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Saturday 18 Nov 2017

उर्दू शायरी की जीवित धरोहर : शायर शकील ग्वालियरी

बीती सदी के वर्ष 1971 में, दूरसंचार विभाग की नौकरी के सिलसिले में, जब मैं ग्वालियर पदस्थ हुआ, उस समय तत्कालीन ग्वालियर में तीन शायरों का बोलबाला था। सर्वश्री डॉ. अख्तर नज़्मी, शमीम फरहत और शकील ग्वालियरी। उस समय तक, निदा फाज़ली ग्वालियर से मुँबई (तब की बंबई) हिजरत कर चुके थे।

डॉ. अख्तर नज़्मी जदीद शायरी के सुपरिचित कवि थे। के.आर.जी. महाविद्यालय में उर्दू के प्राध्यापक। 'व्हाइट कॉलर्ड’तबके के बीच अत्यंत लोकप्रिय। शमीम फरहत प्रगतिशील और जनवादियों की सभाओं के नामचीन शायर थे। पंजवक्ता नमाज़ी, पूरी तरह धार्मिक और आस्थावान शकील ग्वालियरी न जनवादियों-प्रगतिशीलों के फ्रेम में फिट होते थे और न ही 'एलीट’क्लास की महिफलों में उन्हें बुलाया जाता था।

फिर भी, शायर शकील ग्वालियरी में ऐसा कुछ अवश्य था कि उनकी शायरी को नजऱ-अंदाज़ कर पाना मुश्किल था। बँधे-बँधाए किसी भी फ्रेम में फिट न होने के बावजूद, वे क्लासिकल शायरी के एक ऐसे रचनाकार थे- जिनकी सादा-बयानी पहली नजऱ में ही आकर्षित करती थी।

थीम के लिहाज़ से शकील मानवतावादी शायर हैं। जिनके यहाँ अशआर पौधे की तरह उगते हैं। उनकी गज़लें मकान की तरह बनाई गईं कभी नहीं लगतीं। उनकी संपूर्ण शायरी से गुजऱने के बाद महसूस होता है कि वे भारतीय मनीषा के कवि हैं। अनुभूतियों की जितनी विविधता, बहुलता और विपुलता शकील ग्वालियरी की शायरी में दिखाई देती है, वैसे शायर उनके समकालीनों में उँगलियों पर ही गिने जा सकते हैं।

प्रकृति शकील के यहाँ उपादान का काम करती है। अनेक दृश्य-श्रव्य बिम्बों में व्यक्त होते शकील ग्वालियरी के तमाम अशआर पूरी तरह विरल, यादगार और अनूठे हैं। यथा-

कभी जो उड़ती है तितली हमारे आँगन में,

तो उसके साथ हमारी नजऱ भी उड़ती है।

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वहीं से चाँद मेरे साथ-साथ चलने लगा,

जहाँ से खत्म हुई  रोशनी  मकानों की।

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धूप में देखा दरख्तों का खुलूस,

पत्ता-पत्ता मेहरबाँ आया नजऱ।

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धरती से आकाश तक फैली कायनात के मंजऱों को अपनी दृष्टि से देखते हुए, शकील ग्वालियरी कई बार ऐसे-ऐसे मानवीय निष्कर्ष प्रस्तुत करते हैं कि स्तब्ध रह जाना पड़ता है। जैसे उनका यह शेर-

कोई  परिन्दा  नशेमन  अगर  बना  ही   ले,

उसे सँभाल के रखना भी है शजर का काम।

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अपनी आयु के 80 वर्ष पूरे कर चुके शकील ग्वालियरी की शायरी भी लगभग 60 वर्ष का लंबा सफर तय कर चुकी है। इस अवधि में, उनका मिज़ाज पूरी तरह से गज़ल में रच-बस गया है। विविधवर्णी शायरी में, कहीं-कहीं उनका आध्यात्मिक रहस्यवादी कवि-रूप भी प्रकट होता है। लेकिन, वहाँ भी शकील विरल और अनूठे नजऱ आते हैं-

बजा  रहा है कोई साज़ बन्द कमरे में,

लरज़ रहीं हैं छतें सात आसमानों की।

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पूरी तरह से धार्मिक, आस्थावान और आस्तिक शकील ग्वालियरी समावेशी संस्कृति के प्रवक्ता कवि हैं। हर प्रकार की संकीर्णता, साम्प्रदायिकता, यथा-स्थितिवाद और कट्टरता का उन्होंने अपने अशआर में निषेध किया है। उनके ऐसे ही दो उम्दा शेर-

सलाम करके गुजऱता था उस मज़ार को मैं,

पता  चला  कि  किसी  ने ज़मीन घेरी है!

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एक  रस्म  अदा  करने  को आते  हैं यहाँ लोग,

मस्जिद में भी अब कोई मुसलमाँ नहीं मिलता।

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दाढ़ी और टोपी देख कर, आज देश में स्वयं-भू धर्म-रक्षकों द्वारा सड़क पर जिस तरह के अनुचित फैसले और हिंसा की जा रही है, वह अल्प-संख्यकों में लगातार असुरक्षा का भाव बढ़ा रही है। शकील ग्वालियरी द्वारा कहा गया निम्नाँकित शेर आज के समय-संदर्भ में अल्प-संख्यकों के भय, आत्म-हीनता और बेचारगी का जीवंत शेरी दस्तावेज़ प्रतीत होता है-

अपना  सब  कुछ  तो  यहाँ दफ्न किए बैठे हैं,

वक्त पड़ जाय तो हिजरत भी नहीं कर सकते!

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शेरों के साथ, गद्य लिखने में भी शकील ग्वालियरी ने रुचि दिखाई है। 'पत्थरों के शहर मेंÓ उनका एक ऐसा ही दस्तावेज़ी संग्रह है- जिसमें वर्ष 1901 से 1995 के बीच सक्रिय ग्वालियर के शायरों का प्रामाणिक और रोचक वर्णन प्रस्तुत किया गया है। अगर 'गद्य कविता की कसौटी’ है- तो उस नज़रिए से भी शकील ग्वालियरी उल्लेखनीय हैं।

आयु के आठ दशक पूरे करने के बाद भी, वरिष्ठ शायर शकील ग्वालियरी अनथक हैं। कविता के बने और बचे रहने के अवसर के रूप में हम उनकी शायरी को देख सकते हैं। फल की चिन्ता किए बगैर, इतने लंबे समय से वो निरंतर शायरी कर रहे हैं। अगर सच पूछा जाए तो शकील ग्वालियरी जैसे अज़ीम शायर आज उर्दू शायरी की जीवित धरोहर जैसे हैं!