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Saturday 18 Nov 2017

लोक संस्कृति में ज्ञान और ज्ञान बोध

साम्य-27 के अंक में मुक्तिबोध के एक कथन ने सोचने पर मजबूर किया। उस कथन में अनुभव से प्राप्त ज्ञान और उस ज्ञान के सामाजिक रूप को सूत्र रूप में प्रस्तुत कर मुक्तिबोध ने चिंतन का एक नया रास्ता खोल दिया है। कथन इस प्रकार है-

''ठोकर लगने से बुद्धि पैदा होती है, बुद्धि में बोध नहीं जागता। बुद्धि में बोध पैदा होना एक सामाजिक शिक्षा है, एक सुन्दर परिष्कार है, जिसका रक्तमय अनुभव से कोई ताल्लुक नहीं।‘’ (मुक्तिबोध)

इस कथन का हर वाक्य या वाक्यांश अपने आप में 'कोड’ की तरह है। इसे डिकोड करने पर उसकी अर्थ व्यंजना खुलती जाती है और बुद्धि (ज्ञान) एवं बोध का अर्थ खुलते जाता है। ठोकर लगने से बुद्धि पैदा होती है याने ज्ञान के लिए संबंधित वस्तु घटना-संस्कृति, परंपरा तथा समय और काल से टकराना पड़ता है। उससे ठोकर खाना पड़ता है। तभी हम उसका ज्ञान प्राप्त कर सकते हैं। हम ज्ञान या बुद्धि पैदा करने के लिए मोटे-मोटे ग्रंथों से भी टकराते हैं। पर इन ग्रंथों के साथ अपने समय और काल से टकराने तथा ग्रंथ के समय और काल में डूबकर उन घटनाओं में या तो डुबकी लगाने लगते हैं या फिर उस घटना के बहाव में अपने आपको ढीला छोड़ देते हैं। तब हम ज्ञानी तो अवश्य बन जाते हैं पर ज्ञान बोध से बहुत दूर हो जाते हैं।

दूसरा सूत्र वाक्य 'बुद्धि’ में बोध पैदा होना एक सामाजिक शिक्षा है, एक सुन्दर परिष्कार है, यह अपने आप में 'कोड’ वाक्यांश है। इसे डिकोड करने पर ज्ञान के सामाजीकरण की व्यंजना खुलने लगती है। यानि कि ज्ञान और अनुभव से प्राप्त ज्ञान जब तक सामाजिक शिक्षा में या यों कहें कि सामाजिक यथार्थ की शिक्षा से नहीं जुड़ता, वह मात्र अनुभव ज्ञान बनकर रह जाता है। जब वह सामाजिक शिक्षा से जुड़ता है तब इतिहास, भूगोल, समाज शास्त्र, अर्थशास्त्र, राजनीति शास्त्र तथा मानव शास्त्रों से आप ही आप जुडऩे लगता है। उस अनुभव ज्ञान की अर्थ व्यंजना नई धारा में गतिशील होती हुई दिखाई देती है। समाज में घटित होने वाली घटनाओं के कार्य कारण संबंधों को यह ज्ञान बोध तलाशने, खंगालने लगता है। संस्कृति के एक-एक छोटे रेशे में इतिहास, भूगोल को तलाशने लगता है। सामाजिक जीवन एक-एक गति के कार्य कारण को ज्ञान बोध, समाज बोध करवाने लगता है। ज्ञान बोध से ज्ञात कर समाज शास्त्र खुलने लगता है।

ज्ञान बोध को मुक्तिबोध ने एक सुन्दर परिष्कार कहा है। अनुभव से प्राप्त ज्ञान सुन्दर हो सकता है पर वह सुन्दर परिष्कार नहीं हो सकता, ठीक वैसे ही जैसे सुन्दर फूल को हमने देखा। उसकी सुन्दरता पर हम सम्मोहित भी हो गए, सौन्दर्य के प्रति भावुक भी हो गए। और इसी भावुकता के दायरे में बंधकर मगन भी हो गए। सौन्दर्य को भावुकता तक ले जाने का काम ज्ञान करवाता है। पर ज्ञान बोध के साथ लगातार मन में प्रश्न उठता है कि इस सुन्दर फूल को जन्म किसने दिया है, कैसे- क्यों-कौन-कब के प्रश्नों से, जन्म देने वाले पौधे की एक-एक डाली और एक-एक पत्ती में सौंदर्य का परिष्कार होने लगता है। मिट्टी के अंदर घुसी हुई जड़ों में सौंदर्य का परिष्कार होने लगता है। उस फूल के पौधे पर पानी डालने वाले माली के ज्ञान का सौन्दर्य भी ज्ञान बोध के माध्यम से फूल के सौन्दर्य के साथ जुड़ जाता है। इसके साथ ही गर्मी, सर्दी से रक्षा का श्रम शास्त्र भी जुड़ता जाता है। और तब उस फूल के सौन्दर्य का विस्तार सामाजिक सौन्दर्य तक हो जाता है। उसका वैयक्तिक से सामाजिक तक परिष्कार होने लगता है। ज्ञान से ज्ञान बोध, बुद्धि से बुद्धिबोध की यह यात्रा निरंतर चलती रहती है। किन्तु इस यात्रा के आगे ले जाने का काम ज्ञानी के बस का नहीं है। इसे तो ज्ञान बोधी ही अपनी चेतना के विश्लेषक रूप के माध्यम से आगे ले जाने का काम करता है। ज्ञान बोध की ईमानदार सामाजिक शिक्षा से ही फूल की सुन्दरता के रहस्य का भेदन किया जा सकता है।

बुद्धिजीवी वर्ग में ज्ञान और ज्ञानबोध की एक अलग ही भूमिका रहती है। इसमें दो तरह के ज्ञानी होते हैं। एक ज्ञानी वे होते हैं जो संस्कृति के ज्ञान को ही सबसे बड़ी उपलब्धि मानते हैं। जो कुछ वह देखते हंै, अनुभव करते हंै उसी के ज्ञान को वह सर्वज्ञान मान लेते हंै। उदाहरणत: संस्कृति में भेद कर वे नहीं पहुंच पाते। अभिजात संस्कृति और लोक संस्कृति के ग्रामीण रूप तक पहुंच पाना उनके लिए संभव नहीं होता। वे तो जन संस्कृति या लोक संस्कृति के छोटे-छोटे टुकड़े या दायरे में से किसी एक टुकड़ा या दायरा के सांस्कृतिक ज्ञान से ही ज्ञानी बनकर मंत्रमुग्ध हो जाते हैं। हम सबको ज्ञात है कि लोक संस्कृति के जातिवादी, देववादी, धर्मवादी, भाववादी, व्यवसायवादी अलग-अलग दायरे होते हैं। जातिवादी संस्कृति के रीति-रिवाज और प्रभाव अलग-अलग होते हैं। लोधी, तेली, कुर्मी, मरार, नाउ, बरेठ, यादव, दलित सबकी अलग-अलग सांस्कृतिक धाराएं होती हैं। इसमें से किसी एक धारा का ज्ञान ही ज्ञानी के लिए समग्र ज्ञान होता है। इन अलग-अलग धाराओं के मिलन स्थल को न तो वे देख पाते हैं और न ही वहां से सामूहिकता के साथ बहने वाली धाराओं को पहचान पाते हैं। अभिजात संस्कृति इस धारा को संगठित होकर एक प्रवाह में बहने की प्रवृत्ति को रोकने के लिए अपनी पूरी ताकत लगा देती है। इस ताकत के जोर को भी संस्कृति ज्ञानी न तो समझ पाते हैं और न ही देख पाते हैं। वे यह भी नहीं जानते कि अभिजात संस्कृति छोटे-छोटे दायरे की संस्कृति को ही विशेष संस्कृति के रूप में क्यों गौरवान्वित कर रही है। क्यों उसे रेखांकित कर जाति गौरव को ऊपर उठा रही है? इसके पीछे कौन सी राजनीति काम कर रही है? वह नहीं जानता कि माता कर्मा की महाआरती क्यों हो रही है। अवंती बाई का बलिदान महोत्सव क्यों हो रहा है। शाकम्भरी जयंती का उत्सव किन कारणों से परवान चढ़ रहा है। देवांगन समाज की परमेश्वरी देवी के महापुराण का आयोजन क्यों हो रहा है। निषादराज की जयंती क्यों मनाई जा रही है। इन आयोजनों में हर जाति को एक संकुचित दायरे में बांटकर रखने के सांस्कृतिक खेल को ज्ञानी व्यक्ति नहीं समझ पाते। क्योंकि इसे समझना, ज्ञान बोध के बिना संभव ही नहीं है। ज्ञान को ज्ञान बोध में बदलने के लिए सामाजिक शिक्षा जरूरी है। ऐसी सामाजिक शिक्षा जो इतिहास और समाज शास्त्र के भीतर से निकलती है। जब तक कोई ज्ञान इस ज्ञान बोध तक नहीं पहुंच पाएगा तब तक वह संस्कृति के क्षेत्र में होने वाले खेल को भी नहीं समझ पाएगा। उनके अनुभव ज्ञान पर इस तरह की सांस्कृतिक उत्सव धर्मिता का लबादा डाल दिया जाता है। और अनुभव ज्ञान का ज्ञानी एक स्तर पर पहुंचकर इस लबादे को ही अनुभव ज्ञान मानकर महाज्ञानी बनने का सुख प्राप्त कर लेता है। तब तो अनुभव ज्ञान के भीतर उसे झांक कर देखने की फुरसत भला कहां मिल सकती है।

दर्शन के क्षेत्र में भाववाद और भौतिकवाद बुद्धिजीवी वर्ग में बेहद प्रभावशाली रहा है। भाववाद अतीत की ओर जाकर सामाजिक स्थिति को विवेचित करने का प्रयास करता है जबकि भौतिकवाद के सामाजिक विश्लेषण का मूल आधार विज्ञान होता है। इसी आधार पर वर्तमान बुद्धिजीवियों अथवा ज्ञान बोधियों के दो वर्ग साथ-साथ दिखाई देते हंै। एक वर्ग प्रतिगामी वर्ग है और दूसरा प्रगतिशील विचारधारा का। ये दो रूप सामाजिक विश्लेषण और सांस्कृतिक विश्लेषण में स्पष्ट रूप से दिखाई देते हंै। संस्कृति को इसी आधार पर विश्लेषित कर समाज की संस्कृति से, मानव की संस्कृति से सत्ता की संस्कृति में बदल दिया जाता है। सत्ता का उद्देश्य जन समाज को लंबे समय तक अपने अधीन रखना होता है। इसलिए जन संस्कृति को अपने ढंग से गौरवान्वित कर रुढि़, अंधविश्वास, तंत्र-मंत्र, जादू-टोना, चमत्कार, अवतारवाद की सांस्कृतिक चेतना में बांधकर रखना सत्ता के लिए निरापद होता है। सत्ता के बुद्धिजीवी सत्ता से जुड़कर इसीलिए लोक सांस्कृतिक की प्रतिगामी व्याख्या करते हैं। लोक संस्कृति के तीज त्यौहार, पर्व, उत्सव, रीति-रीवाज, नेग दस्तूर पर धर्मवाद का मुलम्ममा इस तरह चढ़ाया जाता है कि मुलम्मा ही संस्कृति के रूप में दिखाई देने लगता है। ये बुद्धिजीवी इस मुलम्मे को ही जन संस्कृति का वास्तविक जामा पहनाने में अपनी पूरी बौद्धिक ताकत लगा देते हैं। सत्ता उनके इस प्रतिगामी ज्ञान बोध को धारदार बनाने के लिए अपनी शक्तियों को इनके साथ जोड़ देती है। इन्हीं प्रतिगामी शक्तियों के कारण झंझा, रूद्र बन गया। रूद्र को शिव बनाकर अनार्य देव बना दिया गया। हरेली की प्रकृति पूजा को 'दूल्हादेव’ की पूजा से जोड़ दिया गया। 'भोजली’ के रूप में सावन की हरियाली की पूजा 'भोजली माता’की पूजा में बदल जाती है। मातृशक्ति का पर्व 'हलषष्ठी’ शिव-पार्वती के पर्व में रूपांतरित हो जाती है। 'पोरा’ का बैल 'नंदी’ बन जाता है और मातृशक्ति की पूजा का पर्व जंवारा कई नामधारी देवियों में तब्दील हो जाता है। याने प्राकृतिक शक्तियों के धार्मिक दैवीयकरण की प्रक्रिया प्रतिगामी शक्तियां आदिम काल से लगातार करती आ रही हैें और सत्ता का सहयोग करती आ रही हैं। इसके लिए तरह-तरह के किस्से कहानी गढ़े जाते हैं। जिसमें इतिहास को मिथ में बदल दिया जाता है और प्रकृति की शक्तियों को ईश्वरीय शक्ति का रूप दे दिया जाता है। तरह-तरह की 'लीजेण्ड’ कथाएं लोककथा की तर्ज पर गढ़ ली जाती हंै। इसका परिणाम यह होता है कि लोक समाज अंधविश्वास का शिकार होने लगता है। जादू-टोना पर विश्वास करने लगता है। भाग्यवाद और नियतिवादी, पुनर्जन्यवाद, मोक्षवाद, पूजावाद आदि उनकी सामाजिक संस्कृति अथवा जन संस्कृति का हिस्सा बन जाता है।  प्रतिगामी ज्ञानबोधी जन संस्कृति को प्रतिगामी विचारधारा के अनुसार लगातार बदलने का प्रयास करते हैं। सत्ता जन संस्कृति के विकास के नारे के साथ इसका प्रचार-प्रसार करती है। मीडिया इस सांस्कृतिक बदलाव का गौरव गान करती है। वर्तमान की खुशियां अतीत में तलाशी जाती हैं। सामाजिक विकास में विज्ञान की भूमिका के स्थान पर धर्म, रुढि़वादी धर्म की भूमिका को सर्वोपरि मानी जाती है। व्रत और कथा, पुराण की नई-नई धारा अनवरत प्रवाहित होने लगती है। लोक समाज को धर्मवाद-देववाद की पिनक में मदमस्त करने का प्रयास किया  जाता है। इससे लोक संस्कृति के परंपरागत विकास की धारा बहने लगती है और  समाज में 'भारतमाता की महाआरती’ दीपावली में 'सुरहुति’ के स्थान पर लक्ष्मी की मूर्ति स्थापना, गौरी-गौरा की लोक संस्कृति को क्षेत्रीय दर्जे का बना देना,'हाथा’ की परंपरा का विलुप्त होता जाना, पोला में 'पोरा पटकने’ की संस्कृति का भगवाकरण कर देना, मातर का राजनीतिकरण करना, तरह-तरह के नये-नये देवी देवताओं के नाम पर एक दिवसीय या तीन दिवसीय या पांच दिवसीय यज्ञ करना, 'गोदभराई’ को सरकारी उत्सव में बदल देना, 'अन्न प्रासन्न’ का संस्थागत रूप करना देवा आदि प्रतिगामी संस्कृति का रूप सामने आने लगता है। प्रतिगामी ज्ञान गोपियों के इन प्रयासों से लोक संस्कृति से लोक समाज दूर होने लगता है और एक नई प्रतिगामी संस्कृति के रस रंग में डूबने उतरने लगता है।

ज्ञान बोधियों का एक वर्ग प्रगतिशील बुद्धिजीवियों का है। यह वर्ग लोक को उसके इतिहास और सामाजिक यथार्थ के साथ देखने का प्रयास करता है। वह सब कुछ वैज्ञानिक दृष्टि से देखता है। लोक संस्कृति के अपने अनुभव को इतिहास और समाज शास्त्र के साथ छांटता निखारता है। उसकी विकासशील और संघर्षशील परंपरा को जानने समझने की कोशिश करता है। इस वर्ग के ज्ञानबोधी यह मानते हैं कि मानव सभ्यता और संस्कृति का विकास प्रकृति के साथ लगातार संघर्ष और नई-नई खोज का इतिहास है। वे 'चकमक’ की आग से 'जंवारा का जोत’ जलाने अथवा चकमक की आग से ही 'होलिका’ में आग देने में मानव की परंपरा के भीतर इतिहास की तलाश करता है। बलराम के कंधे पर हल का हथियार होने के मिथ में उसे कृषि संस्कृति का इतिहास दिखाई देता है। हलषष्ठी में 'पसहर चाउंर’, भैंस का दूध-दही, अथवा 'लाई’ के प्रसाद में महुआ फूल की अनिवार्यता में समाजशास्त्र का पूरा इतिहास दिखाई देता है। 'सगरी’ में आदिमकाल से मानव संस्कृति के विकास में जल के महत्व का इतिहास तलाशता हुआ दिखाई देता है।

इतना ही नहीं लोक संस्कृति की छोटे-छोटे रस्मों में, जहां एक ओर मिथ का लबादा दिखाई देता है वही लबादा को हटाते ही समाजशास्त्र और इतिहास को आसानी से देखा जा सकता है। किन्तु मिथ का लबादा अथवा ओढऩा हटाना न तो ज्ञानी व्यक्ति के बस की बात है न ही प्रतिगामी ज्ञानबोधी व्यक्ति के बस की बात है। ज्ञानी व्यक्ति तो जो जैसा है उसे उसी रूप में देखकर अपने ज्ञानवृद्धि की आत्ममुग्धता में मगन हो जाता है। जबकि प्रतिगामी ज्ञानबोधी व्यक्ति या तो मिथ के लबादे को, कलरफुल ओढऩी को ही सत्य मान लेता है और जानबूझकर लबादा नहीं उठाता अथवा वह जानता नहीं कि लबादे के भीतर भी कुछ है, वह नहीं जानता कि लबादे का आकर्षक रूप छलावा है या धोखा है या फिर भ्रम में डालने वाला वस्तुसत्य है। इसलिए लबादे के मिथ को लोक जीवन में परस देता है और लोक समाज अपनी संस्कृति में लबादे का उपयोग कर एक अलौकिक स्वाद का आनंद लेता रहता है। प्रतिगामी ज्ञान बोधी उस पर नित्य नया लबादा डालते रहता है। लबादे की परतें इतनी अधिक चढ़ा दी जाती है कि संस्कृति का मूल वजूद गायब सा हो जाता है। प्रगतिवादी ज्ञानबोधियों को भी उन परतों को हटाने के लिए बहुत अधिक मशक्कत करनी पड़ती है। एक परत हटाने के बाद उसके सामने दूसरा मिथकीय रूप खड़ा हो जाता है। यहीं परतों के उलझन में बहुत से प्रगतिगामी ज्ञानबोधी भी उलझकर रह जाते हैं। और लोक संस्कृति को धार्मिक रुढिय़ों और अंधविश्वासों के नजरिए से देखने लगते हैं और लोक संस्कृति को समाज विरोधी अथवा मानव विरोधी मानने लगते हैं। यह सही है कि लोक समाज अपनी संस्कृति को धर्म, देवी-देवता अथवा अलौकिक शक्ति के रूप में ही देखता है। उनकी यह दृष्टि हजारों वर्षों की मेहनत से प्रतिगामी शक्तियों ने बनाई है। वैदिक काल से लेकर 21वीं सदी तक लोक संस्कृति पर धर्मवाद और देववाद छाया है, उससे कैसे मुक्त हो सकता है। किन्तु उनकी संस्कृति के छोटे-छोटे रेशों को आज वैज्ञानिक दृष्टि और सामाजिक यथार्थ, मानव विकास के यथार्थ के नजरिए से देखेंगे तो उन रेशों में इतिहास का सच और समाज का यथार्थ दिखाई देने लगता है।

प्रगतिगामी ज्ञानबोधी इन्हीं रेशों को सुलझाने का प्रयास करते हैं। वे ज्ञानबोधी जिनके पास वैज्ञानिक दृष्टि और सामाजिक यथार्थ के गतिशीलता की समझ होती है। तब उन्हें गौरी-गौरा के सृजन के लिए 'कुंआरी माटी’में इतिहास भी दिखाई देता है और आदिम समाज से लेकर आज तक की परंपरा का सामाजिक यथार्थ भी नजर आने लगता है। 'कुंआरी माटी’ को कुंआरी कन्या के आंचल में डालने में उन्हें विवाह पूर्व की सामाजिक व्यवस्था का इतिहास शास्त्र और समाजशास्त्र दोनों दिखाई देने लगता है। गौरी-गौरा के विवाह के आयोजन में इतिहास की और सामाजिक व्यवस्था की गतिमानता बोलती हुई दिखाई देती है। एकल विवाह के पूर्व की सामाजिक व्यवस्था और उसके यथार्थ को ऐसे ज्ञानबोधी आसानी से देख लेता है और रेशों की रस्मों के रूप में पहचान भी लेता है। फूल कुचरने और चावल चढ़ाने की रस्मों में गौरा गुड़ी पर महिलाओं को चढऩे से वर्जित करने में मातृसत्ता और पितृसत्ता का द्वन्द्व ज्ञानबोधी को मुखर होता दिखाई देने लगता है।

इसी तरह मातृशक्ति की पूजा का पर्व जोत जंवारा में भी दिखाई देता है। यह तभी संभव है जब कोई प्रगतिगामी ज्ञानबोधी उसे वैज्ञानिक नजरिए से देखता है। प्रतिगामी शक्तियों और प्रतिगामी ज्ञान बोधियों ने तो इसे देवी मंदिरों में सार्वजनिक जोत जलाने के उत्सव में बदलकर बाजारवाद से जोडऩे में कोई कसर नहीं छोड़ी है। फिर भी लोक तो लोक है उसकी संस्कृति, परिवार की परंपरा या 'मानता’ या घर की 'मानता’ के आधार पर जिस 'जोत जंवारा’ का आयोजन होता है उसके रस्मों के एक-एक रेशों को प्रगतिगामी ज्ञान बोधी उलट-पलट कर देखता है। उसमें कभी इतिहास की तलाश करता है तो कभी समाजशास्त्र की गुत्थियों को सुलझाता है। तो कभी प्राकृतिक शक्तियों के साथ लोक समाज से जुड़ाव के तानों बानों की परख करता है। सात स्थान से मिट्टी लाने की परंपरा के समाज के विकास के साथ 'गेहूं खेत की माटी’ या नदी के कछार की माटी में कैसे बदला, ज्ञान बोध वाला व्यक्ति उसकी पड़ताल करते हुए कार्य कारण संबंधों की तलाश करता है। जहां ज्ञानबोधी की वैज्ञानिक दृष्टि नहीं पहुंच पाती वहां वह लोक के पास जाकर अपनी वैज्ञानिक दृष्टि की धार को तेज करता है। दो शेरों के लडऩे के स्थान, दो हाथियों के लडऩे के स्थान, दो सांडों के लडऩे के स्थान, सर्प की बांबी के स्थान, पहाड़ की, मैदान की और वैश्या के आंगन की माटी से जंवारा के 'फुलवारी’ की परंपरा, धान खेत, कोदो खेत, चना खेत, गेहूं खेत, मसूर खेत, अलसी खेत और लाख खेत अथवा नदी के कछार की माटी में कैसे बदलती गई इसे ज्ञान बोधी व्यक्ति इतिहास की गति में होने वाले परिवर्तन के रूप में देख भी लेता है और पहचान भी लेता है। जबकि प्रतिगामी ज्ञानबोधियों के लिए इसका कोई अर्थ नहीं होता। वह तो देवी की महिमा गान के साथ देवी पुराण की रचना करने में मगन रहते हैं। और देवी पुराण की मिथ कथा को लोक संस्कृति पर लादने में पूरी शक्ति के साथ लगे रहते हैं।

बिरही भिगोने में ज्ञानबोधी बुद्धिजीवी पितृसत्ता के वर्चस्व को भली-भांति पहचान लेता है। फुलवारी के लिए 'बिरही भिगोने’ वाले घड़े में नदी या तालाब का पानी लाने की रस्म में भी इतिहास और समाजशास्त्र का द्वन्द्व स्पष्ट दिखाई देता है। किन्तु इस द्वन्द्व को देखने के लिए ज्ञान बोधी की दृष्टि का समुचित विकास जरूरी होता है। अन्यथा उसे सड़ी-गली परम्परा मानकर आगे बढ़ जाने के सिवाय उसके पास कोई चारा नहीं रह जाता। घर की बड़ी बहू जब मुंह अंधेरे सुबह मिट्टी ढककर लाई हुई साड़ी को पहनकर सिर में घड़ा रखकर घर के दरवाजे से बाहर निकलती है तो प्रगतिशील ज्ञान बोधी के मन में बार-बार यह सवाल दस्तक देता है। घर की बड़ी बहू ही क्यों? मुंह अंधेरे में एक नारी ही क्यों? तब इतिहास की परतें खुलने लगती है और जब उसके आगे-आगे उसके ही पति को झाड़ू लगाते हुए गली में चलते देखता है तो इतिहास का सच और सामाजिक व्यवस्था का यथार्थ एक साथ मुखर होकर बोलने लगता है। मातृसत्ता का क्षरण और पितृसत्ता के प्रारंभिक काल का द्वन्द्व खुलकर सामने आ जाता है और समय की गति के बढ़ते हुए कदम की पदचाप स्पष्ट ही सुनाई देने लगता है। देवी की भक्ति में लीन, देवी के चमत्कारिक व्यक्तित्व के मिथ में मगन रहने वाले ज्ञान बोधी को न तो यह पदचाप सुनाई देती है न ही इस पदचाप को देखने की उनके पास दृष्टि ही होती है। लोक संस्कृति के इन रस्मों की भाषा को समझने के लिए उनके पास कोई कोष भी नहीं होता। उनके पास केवल मिथ की भाषा का कोष होता है जिसकी बदौलत वह महाज्ञानी का ताज पहनकर लोक समाज में पूजित होता है और दूसरा ज्ञान बोधी वर्ग पत्र-पत्रिकाओं में छपकर प्रसन्न हो जाता है। लोक संस्कृति इस यथार्थवादी, इतिहासवादी चेतना को लोक तक के ले जाने के लिए कोई सार्थक प्रयास न होना भी लोक संस्कृति के धर्मवादी रूप को स्थापित होने से रोक पाने में असमर्थ हो जाता है।

लोक संस्कृति के पर्व त्यौहारों में इतिहास के इन रूपों को ज्ञान बोधियों द्वारा सामने लाने से लोक के विकास की कई परतें खुल सकती है जिससे मानव विकास, मानवीय संस्कृति की धारा और मानव की संघर्षशीलता के गूढ़ रहस्य को खोलने में मदद मिल सकती है। लोक संस्कृति का महत्वपूर्ण पर्व 'मातर मड़ई’ को माना जाता है। जो मिथ की कई परतों में लिपटा हुआ है। ज्ञानी व्यक्ति इन्हीं मिथकीय परतों को न केवल मातर मड़ई के रूप में देखता है वरन उसे ही पर्व के यथार्थ के रूप में स्थापित करने का प्रयास भी करता है। फलस्वरूप इन परतों के भीतर छुपा हुआ पर्व का मूल कलेवर न तो लोक में दिखाई देता है न ही सुधि पाठकों को। ज्ञान की अंतिम सीमा मिथ को ही मान लिया जाता है। इस तरह ज्ञानी व्यक्ति कई पुराणों का उदाहरण देकर इस मिथ को ही इतिहास बना देता है और समाजशास्त्र के महाज्ञान का हवाला भी देता है। इन ज्ञानी पुरुषों में अधिकांश पुराणपंथी होते हैं। ये वे प्रतिगामी ज्ञानबोधी होते हैं, जो लोक के चरम विकास को अतीत में देखते हैं। आज के विज्ञान के चरम विकास का सूत्र वे अतीत की मिथ कथाओं में तलाशते हुई दिखाई देते हैं। और अतीत के महिमा मंडन में अपनी पूरी जिन्दगी खपा देते हैं। लोक कला 'मड़ई’ जो लोक पर्व 'मातर’ का अभिन्न अंग माना जाता है, पर इन्द्रध्वज के मिथ का बाना चढ़ा दिया जाता है। मड़ई को इन्द्रध्वज की महिमा से मंडित कर लोक संस्कृति की उत्पत्ति को आर्यों की संस्कृति से जोड़कर यह सिद्ध किया जाता है कि लोक ने जो कुछ सीखा वह आर्यों से सीखा जो कुछ पाया वह आर्यों से पाया,जो कुछ ज्ञान अर्जित किया वह आर्यों से किया। इस तरह लोक को अपने सब तीज त्यौहारों और पर्वों के लिए आर्यों पर निर्भरता का सांगरूपक डाला गया। लेकिन ज्ञान बोधी प्रगतिगामी व्यक्ति आर्य-अनार्य के सांस्कृतिक द्वन्द्व की धड़कनों को अपने वैज्ञानिक हाथों से टटोल-टटोलकर देखता है। इतिहास और पुराण के पन्नों को पलटता है। मिथ की परतों को उखाड़ता है। ये वे प्रगतिगामी ज्ञान बोधी होते हैं, जो प्रगतिशीलता के रुढि़वाद से मुक्त होते हैं और लोक को गंवार मानने पर विश्वास नहीं करते हैं। ऐसे ज्ञान बोधी जब पुराण की मिथ कथाओं का सत्य जानने की कोशिश करते हैं, तब उन्हें पता चलता है कि आर्यों द्वारा इन्द्रध्वज का पर्व भाद्रपक्ष द्वादशी के दिन मनाया जाता रहा है। इस दिन सवर्ण आर्यन घरों के बाहर इन्द्र का ध्वज लगाकर उत्सव मनाया जाता रहा है। ये ज्ञान बोधी यहीं तक सीमित नहीं रहे। इनके मन में मिथ का यह प्रश्न बार-बार कुलबुला रहा था कि क्या मड़ई ही इन्द्रध्वज है? क्या मड़ई की रचना आर्यों ने ही की? क्या निम्न पिछड़े वर्ग के लोगों की इसमें कोई भूमिका नहीं है? इन प्रश्नों का उत्तर तलाशने खोजी ज्ञानबोधी लोक के निम्न वर्ग के लोगों के पास जाता है तो उन्हें लोक के सांस्कृतिक मंच का एक अलग ही रूप दिखाई देता है जिसका मड़ई के इन्द्रध्वज की मिथ के साथ दूर-दूर तक का भी संबंध दिखाई नहीं देता। 'इन्द्रध्वज’ और 'मड़ई’ की रचना की तिथि भी मेल नहीं खाती। खोजी ज्ञानबोधी 'देवारी’ (अन्नकूट) के दिन मछली मारकर, भूंजी सुखसी बेचकर जीवन यापन करने वाले निषाद के दरवाजे को खटखटाता है। जिसे गांव के लोग मछंदर कहते हैं। उनके आंगन में मड़ई की रचना हो रही होती है। बांस की 10-12 फीट लम्बी डांड़ में सात पंक्ति, गुणा के क्रास में लगाते हुए देख रहा है। सूमा डोरी (कांस की रस्सी) परसे के जड़ के गुच्छे और गोदलइया कांदा के चमकदार परतों से सजाया जा रहा है। और ऊपर के भाग में मयूर पंख का गुच्छा लगाकर मड़ई को तैयार कर देवधरा में लिटाते हुए देख रहा है। उसे मातृशक्ति का रूप मानकर उस पर लाल या सफेद, घर की चलन के अनुसार साड़ी ओढ़ाया जा रहा है। और घर की मातृशक्ति बड़ी बहू उसकी पूजा की शुरूआत कर रही है। फिर बारी-बारी घर के सभी पुरुष पूजा कर रहे हैं। और पूजा के बाद उस 'मड़ई’ को तुलसी चौरा के बगल में खड़ा किया जा रहा है।

उस खोजी ज्ञानबोधी व्यक्ति को मिथ की कई परतें लोक की तेज आंधी में उड़ती हुई दिखाई देती है। इन्द्रध्वज का आर्य मिथ हवा में उड़ता हुआ दिखाई देता है, यहां ज्ञानबोधी को मातृसत्ता की अनार्य परंपरा और मानव की संघर्षशीलता के भीतर से कला का जन्म होता हुआ दिखाई दे रहा है। लोक ने अपने यथार्थ से आर्यों के सारे मिथकीय इतिहास को नकार दिया है। ज्ञानबोधी प्रगतिशील, बुद्धिजीवी मड़ई की प्रतिगामी परिभाषा से लोक कला को बाहर निकाल लेता है जिसमें न मिथ है, न आर्य है, न सवर्ण है न ही अनुगामी चिंतन है, जिसमें कला की रचना को ईश्वरीय देन के रूप में मान लिया जाता है। कला को लोक की सम्पूर्णता के साथ प्रगतिगामी ज्ञान बोधी ही देख सकते हैं।

वैसे ही मातर पर्व तमाम मिथकों के घेरेबंदी में बैठे हैं। चाहे वह 'खोड़हर’ का मिथ हो अथवा खोड़हर में 'नोई’ लटकाने का मिथ या फिर 'डांड़ खेलाने’ का मिथ। पशुपालन युग की सामाजिक व्यवस्था और समाज शास्त्र को प्रतिगामी ज्ञानबोधियों ने आर्य सभ्यता के मिथ में लपेटकर लोक के यादव जाति के इस पर्व को देवी देवता के साथ जोड़कर उसके लोक रूप को विरूपित करने का प्रयास किया गया है। ज्ञानी व्यक्ति तो उसकी मोटे-मोटे रस्मों को देखकर अनुभव ज्ञान में ही मगन हो जाता है और अपने आपको लोक संस्कृति का ज्ञानी सिद्ध कर देता है। इन ज्ञानियों में, जिसने इस पर्व की छोटी-छोटी रस्मों को पकड़कर अपने अनुभव ज्ञान में इजाफा कर लिया है, वह लोक संस्कृति का महाज्ञानी कहलाने लगता है। किन्तु प्रगतिगामी ज्ञान बोधी एक-एक छोटे-छोटे अनुभव ज्ञान को इतिहास और तत्कालीन समाजशास्त्र से टकरा-टकरा कर देखता है। वह तब तक टकराते रहता है जब तक मानव समाज की संस्कृति का सूत्र उस अनुभव ज्ञान के मिथकीय रूप से निकलना शुरू नहीं हो जाता। इस लोक पर्व की सांस्कृतिक काया को पशुपालन युग का पर्व मानकर ही संतुष्ट नहीं हो लेता वरन पशुपालन युग की किस अवस्था में यह पर्व शुरू हुआ होगा, क्यों हुआ होगा, आदि सूत्रों से उलझे हुए सूत्र को अपने इतिहास ज्ञान के आधार पर सुलझाता है। 'खोड़हर’ को पशुधन की रक्षा करने वाली मातृशक्ति के रूप में जब वह देखता है तो उसके सामने पशुपालन युग के प्रारंभिक अवस्था का इतिहास खड़ा हो जाता है। और खोड़हर से लेकर 'गोहही’ और 'दइहान’तक की सांस्कृतिक यात्रा को वह गतिमान होते हुए देखने लगता है। पशुपालन युग के प्रारंभिक काल में सारे पशु 'गोहड़ी\’ रहे हैं। किसी विशिष्ट अर्थ में बाद में रुढ़ होने की अर्थ व्यंजना को भी ऐसा ज्ञानबोधी बखूबी समझने लगता है।

'डांड खेलाने को जिन व्यक्तियों ने मौज-मस्ती और आनंद उत्साह का रस्म माना और प्रतिगामी ज्ञानबोधियों ने जिसे देवी को बलि देने की प्रथा से जोड़ दिया उसे प्रगतिशील ज्ञान बोधियों की वैज्ञानिक दृष्टि ने सामाजिक यथार्थ के साथ देखने की कोशिश की। पशुपालन युग के प्रारंभिक काल में उनकी नजर में सबसे बड़ा संकट पालित पशुधन के हिंसक जंगली जानवरों से रक्षा का संकट दिखाई दिया। इसके लिए पालित पशुधन को अपने खुद की रक्षा के लिए प्रशिक्षित करने की पशुपालक मानव समाज की चेतना को पकडऩे की दृष्टि उस यथार्थवादी ज्ञान बोधी के पास ही हो सकती है। डांड खेलाना वास्तव में पशुओं को अपनी रक्षा के लिए तैयार करने का पशुपालन युग का तरीका ही माना जा सकता है। बोरे में बंद और पशुओं के आगे-आगे घसीटने से निकलने वाले मुर्गे की आवाज में पशुधन को हिंसक जानवरों की आवाज का आभास होने और लामबंद होकर पूरे वीरता पूर्ण उन्माद के साथ उसके पीछे भागते हुए पशुधन को देखने में ज्ञानबोधी व्यक्ति को उस युग का एक जीता जागता यथार्थ ही दिखाई देता है। इस सत्य तक प्रतिगामी दृष्टि वाले ज्ञानबोधी का पहुंच पाना संभव ही नहीं है और ज्ञानी तो 'डांड खेलाने’ के आनंद में इतना डूब जाता है कि उससे बाहर निकलने की कोशिश भी नहीं कर पाता। पशुधन का यही प्रशिक्षण उसे शेर, चीते, तेंदुए जैसे जंगली जानवरों से बचाने में अमोध हथियार के रूप में तत्कालीन समाज में रहा होगा। इसे सत्यानवेशी ज्ञानबोधी ही अच्छी तरह समझ सकता है।‘

प्रतिगामी ज्ञानबोधी लोक संस्कृति को जातियों के छोटे-छोटे समूह में बांटकर उसे जाति विशेष की संस्कृति में तब्दील करने का प्रयास करता है। क्योंकि ऐसे बुद्धिजीवी मनुवादी सामाजिक व्यवस्था पर न केवल विश्वास करते हैं वरन उसे ही समाज का सत्य और समाज की संस्कृति मानते हंै। वे मानते हैं कि वर्णव्यवस्था सनातन है और दलित और पिछड़ी जातियों की संस्कृति उनकी अपनी संस्कृति है। सवर्णों की संस्कृति ही समाज और राष्ट्र की संस्कृति हो सकती है और एक हद तक वही लोक की भी संस्कृति हो सकती है। दलित और पिछड़ी जातियों की संस्कृति में इसीलिए सवर्ण संस्कृति के देववाद का आरोपण कर दिया जाता है। यही वजह है कि 'मातर’ को एक ओर तो विशुद्ध रूप से देवीपूजा का पर्व मानने पर लोक को विवश किया जाता है तो दूसरी ओर इसे यादवों का ही पर्व मानने की भावना लोक समाज में भर दी जाती है। जैसे 'गउरी-गउरा’ को गोड़ आदिवासियों का पर्व घोषित कर दिया जाता है। और उसे इसी रूप में विशेषीकृत कर गौरवान्वित किया जाता है। तब ये प्रतिक्रियावादी बुद्धिजीवी भूल जाते हैं कि मातर पर्व में पूरा गांव दइहान में क्यों एकत्रित होकर गांव के पर्व के रूप में मनाते हैं। इस प्रश्न का भी उनके पास कोई उत्तर नहीं होता कि दइहान में खीर बनाने के लिए हर घर से 'पायली आधा पायली’ चावल क्यों निकल आता है? गांव के जिन घरों में 'दुहानी’ गाय होती है, इस दिन उस गाय के दूध पर राउतों को अघोषित अधिकार क्यों दे दिया जाता है। गौरा में 'करसा परघनी’ गांव के दूसरी जाति के सम्पन्न घरों में क्यों की जाती है? और 'करसा’ मिट्टी की लाल हांडी को उस घर के चावल या गेहूं या चना से क्यों भर दिया जाता है। ऐसी परंपरा के चलते उन पर्वों को जाति विशेष का पर्व कैसे माना जा सकता है? जहां पूरा गांव तन-मन और धन से इस पर्व से जुड़ गया हो, ऐसा पर्व तो लोक पर्व ही माना जा सकता है। लोक तो खासकर लोक की दलित और पिछड़ी जातियां, किसी पर्व और तीज त्यौहार में एक साथ जुड़ जाता है और उसे पूरे लोक का पर्व बनाने में कोई कसर नहीं छोड़ता। लोक का हर पर्व पूरे गांव या लोक का सामूहिक पर्व हो जाता है। लोक अपना पर्व मानकर अपने रिश्तेदारों को आमंत्रित कर अपना होने का परिचय देता है। 'आज हमर गांव मा मातर हे, मातर देखे बर आहू ममा’ , आज हमर गांव मा मड़ई देखे बर आहू, भांचा, साला-साली, सास-ससुर का पैगाम भला लोक संस्कृति को जातिवादी संस्कृति में कैसे समेट सकता है। यहां प्रतिगामी बुद्धिजीवी की जातिवादी सोच के भीतर लोक संस्कृति के लोक रूप का भय व्याप्त होता है और अपनी सवर्णवादी तथाकथित आर्य संस्कृति के दोयम दर्जे में आने और नष्ट होने के खतरे का भय ही उनके समूचे सोच-विचार और चिन्तन को प्रभावित करता है। उनमें यह भी भय होता है कि लोक संस्कृति की समूहवादी चेतना कहीं सवर्ण संस्कृति के सामूहिक विरोध में खड़ी न हो जाय। इसलिए यह वर्ग मिथ का सहारा लेकर लोक संस्कृति को जातिवादी खांचे में बांटने के लिए बुद्धिजीवियों का एक पूरा दल तैयार करता है। यह दल आर्य संस्कृति में स्थापित करने का प्रयास करता है।

प्रतिगामी ज्ञानबोधियों के इस दल के द्वारा लोक संस्कृति के महत्वपूर्ण पर्व होली को प्रहलाद की मिथ कथा से जोड़ दिया जाता है। होलिका जो कि हिरण्यकश्यप की बहन थी, आग में न जलने के मिथकीय वरदान पाकर प्रहलाद को जलाने के लिए अपनी गोद में बैठाकर होली के ऊपर बैठ जाती है और विष्णु का नरसिंह अवतार हिरण्यकश्यप का वध करता है। बुद्धिजीवियों के इस दल की नैतिकता और लोक की नैतिकता की परिभाषा अलग-अलग होती है। प्रतिगामी बुद्धिजीवियों की नैतिकता हिरण्यकश्यप को अधर्मी और अपराधी मानती है। जबकि लोक की नैतिकता उनके खून चूसने वाले 'खटमल और किन्नी’ और सिर के जूं को अपराधी मानती है और होली में गोबर के गोले के भीतर डालकर स्वाहा करती है। लोक की यह नैतिकता जीवन के यथार्थ से जुड़ी हुई नैतिकता है जबकि प्रतिगामी शक्तियों की नैतिकता मिथकीय नैतिकता है। होली के मिथकीय रूप को प्रगतिशील बुद्धिजीवी मानव सभ्यता के इतिहास के साथ जुड़कर तोड़ते हैं। होली जलाने की रस्म में मानव इतिहास बोल रहा होता है। चकमक पत्थर के आदिम आग से होली जलाना। होली जलाने में 'खदर’घास का उपयोग, होली जलाने वाले बैगा का 'तोलगी’ खोलकर होली जलाना उस इतिहास की ओर संकेत करता है जब आदिम मानव ने आग के अविष्कार के बाद अपनी रक्षा के लिए महारिन जलाई होगी। लकड़ी के ढेर पर आग लगाने के लिए आदिम घास 'खदर’ को चकमक की आग से पहले जलाया होगा इसलिए बैगा या गांव का ओझा भी अर्धनग्न होकर होली जलाता है। कालान्तर में महाग्नि जलाने के शुभ दिन ही मानव समाज में होली के पर्व के रूप में विकसित हुआ होगा। लोक समाज और लोक संस्कृति मानव विकास के साथ विकसित होती हुई परंपरा को ही अपने पर्व के रूप में मानता है। लोक समाज को उस मिथकीय कथा से कोई लेना-देना नहीं होता।

तथाकथित ज्ञानी अथवा सवर्णवादी प्रतिक्रियावादी ज्ञानबोधी ज्ञानबोध से एक अलग मानव समाज की रचना करता है और प्रगतिशील ज्ञानबोधी एक अलग मानव समाज की कल्पना करता है। लोक समाज इन दोनों से हटकर अपनी संस्कृति का विकास करता है जिसमें अपनी समग्र विशेषता के साथ लोक ही मौजूद होता है। इस लोक संस्कृति का प्राणतत्व उनकी परंपरा ही होता है। इसलिए लोक संस्कृति के प्राणतत्व की रक्षा के लिए वह अपनी परंपरा, प्रथा तथा रस्मोंं को पूरी ताकत के साथ पकड़ रखता है। उसे चाहे प्रतिवादी बुद्धिजीवी धर्मवाद और मिथवाद में बांधने की प्रथाएं हो अथवा रुढि़वादी प्रगतिशील ज्ञानबोधी लोक को अंधविश्वासी, दकियानूसी, परंपरावादी, पिछड़ा और बुद्धिहीन कहता रहे। उनको इन सब विचारों या कथनों से न तो कोई लेना-देना होता है न ही वे इससे प्रभावित होते हैं। 'कुत्ता भंूके हजार, हाथी चले बाजार’ की तरह वे अपने रास्ते ही चलने पर विश्वास करता है। इतिहास और समाजशास्त्र से गतिमान वैज्ञानिक दृष्टि से लोक संस्कृति को देखने वाले ज्ञान बोधियों की हत्या भी कर दी जाती है। ऐसे ज्ञानबोधियों के ज्ञानबोध को लोक समाज तक पहुंचाने, लोक समाज में लोक संस्कृति को लेकर नई चेतना जगाने, अपनी संस्कृति के प्रगतिशील आयामों को लोक समाज में जानने, समझने की समझ पैदा करने का कार्य संस्थागत योजनाओं के माध्यम से होना चाहिए। वह नहीं हो पा रहा है। लोक संस्कृति को उपेक्षा और हिकारत की दृष्टि से देखने की कुंठा से बाहर निकलकर लोक संस्कृति को पुख्ता ज्ञानबोध के माध्यम से देखने का समय आ गया है। खासकर भूमण्डलीय और वैश्विक गांव के अपसंस्कृतिकरण के दौर में।