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Wednesday 22 Nov 2017

प्रस्तावना

31जुलाई। प्रेमचंद जयंती। देश में अनेक स्थानों पर हर साल की तरह इस बरस भी कार्यक्रम हुए। प्रेमचंद को याद किया, विद्वानों ने उन पर व्याख्यान दिए, उनके चित्र पर माला पहनाई गई। यह सब कुछ वैसे ही हुआ होगा जैसा अमूमन होता आया है। प्रेमचंद जयंती हो या अन्य किसी महापुरुष की, उन्हें याद करने की एक लीक सी बंध गई है जिससे हटकर चलने की बात कम ही सोची जाती है। लेकिन छत्तीसगढ़ के एक ग्रामीण अंचल खैरागढ़ में प्रेमचंद जयंती इस साल  बिल्कुल अनूठे ढंग से मनाई गई।

अक्षर पर्व के सुधी पाठक खैरागढ़ के नाम से अपरिचित नहीं होंगे! यहां एशिया का सर्वप्रथम विश्वविद्यालय है जो संगीत और ललित कलाओं को समर्पित है। यहां के पूर्ववर्ती राजा ने 1954 में अपनी दिवंगत पुत्री राजकुमारी इंदिरा की स्मृति में विश्वविद्यालय खोलने के लिए भव्य राजमहल सरकार को दान कर दिया था। इस महल की झलक हबीब तनवीर की फिल्म चरणदास चोर में आपने शायद देखी होगी। आप खैरागढ़ के नाम से इसलिए भी परिचित होंगे कि अपने इस नियमित स्तंभ में एकाधिक बार मैं इस कस्बाई नगर का जिक्र कर चुका हूं कि कैसे छत्तीसगढ़ प्रदेश हिन्दी साहित्य सम्मेलन स्थानीय मित्रों के सहयोग से आसपास के गांवों में भारत कोकिला सरोजिनी नायडू की जयंती पर सुरुचिसम्पन्न गीत यामिनी कार्यक्रम विगत तीन वर्षों से लगातार आयोजित करते आया है। इटार, पेंड्री और पांड़ादाह जैसे अनजाने गांवों में सम्मेलन के कार्यक्रम हुए हैं, आधी रात के बाद तक चले हैं और कम से कम उस रात गांव में टीवी सेट बंद रहे। जब पूरा गांव चौपाल में कविताएं सुनने के लिए इकट्ठा हो गया तो घर में टीवी कौन चलाए! अक्षर पर्व के सुपरिचित लेखक डॉ. गोरेलाल चंदेल और सम्मेलन द्वारा संचालित पाठक मंच के संयोजक डॉ. प्रशांत झा इन आयोजनों के कर्ताधर्ता रहे हैं। दरअसल यह प्रशांत के उर्वर मस्तिष्क की उपज थी कि ग्रामवासियों को साहित्य से जोडऩे के लिए चलो गांव की ओर अभियान शुरू किया गया। वे एक व्यस्त चिकित्सक हैं, फिर भी अपने साहित्यिक अनुराग के चलते इस अभियान को गति दे रहे हैं। यह तो हुई पृष्ठभूमि।

आप शायद यह जानकर चकित, विस्मित होंगे कि 31 जुलाई 2017 को खैरागढ़ अनुविभाग अथवा प्रखंड के एक सौ पचास गांवों में एक सौ सतहत्तर स्कूलों में एक साथ प्रेमचंद की अमर कहानी पूस की रात का वाचन किया गया। हर जगह पर यह वाचन किसी स्कूली छात्र ने किया, फिर उस पर घंटे-दो घंटे की चर्चा हुई। इस अभूतपूर्व कार्यक्रम में स्कूलों के अलावा ग्रामवासी बड़ी संख्या में शामिल हुए। एक कम्प्यूटर प्रशिक्षण केन्द्र था जहां सिर्फ छह लोगों के बीच कहानी पाठ हुआ। यह न्यूनतम संख्या थी। अन्य स्थानों पर बीस-पच्चीस से लेकर चार-पांच सौ तक लोग कहानी सुनने के लिए एकत्र हुए और उन्होंने खुलकर कहानी के बारे में अपने विचार भी सामने रखे। पूस की रात ने छत्तीसगढ़ के ग्रामीण समाज के बीच लगभग सौ साल बाद भी कैसी बेचैनी उत्पन्न की और कैसे अपने प्रासंगिकता सिद्ध की, यह इन केन्द्रों से आई रिपोर्टों से पता चलता है। यदि स्थानाभाव न होता तो मैं इन सारी रपटों को यथावत प्रकाशित करता। लेकिन फिलहाल कुछ चुने हुए अंश सामने है। यह जानकारी देना प्रासंगिक होगा कि खैरागढ़ के पाठक मंच ने कार्यक्रम आयोजित करने के लिए हर गांव में एक ज्ञानमित्र मनोनीत किया था और उनके माध्यम से रिपोर्ट का एक प्रपत्र गांवों में पहले से वितरित करवा दिया था ।

कोहकाबोड़ गांव के श्रोताओं ने निष्कर्ष निकाला कि वास्तव में किसानों की दशा कभी सुधरेगी या नहीं, यदि हां तो कैसे, यदि नहीं तो क्यों? इस सभा में त्रिलोचन ने सवाल उठाया कि किसान भरी दोपहरी में काम करता है जबकि कानून बनाने वाला एसी में रहता है। सिंगारघाट की प्रतिभा पांडेय का कहना था कि आज भी किसान के रूप में हर गांव में हलकू हैं। मुड़पार में अधिकतर श्रोताओं ने छत्तीसगढ़ी में चर्चा की और सरकार से किसानों की संरक्षण की मांग की गई। बोईरडीह की श्रीमती शेषबाई का विचार था कि कहानी में ऋणग्रस्त किसान की गरीबी और बेबसी का यथार्थ चित्रण है। पांड़ादाह में कहानी पाठ के बाद विद्यार्थियों के लिए निबंध प्रतियोगिता का आयोजन किया गया। धौराभाठा के देवकांत ने अपनी रिपोर्ट में लिखा कि कहानी वाचन के दौरान श्रोता किसान भावुक नजर आए। घुमका की सभा में साढ़े चार सौ से अधिक लोग उपस्थित थे। घोटिया के श्रोताओं ने कहा कि उच्च वर्ग किसानों का शोषण करता है। धनगांव के ज्ञानमित्र गिरधारी वर्मा ने लिखा कि कुछ लोगों को कहानी समझ में नहीं आई। कुछ स्थान पर श्रोताओं को हलकू के ठंड से ठिठुरने की पीड़ा ही समझ पड़ी। पवनतरा में पूस की रात के वाचन के साथ-साथ ईदगाह, पंच परमेश्वर इत्यादि कहानियों की भी चर्चा की गई। बिजेतला के श्रोताओं ने कहानी सुनने के बाद गांवों में दलगत राजनीति, साहूकार की जगह बैंक ऋण, रासायनिक खाद और कीटनाशक इत्यादि के प्रश्न भी उठाए। इन प्रतिक्रियाओं को जानने के बाद पाठक सहमत होंगे कि सही मायनों में यह एक अपूर्व आयोजन था।

मुझे यहां बतलाना चाहिए कि छत्तीसगढ़ प्रदेश हिन्दी साहित्य सम्मेलन पिछले कुछ वर्षों से प्रेमचंद जयंती पर दूरदराज के इलाकों में आयोजन करने का आह्वान अपने सदस्यों से ही नहीं, वृहतर लेखक बिरादरी से करता रहा है। पिछले दिनों हमने छत्तीसगढ़ के गांव-गांव में प्रेमचंद क्लब स्थापित करने का भी सुझाव दिया है। हमारा मानना है कि इसी तर्ज पर बिहार में दिनकर क्लब या शिवपूजन सहाय क्लब खोले जा सकते हैं। तमिलनाडु में सुब्रमण्यम भारती तथा अन्य भाषा-भाषी प्रदेशों में वरेण्य रचनाकारों का स्मरण करते हुए श्रेष्ठ साहित्य के प्रति जनता की रुचि पुनर्जीवित  करने का काम इस प्रकार हो सकता है।

संयोगवश यह सितम्बर का माह है याने हिन्दी दिवस, सप्ताह, पखवाड़ा और माह मनाने का अवसर। देश भर में राजभाषा विभाग हिन्दी को प्रतिष्ठित करने के लिए कार्यक्रम करेंगे। उसमें शायद यह चिंतन भी होगा कि बंगलुरु जैसे बहुलतावादी महानगर के मेट्रो स्टेशनों पर हिन्दी नाम पटल पर आपत्ति क्यों हो रही है। उस समय यह याद रख लेना उचित होगा कि हिन्दी का अपना स्थान है किन्तु वह कन्नड़ या अन्य किसी प्रादेशिक भाषा को अपदस्थ करे यह उचित नहीं। हम हिन्दीवालों के लिए 14 सितंबर के भाषणों के आगे-पीछे यह सोचने का भी अवसर है कि हिन्दी जन-जन की भाषा कैसे बने, विशेषकर नई पीढ़ी में उसकी स्वीकार्यता कैसे बढ़े, विशेषकर तब जबकि पैकेज के पीछे भागी जा रही युवा पीढ़ी चेतन भगत और अमीश जैसे लेखकों के तीसरे दर्जे के उपन्यास पढऩे में ही सुख पाती है।

भारतेन्दु हरिश्चन्द्र से लेकर आज तक खड़ी बोली हिन्दी में अपार साहित्य रचा गया है। लेखक लगातार अपना काम कर रहे हैं, लेकिन यह हर दिन की शिकायत बनी हुई है कि हिन्दी रचनाओं को पाठक नहीं मिलते और हिन्दी पुस्तकों को ग्राहक नसीब नहीं होते। हिन्दी समाचार पत्रों में साहित्य पृष्ठ लगभग लुप्त हो चुका है। किसी-किसी पत्र का साल में एकाध साहित्य विशेषांक निकल जाता है जिसमें सामान्यत: वही लेखक होते हैं जो वर्षों से अपना वर्चस्व स्थापित करके बैठे हैं। हिन्दी साहित्य से आमजन कैसे परिचित हो, कैसे उसकी ओर प्रवृत्त हो, यह एक कठिन सवाल खड़ा हुआ है। मुझे लगता है कि प्रेमचंद की रचना हिन्दी साहित्य में प्रवेश करने के लिए एक दरवाजा खोलती है और प्रेमचंद क्लब जैसी संस्था यदि बने तो इस हेतु वातावरण तैयार कर सकती है।

मेरा आग्रह प्रेमचंद को लेकर कई कारणों से है। एक तो उनकी भाषा सरल-सुबोध है। यदि कोई स्कूली बच्चा भी उनकी रचना पढ़े तो आसानी से पढ़ सकता है, भले ही कथा का मर्म उसकी समझ में न आए। दूसरे प्रेमचंद की रचनाएं सही मायनों में कालजयी कही जा सकती हैं। इसका प्रमाण हमने पूस की रात  के वाचन में देखा। प्रेमचंद को ग्रामीण भारत की स्थितियों की सही पकड़ थी, वे मानव मन को भी बखूबी समझते थे और समाज में अन्याय व शोषण के मूल कारणों को भी बिल्कुल ठीक पहचानते थे। इन सबके चलते उनकी कहानियां पाठक या श्रोता को गहरे तक आंदोलित करते हैं। आज जो प्रेमचंद की कहानियां पढऩा शुरू कर रहा है, कल वह उनके उपन्यास भी पढ़ेगा, फिर महाजनी सभ्यता। वह प्रेमचंद से प्रारंभ कर वर्तमान साहित्य की तरफ रुख करेगा, यह आशा की जा सकती है।

कोई दस वर्ष हुए स्पैनिश भाषा के महान लेखक सर्वांतीस की चार सौवीं जयंती पड़ी तो स्पैन ही नहीं लातिन अमेरिकी देशों में भी गांव-गांव में भव्य आयोजन हुए, उनके उपन्यास डॉन क्विक•ाोट का वाचन किया गया। दक्षिण अमेरिका के देशों में अपने प्रसिद्ध कवियों की जयंती पर रात-रात भर काव्यपाठ का आयोजन होता है, जिसमें हजारों की संख्या में लोग एकत्र होते हैं। रूसी भाषा के महान कवि अलेक्जेंडर पुश्किन की दो सौवीं जयंती 1999 में पड़ी तो मास्को शहर की हर दुकान और हर सार्वजनिक स्थान पर पोस्टर चस्पा थे कि इस यादगार मौके पर कहां क्या आयोजन होने जा रहे हैं। उनकी किताबों के नए संस्करण बाजार में आ गए थे और रियायती दर पर खरीदने के लिए उपलब्ध थे। कौन नहीं चाहेगा कि अपने साहित्य और अपने लेखकों के प्रति ऐसा उत्साह हमारे समाज में भी हो। इसकी शुरूआत करने के बहुत से तरीके हो सकते हैं। एक तरीका मैंने यहां प्रस्तुत किया है। मैं अंत में कहना चाहता हूं कि लेखक अपना काम करता रहे लेकिन उत्तम साहित्य को जनता तक ले जाने के लिए हमें निस्पृह समालोचकों की आवश्यकता है, साहित्य रसिक हिन्दी अध्यापकों की आवश्यकता है, निष्पक्ष संपादकों की आवश्यकता है और इन सबके साथ आवश्यकता है स्वैच्छिक कार्यकर्ताओं की जो हिन्दी अथवा अन्य भारतीय भाषाओं को अकाल मौत से बचाने के लिए तन-मन से काम कर सकें। धन की इसमें कोई खास आवश्यकता नहीं होगी।