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Wednesday 22 Nov 2017

पत्र

जून के मुक्तिबोध अंक की प्रस्तावना में विलक्षण सृजन के कवि मुक्तिबोध के संबंध में कुछ अनकही बातों पर ललित सुरजन जी ने रोशनी डाली है। दरअसल मुक्तिबोध के बारे में बहुत जान लेने के बाद भी बहुत कुछ जानना अंतत: शेष रह ही जाता है। मुक्तिबोध के सृजन और चिंतन की इतनी अधिक परतें हैं किवे खुलती ही चली जाती हैं। उनकी अभिव्यक्ति के फलक का ओर-छोर नहींहै। कितने ही गहरे उतरे, थाह नहींमिलती, यह अंक मुक्तिबोध के रचनाधर्म के विभिन्न पक्षों को रेखांकित और व्याख्यायित करने वाला अंक है। मैं समझता हूं इस अंक में प्रकाशित सामग्री के माध्यम से मुक्तिबोध को विभिन्न आयामों के परिप्रेक्ष्य में ठीक से समझने में तो मदद मिलेगी ही, साथ ही शोधकर्ताओं के लिए जानकारी के नए द्वार भी खुलेंगे। जहां तक मेरी जानकारी है, पत्रिकाओं के अब तक जो विशेषांक गहन-गंभीर-अप्रतिम कवि मुक्तिबोध के कृत्तिव पर निकले हैं, उनमें अक्षर पर्व का यह विशेषांकअधिक व्यापक और अद्यतन है। मुक्तिबोध के सृजन को लेकर उठने वाले प्राय: सभी प्रश्नों के उत्तर इस विशेषांक में समाहित हैं। आपको और सभी लेखकों को एक अच्छे शोधपूर्ण विशेषांकके लिए बधाई।

युगेश शर्मा, भोपाल