Monthly Magzine
Wednesday 17 Oct 2018

पत्र

मई अंक में ललितजी ने कुमार विनोद के नवीनतम गज़़ल संग्रह सज़दे में आकाश का नूतन बिम्ब प्रतीकों के आधार पर जो मूल्यांकन किया है, वह परम आस्वाद्य है। उपसंहार में सर्वमित्राजी ने रूस और अमरीका जैसी विश्व की दुर्धर्ष महाशक्तियों की बदगुमानी के परिणामस्वरूप उत्पन्न तीसरे महायुद्ध की भयावह स्थिति की आगाही की है। आपका यह सार्थक प्रश्न सोचने पर बाध्य करता है कि क्या विश्वशांति कायम करने के लिए युद्ध की विभीषिका अपरिहार्य है? दुनिया गंभीरता से इस पर सोचे।

भूले-बिसरे शायर शीर्षक स्तंभ का आगाज़ स्वागतेय है। भाई जहीर कुरेशी ने अपनी नजऱ से खुद को देखने वाले शाइर शेख कदीर कुरेशी दर्द की गज़़लगोई का, पर्याप्त उद्धरणों के प्रकाश में, संतोषजनक आकलन किया है। वीरेन्द्र सरल का बाबूलाल का जीव पढ़कर प्रसिद्ध व्यंग्यकार स्व.हरिशंकर परसाई की रचना भोलाराम का जीव की याद आ गई। कहानी के रूप में बाबूलाल का जीव गुदगुदाता है, तो व्यंग्य के रूप में पाठक को तिलमिलाता भी है।

डा.शोभा निगम ने विभिन्न रामकाव्यों के संदर्भ से कैकेयी के व्यक्तित्व का अच्छा मूल्यांकन, आकलन किया है। वाल्मीकि रामायण, कंब रामायण, जैन रामायण, कृत्तिवास-बांग्ला रामायण, गुप्तजी रचित साकेत आदि कई रामकाव्यों के आधार पर कैकेयी का चरित्रांकन करते हुए उसके सहज अपराध को क्षम्य ही माना है। पूरे लेख में लेखिका की असाधारण शोधदृष्टि का परिचय मिलता है। इत्यलम।

प्रो. भगवानदास जैन, अहमदाबाद-382445