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Monday 22 Oct 2018

पत्र

गजानन माधव मुक्तिबोध जैसे महान साहित्यकार पर केन्द्रित अक्षर पर्व का जून अंक मिला, तो जैसे मुझे सर्वश्रेष्ठ उपहार मिल गया! मुक्तिबोध पर चर्चा और परिचर्चा जरूरी है, क्योंकि अपने समय की विसंगतियों और विरूपताओं को आमने-सामने की चुनौती देने का वैसा दुस्साहस कम ही लेखकों के पास होता है, जैसा कि मुक्तिबोध के पास था! इस महत्वपूर्ण अंक की प्रस्तावना को पढऩे लगा जिसमें ललित जी ने मुक्तिबोध की वैश्विक चेतना को चर्चा के केन्द्र में रखकर इस विशिष्ट लेखक की विशिष्टता को रेखांकित किया है ! मुक्तिबोध की कविताओं में वर्णित यथार्थ न सिर्फ वर्तमान बल्कि भविष्य की नब्ज और धड़कन को पकडऩे में कामयाब था और इसलिए आजादी के बाद के स्वप्नभंग के सबसे बड़े चितेरे थे मुक्तिबोध और इसलिए सदैव प्रासंगिक भी! मुक्तिबोध ने अपने समय और समाज की विसंगतियों और त्रासदियों की जैसी गहरी और तार्किक पड़ताल की वह उन्हें अपने समकालीनों में एक विशिष्ट महत्व प्रदान करता है। क्लॉड ईथरली जैसी कहानी जिसका उल्लेख ललित जी ने किया है, वाकई एक उल्लेखनीय कहानी है। अमेरिका द्वारा नागासाकी पर अणु बम गिराया जाना एक महान अमानवीय कृत्य था उसकी इस कहानी में बड़े ही कलात्मक ढंग से भत्र्सना की गई है और युद्ध की विनाशकारी विभीषिका और वीभत्सता को उजागर करने वाली यह कहानी युद्ध की व्यर्थता का भी बोध करवाती है। आज हमारे पास नरसंहार के ऐसे -ऐसे विकसित उपकरण हैं कि कुछ ही पल में सारी संस्कृतियों को विनष्ट किया जा सकता है। ऐसे में यह कहने की जरूरत नही है कि मुक्तिबोध की 1953 में लिखी यह कहानी आज भी कितनी प्रासंगिक है। आज मानवीयता दारुण परिस्थितियों से जूझ रही है और स्त्री, किसान, मजदूर, दलित और अल्पसंख्यक लोकतंत्र से लगभग निराश हो चुके हैं और इस भयावह स्थिति में मुक्तिबोध की रचनाएं हमें प्रतिबद्धता के साथ डटे रहने की प्रेरणा देती हैं। ललित सुरजन की गुरु - गंभीर प्रस्तावना ने जून अंक को बहुत बारीकी से देखने के लिए प्रेरित किया।

रमाशंकर शुक्ल: हृदय की स्मृति में एक हमेशा स्मरण रह जाने वाली रचना है, जिसे पढ़कर सहज ही मन उत्फुल्ल हो उठा । मुक्तिबोध के सुगठित गद्य में रमाशंकर शुक्ल के वेगमय और जीवट से भरे व्यक्तित्व का भावपूर्ण और आत्मीय चित्रण किया है। जनता की आकांक्षाओं और संघर्षों को अत्यधिक अहमियत देने वाले मुक्तिबोध सही मायने में जनकवि थे क्योंकि उनकी सारी रचनाएं जनोन्मुखी थीं पर हिन्दी के सुधिजनों ने सरलता बनाम जटिलता के बौद्धिक विमर्श में मुक्तिबोध की जनोन्मुखी और जनउपयोगी रचनाओं के इर्द-गिर्द रहस्यमयी वितान खड़ा किया जबकि जीवन की जटिलता से होड़ करती मुक्तिबोध की रचनाएं आज भी पुनर्मूल्यांकन की बाट जोह रही हैं। आशीष सिंह का मूल्यांकन परक आलेख मुक्तिबोध को पढ़ते हुए स्फुट विचार, मुक्तिबोध के रचनात्मक जगत को एक नई दृष्टि से देखने का आग्रह करता सा लगा। गहन विचारबोध के कवि मुक्तिबोध की कविताएं आज पचास साल बाद भी सवाल उठाती हैं और उन सवालों के जवाब खोजने और उन पर विचार करने की जरूरत है, जो हमें स्वयं करनी पड़ेगी। इस बेहतरीन आलेख के लिए आशीष सिंह को धन्यवाद।

गणित मेरे लिए सबसे कठिन विषय रहा है, क्योंकि मुझे गणित से बहुत भय होता है और इसलिए मैं स्वयं को यह दिलासा देकर खुश कर लिया करता था कि गणित जैसे शुष्क और निरस विषय में फिसड्डी हुआ तो क्या हुआ, साहित्य में तो गहरी अभिरुचि है! पर ललित सुरजन जी की प्रस्तावना में जब पढ़ा कि गणित के प्रोफेसर होते हुए भी कुमार विनोद जी कविता और गज़़ल लेखन में भी सक्रिय हैं, तो बहुत आश्चर्य हुआ कि दो विपरीत धाराओं में संतुलन कैसे स्थापित कर लेते हैं कुमार विनोद! लेकिन इस संसार में अपवादों की कोई कमी नहीं है, ऐसा सोचता हुआ मैं ललित सुरजन जी के शब्दों की पगडंडी पकड़ कर आगे बढऩे लगा, तो लगा कि वाकई अगर गणित न होता तो हमारे इस संसार का स्वरूप क्या होता? क्या मनुष्य इतनी प्रगति कर पाते? बहुत सारे रहस्य अछूते-अजाने रह जाते!!

ललित सुरजन अपने संपादकीय में अक्सर किसी न किसी स्वपठित पुस्तक की विलक्षणता और विशिष्टता का गुणगान करते नजऱ आते हैं और इस बार कुमार विनोद के नए गज़़ल संग्रह सजदे में आकाश के विलक्षण शिल्प, कथन और प्रयोगधर्मिता के विहंगम वर्णन में अपने शब्द-कौशल का सुखद प्रदर्शन किया है! कुमार विनोद के गज़़लों में जिस वैचारिक टटकापन भाषाई विशिष्टता, शिल्पगत विविधता और प्रयोगशीलता का ललित जी ने लालित्य पूर्ण वर्णन किया है, वो मन को मोहित कर देने वाला है और मुझे कुमार विनोद के इस गज़़ल संग्रह के पाठ के लिए उत्प्रेरित कर रहा है !

नवनीत कुमार झा, हरिहरपुर, दरभंगा  847306