Monthly Magzine
Sunday 19 Nov 2017

स्वतंत्रता खतरे में है, इसे पूरी ताकत से बचाया जाना चाहिए

किसी भी देश में जनता की आवाज को बुलंद रखने का सबसे कारगर माध्यम निषपक्ष, स्वतंत्र मीडिया हो सकता है। इस बात का सबसे बड़ा प्रमाण है निर्भीक पत्रकारों से सत्ता को लगने वाला डर। पत्रकार अगर बिना किसी दबाव या लालच में आकर जनता तक सही-सही खबर पहुंचाए, उसे सरकार की नीतियों की लाभ और हानि के बारे में तटस्थ होकर बताए, उसे अपने अधिकारों के लिए जागरूक करे और जब हक पर चोट पड़े तो उसके खिलाफ आवाज़ उठाने का साहस जनता में भरे, तो ऐसा पत्रकार या ऐसा मीडिया जनता के लिए अंधेरे में रोशनी का काम करता है, लेकिन यहींसत्ता को वह जला कर राख कर देने वाली आग के समान प्रतीत होता है। और पूंजीवाद के इस दौर में ऐसा पत्रकार, मीडिया सत्ता के साथ-साथ पूंजीपतियों के लिए भी खतरनाक साबित होने लगता है। इसलिए अब मीडिया पर वर्चस्व का नया खेल राजनेता और पूंजीपति रचने लगे हैं और दुख इस बात का है कि काफी हद तक सफल भी हो चुके हैं। यह किसी एक देश की त्रासदी नहींहै, बल्कि दुनिया के बड़े हिस्से में पत्रकारों की स्वतंत्रता खरीदी जा चुकी है और उनकी कलम से राजनीति की नयी इबारत लिखवाई जा रही है। भारत में गुलामी के दौर में कई नेताओं ने पत्रकार, संपादक बनकर अंग्रेजों से जूझने और जनता को जागरूक करने की दोहरी जिम्मेदारियां तमाम जोखिम देकर उठाईं। जेल गए, प्रतिबंध सहे, लेकिन गुलामी के खिलाफ आवाज़ उठाना नहींछोड़ा। इस दौर में पत्रकारिता को मिशन कहा गया, गो कि आज भी उसकी भूमिका वही होना चाहिए, जनजागरूकता तो एक निरंतर चलने वाली प्रक्रिया है। पूर्व राष्ट्रपति प्रणव मुखर्जी का मीडिया की सजगता संबंधी आह्वान इस बात का प्रमाण है कि देश में लोकतांत्रिक मूल्यों को बचाए, बनाए रखने में मीडिया की भूमिका कितनी महत्वपूर्ण है। विगत दिनों नेशनल हेराल्ड समाचार पत्र के पुन:प्रस्तुतिकरण कार्यक्रम में अपने भाषण में देश में भीड़ द्वारा पीट-पीटकर मार डालने और कानून हाथ में लेने की घटनाओं के मुद्दे पर उन्होंने बड़ी बात कही। उन्होंने कहा कि जब भीड़ का उन्माद बहुत ज्यादा अतार्किक और नियंत्रण से बाहर हो जाए तो हमें रुककर विचार करना चाहिए कि क्या हम अपने समय के मूलभूत मूल्यों को बचाने के लिए पर्याप्त रूप से सजग हैं? उन्होंने बौद्धिक वर्ग से इस मुद्दे पर मुखर और सजग होने की गुजारिश की। श्री मुखर्जी ने कहा कि नागरिकों की समझदारी और मीडिया की सजगता अंधकार और पिछड़ेपन की शक्तियों के लिए सबसे बड़े निवारक का काम कर सकती हैं। उन्होंने मीडिया से भी लगातार सजग रहने की अपील की क्योंकि इसी वजह से लोकतंत्र जिंदा है। उन्होंने कहा, क्योंकि आपके कारण लोकतंत्र का अस्तित्व बरकरार है। लोगों के अधिकार संरक्षित हैं। मानवीय गरिमा बरकरार है। गुलामी खत्म हुई है। आपको अपनी सजगता बरकरार रखनी होगी। प्रणव मुखर्जी ने कहा कि पंडित जवाहरलाल नेहरू ने नेशनल हेराल्ड अखबार के लिए आदर्श वाक्य दिया था, स्वतंत्रता खतरे में है, इसे पूरी ताकत से बचाया जाना चाहिए। ये शब्द भले ही 1939 में लिखे गये किन्तु इसका महत्व आज तक है।

इधर भारतीय राष्ट्रपति भारत में मीडिया को अधिक सजग होने की अपील कर रहे थे, उधर अमरीकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप खुद को नए दौर का राष्ट्रपति बताते हुए मीडिया की गरिमा की धज्जियां उड़ाने में लगे थे। उन्होंने पद संभालने के कुछ दिनों बाद ही प्रेसवार्ता में सीएनएन के पत्रकार के साथ अभद्र व्यवहार किया था और फिर एक ट्वीट में उन्होंने दिखाया है कि वो एक व्यक्ति के साथ कुश्ती कर रहे हैं, जिसका चेहरा सीएनएन के प्रतीक चिह्नï से ढंका है। इस झूठी कुश्ती में वे सीएनएन को पटखनी दे रहे हैं। ट्रंप की यह पोस्ट स्वतंत्र मीडिया के लिए उनकी घृणा को ही नहीं दर्शाती है, बल्कि सीधे-सीधे तानाशाही का संदेश देती है कि अगर कोई उनके खिलाफ जाएगा तो वे उसे इसी तरह मात देंगे। अपनी पोस्ट में ट्रंप ने जो वीडियो डाला है वह 2007 का है, जिसमें खुद ट्रंप डब्ल्यू डब्ल्यू ई रेसलिंग की एक छद्म फ़ाइट में शामिल हुए थे, ट्रंप पूर्व निर्धारित योजना के मुताबिक फ्रेंचाइज़ी मालिक विन्स मैकमैहॉन को पीटते हैं। ट्रंप तब व्यापारी थे और मुमकिन है, ये उनके व्यापार की कोर्ई रणनीति रही हो। ये नया वीडियो पुराने वीडियो में छेडख़ानी कर बनाया गया है और ट्रंप ने बतौर राष्ट्रपति उसे बड़े अभिमान के साथ पेश किया है। मीडिया पर पूंजीवादी राजनीति का यह नया हमला दुनिया भर के मीडिया संस्थानों के लिए चेतावनी है। सीएनएन ने इस वीडियो के बाद ट्रंप पर मीडिया के खिलाफ़ हिंसा भड़काने का आरोप लगाया है। ट्रंप की एक आलोचक एना नवारो ने कहा, ये हिंसा को भड़काने का काम है. इस तरह मीडिया में किसी की हत्या हो जाएगी। ट्रंप कई बार सीएनएन से उलझ चुके हैं, वो सीएनएन पर फर्जी ख़बरें दिखाने का आरोप लगातार लगाते रहे हैं। सीएनएन के वरिष्ठ व्हाइट हाउस संवाददाता जिम अकॉस्टा ने ट्वीट कर कहा है, क्या प्रो रेसलिंग फजऱ्ी नहीं है? सीएनएन बड़ा मीडिया संस्थान है और वो शायद राष्ट्रपति से लड़ाई का खतरा सह भी ले, लेकिन छोटे मीडिया संस्थानों, पत्रकारों का क्या होगा? भारत हो या अमरीका पूंजी, सत्ता, राजनीति और व्यापार का खेल तो एक जैसा ही चलता है। अगर आज समाज या लोकतांत्रिक मूल्यों की राजनीति करने वाले लोग निष्पक्ष मीडिया का साथ नहींदेंगे और दबाव में मीडिया को सरकार का भोंपू बनने देंगे तो उसका नुकसान अंतत: हमारी आने वाली नस्लों को ही भुगतना होगा। दुनिया देख ही रही है कि टर्की मेंंराष्ट्रपति एर्दोगान किस तरह अपने खिलाफलिखने वाले पत्रकारों को प्रताडि़त कर रहे हैं। हाल ही में एर्दोगान ने रेडआक्टिफ वेबसाइट के मुख्य संपादक हकन गुलसैवन को 14 अन्य लोगों के साथ गिरफ्तार कर लिया। टर्की में पिछले एकसाल में कम से कम सौ पत्रकार या तो गिरफ्तार हो चुके हैं या उन्हें देशनिकाला दिया गया है। सोशल मीडिया पर सरकार के खिलाफ लिखने पर लगभग 10 हजार लोगों पर जांच बिठा दी गई और 1080 लोगों को सजा भी सुनाई गई है। दर्जनों अखबार सरकार की ज्यादतियों के कारण बंद हो चुके हैं। ट्रंप की ज्यादतियों की खबर दुनिया में आ जाती है, एर्दोगान के बारे में अधिक पता नहींचलता। अब क्या समय नहींहै कि भारतीय बाखबर हो जाएं।