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Tuesday 21 Nov 2017

कठिन समय का सहज कवि

हरीश वाढेर का नया काव्य संग्रह जो पहचाना नहीं गया, उनके निधन के बाद प्रकाशित होकर आया है। अपने शीर्षक को ही सार्थक करता यह एक महत्वपूर्ण काव्य संग्रह है, जो किसी पहचान और सम्मान की महत्वाकांक्षा के बगैर केवल अभिव्यक्त होना चाहता है -फुहारों में फुलझडिय़ों में, अनारदानों सा स्पष्ट। जीवन को गहरे अनुभव करने की चाह और इस अंधेरे समय के यथार्थ को उजाले में देखने की चाहत तथा अनुभूति की अभिव्यक्ति की स्वाभाविक स्पष्टता इस संग्रह की खासियत है, जो इसे अनावश्यक कृत्रिम कलात्मक दुर्बोधता और दुरूहता से बचाते हुए एक नयी ताजगी प्रदान करती है। इन कविताओं में कवि का अपने जीवन-जगत से गहरा रागात्मक लगाव स्पष्ट दिखाई देता है। यही कारण है कि इन कविताओं में घटनाओं, अनुभूतियों और दृश्यों को उसके संपूर्ण सौंदर्य के साथ रचने की ललक दिखाई देती है। 

इस बेहद अमानवीय समय में जब मनुष्य अपने स्वार्थ में लिप्त दर्प से भरा हुआ है। ऐसे समय में कवि का किसी के प्रति किये गये सहयोग को भी इस प्रकार अपनी कर्षण शीर्षक कविता में कहना - मैंने कोई परोपकार नहीं किया। सहज ही लेना बंधु ! जैसे धरती खींच लेती झुुकी डाल का पका फल। कवि की संवेदनशीलता और मानवीय सहजता की उच्च भूमि को दर्शाता है। यहां कविता और कवि में कोई फांक नहीं है। और न ही कवि केवल कविकर्म में ही लीन आत्मग्रस्त कवि है। बल्कि वह कविता से बाहर आम आदमी के लिए कुछ करना चाहता है जो कविता लिखने से भी जरूरी है। अपनी कविता एक काम में कहते हैं- एक काम। जो आज मुझे करना नहीं है। वह है कविता लिखना और फिर आगे लिखते हैं- वह आयेगा। फेरी पर इस शुक्रवार को। उकडँू बैठ कर खायेगा। दाल भात साग चटनी और अचार। उससे पूछना है। पेट भर खिलाने के बाद। उसके गाँव घर-द्वार का हाल-चाल। अपने आप से भी कटते जा रहे इस खंडित समय में कवि का अपने आसपास के जीवन प्रति आत्मीय लगाव यहां उनकी हर कविता में देखने को मिलता है। यही कारण है कि कवि यहां समय गुजारने के लिए नहीं बल्कि ऐसे सुंदर समय से गुजरने के लिए समय चाहता है। जहां वह सम्मानों और पुरस्कारों के जुगाड़ से परे काट सके शब्दों पर उगे नरम रोम तंतु और बुन सके भविष्यत शिशु के लिए मोजे, शाल ठंड में ठिठुरते लोगों के लिए कंबल और मढ़ैया पर फसल की रखवाली करती बुढिय़ा के लिए तम्बू। यह एक सीधे सरल कवि की मानवीय सरोकारों से जुड़ी स्वाभाविक एवं सुंदर कविताएं हैं, जो बुलबुले में कैद हवा की मुक्ति के संघर्ष के सौंदर्य को भी बेहद सुंदर ढंग से अभिव्यक्त करने की क्षमता रखती है। वे संघर्ष में जीवन के सौंदर्य को देखते है। अपनी ग्रीन हाउस की पौध शीर्षक कविता में कहते हैं कैसे होगा आत्मसात। पैदा होना खुले आसमान के नीचे। भीतर जमीन के। जड़ों से जड़ों की लड़ाई में ऊपर आकाश की हाथापाई में। बनाना जंगल में जगह। जूझते रहना अथक। फूलना फलना और बढऩा। वे जानते हैं बिना संघर्ष किये जीवन के सौंदर्य को नहीं पाया जा सकता। क्योंकि मनुष्य अपनी स्वार्थपरता और अवसरवादिता में इस प्रकार अनात्म और संघर्षहीन होता जा रहा है कि उसे आज अपने आपसे ही संघर्ष करने की पहले आवश्यकता है। क्योंकि ऐसे समय में मनुष्य के लिए अपने आप को बचाना भी किसी चुनौती से कम नहीं। इसलिए वे अपनी आदिम लड़ाई शीर्षक कविता में कहते हैं आदमी खुद से। जितने फासले पर जीता है। उतनी ऊँचाई पर महसूस करता अपने को। जहाँ से खुश हो। नीचे सब तंग। लसलसाती लिजलिजी मजबूरियाँ देखता है। उसकी ढलान वहीं से शुरू होती है। जहाँ वह खड़ा होता है। शायद यही कारण है वे अपनी आदमी चाहिए कविता में एक पूरे आदमी की तलाश करते हुए कहते हैं- पूरा पका हुआ। पूरा डटा हुआ। सामने खड़ा हुआ। भरा-भरा। एक आदमी चाहिए। वे जानते हैं कि जीवन और कला दोनों के लिए सौंदर्य अनिवार्य है और यह सौंदर्य जीवन के संघर्ष में ही प्रतिफलित होता है और यदि जीवन में सौंदर्य नहीं है तो फिर कविता और कहानी के अस्तित्व पर भी प्रश्न खड़ा होता है। इसलिए कवि लिखना शीर्षक कविता में कहते हैं- खड़ा, थरथराता पेड़ पत्ती पत्ती में। सुनता जीवित मांस पर पड़ते। कुल्हाडिय़ों के घात खच्च् खच्च। और दूर से आती साँस में सूंघता। ताजे खून की गंध घूँट घूँट में। रूंधे गले से कहता। इस कत्लेआम पर लिखो। यहां कवि हर दारूण मृत्युओं और इस दुष्काल पर लिखना ही एक प्रतिबद्ध कवि और कविता का दायित्व मानता है।
विज्ञान और तकनीक का विकास और प्रयोग आज मुनाफा कमाने के लिए जिस बुरी नीयत से किया जा रहा है तथा प्रकृति और प्राकृतिक संसाधनों का दोहन जिस प्रकार किया जा रहा है। मनुष्य को विस्थापित कर उसकी संस्कृति को पूरी तरह नष्ट कर आज पूंजी और विज्ञान की इसी ताकत के बल पर कुछ लोग पूरी दुनिया को अपने हिसाब से कर लेना चाहते हैं। इसी भयावह स्थिति को उजागर करते हुए आइंस्टीन का सिद्धांत शीर्षक कविता में वे कहते हैं उस पुरातन आदमी ने। बनाई नहीं कोई गुफा। पहाड़ को भोंक खोद कर। फिर आगे कविता और कहानी शीर्षक कविता में वे इसी भयावह यथार्थ को सीधे-सीधे उजागर करते हुए कहते हैं- बस्ती से लगे जंगल। काट डाले गए। पहाडिय़ाँ हो गई निर्वसन। नदी का पाट सूख गया। प्यासे कंठ सा। खदानों ने खोखला कर दिया। धरती को। यह कविता मुनाफे की राजनीति और प्रकृति के दोहन की दारूण कथा कहती है।
सदियों से पूंजी और पूंजी की सत्ता निरंतर मनुष्य के जीवन की पहचानी गई हर सुंदर, हरी और सुखद चीजों को तहस नहस करता आ रहा है और जो पहचानी नहीं गई वे आज भी बची हुई हैं। कवि उन्हीं अनपहचानी बची हुई सुंदर चीजों को बचाने के लिए जो पहचाना नहीं गया शीर्षक कविता में कहते है कि- हजारों वर्षों से। बहुत कुछ पहचाना नहीं गया। समय है बचाने का। जो बचा रह गया।
पंूजीवादी महाशक्तिशाली राष्ट्र किस तरह अपने साम्राज्य के विस्तार और मुनाफे के लिए पूरे देश को युद्ध में झोंक देता है। उसका कू्रर यथार्थ हमें समय का हमशक्ल जैसी महत्वपूर्ण कविता में देखने को मिलता है। जिसमें कवि कहता है- कितनी बेरहमी बेशर्मी बेदर्दी से। संहार किया होगा बेवजह। इस्पात के कबाड़ से कहीं ज्यादा वजन था। आदमी और शब्दों की मौतों का। वापरा था जिन्हें अंधाधुंध। वीभत्स महास्वाहा: में। नशे में चूर अघोरी की समिधा की तरह। निशाने पर इंसानियत के सिवाय। और कुछ नहीं था। बहाने हैं। पुल महल इमारतें कुएं तहखाने। और नदी का हराभरा पाट।
इसी अराजक, अमानवीय और कू्रर समय के जटिल यथार्थ को अपनी सबसे महत्वपूर्ण और लम्बी कविता माया में माया शीर्षक में अभिव्यक्त करते हैं। जो पूंजी के मायावी बाजार के यथार्थ की जटिलताओं को परत दर परत खोलने की कोशिश करती और लगातार उसकी कू्रर और अमानवीय होती जा रही स्थितियों को उजागर करती कविता है। वे कहते हैं- हम जो जी रहे। मायावी षडयंत्र में रचे गए। सौंदर्य संपन्नता विलास और विपुलता की। मोह मृगया में। ऐसा सुख छलता है। ऐसा दुख भी ठगता। यह माया के अंदर माया। आजकल का दोमुँहा श्राप। हम ऐसे घड़ी के कलपुर्जे हो गए हैं समय जिसकी पकड़ से बाहर हो गया है। हम अपने को केवल हर जगह छलते हुए देखने के लिए विवश हो गये हैं। इस बाजार ने हमारी हवस को इतना बढ़ा दिया है कि हम पशुता में पशु से भी आगे निकल गये है। बाजार मीडिया के माध्यम से धीमा जहर कहर की तरह युवामन में चुपचाप प्रसारित कर रहा है और वस्तुओं की अतिरंजित व मोहक छवियों के बीच मनुष्य के कोमल चेतन संसार को नष्ट करता जा रहा है। बाजार ने आज ऐसा समाज रच दिया है। जहां आदमी को आदमी की जरूरत नहीं। वस्तुओं ने आदमी को विस्थापित कर उसे कुछ चुनचुनाती आवाजों और गुदगुदाते दृश्यों का गुलाम बना दिया है। वे अपनी कविता में कहते है- शब्दकोषों के संसार में। कफन ओढ़े जा रहे ये शब्द। यह मोह ग्रस्त यंत्राचरण। किसी दिन तो रख देगा। अपने ही सर पर। कुटिल वरदानी भस्मासुरी हाथ। कैसे बच सकता है। केवल यंत्रों और वस्तुओं से ठूँसा मानव समाज। होने से बरबाद। बाजार की उपभोक्तावादी संस्कृति हमारी जरूरी और गैर जरूरी इच्छाओं का विस्फोट है। जिसकी चकाचौंध में बहुत विस्तार से देखने पर भी आम आदमी का कोई अस्तित्व नजर नहीं आता है। आज आदमी और बाजार का रिश्ता ऐसा हो गया है जैसे बीमार का अस्पताल से। मनुष्य ने जिस समय को रचा है आज वही समय उसके पकड़ से बाहर हो गया है। यह कविता अपने समय के यथार्थ का आख्यान रचती इस संग्रह की सबसे महत्वपूर्ण और लम्बी कविता है। जो अपने समय के यथार्थ को उसकी समग्रता में पकडऩे की कोशिश करती है। यह कविता अपने भीतर गहरी बेचैनी, दुख और पीड़ा के साथ वैश्विक दृष्टि लिए हुए है। जो अपनी अभिव्यक्ति में बेहद सार्थक, मजबूत और ताकतवर कविता है।
इस संग्रह में प्रकृति, रिश्ते-नातों, प्रेम और विभिन्न अनुभूतियों से संबंधित कई छोटी-बड़ी कविताएं हैं। जो लगातार असुंदर होते जा रहे समय में सौंदर्य की तलाश करती, रचती और अपने जड़ों से जीवन रस को संचित करती हैं। कवि ने प्रकृति के सौंदर्य और उसकी क्रियाओं को बेहद सूक्ष्मता से अनुभव किया है। जो जीवनजगत के प्रति उनकीगहरी रागात्मकता, आत्मीयता और कृतज्ञता को दर्शाता है।
हरीश वाढेर वस्तुत: सौंदर्य के कवि हैं। जीवन-जगत के सौंदर्य को वे बिना किसी कृत्रिमता या आडंबर के स्वाभाविक अभिव्यक्ति करते हैं। जिसके कारण उनके बिम्ब मानस पटल पर जीवंत हो उठते हैं। ये कविताएं प्रकृति के प्रति पाठकों के भीतर एक आत्मीय दृष्टि को विकसित करती हैं। इन कविताओं में अनुभूति और अभिव्यक्ति के स्तर पर कोई फाँक नजर नहीं आती। यही कारण है कि यह अपनी सहज संप्रेषणीयता में सीधे पाठकों से जुड़ पाती है। इन कविताओंं में न तो अति बौद्धिकता है न ही भावुकता का अतिरेक और न ही भाषा की कीमियागिरी ही है। बल्कि संवेदना, विचार, भाषा, शिल्प और संरचना की दृष्टि से बेहद संयमित और कसी हुई कविताएं हैं।
इस संग्रह की कविताएं समकालीन हिन्दी कविता में अपनी सहजता, स्वभाविकता और अभिव्यक्ति में एक नया स्वाद और अंदाज लिये हुए है। जिसे अभी तक पहचाना नहीं गया है और जो बचा रह गया है। अपनी सुंदरता के साथ व्यक्त होने की चाह लिए फुहारों में। फूलझडिय़ों में। अनारदानों सा स्पष्ट।


काव्य संग्रह: जो पहचाना नहीं गया
कवि: हरीश वाढेर
प्रकाशक: हर्ष पब्लिकेशन