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Monday 20 Nov 2017

छत्तीसगढ़ी लोक-वेदना का मरसिया: पगडंडी छिप गई थी

 

छत्तीसगढ़ को धान का कटोरा कहा जाता है और इधर छत्तीसगढ़ नक्सली समस्या के कारण भी देश में बहुचर्चित रहता है। इसी छत्तीसगढ़ की धरा से जब लोकरंग में पगी कविताएं लिखी जाती हैं तो उनमें धान की सोंधी खुशबू के साथ नक्सली हिंसा की बदबू भी आ मिलती है। छत्तीसगढ़ ने हिन्दी को कई महत्वपूर्ण कवि दिए हैं। उनमें श्रीकांत वर्मा और विनोद कुमार शुक्ल जैसे बड़े नाम भी हैं। छत्तीसगढ़ की अस्मिता और लोकाचार पर इधर जो किताब पढ़ी है वह कवि संजय अलंग की कविताओं की किताब है 'पगडंडी छिप गई थी'। कवि अलंग लोकरंग से आच्छादित इसी छिपी पगडंडी की खोज में अपनी जड़ों तक पहुंचते हैं और छत्तीसगढिय़ा लोक वेदना, अस्मिता, आशाओं को आकार देने का विनम्र प्रयास करते हैं। नास्टेल्जिक स्मृतियां कवि का खज़़ाना हैं।
कम पंक्तियों में गहन भावबोध समेटे सहज कविताएं संजय अलंग की रचनात्मक विशेषता है। उपभोक्तावादी समय में सामाजिक, राजनीतिक ताने-बाने पर पड़ते प्रहार से कविताएं लाऊड हो सकती थीं लेकिन संजय अलंग की कविताएं नाटकीय आवेश में नहीं आतीं बल्कि बड़े धैर्य से कारणों की पड़ताल करती हैं और सांकेतिक प्रतिरोध दर्ज करने में सफल होती हैं। संजय अलंग की कविताएं प्रकृति और मनुष्य के बीच सेतु का निर्माण करती हैं, जिन्हें आज के परिवेश में देखा जा सकता है। इन कविताओं में कवि बार-बार खुद के जीवन का भी अनुसंधान करता है। समय के साथ बदलते परिवेश में कवि का लोक के प्रति गहरा आग्रह है। कवि बाज़ारवाद से प्रभावित नई सामाजिक संरचना के साथ तालमेल बैठाने में कहां चूक हो रही है इसके लिए चिंतित भी है। लोकरंग को बरकरार रखने की जि़द से सराबोर कविताएं इस संग्रह की निधि हैं-'बस उसे चाहिए / गहरे हरे रंग की पत्तियोंं / की पनाह।' (छत्तीसगढ़ पृ. 11)
इन कविताओं में गेंड़ी, अमृतधारा का जल-प्रपात, सरई के जंगल, खदान, करमा, मैना, महुआ, गोदना, झुमका बांध, रेण और गेज नदी, बीरबहूटी, भादों, चूल्हा, बांस और गुलेल जैसे लोक-तत्व हैं जो अपनी समूची विविधता के साथ छत्तीसगढ़ लोक को परिभाषित करते हैं। इन लोक-तत्वों से बनी कविताएं संजय अलंग की लोकचेतना और लोक-प्रेम को प्रदर्शित करने में सक्षम हैं। इन कविताओं के माध्यम से कवि बार-बार स्मृतियों की बीहड़ पगडंडियों में विचरण करता है और हर बार ये साबित करता है कि प्रकृति से मनुष्यों का जुड़ाव कितना सुखद हुआ करता था। अपनी जड़ों से कटती जा रही संस्कृति के अधोपतन से कवि दुखी है। कवि पाठकों को सचेत करता चलता है कि विरासतें स्थायी होती हैं और तथाकथित आधुनिकता क्षणभंगुर है। मैं संजय अलंग की इन कविताओं के बारे में ज्यादा बात नहीं करूं गा क्योंकि इन कविताओं का लोक पाठकों को सहज ही अपने साथ बहा ले जाता है और मनुष्य की जिजीविषा का उद्घोष इन कविताओं को सशक्त बनाती हैं।
मेरा ध्यान उन अन्य कविताओं की तरफ जाता है जहां कवि ने बहुत सिद्धहस्त तरीके से लोकरंग के साथ की जा रही छेडख़ानी और वर्तमान सामाजिक, राजनीतिक, आर्थिक बदलावों के साथ बदलते मानवीय मूल्यों के प्रति अपनी चिंताएं प्रकट की हैं। प्रशासनिक सेवाएं देते हुए सत्ता की नीतिगत आलोचना करने में तमाम खतरे हैं और मुझे खुशी है कि संजय अलंग ने बड़ी कुशलता से अपनी बात इस तरह से रक्खी हैं कि सांप भी मर जाए और लाठी भी न टूटे।
जैसे एक कविता में 'गंवर' के बहाने कवि बड़ी बात कह जाता है। गंवर वन-भैंसे के शिकार का सांकेतिक जनजातीय नृत्य है। वनभैंसे के सींग और कौडिय़ों का मुखौटा लगाकर यह नृत्य किया जाता है। कभी यह नृत्य 'गंवर' जनजातियां किया करती थीं। आज कुछ और लोग हैं जो गंवर कर रहे हैं। इस आखेट के तीखेपन को सरल-सहज तरीके संजय अलंग ने इस तरह प्रस्तुत किया है--
'वे भी अब जंगल में आ गए हैं / करने को एकत्र अपना भोजन
उस भोजन में सत्ता पाना भी है / नाम कमाना भी है / जो वे
अब कर रहे हैं यहां एकत्र भोजन / क्या वे भी लौट कर दिखाते हैं गंवर और
बताते हैं कि क्या शिकार कैसे / कैसे मारे आदमी / कमाया नाम कैसे?
खुश होते हैं क्या अब भी / देखने वाले इसे।'
(क्या अब भी वैसा ही है गंवर पृ 17)
ये जो प्रतिरोधी स्वर हैं इन्हें मैंने संजय अलंग की कविताओं में ही पाया है। छत्तीसगढ़ की समकालीन कविताएं जाने क्यों अपनी पोलीटिक्स बताने से बचती फिरती हैं। छत्तीसगढ़ के समकालीन कवि भी इन सवालों से बचते नजऱ आते हैं और छत्तीसगढ़ी लोक की संरचना में भी डूबते-उतराते रहते हैं। कवि बुद्धिलाल पाल ने ज़रूर 'राजा की दुनिया' संग्रह की कविताओं में सत्ता के घिनौने खेल के बीच पिसते लोक की फिक्र की है। बेशक, इस तरह की कोशिशों से पहचान लिए जाने का खतरा तो है लेकिन क्या सिर्फ इसी डर से सही बात कहने से कवि बचता फिरेगा?
सरई के पेड़ों को प्रतीक बनाकर जनजातीय संस्कृति और आदिवासियों के दमन-शोषण की प्रतीकात्मक दास्तान जिस कविता में उभर कर आई है वह कविता है--'सरई जंगल मुरझा रहा था और लोग हंस रहे थे'
ये लोग कौन हैं? क्या इनका इस लोक से कोई नाता नहीं है? क्या ये हंसने वाले लोग वही परजीवी हैं जिनके हाथ में सत्ता है, जो नैसर्गिक संसाधनों से लैस आदिवासियों को जल, जंगल और जमीन से बेदखल करने का जतन किया करते हंै। जो आदिवासियों की भूख से अन्न चुराकर खुश होते हैं? बड़ी वीभत्स स्थिति निर्मित होती है जब कवि संवेदनाओं को इस तरह शब्दों में बयान करता है--
'संगीने स्तनों पर ठुकी थीं / बसंत का राग / नहीं गा पा रही थी सरई /
मांदर निढाल हो चला था / आवाज़ थी तो पर / गोलियों की'
( पृ 19)
आदिवासियों को मुख्यधारा से जोडऩे की निरर्थक कवायद का एक नमूना इस कविता में दिखलाई देता है जहां आदिवासियों की संस्कृति पर तथाकथित सभ्य-समाज अपनी विकृत संस्कृति आरोपित करने का निर्मम प्रयास करता है। ये कोशिशें आदिवासियों को भयभीत करती हैं और उनकी नैसर्गिक सहजता पर अतिक्रमण करती हैं।
'इन नए कपड़ों से जंगल तप रहा था / जंगल के सीने पर बूट और संगीन थे
जंगल की नाक से फुल्ली को खींच देने से / खून बह रहा था / अब लड़की
महुआ बीनने जाने से / कतरा रही है
नए कपड़ों से आ रही / खून और बारूद की गंध से / महुआ की गंध खो गई है।'
( महुआ बीनती लड़की -पृ 28)
लोकतांत्रिक देश में आदिवासियों की अस्मिता के साथ यह जो घिनौना खेल खेला जा रहा है इस ओर बहुत कम लोगों ने ध्यान दिया है। छत्तीसगढ़ राज्य बनने के बाद छत्तीसगढ़ी बोली को भाषा का दर्जा दिलाने वाली ताकतें भी आदिवासियों की समस्याओं से मुंह चुराती हैं और लोकगीतों की पैराडी बनाकर दोयम दर्जे का छत्तीसगढ़ी साहित्य का सृजन कर रही हैं। अहो रूपम् अहो ध्वनि का खेल खेला जा रहा है। आदिवासियों की संस्कृति और नगरीय-ग्रामीण संस्कृति में ज़मीन-आसमान का अंतर है। इसे संजय अलंग की कविताओं के माध्यम से बखूबी समझा जा सकता है। ज्यादा ताकतवर सभ्यताएं आदिवासी संस्कृति को लीलने का प्रयास करती हैं। दृश्य और श्रव्य माध्यम दिन-रात इन ताकतवर सभ्यताओं के रीति-रिवाज़ों को स्थापित करने का प्रयास करती हैं। इस चकाचौंध में शाश्वत आदिवासी खुद को ठगा सा महसूस करता है। आदिवासी संस्कृति का शोक-गीत है एक कविता- 'ऊंचे दरख्तों के साए में प्यार'। इस कविता का विन्यास थोड़ा कठिन है और मांदर की थाप से उपजी थरथराहट को देर तक वातावरण में गूंजने देता है। संजय अलंग की इस कविता पर अलग से विस्तार से लिखने की आवश्यकता है। इस कविता में बस्तर के आदिवासियों की सामाजिक संस्था घोटुल की दुर्दशा का वर्णन इस तरह से किया गया है कि देर तक रूह कांपती रहती है। जाने कैसा ग्रहण लग गया है इन प्राकृतिक संस्थाओं पर? किस तरह आदिवासी जन-जीवन की दुर्दशा का वर्णन इस तरह करते हैं--
'मीठी सुबह की गुनगुनी धूप के वस्त्र/ कांटों से उलझते, बदन छिलते / तो मुस्कुराहट ही आती
अब वही वस्त्र / पेशाब में भींग कर बदबू मार रहे हैं / बर्बादी घोटुल से शिकारों तक / शरीर ढंकने को तरस रही है।' (पृ 35)
बंदूकों से समाधान तलाशती सरकारों की निर्लज्जता क्या कभी आदिवासियों की संवेदनाओं को आत्मसात करेगी? बेशक जंगलों के बीच कोई वैक्यूम नहीं हुआ करता था। जंगलों की अकूत खनिज-सम्पदा की लूट के लिए रोड़े की तरह खड़े आदिवासियों को बेदखल करना या कि उनका उन्मूलन करना ही कारपोरेट लूट का अभीष्ट है। चुनी हुई लोकतांत्रिक सरकारें नक्सल समस्या से निपटने के लिए नित नए प्रयोग किया करती हैं। इसे संजय अलंग ने करीब से देखा, सुना और गुना है तभी तो इस कविता में आदिवासियों की व्यथा चीत्कार मारती है- 'अनुपस्थित है हर चीज़ चारों ओर/ बचा नहीं पा रही कविता भी / विचार को, विश्वास को, आसमान को / हदेें, भूख, लालच, बंदूक से बह रहे हैं / प्रेम और शांति जंजीर से जकड़ी / जुडूम के कैंप में बैठी / भात खा रही है शरणार्थियों के साथ।' (सलवा जुडूम के दरवाजे से पृ 39)
ये कैसी लाचारी है जो आदिवासियों को पशुवत जीवन जीने पर मजबूर कर रही है। ये कैसी विडम्बना है कि इन आदिवासियों की खुशहाली के लिए फ्रेमवर्क तैयार करते हुए पुलिस, अद्र्ध-सैनिक बल की तैनाती होती है और आदिवासियों को जल-जंगल-जमीन से अंतत: बेदखल होना पड़ता है। इन आदिवासियों के पास कोई मीडिया नहीं है, इनके पास कोई गुहार सुनने वाले कान नहीं हैं। देश-प्रदेश की राजधानियों में इन आदिवासियों को संरक्षित करने के लिए तमाम योजनाएं बनती हैं और आदिवासी या तो पुलिसिया कारवाई से या फिर नक्सली हिंसा से असमय मौत का शिकार होता है। बेशक ये आदिवासी हमारे देश के नागरिक हैं और संविधान प्रदत्त तमाम अधिकारों और कर्तव्यों से इनकी रक्षा होनी चाहिए थी। ये आदिवासी इतने निरीह हो चुके हैं कि बकौल कवि-''आंखों में विस्फोट की चिनगारी दिखती नहीं / विस्फोट सुनता नहीं / बहरापन अब बम से भी नहीं जाता...।''
क्या हो रहा है? लोकतांत्रिक संस्थाएं कवि के इस आर्तनाद पर मौन क्यों हैं?
संजय अलंग ने मर्यादा के साथ ऐसे कई प्रश्न किए हैं जिन प्रश्नों को पूछने से बहुत से कवि बचना चाहते हैं। सीधे आंख में आंख डालकर पूछे जाने वाले इन सवालों से कवि की समय और समाज के प्रति जि़म्मेदारियों का अहसास होता है। कवि सिर्फ स्वांत: सुखाय नहीं लिख रहा है बल्कि उसके अपने परिवेश के प्रति कुछ सरोकार भी हैं जो इन कविताओं को पढऩे से पता चलता है।
आदिवासियों और किसानों को निपटाने का एक और औजार आजकल प्रचलन में है-'सेज'। आदिवासियों और किसानों को उनकी जमीनों से बेदखल करने का संवैधानिक हथियार। इसके लिए तर्क चाहे जो हों लेकिन 'अच्छा आदमी सब ओर बस जाएगा।' कविता के माध्यम से कवि संजय अलंग ने करारा व्यंग्य व्यवस्था पर किया है। लुटियन की दिल्ली वहीं रहेगी, राजघाट अपनी जगह रहेगा लेकिन आदिवासियों और किसानों को अपनी जमीनों से विस्थापित होना होगा। इसके लिए उन्हें दाम मिल जाएंगे। क्या ये निर्धन पैसा रखना या उसका उपयोग करना जानते हैं? सेज के जरिये ग्रामीण संस्कृति की विविधता और विशिष्टता को मारने का यह कैसा षड्यंत्र है? संग्रह की बेहतरीन वैचारिक व्यंग्यात्मक कविता है ये। ये भोले-भाले आदिवासी, ग्रामीण अच्छे आदमी होते हैं इन्हें उजाड़कर, उखाड़कर कहीं भी फेंका या रोपा जा सकता है। इनके पक्ष में बोलने वाला कोई नहीं। देश के नीति-निर्धारक तत्वों की चालबाजिय़ां और निर्धन को निर्धनतम बनाने का षड्यंत्र जैसे किसी से छिपा नहीं है लेकिन संजय अलंग ने कविता के माध्यम से सेज़ से सम्भावित खतरों की तरफ मुखरता से प्रश्न खड़े किए हैं। विकास की पूंजीवादी अवधारणा से फायदा किनका है और नुकसान किन्हें उठाना पड़ रहा है, सर्वविदित है फिर भी विकास-विकास के नारों में हाशिए की आवाज़ेंं दम तोड़ रही हैं।
'पैसा आएगा तो जाएगा / विकास भी लाएगा / भर-भर मु_ी फूल उड़ाएगा / छम-छम करती नचनिया पाएगा / जमीन तो स्थिर है उसे ही ले जाएगा / कर्मशील दस्यु ही चल संपत्ति है / उसे ही हटाएगा।' (अच्छा आदमी सब ओर बस जाएगा पृ. 47)
'जमीन जाएगी, जाए/ पेड़, पहाड़, नदी, जानवर / नाच-गाने, किताब, बोली / आन-बान, इज्जत-आबरू / शासन, संस्कृति / साथ जाएं तो जाएं।Ó
ऐसी विचारधारा सदियों से स्थापित ग्रामीण संस्कारों की बलि चढ़ाने को बेकरार है और कामयाब होती जा रही है। गांव को लीलते जा रहे शहर एक ऐसे हिन्दुस्तान का निर्माण कर रहे हैं जहां लोकरंग, लोकधर्मिता की हत्या हो रही है। विविधता की इंद्रधनुषी छटा को खत्म करने की साजिशें जारी हैं। मुख्यधारा में लाने के नारे से गांव-गिरांव की अस्मिता पर खतरा मंडरा रहा है।
'अच्छा आदमी तुम्हें भी हटाएगा / अपने में सम्मिलित होने की बात चलाएगा / बड़ा वाला एक गांव बनाएगा / बाकी किस काम के / एक गांव, एक धर्म, एक संस्कृति को जमा पाएगा।'
यह एक फासीवादी विचारधारा है जो अनेकता में एकता की नींव पर बने हिन्दुस्तान के लिए सबसे बड़ा खतरा है और संजय अलंग इनसे पाठकों को रूबरू कराते चलते हैं।
लोक कलाकार इन बदलती परिस्थितियों में असमंजस की स्थिति में अवाक खड़े हैं। उनकी अपनी पहचान विलुप्त होते जा रही है। औद्योगीकरण और विकास की आंधी ने गांव-गिरांव की लोक कलाओं को लील लिया है। आजीविका का संकट लोक-कला की कब्र बनता जा रहा है। ऐसे में लोक-कलाकार की व्यथा 'कलाकार रण तीर से उठ नहीं पा रहा' कविता में दर्ज है। बड़ी सघन अनुभूतियों से कवि ने लोककला की दुर्दशा पर सवाल उठाए हैं जहां नदियां, पर्वत, जंगल और खेत सब बड़े पैमाने पर किए जा रहे औद्योगीकरण से विलुप्त हो रहे हैं।
छत्तीसगढ़ सिर्फ धान, ददरिया, मंड़ई, बोली-बानी, तीज-त्योहारों का पर्याय भर नहीं है। छत्तीसगढ़ का एक महत्वपूर्ण इलाका बस्तर है जो जाने कितने दशकों से आग और बारूद के ढेर पर बैठा है। वहां के आदिवासियों की दैनंदिनी पर पुलिस-प्रशासन की दखलंदाजी नाकाबिले-बर्दाश्त है। ये नक्सली कौन हैं? यदि ये आदिवासी ही हैं तो फिर इनकी बेहतरी की योजनाएं बननी चाहिए थीं न कि इनके दमन के लिए संगीनों, सिपाहियों, वज्र वाहनों और हैलीकॉप्टरों की तैनाती की जानी चाहिए थी। लोकतांत्रिक देश में आदिवासियों के संरक्षण और संवद्र्धन की योजनाएं बंदूक की नलियों से निकालने की कोशिशें नाकाम हो चुकी हैं और आदिवासियों की अस्मिता खतरे में है।
संजय अलंग की कविताएं बड़ी मुखरता से इन्हें जनमानस तक पहुंचा रही हैं। संजय अलंग बेहद जि़म्मेदार कवि हैं जो लोक की रक्षा के लिए कृत-संकल्पित हैं।
तभी तो अपनी एक कविता में वे ये सवाल उठाते हैं- 'खनिज महत्वपूर्ण है कि आदिवासी / महंगे से महंगा खनिज है वो तो / देवता क्यों माने आदमी पहाड़ और वन को / उसे उपकरण की तरह तो शासक ही करता है उपयोग / तुम क्यों?'
एक और करारा प्रहार- 'सरकार तो सदा वही, जो सभ्य इच्छा को कानून कह इठलाएगी'
और- 'लाभ खनिज से, खनन आदिवासियों से / विरोधी जुग्गा, जुम्मा, राजू, दोरा, पामभोई सब तो खो गए / हैं तो उद्योगपति, मंत्री, सरकर और बंदूकें / इनका घालमेल ही सब कुछ कराएगा।' (कुई विद्रोह-बस्तर 1859 पृ 59)
ये है संजय अलंग की अभिव्यक्ति के खतरे उठाकर चलने की जि़द जो उन्हें एकदम अलग चिन्हित करती है। मैं उन कविताओं पर क्या बात करूं जिनमें उनके छत्तीसगढिय़ा संस्कार बोल रहे हैं। कवि का कस्बा, कवि का बचपन, कवि के अंतरंग और कवि का लोकोत्सव सब कुछ कई कविताओं में मुखरता से बोलते हंै। उनकी कविताओं के प्रतिरोधी स्वर उन्हें एक नई ऊंचाई प्रदान करते हैं। बड़े साहस के साथ कवि ने अपनी बातें पाठकों के समक्ष रखी हैं। आए दिन नक्सली हिंसा के तांडव की भत्र्सना नेता और मीडिया करता रहता है लेकिन ऐसी स्थितियां बनी क्यों इस विषय पर सब मौन रहते हैं। संजय अलंग समझते हैं कि- 'हत्याएं करते जाना / आत्महंता होने का है राग / बताओ नहीं कुछ भी / सुनना नहीं कुछ भी / न ही जानना / न ही समझना है कुछ भी / डर कर / लाशों के और खेत बनाते जाना है।' (हत्या पृ 77)
ये डर आदिवासियों के मन में भी है और आदिवासियों के बीच नियुक्त सैनिकों-सिपाहियों के मन में भी है परिणामत: लाशों की फसल उगती रहती है। ये दोनों एक-दूसरे से डरे हुए हैं। एक-दूसरे पर घात लगाए बैठे इन लोगों को लाशों के ढेर में तब्दील होने का खतरा हमेशा मंडराता रहता है। सरकारी तंत्र आदिवासियों के लिए मनोहारी योजनाओं का मौखिक पिटारा खोलता है और सिपाहियों को रसद और गोला-बारूद सप्लाई करता रहता है। 'बारूदी सुरंगे' जब-तब फटती रहती हैं। मीडिया लाशों की गिनती करती है और अचानक भत्र्सनाओं की आवाज़ें गूंजने लगती हैं।
''फटी जब बारूदी सुरंग / सिर किसी का कहीं गिरा / कहीं किसी का हाथ / रक्त के साथ आंतें बिखरी हुई थीं / चीख सुनने वाला किनारे खड़ा / चिल्ला रहा था-विजय/ अब मरसिया ही पढ़ा जाना था/ निंदा के बयान के साथ!' (बारूदी सुरंगें पृ 79)
कुछ हाइकू भी संकलित हैं इस संग्रह में। इनमें भी कवि की राजनीतिक समझ और सामयिक हस्तक्षेप नजऱ आता है।
'किसकी बंदूक किसका सैनिक
कौन मरा कौन जीता
नहीं पता तनिक'
और एक अन्य हाइकू कवि की वैश्विक दृष्टि सम्पन्नता की परिचायक है।
'फिलीस्तीन, सिंध, सीरिया, सोमालिया, कश्मीर
सब एक साथ याद आता है
आते हो लेने जब बस्तर की तस्वीर।'
मेरे विचार से बस्तर की तमाम समस्याओं पर बड़े साहस और विवेक के साथ एक साथ इतनी अधिक कविताएं संजय अलंग ने ही लिखी होंगी, जिनमें सीधे-सीधे आदिवासियों के साथ कवि खड़ा भी दीखता है। यह एक दुस्साहस है जब आदिवासियों का पक्षधर होना व्यक्ति को संदिग्ध बनाता हो।
ऐसी ही एक कविता है जो मरसिया की तरह पढ़ी जाती है और गहरी वेदना से दम टूटने लगता है।
-'क्या मुझे बस्तर पर रोना चाहिए?'
इस कविता की थरथराहट अभी सम पर आती है कि 'शव' कविता तो जैसे चेतना को झकझोर कर रख देती है।
'पुलिस समझ नहीं पा रही कि / सपनों और इच्छाओं को कहां फेंकें / अब तो दंतेवाड़ा, बेरूत, बगदाद, गोधरा / सभी जगह गड्ढे पटे पड़े हैं / स्वच्छता का दारोमदार भी सरकार पर है / नालियां कीचड़ और प्लास्टिक से अटी पड़ी हैं / हां उसमें शव भी हैं, कहीं ।'
'इच्छाओं को ताबूत में रैप किया जा रहा है / जम्हूरियत, नौकरी, पेेंशन, धंधे, डालर, मुआवज़ा, बदलाव / रैपर पर पता नहीं क्या-क्या प्रिंट है / शवों को तो हटना ही होगा।' (शव पृ 77)
और अंत में छत्तीसगढ़ बोली-भाषा के अध:पतन पर कवि की चिंताएं इस तरह परिलक्षित होती हैं- 'अब उनकी भाषा कोने में घुटी सी पड़ी है / नई भाषा के गाने ऊंची आवाज़ में बज रहे हैं / वे अपनी भाषा को बचाने का आवेदन कर रहे हैं / उसके संरक्षण की फाइल नई भाषा में लिखी जाकर दौड़ रही है / एक और भाषा खोने की तैयारी में है।' (गुम होती भाषा पृ 77)
छत्तीसगढ़ में छॉलीवुड पनप चुका है और भूमंडलीकरण की आंधी से मदांध उग्र राष्ट्रवाद पनप रहा है। इंसान और इंसान के बीच दूरियां बढ़ रही हैं और ऐसे समय संजय अलंग जैसे सजग-सचेत कवि अपने समय की तर्जुमानी कर रहे हैं।
एक बेहद जि़म्मेदार कवि संजय अलंग से इसी तरह हस्तक्षेप की आशाएं बलवती होती हैं।


काव्य संग्रह: पगडंडी छिप गई थी
कवि: संजय अलंग
प्रकाशक: किताबघर, 4855-56/24, अंसारी रोड, दरियागंज, नई दिल्ली 110002, 011 23266207
मूल्य: दो सौ रूपए