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Wednesday 22 Nov 2017

कला के वृहत संसार में

(वाया चिडिय़ों का स्टेशन)

केशव कहिन न जाइ का कहिये' कहते हुए भी बहुत कुछ कहा जा सकता है। तो मेरे लिए भी यह सुविधा है कि अपनी यात्रा के अभीष्ट पड़ाव पर पहुंचने से एक स्टेशन पहले के अनुभव से बात शुरू करूं। अजंता-एलोरा देखने के लिए औरंगाबाद हम मनमाड़ होते हुए गए। मनमाड़ से अगली ट्रेन पकडऩे के बीच हमें तीन घंटे का समय बिताना था। मनमाड़ जैसे व्यस्त जंक्शन के उच्च श्रेणी प्रतीक्षालय को विश्राम कक्ष तो बिलकुल ही नहीं कहा जा सकता। यहां तक कि वहां का बाथरूम को किसी भी कोण और नजरिए से साफ-सुथरा कहने के लिए विनम्रता के जिस स्तर की आवश्यकता है उतनी सभ्यता अभी मुझमें नहीं आ पाई है। (यों जब भोपाल को स्वच्छ शहर नं. 2 का खिताब मिल गया है तब यहां के नागरिक को वह स्तर प्राप्त कर लेना चाहिए।) यही वजह थी कि जनशताब्दी जिसमें हमें मनमाड़ से औरंगाबाद जाना था, के आगमन में काफी वक्त बाकी था, लेकिन हमारे कुली सुनील ने आकर प्लेटफार्म पर ही चलकर प्रतीक्षा करने के लिए कहा तो हम फौरन राजी हो गए। शायद वह प्लेटफार्म नं.6 था। जिस स्थान पर हमारा एसी कोच रुकता है वहां तक शेड नहीं था। खुले आसमान के नीचे बेंच पर बैठते हुए मुझे नहीं मालूम था कि मेरे लिए वह शाम एक स्मरणीय संध्या होने वाली थी।
यह तो मैंने ध्यान दिया था कि स्टेशन के हर गर्डर पर चिडिय़ा बैठी हुई थीं लेकिन खुले आसमान के नीचे आते ही तोतों का एक बड़ा झुंड उड़ते हुए दिखा जो स्टेशन के पार सामने पीपल के बड़े पेड़ पर उतरा। वह झुंड शायद सांस लेने के लिए ही पेड़ पर उतरा था। कुछ क्षणों के बाद ही पेड़ पर से जैसे हरे रंग की बौछार हुई। झुंड ने फिर एक उड़ान भरी। ढलती हुई शाम में आसमान में तैरते कुछ सफेद बादलों पर पश्चिमी दिशा ने रंगीन बनाना शुरू कर दिया था और आसपास कौओं की समवेत कांव-कांव की ध्वनि थी, यह अनोखा अनुभव था।
इतने तोते। शहर में। वह भी स्टेशन के आसपास। मैं अचंभे में था कि स्टेशन के दूसरे तरफ के पीपल के पेड़ पर बैठे पक्षियों का झुंड आसमान में उड़ा और एक बड़ा चक्कर काटकर फिर पेड़ पर जा बैठा। एक ही प्रजाति के पक्षियों का समूह तोतों के झुंड से भी बड़ा था। काले रंग की इस चिडिय़ा का नाम मुझे नहीं मालूम। शायद ब्रम्हणी या सतबहिनिया हो। सुनील को भी नहीं मालूम था। मैंने वर्षों के बाद खग-कूजन का ऐसा अनोखा संगीत सुना। ये प्रवासी पंछी नहीं हैं बल्कि यहां के नागरिकों की ही तरह स्थानीय पक्षी हैं। बेशक बदलते मौसम के समय इनके प्रवासी मित्र भी आकर इनकी मेहमाननवाजी का लाभ उठाते होंगे। जो पक्षी उड़ान भर रहे थे उनके ये स्थायी डेरे हैं। इनके साथ यहां के निवासियों का सहकार भाव है, यह सुनील की बातों से लग रहा था। बातों के बीच उसने कहा- 'अंकल जी, जिन पेड़ों पर पक्षियों का बसेरा है उन पर इन पक्षियों के लिए दाना-पानी का इंतजाम यहां के लोग करते हैं। आप गौर करें पेड़ों पर जो बोरे जैसी चीजें दिखाई दे रही हैं उसमें आसपास की केन्टीन और होटलों का बचा खाना लोग चिडिय़ों के लिए रख देते हैं। वहां दाना और पानी के लिए बर्तन भी बांध देते हैं।'
'यानी यहां के लोगों के साथ इनका पड़ोसी जैसा संबंध है।' मैंने कहा।
'बिल्कुल। यहां लोग इनका ख्याल रखते हैं।'
जब घरों के आंगन में प्रभात का संदेश लेकर आने वाले कौवे और घरों में घोंसलों बनाकर रहने वाली गौरैयों को दूर हकाल दिया गया है और उनकी आवजें लगभग अजनबी हो गई हैं तब मनमाड़ स्टेशन के प्लेटफार्म पर चालीस-पचास मिनट इन आकाशचारियों ने मन को आनंद से भर दिया। जनशताब्दी आने पर हमने चिडिय़ों को टाटा किया और औरंगाबाद के लिए रवाना हो गए।
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जनशताब्दी से औरंगाबाद की यात्रा मात्र 2 घंटे की है। जिस होटल में मैंने कमरे का आरक्षण करवाया था। वहां मैंने फोन लगाने की कोशिश की। यह तय करने के लिए कि होटल की टैक्सी समय पर मुझे ले जाने के लिए स्टेशन पहुंच जाए। वहां से होटल और वापसी के समय स्टेशन छोडऩा काम्पलीमेंट्री था। डिजिटल इंडिया का ढोल बजता रहा लेकिन होटल से संपर्क नहीं हो सका। मेरी सीट के आगे बैठे सज्जन भी परेशान थे। उनके मोबाइल पर भी बात नहीं हो पा रही थी। वैसे, यात्रा में कई बार नेटवर्क न मिलना बहुतों का सामान्य अनुभव है। औरंगाबाद स्टेशन के प्लेटफार्म पर उतरते ही एक ट्रेवल एजेंसी के सज्जन ने अपना कार्ड मुझे पकड़ाकर कहा- 'सर, दूसरों से सस्ती बेहतर सेवा देने की मेरी गारंटी है।' मैंने कहा, 'होटल पहुंचने के एक घंटे बाद फोन पर बात करूंगा। अभी तो यह बतलाइए कि रविराज होटल तक पहुंचाने का कितना लेंगे? उन्होंने अपने एक बंदे को पुकारा और मुझसे कहा- 'सर, हमारी टैक्सी से ही जाइए। केवल तीस रुपए में।'
होटल पहुंचकर मुझे यकीन हुआ कि अब अजंता एलोरा देखना तय है। मुझे दो बार अपना रेलवे आरक्षण रद्द करवाना पड़ा था। पहली बार बड़े भाई के आकस्मिक निधन के कारण और दूसरी बार विधानसभाओं के चुनाव की तारीख तय होते ही जाट आंदोलन की धमकी-चमकी के असर के कारण। जिस 'जसखण्ड एक्सप्रेस' से आरक्षण था वह हर दिन सात-आठ घंटे देरी से भोपाल पहुंच रही थी। मेरी यात्रा के दस दिन पहले ट्रेन तेरह घंटे देरी से आई तो उसी दिन आरक्षण रद्द करवाया था। अपने प्रांत में चुनाव न होते भी उसके प्रभाव से हम ग्रस्त हुए थे। प्रभु भी असहाय थे। बहरहाल, मेरे पूछने पर होटल के रिसेप्शन पर मुझे बतलाया गया कि उन्होंने भी फोन पर मुझसे संपर्क साधने की कोशिश की थी। संपर्क न होने पर भी उन्होंने होटल की टैक्सी स्टेशन पर भेजी थी। होटल मेरी अपेक्षाओं से भी बेहतर था। साफ-सुथरा, आधुनिक सुविधाओं से युक्त और विनम्र सेवा। आधे घंटे में ही उन दो वाहन एजेंसियों के फोन आ गए जिनसे भोपाल से ही मैंने जानकारियां ली थीं। घंटेभर बाद होटल तक पहुंचाने वाले टैक्सी ड्राइवर ने हाजिरी दी। उसी एजेन्ट के रेट कम थे। हमने दूसरे दिन अजंता और तीसरे दिन एलोरा जाना तय किया।
दूसरे दिन रिसेप्शन से सुबह 9.30 बजे फोन पर बतलाया गया कि हमारी टैक्सी आ गई है। हम तैयार थे। फौरन नीचे जाकर टैक्सी ड्राइवर से हाथ मिलाकर उसका नाम पूछा। यात्रा में टैक्सी और ऑटो वालों से दोस्ती करना अक्सर काम आता है। उन्हें अपने क्षेत्र के जनजीवन की जो जानकारी होती है वह टूरिस्ट गाइड में नहीं होती। ड्राइवर का नाम था राजू। मैंने कहा 'वाह, आज तो हमारे साथ राजू गाइड रहेंगे।'
राजू ने मुस्कुराकर कहा- 'सर, मैंने गाइड फिल्म देखी है लेकिन कहां वो राजू और कहां मैं।'
फिर तो, राजू दो दिनों तक हमारे लिए राजू गाइड ही बना रहा। अजंता-एलोरा जाते हुए और नगर दर्शन कराते हुए उसने हम लोगों को बहुत-सी बातें बतलाई। मसलन उसने कहा- सर, यहां एक पान की दुकान है। उसका पान आप खाएंगे तो आप बनारस का पान भूल जाएंगे।
राजू के नगर गौरव-भाव को मैं आहत नहीं करना चाहता था, सो कहा- 'ठीक है लौटते हुए या फिर कल जब एलोरा से लौटेंगे तब खा लेंगे। अभी तो यह बतलाओ कि यहां तो मुसलमान आबादी काफी है। कभी हिन्दू मुसलमान तनाव नहीं होता?'
'नहीं सर,' राजू ने कहा- 'यहां ऐसा कुछ नहीं है। मेलजोल अच्छा है। आपको टैक्सी में ले जाने के लिए पहले हमारे गफूर भाई जान आने वाले थे। हम उनको बड़े भाई जैसा मानते हैं।'
सुनकर अच्छा लगा। पूरी तरह यकीन तो नहीं हुआ पर खुशी हुई। अजंता की ओर ले जाने वाली सड़क बहुत बढिय़ा है। मैंने कहा 'सड़क का मेन्टेनेंस तो अच्छा है।' राजू की प्रतिक्रिया ने मुझे चकित कर दिया। उसने कहा- 'सर इस सड़क को फोरलेन होना चाहिए था। इसके लिए चीन सरकार ने ग्रांट दी। जब चाइना के नेता आए तो उन्हें इस रोड से अजंता नहीं ले गए। हेलीकाप्टर से सीधे ले गए।'
मैं फिर विश्वास और संशय के बीच था। इस सड़क को बनाने के लिए चीन सरकार क्यों पैसा देगी। माना कि अजंता विश्व धरोहर है, लेकिन क्या वहां पहुंचने के लिए अन्य देशों की सरकारें कोई इस तरह की राशि देती होगी इसमें मुझे संदेह है। कम से कम ऐसी कोई जानकारी मुझे नहीं है। राजू ने जो कुछ बतलाया उसका सच या झूठ वही जाने लेकिन हमारे देश में सड़कें नेताओं और अफसरों के लिए कामधेनु हैं। हमारी व्यवस्था में भ्रष्टाचारियों के लिए असली लक्कड़-हजम, पत्थर हजम चूर्ण की व्यवस्था है। स्वाभाविक है कि समाज में फैली अव्यवस्था और भ्रष्टाचार की बात चल पड़ी। एकाएक राजू ने अपने प्रांत के दो बड़े नेताओं के नाम लेकर कहा कि यदि इनके यहां छापा मारा जाए तो महाराष्ट्र का आधा कर्ज उतारा जा सकता है।
विषय बदलने के लिए मैंने कहा- 'यह तो गन्ना की पैदावार का क्षेत्र है। कहीं साफ-सुथरी मशीन पर गन्ने का रस पीने की इच्छा है। एक खेत के पास, सड़क के किनारे एक अस्थायी छाजन के नीचे कुछ कुर्सियां लगी थीं और गन्ना पेरने की एक मशीन भी थी। पास ही किसान का घर था। राजू ने उसे बुलाया और मशीन को दो बार अच्छी तरह धोने का कर्मकाण्ड पूरा करके गन्ने का रस पिलवाया जो सचमुच बहुत स्वादिष्ट था। वहीं से थोड़ी दूर चलकर अजंता घाटी की ढलान शुरू हो गई। एक स्थान पर गाड़ी रोककर उस गहरी घाटी पर नजर दौड़ाई। ऊपर से काफी नीचे गाडिय़ों की पार्किंग और ऑफिस जैसे कुछ भवन दिखलाई दिये। यहां से ही इतिहास किसी साथी की तरह हमारे संग लग लेता है। मन अतीत की ओर लौटने लगता है। घने बादलों से आच्छादित, पगडंडी जैसे रास्तों से घाटी में उतरकर बगुर्ना नदी घाटी में, घोड़े की नाल के आकार के पर्वतीय ढाल पर कई वर्षों तक चट्टानों को काटकर इन गुफाओं की विराट पैमाने की कला साधना कैसी अद्भुत रही होगी।
पठार से काफी नीचे उतरकर हमारी टैक्सी उस स्थान पर पहुंची जहां पार्किंग के अलावा बगीचा, रेस्टोरेंट और एक बाजार था। उस छोटे बाजार में अमूमन उन्हीं वस्तुओं की दुकानें थीं जो विशेष रूप से देशी-विदेशी पर्यटकों को लुभाने के लिए होती हैं। धूप थी तो मैंने एक हैट खरीदा (दूसरे दिन हैट के अंदरुनी हिस्से की स्लिप पर नजर डाली 'मेड इन चाइना') इस पार्किंग स्थल से अजंता गुफाएं चार किलोमीटर दूर हैं। वहां तक के लिए हर पंद्रह मिनट पर बसे हैं। इन आरामदेह बसों में 15 मिनट में ही हम उस स्थान पर पहुंचे जहां गुफा दर्शन के लिए टिकट घर बना है। पूछने पर बतलाया गया कि ऊपर पहली गुफा के पास ही हमें गाइड मिलेगा। पर्यटन विभाग द्वारा यह स्थान काफी सुविधाजनक बना दिया गया है। सीमेंटेड रास्ते पर चलकर हम उस समतल स्थान पर पहुंचे जहां से वह भव्य दृश्य दिखलाई देता है जो देखने वाले को चकित कर देता है। बायीं तरफ एक आधुनिक रेस्टोरेंट है और दायीं तरफ चट्टानों को काटकर गुफाओं तक पहुंचने के लिए सीढिय़ां बनाई गई हैं। अद्र्घ चंद्राकार पहाड़ी ढाली पर बनी गुफाओं को नीचे से जब एक साथ देखते हैं तो मनुष्य के महान श्रम का लोहा मानना पड़ता है। कुछ गुफाएं और ऊपर हैं जिन्हें देखकर दुमंजिले का आभास होता है।
ऊपर पहुंचकर जब आप गुफाओं के सामने के रास्ते पर चलते हैं तब आपको पता चलता है कि कई स्थानों पर कुछ सीढिय़ां चढऩा उतरना है। इतना तो हम जानते थे कि अजंता की 29 गुफाओं में से अब 6 गुफाएं ही पर्यटकों के लिए दर्शनीय रह गई हैं। ईसा पूर्व पहली सदी से उत्तर गुप्तकालीन यानी 560 ईसा तक, विभिन्न कालों में निर्मित होने वाली बौद्घ, हिन्दू और जैन गुफाओं में पर्यटकों के लिए निर्दिष्ट गुफाओं तक पहुंचकर उनकी सही जानकारी के लिए न केवल गाइड बल्कि आपकी उम्र में संचित शारीरिक शक्ति का अनुमान भी जरूरी है। कम से कम 30-35 वर्ष पहले आना चाहिए था, यह अहसास हुआ। नीचे तो यह लगा था कि तीस-चालीस सीढिय़ां चढऩे के बाद सब कुछ उतना कठिन नहीं होगा। यही सोचकर वहां उपस्थित डांडी वालों को मना करके हमने सीढिय़ों का रुख किया। डांडी वालों की पुकार जारी थी- साहब जी, डांडी ले लीजिए। ऊपर और भी सीढिय़ां हैं। आपको तकलीफ होगी। देखिए सर, धूप तेज है। मां जी थक जाएंगी। लगभग 25-30 सीढिय़ां चढ़कर लगने लगा कि इस उम्र में अपनी क्षमता का भरोसा केवल एक दिखावा होगा। मुड़कर देखा, कुछ सीढिय़ां नीचे, पूरे साहस को संचित कर पत्नी चली आ रही थीं। लगा कि जिस उद्देश्य से आए हैं उसे पूरा करने के लिए डांडीवालों की सहायता लेनी ही होगी। इसमें शर्म की क्या बात है कि उम्र ने आपकी शारीरिक क्षमता छीन ली है। हमारे उद्देश्य और हमारी जिज्ञासा को तो वह परास्त नहीं कर सकी है। मैंने डांडीवालों को आने का इशारा किया जो अभी भी आशाभरी नजरों से हमें देख रहे थे।
दो समानांतर बांसों पर बंधी गद्दीदार कुर्सी पर ही सही चार लोगों के कंधों पर सवार हुआ। मन में अजीब से ख्याल आए। मजा लेते हुए मैंने मुड़कर दीपा से कहा- 'चलो अच्छा है। प्रेक्टिस हो जाएगी।' दीपा बोली- 'अच्छा सगुन है। एक साथ अभ्यास हो रहा है।' मन में सहगल का गीत गूंजा- 'चार कहार मिल मोरी...' फिर लगा कि छूट कुछ भी नहीं रहा है बल्कि हम अपनों से मिलने जा रहे हैं जो अपनी कलाओं के माध्यम से आज भी हमारे निकट हैं। गुफाओं तक पहुंचने के लिए पहाड़ काटकर जो रास्ता बनाया गया है उस पर चलते हुए आप वैसा ही अनुभव करते हैं जैसा किसी किले की ऐसी प्राचीर पर चल रहे हैं जिस पर एक साथ छ: घोड़े दौड़ाए जा सकते हैं। दुर्गों के निर्माण की विधि जटिल है और वह दुश्मन की आशंका-आक्रमण की नीति से जुड़ा स्थापत्य है लेकिन पहाड़ काटकर बनाया गया यह रास्ता कला के उस कोष तक पहुंचाता है जिसे देखकर भाषा की वर्णन क्षमता छोटी पड़ जाती है। बौद्घ दर्शन के पद का ही प्रयोग करें तो 'शब्दों की अनिर्वचनीयता' का अर्थ समझ में आता है।
नीचे टिकटघर पर पूछने पर बतलाया गया कि गुफा नं. 1 के पास मान्य गाइड मिलेंगे जिनका रेट चौदह सौ रुपए है। दूसरा तरीका यह भी बतलाया गया था कि गुफाओं की देखरेख करने वाले कर्मचारियों को कुछ पैसे देने पर वे भी जानकारी देने में सक्षम हैं। जाहिर है कि विभाग द्वारा अनुशंसित गाइड ही हम लेने वाले थे। गुफा नं. 1 के पास ही प्रवेश करना होता है। हमारी डोली उतारी गई। वहां बैठे सज्जन से गाइड के विषय में पूछा गया तो गुफा के बरामदे में पर्यटकों के एक दल से बात करते हुए एक सज्जन की ओर इशारा किया। उनसे बात करके हम सब उनके साथ हो लिए। गुफा नं. 1 को देखकर ही विस्मय होता है। अब आप बारह अलंकृत स्तंभों वाले पोर्च में खड़े होते हैं। तो लगता है किसी आलीशान राजमहल के बरामदे में है। रास्ते से होकर जिस कक्ष में पहुंचते हैं वह एक बड़ा हाल है। 40*40 का, जिसकी ऊंचाई लगभग 20 फीट है। कभी इस कक्ष की दीवारें चित्रों से भरी हुई थी। अब तो एक दीवार पर नौ-दस फुट की ऊंचाई पर कुछ फुट के हिस्से पर चित्रकारी के अवशेष हैं। ध्वस्त हो चुके चित्रों की चमक विगत सौन्दर्य की स्मृति या धुंधले पड़ चुके अक्षर वाले प्रेम पत्र की तरह आपको हांट करती है। गुफा नं 2 में मंडप है। दोनों ही दो-दो खासे मोटे, बारीक नक्काशीदार स्तंभ पर टिके हैं। इस गुफा में जातक कथाओं पर आधारित चित्र है । इन चित्रों का इतना क्षरण हो चुका है कि कई स्थानों पर अब रंग मिट गए हैं। विशेष विधि से बनाए गए पलस्तर की परत पर ये चित्र बनाए गए थे। सैकड़ों साल तक वह पलस्तर कलाकारों की रचनाओं को थामे रहा। कुछ शेष है उसकी झलक इतनी प्रभावान है कि दर्शक अभिभूत होता है। जब ये बनाए गए तब कैसी दीप्ति, जीवंतता और नयनाभिराम सौन्दर्य रहा होगा। अजंता के चित्रों को देखकर अंग्रेज इतिहासकार ग्रिफित की आंखें चौंधिया गई थीं और उसने कहा कि अजंता के चित्रकार सृजन के शिखर पुरुष थे।
गुफा नं. 16 और 17 देखना अविस्मरणीय अनुभव है। हमारे गाइड का नाम भी बौद्घ कथाओं के महत्वपूर्ण पात्र से जुड़ा हुआ है- राहुल। काफी क्षण के बाद भी एक चित्र ध्यान आकृष्ट करता है। राजकुमार सिद्घार्थ सिद्घ पुरुष गौतम बुद्घ बनकर यशोधरा के द्वार पर आए हैं। यशोधरा दान स्वरूप अपने पुत्र राहुल को आगे कर रही हैं। यह मन को छू लेने वाली दान कथा है गाइड महोदय से मैंने कहा कि अपनी और दूसरों की जानकारी में भी यह जोड़ लें कि हिन्दी के एक कवि मैथिलीशरण गुप्त ने यशोधरा की पीड़ा भरी मनोदशा पर कविताएं लिखी हैं। इसके पहले भी भित्ति चित्रों के रंगों के विषय में भी कुछ प्रश्न पूछ चुका था। स्वाभाविक है कि राहुल जी ने ऐसे वाचाल पर्यटक के विषय में जानना चाहा। यह जानकर कि मैं इंदिरा कला संगीत विश्वविद्यालय खैरागढ़ में प्रोफेसर था, वे गदगद हुए और हम लोगों पर विशेष ध्यान देने लगे। मैंने यह उत्सुकता भी जाहिर की थी कि मरणासन्न राजकुमारी का चित्र किस गुफा है। इन जिज्ञासाओं का लाभ यह मिला कि राहुल जी ने मुझसे अपनी फीस से पांच सौ रुपए कम लिए।
हम फिर रंगों के संसार में लौटें। पद्मपाणि, वज्रपाणि, मरणासन्न राजकुमारी, जातक कथाएं और उत्सव के जुलूस जैसे चित्र देखकर, डेढ़ हजार वर्ष बाद भी कलाप्रेमी पर्यटक आश्चर्य और गौरव भाव से भर जाता है जबकि ये चित्र अपनी विपन्नतम दशा में हैं। गुफा नंबर 17 को तो चित्रशाला ही कहा गया है। गुफा की दीवारों के अलावा, उनके स्तंभ और छत भी सौन्दर्य के अनोखे संसार में प्रवेश करने का आमंत्रण देते हैं। डेढ़ हजार वर्ष से लेकर आज तक की अविछिन्न सौन्दर्य चेतना से जोड़कर यदि हम इस काम को देखें तो भारतीयता को एक नये अंदाज में अनुभव किया जा सकता है। छत छोटे ब्लाक्स से बने डिजाइन के भंडार हैं। ये बेलबूटे और डिजाइन हमारे देश की पोशाकों, जेवरों, प्रसाधनों के लिए सैकड़ों वर्षों तक इस्तेमाल होते रहे हैं। ये कलाकारों की नई कल्पनाओं के आधार बनते हैं। कुछ दशकों पहले अजंता शैली की नाभि दर्शना साड़ी और केश सज्जा (विशेष रूप से जूड़ा बांधना) का फैशन चला था जो आज भी जारी है। आधुनिक भारत के कई मोटिव्स अजंता की चित्रकारी से लिए गए हैं। मुद्राओं, आधुनिक भवनों तथा अन्य कई स्थानों और वस्तुओं पर इनका प्रयोग परंपरा से प्रचलित होता रहा है, बिना यह जाने कि उनका स्रोत कहां है। हमारे जीवन में इस्तेमाल होने वाले कितने ही उपकरणों को उन डिजाइनों ने खूबसूरती प्रदान की है। यहां तक कि, हमारे गाइड राहुल की सूचना के अनुसार एक डिजाइन इंग्लैंड के राजा के मुकुट की शोभा बढ़ाता है।
उत्तर गुप्तकाल से लेकर हजार वर्ष तक ये गुफाएं उपेक्षित पड़ी रहीं और लोक स्मृति से भी विलुप्त हो गया। इसका कारण तो इतिहासकार ही जानते होंगे। आश्चर्यजनक तो यह है कि वनाच्छादित घाटी से झाड़ झंखाड़ों से घिरी इन गुफाओं के अनोखे चित्रों का सौन्दर्य नष्ट नहीं हुआ। मन में एक कल्पना उभरती है कि जब इन विहारों और चैत्यों में साधक, संन्यासी, गुरु-शिष्य, शिल्पी, कलाकार और निर्माणकर्ताओं द्वारा नियुक्त राज कर्मचारियों का निवास और आवागमन होता रहा होगा तब इन चित्रों और मूर्तियों की दीप्ति, सुन्दरता और जीवंतता कैसी रही होगी। तब प्रभात और संध्याकाल में गुफाओं से उभरकर घाटी में गूंजते प्रार्थना के स्वर और शाम के उतरते ही जल उठने वाले दीपकों के टिमटिमाते प्रकाश से युक्त यह स्थान कैसा लगता रहा होगा। इस स्थान से कुछ मील दूर के गांवों के नागरिकों और साधकों की आवाजाही की गहमागहमी भी रही होगी। और फिर किन्हीं कारणों से वीरान हुई गुफाओं के आसपास जंगल-झाड़ी से ढंकी चित्रशाला में बैठे वनराज की क्या शान रही होगी। उसकी दहाड़ की गूंज घाटी के निबिड़निर्जन विस्तार के वनचरों को किस तरह भयभीत करती रही होगी।
अजंता (एलोरा की भी) की गुफाओं में जो चैत्यगृह बने हैं उनकी डिजाइन विहारों और हिन्दू गुफाओं से भिन्न हैं। इनकी छतें अद्र्घगोलाकार हैं। इनके प्रवेश द्वार से सामने की दीवार से लगा स्तूप और बुद्घ की प्रतिभा दिखलाई देती हैं। ये सभागृह प्रवचन और विमर्श कक्ष रहे होंगे। छत के आकार का संबंध निश्चित ही ध्वनि विज्ञान की तकनीक से युक्त रहा होगा। सैकड़ों वर्षों तक चिंतन-मनन, विमर्श के लिए प्रयुक्त जिस स्थल को बेमिसाल कला से अलंकृत किया गया वहां बौद्घ, हिन्दू और जैन धर्म से संबंधित गुफाओं में शैली का एक निरंतर प्रवाह दिखलाई देता है। बोलती हुई रेखाएं भारतीय चित्रकला की विशेषता रही हंै। कथाओं के विभिन्न पात्रों के चेहरे के भाव बतलाते हैं कि चित्रकारों ने साधकों से सुनी कहानियों की पृष्ठभूमि की कल्पना बहुत सोच-समझकर की थी। ऐसे रंग का मिलना भी दुर्लभ है। इन चित्रों को संरक्षित करने के लिए ठीक वैसे ही पलस्तर और रंगों को बनाने के प्रयास सफल नहीं हो सके। आखिर, हर चीज की एक उम्र होती है। शायद कुछ वर्षों के बाद इनकी झलक पाना भी संभव नहीं हो सकेगा। इन गुफाओं के विगत वैभव के आकर्षण में खिंचकर फिर भी संसार भर के कलाप्रेमी पर्यटक आते रहेंगे।
गुफा नं. 16 के बेहद खूबसूरत द्वार मण्डप पर खड़े होकर विशाल घाटी के उस पार सामने की पहाड़ी की ओर इशारा करके गाइड महोदय ने बतलाया कि वह स्थान है जहां से अंग्रेज शिकारी ने इन गुफाओं को देखा था। जिन गड़रियों ने आर्मी अफसर जान स्मिथ को 1819 में वन प्रांतर के बीच पहाड़ी ढलान पर बने दूर से दिखलाई देने वाले स्तंभों से युक्त गुफाओं के द्वार मण्डप दिखलाए होंगे, वे तो इतिहास के अंधेरे में गुम हो गए लेकिन इस महान खोज ने स्मिथ के नाम को अमर कर दिया। ठीक भी है। उसके माध्यम से हमारी सांस्कृतिक निधि का पुनप्र्रकाशन हुआ। बलिहारी है हमारे समाज की अपनी विरासत के प्रति विरक्ति भरी उदासीनता की और उस फौजी की उत्सुकता की जिसकी वजह से अजंता प्रसिद्घ हो गया। शायद साधनों के अभाव में भी दुर्गम उस स्थान पर पहुंचना कठिन था और धीरे-धीरे यह स्थान भुला दिया गया। कला के महान खजानों से ध्यान हटा और सोने-चांदी के खजानों और लाभकारी जमीन को कब्जियाने की लालसा बाहुबलियों की हलचलों का केन्द्र बनी। इतिहास में उनकी वीरता का यशोगान हुआ। अधिपतियों की क्रीड़ा स्थलियों और निष्प्रयोजन, शौर्य गाथाओं की लालसा ने महलों और किलों के निर्माण की कला में मानव श्रम को मोड़ दिया। मानव इतिहास की यात्रा में युद्घ, रक्त और शोषण जैसे मील के पत्थरों की संख्या अधिक है। सदियों तक बनने वाले कलापूर्ण धर्मस्थल हों, युद्घ कामना से प्रेरित दुर्गम किले हों या विलासपूर्ण जीवन की आक्रांता से निर्मित सुंदर महल हों, उनकी निर्माण प्रक्रियाओं में कई बार बेगारी का अभिशाप भोगने वाले श्रमिक और शिल्पियों के संघ थे। मानव सभ्यता की यह यात्रा एक साथ गौरव, आश्चर्य, ऊर्जा और अवसाद से भर देती है। कहते हैं कि कुछ अधूरी गुफाओं के पूरा न बन पाने का कारण वाकाटक राजवंश के राजकोश का खाली हो जाना था। क्या हुआ होगा उस राज्य की जनता का? इस विरोधाभास के बावजूद कलाकार शिल्पियों द्वारा निर्मित यह कला संसार मनुष्य की सौन्दर्य चेतना का प्रमाण है और विश्व धरोहर है। काल से होड़ लेती कला के महत्व को स्वीकार करते हुए 1983 में यूनेस्को ने अजंता-एलोरा को 'विश्व विरासत' घोषित किया।
इतिहास की व्याख्या आप चाहे जैसी कर लें किन्तु उस सत्य को झुटलाया नहीं जा सकता कि धर्म के ठेकेदारों ने इतिहास को मिथक बनाकर अपना उल्लू सीधा करने की जैसी कोशिश की वैसी ही कोशिश आज के व्यावसायिक युग में जारी है। मानव श्रम और उसकी सौन्दर्य चेतना को तिलस्मी कहानी के रूप में प्रचारित करके, उसे रहस्य-रोमांच बनाकर कमाने की मंशा रखने वाले बेवकूफ संस्कृति द्रोहियों ने शिगूफा छोड़ा है कि अजंता-एलोरा एलियंस ने बनाया होगा। नेट पर तो यह कहानी है ही हमारे दृश्य मीडिया भी पीछे नहीं हैं। कुछ चैनल्स ने भी इसे प्रसारित किया है। ये मूर्ख नहीं चालाक और ठग हैं। यह बुद्घू बक्सा नहीं बुद्घू बनाने वाला बक्सा है। तकनालॉजी और विवेक में अंतर होता है। यदि स्वार्थ और चालाकी है तो तकनालॉजी अज्ञान फैलाने का भी अच्छा माध्यम है। जिस बेवकूफ ने इस थ्योरी को गढ़ा है उसने अपनी मूढ़ कल्पना को युवा पीढ़ी के लिए विश्वसनीय बनाने के लिए लिख मारा है कि आर्कियालॉजी के विद्वान इन कलाकृतियों को चार हजार वर्ष पुराना बतलाते हैं। अरे मूर्ख, पहले यह तो जान ले कि गौतम बुद्घ कब पैदा हुए थे। अक्ल के इस दुश्मन के कहने का यह अर्थ निकला कि गौतम बुद्घ के जन्म से ही पहले एलियन्स को उन जातक कथाओं की जानकारी हो गई थी जो बुद्घ की मृत्यु के भी बाद रची गई थीं।
अजंता देख सका इसलिए आभारी हूं उन डांडी वालों का जिन्होंने कला के खजाने तक पहुंचना सुगम बनाया वरना हम तो कुछ सीढिय़ां चढऩे के बाद ही वापस हो जाते। हमें वापस ले जाते समय एक स्थान पर उन्होंने डांडी घुमाकर हमारा रुख गुफाओं के विस्तार की ओर कर दिया। मैंने पूछा- 'क्या बात है? फिर वापस तरफ जाना है।'
'नहीं बाबूजी, लौटते हुए एक बार नजर भरकर अजंता को देख लीजिए। इस बात पर मेरी तबियत बाग-बाग हो गई। बंदे ने क्या शायराना बात कही। सच बात है कि हजार इच्छा होने पर भी अपनी पसंदीदा जगह पर दुबारा आ पाना क्या सबके लिए संभव हो सकता है। मैंने कहा- 'डांडी उतारो, इसी जगह पर तुम लोगों के साथ एक फोटो लेंगे।' फिर हम गहरी तृप्ति के साथ अपने अस्थायी आशियाने होटल रविराज लौट आए।
दूसरे दिन सुबह साढ़े नौ बजे हम एलोरा के लिए रवाना हुए। आज भी टैक्सी में हमारे सारथी राजू गाइड थे। दूसरे दिन के इस पैकेज में एलोरा के रास्ते में पडऩे वाले अन्य दर्शनीय स्थल भी शामिल थे। राजू ने पूछा- रास्ते में ही ज्योर्तिलिंग घृष्णेश्वर मंदिर है। पहले वहां चलें। हमने कहा कि हम एलोरा देखने निकले हैं अत: पहले वहां जाएंगे। बाकी लौटते समय देखेंगे।
रास्ते में ग्रामीण इलाका आते ही महाराष्ट्र के पुरुषों की पारंपरिक पोशाक दिखाई देने लगी। अधिकांश लोग सफेद धोती-कमीज और सफेद टोपी में दिखे। यह टोपी गांधी के साथ जुड़ गई हैं जबकि गांधीजी ने शायद ही कभी ऐसी कोई टोपी पहनी होगी। राजू से पूछा कि अब तो बदलते हुए जमाने के चलते इस वेशभूषा में भी परिवर्तन हो रहा होगा। राजू का उत्तर दिलचस्प था। विश्लेषण करते हुए उसने कहा- 'सर, वैसे तो नई पीढ़ी जींस, टी-शर्ट पहनने लगी है। लेकिन गांवों में साठ-पैंसठ साल के लोग सफेद पैजामा-कमीज, नेहरू जैकेट और टोपी पहनते हैं। सत्तर-पचहत्तर बरस के लोग सफेद धोवर (धोती), सफेद कुरता और रंगीन फेंटा लगाते हैं। अभी यही चलन है। उम्र वाली औरतें काछा वाली महाराष्ट्रीयन सूती साड़ी पहनती हैं। मुसलमान औरतें सलवार-कुर्ता पहनती हैं।'
औरंगाबाद से एलोरा तीस किलोमीटर की दूरी पर है अत: वहां पहुंचने में देर नहीं लगी। यहां की महत्वपूर्ण गुफाओं के लिए सीढिय़ां नहीं चढऩी पड़तीं। इसे कलादीर्घा का ग्राउंड फ्लोर कह सकते हैं। पार्किंग स्थल से गुफाओं तक लगभग सौ मीटर चलना पड़ता है। टिकट घर से टिकट लेते ही दो गाइड पीछे पड़े जिन्हें मैंने मना कर दिया। एक तो एलोरा के विषय में मैंने काफी पढ़ रखा था दूसरे मेरे हाथ में एलोरा की चित्रमय बुकलेट थी। एलोरा का कैलाश मंदिर विश्व में अपने किस्म की महान रचना है। हमने तय किया कि पहले अन्य गुफाओं को देखने के बाद उसे देखेंगे। हमारा यह निर्णय ठीक भी था क्योंकि जहां आपकी कल्पना थक जाती है वहां से कैलाश मंदिर की कला प्रारंभ होती है।
हमने गुफा नं. 14 से देखना शुरू किया। यह पहाड़ में तराशा गया एक विशाल कक्ष है जिसमें नक्काशीदार स्तंभ तो हैं ही, इसकी तीन तरफ की दीवारों में बनाए गए ब्लाक्स में मूर्तियां बनी हैं जो आठ-दस फुट से कम ऊंची नहीं होगी। धरती को अपने दांतों पर उठाए हुए वराह अवतार की मूर्ति आप में अन्य मूर्तियों को देखने की उत्सुकता भर देती है। विराट कल्पना पर आधारित ताण्डव शिव की मूर्ति की सज्जा और संतुलन दर्शनीय है। रावण द्वारा कैलाश पर्वत उठाने का दृश्य शायद अपनी विचित्रता और चित्रण में कल्पना को विस्तार देने की संभावना के कारण एलोरा की एक से अधिक गुफाओं में है। चित्रशाला की तर्ज पर इन्हें मूर्तिशालाएं कहा जा सकता है। गुफा (नं. 14) की परिचारिका दक्षिण भारत की सौम्य महिला से हमने पूछा कि आप हमें गाइड कर सकती हैं? उन्होंने खुशी-खुशी, पूरा समय देकर हर मूर्ति की विशेषता बतलाई। गुफा से बाहर आते समय हमने उन्हें पैसे देने चाहे तो उन्होंने हाथ जोड़कर कहा- आप लोग हमारे माता-पिता की तरह हैं, आपसे पैसे नहीं लूंगी। साथ ही उन्होंने कहा- सर, आप इन गुफाओं में जो कुछ भी देखेंगे वह सब कुछ एक साथ ही गुफा नं. 16 में मिल जाएगा। कैलाश मंदिर (यानी गुफा नं. 16) को अधिक समय देकर देखने के लिए हमने कुछ गुफाओं को छोडऩे की बात परिचारिका से कही। उन्होंने आग्रह किया कि गुफा 10-11-12 जरूर देख लीजिए। बेशक ये देखने के लायक हैं। इनमें रेखांकित करने की बात यह है कि गुफा नं. 10 के देखकर अजंता की गुफा नं. 16 की याद ताजा हो जाती है। यह बौद्घ गुफा एक चैत्य है जो द्वार मंडप की खूबसूरती और सूक्ष्म कलाकारी के कारण अभिभूत करती है। पुरातत्व विभाग के सूचना पट्ट में उसे संगीत शाला निर्दिष्ट किया गया है। चैत्य दीवार से लगकर बने स्तूप के आगे बुद्ध की बड़ी प्रतिमा है। इसकी छत अद्र्घगोलाकार है। जाहिर है कि इसके आकार का संबंध ध्वनि शास्त्र से है।
इसके बाद हमने गुफा नं. 16 यानी कैलाश मंदिर की ओर रुख किया। कई दशक पूर्व हिन्दी के यायावर लेखक अज्ञेय का लेख 'एलोरा' पढ़ा था। जिसमें उन्होंने लिखा था कि कैलाश मंदिर 'तक्षण' कला में दुनिया का सर्वश्रेष्ठ उदाहरण है। जिसे इसका गुफा द्वार कहा जाता है वह किसी महल या किले की ऊंची प्राचीर के बीच बने दोमंजिले मुख्य द्वार की तरह दूर से दिखलाई देता है। द्वार के अगल-बगल की ऊंची प्राचीर में ब्लाक्स बने हैं जिनमें मूर्तियां बनी हैं। इस आश्चर्य को पार करके जब अंदर पहुंचते हैं तो एक विशाल आंगन के बीच दो मंजिले अलंकृत मंदिर को देखकर आप जड़ हो जाते हैं। कुछ क्षणों तक मैं अवाक होकर देखता रहा कि गुफा द्वार से भीतर आकर हम खुले आसमान के नीचे हैं। इस आंगन के तीन तरफ बने बरामदे की पिछली दीवारें पर्वत के कटाव हैं। एक पहाड़ को ऊपर से तराशते हुए बिना जोड़ के मंदिर की विशालता का अनुमान इसके क्षेत्रफल से होता है। 276 फुट लंबे, 154 फुट चौड़े और 90 फुट ऊंचे स्थायत्व को देखना अपने आपमें अविस्मरणीय अनुभव है।
प्रवेश द्वार से भीतर आते ही दोनों पाश्र्व में बनी हाथियों की मूर्ति और मंदिर की ऊंचाई के दो अलंकृत स्तंभों को देखकर वास्तुविद की अनोखी कल्पना की प्रशंसा के लिए शब्दों की तलाश करनी पड़ती है। जब आप दोमंजिला मंदिर के चारों ओर घूमकर इस विशाल संरचना के अलंकरणों को देखते हुए, चक्र पूरा करके दूसरे पाश्र्व के स्तंभ और हाथी की मूर्ति के पास पहुंचते हैं कुछ सवाल प्रश्न मन में अंकुरित होते हैं। कैसा रहा होगा इस स्थापत्य का ब्लू प्रिंट? यह विशाल संरचना जमीन की नींव से ऊपर की ओर निर्मित होने वाली अभियांत्रिकी का कमाल नहीं है जिसके विभिन्न आयामों की कल्पना पटल और मन पर होती है। कुशल वास्तुविद के अंतर्मन में जटिल संरचना का नक्शा होता है, लेकिन उसे शिल्पकारों तक संस्थित करना आसान नहीं है, विशेष रूप से तब जब लगभग डेढ़ सौ वर्षों का अविरल कौशलपूर्ण श्रम कुछ पीढिय़ों तक हस्तांतरित होता रहा। शिल्पियों और वास्तुकारों की पीढिय़ों ने कला के इस संभार को किस निष्ठा से धारण किया होगा- सोचकर ही उनके प्रति सम्मान से सिर झुक जाता है। पहाड़ के ऊपर से एक विराट चट्टान को तराशना शुरू करके नीचे की पीठिका तक, बिना जोड़ की ऐसी विराट संरचना के लिए विरल कौशल की आवश्यकता है। कागज पर भी ऐसी बारीक कलाकारी कठिन है। मंदिर के प्लिंथ के चारों ओर हाथी की कतार को तराशा गया है। एकाएक देखने पर लगता है कि पत्थर की दीवार से हाथी बाहर निकलकर आ रहे हैं और मंदिर को उन्होंने अपनी पीठ पर उठा रखा है। कलाकारों और शिल्पी संघों की गहन एकाग्रता और काम के प्रति समर्पण से ही ऐसे किसी स्थापत्य की रचना संभव है। कला और सौन्दर्यचेतना मनुष्य के अंतर्मन का वरदान है। किन्हीं कल्पित देवताओं और एलियंस के बूते की बात नहीं।
राष्ट्रकूट राजवंश को तो इसका गर्व होना ही था क्योंकि वह इसका प्रायोजक था; उनके वास्तुकार को भी यह विश्वास नहीं हो सका होगा कि उसने ऐसा कुछ अनोखा किया है जो सदियों तक इतिहासकारों, कलाकारों और पर्यटकों को आश्चर्यचकित करता रहेगा। इतिहासकार बर्नियर ने जब आगरा में ताजमहल को देखा तो लिखा कि इसके सामने मिस्र के पिरामिड पत्थरों के ढेर की तरह लगते हैं। सोचता हूं कि बर्नियर ने यदि अजंता-एलोरा देखा होता तो क्या लिखता। भारतीय कलाओं से अभिभूत पर्सी ब्राउन ने कैलाश मंदिर को देखकर इसे शिल्पकला और अभियांत्रिकी का चमत्कार माना। पर्सी ब्राउन इसे समझ पाया होगा कि दो हजार वर्ष पूर्व भी भारतीय तकनालॉजी उच्च श्रेणी की थी। शिल्पियों के पास विद्युत चालित उपकरण नहीं थे लेकिन जो भी औजार थे वे उनके कुशल हाथों में आकर जादू जगाने में सक्षम थे। विधिपूर्वक काम करने का गणित भी उनके पास था। यहां यह बात भी जोडऩा चाहता हूं कि वे गुलाम नहीं थे। प्राचीन ग्रंथों में शिल्पीसंघों का जिक्र है। यह अवश्य सत्य है कि सामंती व्यवस्था में वे जिन सुख-सुविधाओं के हकदार थे, उससे वंचित थे। यह तो आज की पूंजीवादी व्यवस्था में भी है। सरकारें अपनी कागजी उपलब्धियों का पुलिन्दा हमारे सिरों पर भले ही पटक दें पर जमीनी हकीकत यह है कि आज भी समाज में बंधुआ मजूदर हैं ।
दोमंजिले मंदिर का एक पूरा चक्कर लगाने में खासा समय लगा फिर भी यह नहीं कह सकता हूं कि मैं दीवारों, स्तंभों, दूसरी मंजिल को पूरी तरह देख सका। द्वार मंडप के दायें पाश्र्व में कैलाश पर्वत को उठाते हुए रावण की मूर्ति को गौर से देखने वाले विदेशी पर्यटक को उक्त पुराण कथा का संदर्भ बतलाने से अपने को रोक नहीं पाया। वह बंदा बेहद रुचि से सुनता रहा। (मेरी अंग्रेजी जैसी भी रही हो)। उसका धन्यवाद लेकर और मन-मस्तिष्क में उभरते प्रश्नों के साथ लगभग दो घंटे बिताकर हम बाहर आए। अभी भी मन अज्ञेय, बर्नियर और पर्सी ब्राउन के मंतव्यों के आसपास मंडरा रहा है। आधुनिक विश्व में पर्यटकों द्वारा सर्वाधिक देखी जाने वाली इमारत ताजमहल बेशक सौन्दर्य का पैमाना है। अपनी समग्रता में संतुलित भव्य ताजमहल के निर्माण में तीस वर्ष लगे। सुंदरता में तो नहीं लेकिन अपनी विशालता में एक पुराधों खुकू का पिरामिड चमत्कृत कर सकता है। उसका निर्माण भी पन्द्रह-बीस वर्षों में में हुआ। लेकिन कैलाश मंदिर तो कदम-कदम पर थमकर एक-एक मूर्ति शिल्प और बारीक कारीगरी को देखते हुए सौन्दर्य के अमृत पान का आभास देता है। डेढ़ सौ वर्षों तक एक ही विराट चट्टान को काट-छीलकर बनाई गई संरचना। सुंदर संरचनाओं की तुलना नहीं होती लेकिन यह अपने किस्म का कल्पनातीत मोनोलिथिक स्थापत्य है।
हम कैलाश मंदिर से बाहर आए तो देखा कि पार्किंग स्थल पर बस खड़ी है जो कुछ किलोमीटर दूर स्थित जैन गुफाओं तक ले जाती है। जिन गुफाओं को नं. 32 और 34 चिन्हित किया गया है उनमें तराशी गई मूर्तियां अपनी भव्यता से प्रभावित करती है। आम्र वृक्ष के नीचे बैठे इंद्र और सामने ही इंद्राणी की मूर्तियां देखने योग्य है। बौद्ध, हिन्दू और जैन गुफाएं भारत की पाषाणीय कला की निरंतर प्रवहमान कुशलता को प्रमाणित करती हंै। धार्मिक विश्वास में अंतर है किन्तु सौन्दर्य चेतना और कला-कौशल भारतीय और तयशुदा भारतीय है। चिंतन और जीवनशैली मोनोलिथिक नहीं है।
एलोरा से औरंगाबाद लौटते हुए शहर के कुछ दर्शनीय स्थल पैकेज में शामिल थे जिनमें 'बीबी का मकबरा'पर्यटकों के लिए महत्वपूर्ण माना जाता है। इसे दक्षिण का ताजमहल कहा जाता है। 'मिनीताज' और 'Poor man's Taj' की पदवी भी इस इमारत को दी जाती है। औरंगजेब के शाहजादे आज़म शाह ने अपनी मां दिलरास बानो बेगम की कब्र के लिए एक विशाल भवन बनवाया। खुद औरंगजेब की कब्र दौलताबाद के रास्ते पर खुल्दाबाद में है, जिसे उसकी इच्छा के अनुरूप बहुत सादगी से बनाया गया है। मिनी ताज अपनी विशालता के बावजूद विशेष प्रभाव नहीं छोड़ता। यह एक असंतुलित रचना लगी। आगरा के ताजमहल में कला की पूर्णता, नजाकत और कल्पनाशीलता है। बीबी का मकबरा उसकी परछाई भी नहीं लगता। प्रवेश द्वार मुख्य इमारत से कहीं अधिक सुंदर है। इसके परिसर में दाखिल होते ही इतिहास की एक विडंबना की ओर ध्यान जाता है। अपने पिता के प्रति औरंगजेब के विरोध भाव का एक कारण यह भी था कि वह ताजमहल के निर्माण के पक्ष में नहीं था और उसे शाही खजाने पर बोझ डालने वाली फिजूलखर्ची मानता था। उसी औरंगजेब के बेटे ने औरंगजेब की बीबी का मकबरा बनवाया। जब राजू ने दौलताबाद के प्रसिद्ध किले के सामने टैक्सी रोकी तो मैंने उससे कहा कि मैं भीतर जाकर इसे देखने का इच्छुक नहीं हूं। बस, बाहर से एक-दो कोण से इसकी तस्वीर खींचकर आगे बढ़ेंगे।
घृष्णेश्वर ज्योर्तिलिंग मंदिर इस रास्ते के महत्वपूर्ण दर्शनीय धार्मिक स्थलों में शामिल है। राजू ने टैक्सी रोकी और हमें मंदिर परिसर के द्वार तक ले गया। मैंने पत्नी से कहा- तुम दर्शन के लिए जाओ मैं बाहर तुम्हारी चप्पलों की रखवाली करता हूं। राजू ने आश्चर्य से मुझे देखा। थोड़े कंधे उचकाए और फिर कुछ बोले बिना जाकर गाड़ी में बैठ गया। इस रास्ते पर एक दिलचस्प दृश्य एक सड़क है जिसकी दोनों तरफ लगभग एक किलोमीटर तक केवल बरगद के पेड़ हैं। सही मायने में शीतल छांह। एक पनचक्की को दिखलाने के लिए राजू का आग्रह मानकर उसे देखना भला लगा। चार सौ साल पुरानी पनचक्की में छ: किलोमीटर दूर की नदी से मिट्टी के पाइप से पानी लाकर जिस लोहे के चक्र पर पानी गिराया जाता है उससे उत्पन्न ऊर्जा से एक आटाचक्की चलती थी। यह चक्की बाबा शाह मुसाफिर की दरगाह के परिसर में है। होटल लौटने से पहले अंतिम पड़ाव था छत्रपति शिवाजी म्यूजियम। इसे भी देखने का आग्रह हमारे राजू गाइड का था। इसके बंद होने में पंद्रह-बीस मिनट ही बाकी थे। पालिका द्वारा संचालित इस छोटे किंतु व्यवस्थित संग्रहालय में शिवाजी के काल के कुछ हथियार, चित्र, पोशाकेें और दस्तावेज रखे गए हैं। मैंने संग्रहालय के परिचारक से कहा कि यदि यहां बघनखा रखा हो तो मैं सबसे पहले वही देखना चाहता हूं। उसने खुशी-खुशी संग्रहीत हथियारों में अंगरखे के नीचे पहनने वाली लोहे की जाली, शिरस्त्राण और दो आकारों के बघनखे दिखाए। इसके बाद हम चित्रों, दस्तावेजों को देखने लगे। उस समय संग्रहालय मेंंकेवल तीन-चार लोग भर थे। जैसे ही मैं उनकी बगल से गुजरा वे पलटकर मुझसे बोले- ये लोग शिवाजी को हिंदू आइकान की तरह पेश करते हैं। लेकिन सर, शिवाजी धर्मनिरपेक्ष व्यक्ति थे। उनकी वाणी में क्षोभ था- इतिहास की कई घटनाएं इसे सिद्ध करती हैं। उनकी उद्विग्नता इस बात से जाहिर थी कि एक अपरिचित व्यक्ति से अपने मन की बात कहने से वे अपने को रोक नहीं सके। मैंने स्वीकृति में कहा- आप सही कह रहे हैं। उन्हें गलत ढंग से प्रस्तुत किया जाता है।
मेरे यात्रा विवरण का इससे बेहतर भरत वाक्य क्या हो सकता है।