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Monday 20 Nov 2017

योगपथ पर संगीत की भूमिका

भारतीय मनीषियों ने संगीत को मनोरंजन का साधन न मानकर उसे आध्यात्म का विषय माना उसी प्रकार योग के द्वारा भी मन की चंचल प्रवृति को वशीभूत करके उसे आध्यात्म की ओर प्रवृत्त करना आवश्यक माना गया है। साधारणत: संगीत व योग दोनों विषय भिन्न-भिन्न हैं किन्तु फिर भी ये दोनों विषय गंभीर रूप से एक-दूसरे में समाहित हैं। भारतीय शास्त्रों में संगीत का घनिष्ठ संबंध योग साधना के अनहद अथवा निराकार रूप नाद से माना गया, जिसे शारंगदेव ने अत्यंत सुंदर ढंग से वर्णित किया है-
''चैतन्यं सर्वभूतानां विवृतं जगदात्मना।
नादब्रह्म तदानन्दम द्वितीयमुपास्महे।।''
शास्त्रों में संगीत तथा योग साधना को शिव से जोड़ा गया तथा देवताओं को भी संगीत व योग का अभ्यास करते हुए चित्रित किया गया। जयचन्द्र शर्मा संगीत और योग का सामंजस्य स्थापित करते हुए लिखते हैं कि- ''श्रुतियों का ज्ञान सर्वप्रथम भारत के प्राचीन ऋषियों को योग क्रिया के माध्यम से हुआ। उन्होंने अनुभव किया कि मानव शरीर में कुछ ऐसी नाडिय़ाँ हैं, जिनमें सुमधुर नाद प्रकट करने की शक्ति है। सुमधुर ध्वनियों को प्रकट करने वाली शरीर में बाईस नाडिय़ाँ हैं, जिनसे उत्पन्न होने वाली ध्वनि एक से एक ऊँची है उन ऋषियों ने उन ध्वनियों के गुण, स्वभाव, प्रभाव आदि के अनुरूप उनके नाम निश्चित कर सप्त-स्वरों की स्थापना की। सप्त स्वरों के आरोह व अवरोह एवं संचारी क्रियाओं के आधार पर मानव ने विभिन्न प्रकार की स्वर लहरी (धुनों) को अपने कंठों से प्रकट किया। मानव हृदय से स्वाभाविक तौर पर प्रकट होने से उन धुनों को लोक संगीत के नाम से संबोधित किया जाता है।''जयचन्द्र शर्मा जी के कथन से स्पष्ट होता है कि भारत देश में संगीत का स्वरूप ऋषि-मुनियों द्वारा निर्धारित किया गया। मानव शरीर विधाता की संगीतबद्ध रचना है, और इससे जो संगीतमय ध्वनि प्रस्फुटित हुई वह मधुर व आनंददायक थी। बाद में संगीत मनीषियों ने उस ध्वनि को शास्त्रबद्ध किया। यह कथन एक और बात स्पष्ट करता है कि संगीत अपनी आरंभिक अवस्था में लोक से जुड़ा था, श्रुतियों व सप्तक का बोध सर्वप्रथम ऋषियों-मुनियों को हुआ था। संगीत विचारकों के द्वारा बनाए गए नियमों में कसे जाने पर वह शास्त्र सम्मत हुआ व शास्त्रीय संगीत कहलाया। मूलत: संगीत लोक संगीत से ही जुड़ा होता है, लोक संगीत का ही यह स्वभाव है कि वह स्वयं में नई-नई विधियों, रूपों को बिना किसी संकोच के अपनाता चलता है वहीं, शास्त्रीय संगीत की यह मर्यादा है कि वह सूक्ष्म परिवर्तन भी स्वीकार्य नहीं करता उसके गायन के समय राग में तनिक भी अन्य सुर का स्पर्श संभव नहीं। लोक व शास्त्रीय संगीत के इस नियम को यदि योग विद्या से जोड़ कर देखा जाए तो जिस प्रकार व्यक्ति अनायास ही प्रत्येक दिन की चर्या में योग की कुछ क्रियाएं स्वत: ही करता है जैसे कि श्वासों का एक ही गति से आदान-प्रदान, अनजाने में वह बहुत सी योग मुद्राओं को कर लेता है, लेकिन जब वह इन्हीं क्रियाओं को एक नियम में बंध कर करना आरंभ करता है तो उन नियमों में तनिक भी परिवर्तन करने की उसे अनुमति नहीं होती। यही बात संगीत के विषय में भी है कि लोक संगीत में अनजाने में ही कई प्रकार के शास्त्रीय रूपों को धारण किया जा सकता है किन्तु यह प्रयोग शास्त्रीय संगीत में संभव नहीं हो पाते।
संगीत व योग साधना का मूल आधार नाद है इसकी साधना साधक जितनी तन्मयता व एकाग्रचित्त होकर करता है उसकी कला उतनी ही गंभीरता व सार्थकता की ओर प्रवृत्त होती जाती है। नाद दो प्रकार के बताए गए हैं- एक आहत नाद और दूसरा अनहद नाद। आहत नाद वाद्य पर प्रहार करने पर उत्पन्न होता है तथा इससे जिस ध्वनि की उत्पत्ति होती है वह संगीतोपयोगी होती है। यह नाद भूमि पर उत्पन्न होता है। अर्थात
''हृदेयऽनाहत चक्रेऽस्मिन्ननिला नल योगत:।
आहतस्तत्र नाद: स्यादिति शास्त्रेषु प्रकीर्तित:।।''
अर्थात् हृदय स्थित अनाहत चक्र में वायु और अग्नि के संयोग से आहत नाद उत्पन्न होता है तथा यही नाद देशी अथवा प्रचलित संगीत में प्रयोग होता है। संगीत के लिए आहत नाद को स्वीकृत किया गया है, किन्तु साधक जब तक अनहद नाद को महसूस नहीं करेगा तब तक उसकी साधना में गंभीरता नहीं आ सकेगी। अनहद नाद की अनुभूति ही साधक को संगीत साधना में अग्रसर करती है। कहा गया है कि ''अभिव्यक्ति का यह क्रम जो एक अखंड नाद से आरंभ होता है, संगीत के स्थूलतम स्तर पर भी इन्द्रियगोचर हो सकता है और योगजन्य अनुभव के सूक्ष्म स्तरों में भी अवगत हो सकता है।'' अर्थात् अनहद नाद की साधना संगीत व योग साधक के लिए आवश्यक है। अनहद नाद कानों द्वारा नहीं सुना जा सकता। उच्चकोटि की साधना के पश्चात् योगीजन ही शरीर में स्थित चौथे चक्र से ऊपर उठकर ही अनहद नाद को सुन पाते हैं। इसे सूक्ष्म या गुप्त नाद भी कहते हैं। अनहद नाद के संदर्भ में कहा गया है कि-
''न नादेन बिना गीतं न नादेन बिना स्वरा:।
न नादेन बिना ज्ञानं न नादेन बिना शिवा:।।''
अर्थात् न तो नाद के बिना स्वर की उत्पत्ति हो सकती है, न नाद के बिना गीत उत्पन्न हो सकता है और न ही नाद के बिना ज्ञान प्राप्त हो सकता और न ही शिव को प्राप्त कर व्यक्ति अपना कल्याण कर सकता है।
किन्तु अनहद नाद को प्राप्त करने के लिए साधक को लंबे समय तक साधना करनी पड़ती है जब साधक अपनी साधना द्वारा ब्रह्मरन्ध्र तक पहुँचता है तब उसे अनहद नाद सुनाई पड़ता है। जो समस्त सार तत्त्वों का सार है व गंभीर है। उसी समय उसे ब्रह्म की अनुभूति होती है जो वाणी द्वारा अव्यक्त है। अनुभूति के पश्चात् ही वह जान पाता है कि वही सत्य है और सारे विवाद मिथ्या हैं। इस अनहद नाद का अनुभव व ब्रह्म की प्राप्ति संगीत के माध्यम से की जा सकती है इसके संबंध में लिखा गया है कि ''हिन्दू संगीत का एक ओर शरीर-मूलक हठयोग से घनिष्ठ संबंध है और दूसरी ओर मनोमूलक राजयोग से। संगीत में वाक, प्राण, मन का सभी स्तरों पर समत्व साधा जाता है। अत: संगीत बड़ी सुगमता से किसी भी साधना-पद्धति का सहगामी बन सकता है, जो शरीर को, मन को अथवा वाणी को आधार मानकर चलती हो।'' यह कथन स्पष्ट करता है कि भारतीय संगीत केवल मनोरंजन का माध्यम नहीं बल्कि वह अध्यात्म के मार्ग की ओर साधक को प्रशस्त करने का माध्यम है।
नाद की तीन विशेषताएँ होती हैं- छोटा या बड़ापन, ऊँचा या नीचापन, जाति या गुण। नाद के दोनों स्वरूप आहत व अनहद की साधना के माध्यम से ही व्यक्ति को आनंद की प्राप्ति होती है। इसी नाद के व्यवस्थित सुर और ताल मनुष्य के दिमाग को झंकृत करते हैं। यह मनुष्य के शरीर और मस्तिष्क को स्पंदित करता है और इससे व्यक्ति में प्रसन्नता और ऊर्जा का विकास होता है। संगीत मानव को शारीरिक, मानसिक व भावात्मक तीनों स्तरों पर प्रभावित करता है। संगीत की ध्वनि तरंगे शरीर के प्रत्येक भाग पर प्रभाव छोड़ती हैं। संगीत साधना के आरंभिक वर्षों से ही गुरू शिष्य को प्राणायाम करने की ओर अग्रसर करता है। जब तक शिष्य श्वासों की गति पर अधिकार न कर ले व उसकी वाणी गंभीर व ठोस न हो जाए तब तक शिष्य संगीत की साधना करने में सफल नहीं हो सकेगा। यह शिक्षा अनहद नाद को महसूस कर, कला को श्रेष्ठता के स्तर पर ले जाती है। संगीत मात्र आनंदोपयोगी नहीं, बल्कि योग, तप, प्रसन्नता, भावचित्त की साधना है। सामवेद के प्रौढ़ ब्राह्मण में स्पष्ट कथन है कि ''स्वर ही उद्गीथ का प्राणभूत है तथा ओंकार का गान करते समय प्राणायाम की परम आवश्यकता है।''इसी ब्राह्मण में प्रथम बार देवी सरस्वती का आवह्न स्वर देवी के रूप में किया गया। स्वर साधना में प्राणतत्व की महत्ती आवश्यकता है। स्वर ओजपूर्ण व पुष्ट होने के लिए प्राणायाम परम साधन है। संगीत के अंतर्गत स्वर तथा स्वरावलि को एक दीर्घ श्वास में गाने के लिए गायक को श्वासों पर पूरा नियंत्रण करना आवश्यक है। संगीत में सप्त स्वरों की साधना नाद साधना ही है। वैदिक संगीत में उदात्त, अनुदात्त तथा स्वरित ये तीन स्वरों की ही अवधारणा थी आगे इन्हीं तीनों स्वरों पर अन्य स्वरों की उत्पत्ति हुई जिसे संगीत के सात स्वर कहा गया- ''उदात्त पर नी व ग, अनुदात्त पर रे व ध, स्वरित पर स, म और प।'' अत: इन्हीं सप्त स्वरों की साधना करते हुए संगीतकार अनजाने में ही योग विद्या का भी अभ्यास करता जाता है। सुर की साधना करते समय साधक को शारीरिक व मानसिक दोनों ही रूपों से उस सुर पर ही एकाग्रचित्त होना आवश्यक है। शरीर या मन पर किसी भी प्रकार का अवरोध उसके कंठ को प्रभावित करेगा व उसकी साधना सार्थक नहीं हो सकेगी, इसलिए साधक को पूर्ण रूप से उस सुर पर ही स्वयं को केन्द्रित करना होगा।
आचार्य परशुराम चतुर्वेदी संगीत व योग का सामंजस्य इस प्रकार बतलाते हैं कि- ''संगीत भी उसी प्रकार नाद विद्या है, जिस प्रकार योग है क्योंकि जिस आहत या साकार शब्द की साधना संगीत में की जाती है, उसी का अनहद या निराकार रूप योग साधना का भी लक्ष्य रहा करता है। अनहद नाद केवल किसी योगी के ही लिए अनुभवगम्य है। इसके लिए उसे कुण्डलिनी योग की साधना करनी पड़ती है। वह सुषुम्ना नाड़ी के मूल भाग में स्थित कुण्डलिनी को जागृत कर उसके द्वारा क्रमश: मूलाधार, स्वाधिष्ठान, मणिपूरक, अनाहत तथा विशुद्ध चक्रों को वेधित करता है। अन्त में सहन्नर तक पहुँच कर नाद में लीन हो जाने की चेष्टा करता है। संगीत के साधकों का विशेष संबंध इनमें से केवल तीन चक्रों से रहा करता है। संगीत शास्त्र के ग्रंथों में बतलाया गया है कि हृदय के अनाहत चक्र से 'मध्यम'तथा मूद्र्धा के सहन्नर से 'तार' स्वर उत्पन्न होते हैं। इन्हीं तीनों के आधार पर तार सप्तक अथवा सप्त स्वरों की सृष्टि होती है। इस कारण इन्हीं चक्रों की साधना पर संगीत कला की सिद्धि भी निर्भर है। योग संबंधी ग्रंथों में बतलाया गया है कि योग साधना करने वालों को भी अनहद शब्द क्रमश: पहले मत्तभ्रंग, वेणु, वीणा, घण्टानाद व मेघ ध्वनि जैसा ही सुन पड़ता है। किन्तु जब वे इनसे विचलित न होकर स्थिरचित्त बने रहते हैं। तो अन्त में उन्हें नाद में लय की प्राप्ति होती है।'' ये कथन योग व संगीत के संबंध को स्पष्ट करता है। संगीत और योग दोनों ही स्थितियाँ व्यक्ति को एकाग्रबद्ध बनाती हैंं, सर्वप्रथम व्यक्ति को अपने मन पर नियंत्रण करना आवश्यक होता है, तत्पश्चात् ही वह योग व संगीत की साधना करने में सक्षम होगा। योग साधना में बढ़ते हुए साधक को सांगीतिक वाद्य यंत्रों की ध्वनि का अनुभव होने लगता है, इस अनुभव के पश्चात् ही वह लय को प्राप्त करता है। मंद्र, मध्य व तार सप्तक की साधना हृदय, मस्तिष्क व कंठ की मांसपेशियों को प्रभावित करती हैं। मंद्र सप्तक के सुरों के अभ्यास के समय हृदय पर, मध्य सप्तक के सुरों के समय कंठ पर व तार सप्तक के सुरों की साधना करते हुए मस्तिष्क पर बल पड़ता है, अत: इन तीनों सप्तकों की साधना करते हुए साधक हृदय, कंठ व मस्तिष्क के योग अभ्यास करता जाता है।
वहीं, यदि संगीत के प्रत्येक स्वर के अभ्यास की बात की जाए तो भी साधक योग साधना की ओर ही अग्रसर होता प्रतीत होगा। प्रत्येक स्वर साधक को ध्यान की अवस्था में ले जाता है। जिस प्रकार योग में ओंकार पर अधिक बल दिया जाता है उसी प्रकार संगीत के सातों स्वर ओंकार की साधना ही हैं। ऊँ शब्द अ, ऊ और म से मिलकर बना है। अ अर्थात् अकार इसे महाकाली की शक्ति माना गया, ऊ अर्थात् उकार यह महासरस्वती की शक्ति मानी गई, म अर्थात् मकार इसे महालक्ष्मी की शक्ति माना गया, अत: ऊँ शब्द में तीनों देवियों की शक्तियाँ समाहित हैं व इसकी साधना से तीनों देवियों की आराधना की जा सकती है। कहा गया है कि ''योग साधना में निर्दिष्ट आठ अंग- यम, नियम, आसन, प्राणायाम, प्रत्याहार, धारणा और समाधि संगीत साधना में स्वयंमेव सम्मिलित हो जाते हैं। अन्तर यह है कि योग साधना में अनाहत नाद को उपास्य तत्व और उपासना का माध्यम स्वीकार किया है, जो उसे स्वर पर केन्द्रित करता है जिसका माध्यम है 'ऊँ' की ध्वनि, इसी 'ऊँ' का रूपांतर आज गायक द्वारा आरंभ में लगाए 'ओंकार' में देखा जाता है। अत: नाद के स्थूल रूप से सूक्ष्म स्वरूप तक पहुँच जाना योग साधना की चरम सीमा है।''अत: ईश्वर को नादयोग की साधना के माध्यम से शीघ्र और सुगमता से प्राप्त किया जा सकता है।
ओंकार संगीत में स्वर का दाता है। प्रथम स्वर षडज की साधना के बारे में कहा गया है कि ''षडज की अवस्था निर्विकार और निश्चल होती है। योग निद्रा मग्न योगिराज की अवस्था इस स्वर में पाई जाती है।'' इसी प्रकार प्रत्येक स्वर का अपना विशेष रूप व स्थान है जिसमें परिवर्तन संभव नहीं।
जिस प्रकार संगीत के तत्व नाद, सुर, सप्तक योग से संबंध रखते हैं उसी प्रकार राग का संबंध भी योग विद्या से है। भारतीय शास्त्रीय संगीत में राग की अवधारणा है तथा राग जीवन के प्रत्येक भाव को अभिव्यंजित करता है। योग और राग कैसे एक-दूसरे से जुड़े हुए हैं इसके बारे में प्रेमलता शर्मा लिखती हैं कि ''कलनी शक्ति, जो कलाओं के रूप में अभिव्यक्ति का क्रम बनाती है, मूलत: षडंग योजना के अनुसार कार्य करती है ये छ: अंग 'रं' 'लं' 'वं' इत्यादि छ: बीजाक्षरों में अनुस्यूत हैं। मूल राग छ: ही हैं- राग-रागिणी-पद्धति में तो वैसा है ही, प्राचीन ग्राम-राग-पद्धति में भी शुद्ध राग छ: ही हैं। मूल रागों की यह संख्या (6) मनुष्य-शरीर में छ: चक्रों से भी संबद्ध है। राग-रागिणी-पद्धति के छ: रागों के साथ छ: बीजाक्षरों का संबंध जोड़ा जा सकता है। उदाहरण के लिए- 'ऊँ वं' को मेघ राग का बीज माना जा सकता है क्योंकि 'वं' जल का बीजाक्षर है, उसी प्रकार 'ऊँ रं' दीपक राग का बीज हो सकता है क्योंकि 'रं' अग्निबीज है।'' इस प्रकार प्रेमलता जी मानव शरीर के छ: चक्रों से छ: रागों का संबंध स्थापित करती हैं। प्राचीन भारत के मनीषी, विद्वान, आचार्यों ने जो भी नियम बनाए या विचार प्रस्तुत किए वे ठोस धरातल पर अडिग थे। उन्होंने किसी भी बात को दीर्घ साधना, तप, कठिन प्रयासों व स्वयं अनुभव करके ही तर्क के साथ प्रस्तुत किया, अर्थात् संगीत के संदर्भ में उन्होंने जो भी मत प्रस्तुत किए वे उनकी कठिन व दीर्घ साधना के उपरांत प्राप्त फल हैं। इसीलिए भारतीय संगीत औषधी के रूप में भी कार्य करता है। यह बात रागों के संदर्भ में भी सिद्ध हो चुकी है।
संगीत द्वारा मनुष्य के भौतिक दु:ख भी दूर हो सकते हैं। योग को जिस प्रकार से दवा के रूप में प्रयोग में लाया गया उसी प्रकार यह सिद्ध हो गया है कि संगीत भी कई रोगों से मुक्ति दिला सकता है। अनेक उत्तेजक रोग संगीत द्वारा ठीक किए जा सकते हैं इससे पाचक ग्रंथियों को बल मिलता है। इकहरे स्वरों के अभ्यास से हृदय की गति बढ़ती है। संगीत से नेत्र शक्ति बढ़ सकती है व जिद्दी प्रकृति सरल की जा सकती है, स्मरणशक्ति वापस लाई जा सकती है व जीवन को सरल व सुंदर बनाया जा सकता है। मनुष्य ही नहीं वरन् पेड़-पौधों व जीव-जंतुओं पर भी संगीत के पडऩे वाले प्रभावों की परीक्षा की जा चुकी है। जगदीश चंद्र बसु ने ओंकारनाथ जी के साथ अपनी प्रयोगशाला में इस प्रकार के कई प्रयोग किए। ''श्री बसु ने ओंकारनाथ जी से एक मुरझाए हुए पौधे के सम्मुख 'भैरवी' गाने को कहा। भैरवी की ध्वनि सुनकर पौधे में इस प्रकार के चिह्न दिखलाई दिए मानो उसे अपूर्ण सांत्वना मिली हो। ठाकुर जी ने वृक्षों पर किए गए संगीत के प्रयोगों की सफलता का वृत्तांत बताते हुए कहा कि भैरवी राग गाते हुए कोपलों पर नवीन चमक आ गई थी।''जानवरों पर पडऩे वाले संगीत प्रभाव पर पंडित ओंकारनाथ जी का कहना है कि ''काफी राग के कोमल स्वरों का प्रभाव जानवरों पर खूब पड़ता है।'' प्राचीन मिस्र में संगीत की शक्ति के द्वारा पागलों का उपचार किया जाता था। प्रयोगकर्ताओं ने यह भी निष्कर्ष निकाला कि क्लोरोफ़ार्म की अपेक्षा किसी भी गंभीर नाद द्वारा मस्तिष्क की नाडिय़ों को सुषुप्त किया जा सकता है। अत: संगीत प्रत्येक जीव पर औषधि के रूप में कार्य करने में सक्षम है। सृष्टि के प्रत्येक जीव पर सप्त स्वरों के पडऩे वाले सकारात्मक प्रभाव को अनुभव किया गया।
विश्वभर में संगीत द्वारा चिकित्सा भिन्न-भिन्न सांगीतिक विधियों द्वारा दी जा रही है। आज विज्ञान ने भी यह स्वीकार कर लिया है कि संगीत के द्वारा गंभीर बीमारियों का उपचार संभव है। भारत में संगीत चिकित्सा का आयाम राग चिकित्सा के रूप में प्रचलित हुआ। रोग से मुक्त करने में संगीतज्ञ भी अपना योगदान दे रहे हैं। पंडित शशांक कट्टी ने चिकित्सकों के एक समूह के साथ मिलकर संगीत जगत में नया प्रयोग किया। उन्होंने भारतीय शास्त्रीय संगीत एवं आयुर्वेद के योग से संगीत चिकित्सा में एक नवीन विधि विकसित की जिसे सुर संजीवनी नाम से अभिहित किया गया है।
संगीत चिकित्सा विधि को आमजन में सरलता व सहजता के साथ प्रयोग में लाने के लिए संगीतज्ञों द्वारा बाजारवाद का भी सहारा लिया गया। इस दिशा में पंडित तरुण भट्टाचार्य का नाम लिया जा सकता है, उन्होंने मानसिक तनाव से ग्रस्त लोगों के लिए 'विश्राम' नामक सी.डी. की पूरी श्रृंखला तैयार की है। इससे पूर्व उन्होंने रोग निदान के लिए ही म्यूजिक फॉर लाइफ नामक श्रृंखला निकाली जो अत्यंत प्रसिद्ध हुई। अत: आज संगीतकार समाज के हित के लिए अपना सहयोग आगे बढ़कर देने में प्रयत्नशील हैं।
संगीत ईश्वर द्वारा मानव को एक सुंदर देन है। प्राचीन भारतीय संगीत विचारकों व चिंतकों ने इसमें जीवन से जुड़े प्रत्येक रहस्य का उत्तर खोज निकाला और संगीत मनुष्य के जीवन का एक प्रमुख अंग बना। सच्चे संगीत साधकों ने अनेक व्यक्तियों को अपनी साधना के माध्यम से वास्तविक सुख का अनुभव कराया। इसीलिए भारतीय संगीत का विश्वभर के संगीत में सबसे ऊँचा स्तर रहा। जो संगीतकार सी. डी. जैसे यंत्रों द्वारा संगीत चिकित्सा का प्रचार समाज में कर रहे हैं उनका कार्य प्रशंसनीय व सराहनीय है।
किन्तु एक बड़े पैमाने में आज का भारतीय संगीत अपने मूल रूप से हटता जा रहा है। आज वह मनोरंजन प्रदान करने का ही अधिक माध्यम बनने लगा, मनोरंजन भी केवल एक ऐसे समुदाय के लिए जो भारतीय संस्कृति से भिन्न संस्कृति के अधिक संपर्क में है। वर्तमान में शास्त्रीय संगीत बहुत कम सुनने को मिलता है, और जिन कलाकरों द्वारा सुनने को मिलता भी है तो उनमें से बहुत से अपने घरानों में ही उलझकर संगीत साधना करते हैं जिससे भारतीय संगीत की अस्पष्ट झलक दिखाई देती है। आज भारतीय सिनेमा विश्व स्तर पर अपनी छाप बना चुका है, अत: सिनेमा का दायित्व यह भी है कि वह भारतीय संस्कृति की धरोहर संगीत को अपने मूल स्वरूप के साथ विश्व के समक्ष उपस्थित करे। एक बड़े स्तर का युवा वर्ग भारतीय संगीत से बहुत दूर हो चुका है, उसे पता ही नहीं है कि उसके देश की सांगीतिक धरोहर कैसी है वह आधुनिक दौर के संगीत में इस तरह से फंस चुका है कि वह उसके स्वरूप को जानता ही नहीं है। आज का व्यस्त व्यक्ति अपने मन को आनंदित करने के लिए जिस संगीत को सुनता है, क्या उस संगीत से उसे आनंद की प्राप्ति होती है या वह और भी अधिक निराशा की ओर बढ़ता जाता है? हमारे आज के संगीतकारों को इस दिशा में अवश्य सोचना चाहिए व भारतीय जनमानस और भारतीय संगीत के बीच जो दूरी बढ़ चुकी है उसे मिटाने का प्रयास करना चाहिए, यही संगीतकारों का भारतीय संगीत के प्रति निष्ठा का भाव होगा जिससे आने वाली पीढ़ी के समक्ष भी भारतीय संगीत सुरक्षित रहे व वे भी संगीत से अपने जीवन को सुखी व समृद्ध कर सकें।