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Tuesday 21 Nov 2017

लंकेश्वरी म्ंदोदरी: विभिन्न रामायणों के संदर्भ से

वाल्मीकीय रामायण में लंकापति रावण की राजमहिषी मंदोदरी का चरित्र अत्यंत सुंदर चित्रित हुआ है। यहां इसे मयदानव एवं हेमा नामक स्वर्गलोक की अप्सरा की कन्या बताया गया है। माता-पिता ने मंद उदर वाली इस सुंदर कन्या का नाम रखा मंदोदरी। किंतु इस पुत्री को जन्म देने के बाद हेमा इन्द्र के आदेश पर स्वर्गलोक चली गई। तब पिता ने ही इसका पालन-पोषण किया। पुत्री के युवा होने पर योग्य वर की तलाश में घूमते हुए उसकी नजर लंकाधिपति रावण पर पड़ी। रावण से मिलकर उसकी शक्ति देखकर तथा ब्रह्मा के कुल का पुत्र समझ कर मय ने उसे अपनी पुत्री दे दी, साथ ही एक अमोघशक्ति भी दी। इसी शक्ति से युद्ध में उसने लक्ष्मण को घायल किया था (वा.रा.उ.कां. सर्ग 12) ।
रावण के साथ मंदोदरी प्रसन्न थी। वह उसकी पटरानी थी, उसकी प्रियतमा थी और उसका वीर पुत्र मेघनाद भी रावण को सर्वाधिक प्रिय था। होता भी क्यों न ? जिस इन्द्र को रावण नहीं जीत पा रहा था उसे मेघनाद ने ही तो जीता था।
वैसे अन्य राजाओं के समान रावण की भी अनेकानेक रानियां थी। जहां भी युद्ध करता, विजीत देशों की कन्याओं को उठा लाता। उसका हरम देव, दैत्य,नाग, किन्नर, गंधर्व आदि कन्याओं से भरा हुआ था। किंतु मंदोदरी को इस पर कोई आपत्ति नहीं थी। वह रावण की पटरानी थी और रावण उसका मान भी खूब करता था। किंतु सीता के अपहरण से वह दु:खी थी। रामायण में वह अनेक बार रावण को राम से युद्ध न करने और सीता को लौटाने की सलाह देती है। उल्लेखनीय है कि सीता को लौटाने की सलाह रावण के भाई विभीषण एवं कुंभकर्ण तथा नाना माल्यवान भी दे चुके थे। उनकी यह सलाह सुनकर वह सबको बुरी तरह प्रताडि़त करता था। अनुज विभीषण को इसी कारण उसने लंका से निष्कासित कर दिया था किंतु मंदोदरी जब भी उसे यह कहती थी, उसकी बात को हंस कर टाल देता था, इस हेतु कभी उसे बुरा-भला नहीं कहता था। वाल्मीकि के परवर्ती प्राय: सभी रामकथाओं में मंदोदरी का चरित्र ऐसे ही चित्रित है।
तुलसीदास के मानस में हनुमान के लंका जलाकर जाने के बाद मंदोदरी हाथ जोड़ कर पैर पड़ते हुए रावण से विनती करती है कि सीता को लौटा दो। वह यहां तक कहती है कि यह सीता तव कुल कमल बिपिन दुखदाई ।। (सुं.कां .36) सीता आपके कुलरुपी कमल-वन को दु:ख देनेवाली जाड़े की रात्रि के समान आई है। फिर ,युद्ध प्रारंभ होने के पूर्व राम की ओर से संधि हेतु भेजे गये अंगद के लंका आकर जाने के बाद भी वह पति से विनयपूर्वक किंतु कड़े शब्दों में कहती है - कंत समुझि मन तजहु कुमतिही। सोह न समर तुम्हहि रघुपतिही।। आप मन में विचार कर कुबुद्धि को छोड़ दें। समर में आपमें और राघव में युद्ध शोभा नहीं देता। फिर आप उन्हें संग्राम में कैसे जीत पाएंगे जिसके दूत हनुमान ने ऐसा काम किया है? खेल ही खेल में वह समुद्र लांघ कर लंका चला आया । तब आपके बल का गर्व कहां था जब उसने सारे नगर को जलाकर राख कर दिया था? आपसे तो रामानुज द्वारा बनाई गई एक छोटी सी रेखा भी नहीं लांघी गई। मंदोदरी आगे यहां तक कहती है-जनक की सभा में जब राम ने शिवधनुष भंग कर सीता को पाया था तभी क्यों नहीं आपने युद्ध में उन्हें जीत लिया? वह यह व्यावहारिक बात भी कहती है -
नाथ बयरु कीजे ताही सों। बुधि बल सकिअ जीति जाही सों।।
तुम्हहि रघुपतिहि अंतर कैसा। खलु खद्योत दिनकरहि जैसा।। (मानस, लं.कां. 6.3)
अर्थात् शत्रुता उसी से करना चाहिये जिसे बुद्धि और बल से विजीत किया जा सके। आपमें और रघुबीर में वैसा ही अंतर है जैसा एक जुगनू और सूर्य में है। किंतु काल के वशीभूत हो रावण को बोध नहीं हुआ। काल बिबस मन उपज न बोधा।(लं.कां. 35)... और इस तरह वह मंदोदरी के हितोपदेश को अनसुना कर देता है।
चन्द्र झा द्वारा रचित मैथिली रामायण में भी मंदोदरी बड़े कड़े शब्दों में रावण को बरजती है। वह कहती है- सहस्त्रार्जुन ने तुम्हें बलपूर्वक ले जाकर बंदीगृह में डाल दिया था, उसे जिस परशुराम ने हराया, उन्हीं परशुराम को राम ने हरा दिया था। सर्प के मस्तक पर की मणि ले जाने पर प्राण की हानि निश्चित है। अत: सीता को लौटा दीजिये। इस पर रावण कहता है-यह तो कल्पांत तक संभव नहीं। यहां कवि कहते हैं- मंदोदरी के उपदेश विवेकरुपी आकाश के तारे थे ...सुबुद्धिरूपी सागर में उत्पन्न रत्न ही थे पर कमल की सुगंध को मेंढक क्या जाने? क्या बगुला मोतियों का हार ग्रहण कर सकता है? कस्तूरी की सुगंध कौआ कभी ग्रहण नहीं कर सकता। मद्यपि के लिये तत्त्व संबंधी विचार व्यर्थ है। जन्मांध के सामाने रत्न बिखेरने से क्या लाभ? बहरे के सामने सुरीला गायन गाने एवं जारिणी से पतिव्रता के धर्म कहने का क्या फल? उसी प्रकार रावण के लिये मंदोदरी के उपदेश व्यर्थ थे (22.114-120) ।
मंदोदरी सीता से सौंदर्य में कम नहीं थी। वाल्मीकि रामायण के अनुसार रावण की मृत्यु के समय वह स्वयं कहती है कि मैथिली न तो कुल में, न रुप में और न ही दाक्षिण्य आदि गुणों में मुझसे बढ़कर है। वह मेरे बराबर भी नहीं है किंतु आपने मोहवश इस बात पर ध्यान नहीं दिया(यु.कां.111.28) रावण के महल में उसे एक पृथक् पर्यंक में सोते हुए जब हनुमान ने पहली बार देखा तो केवल उसके अद्वितीय एवं महिमायुक्त सौंदर्य को देखकर उन्होंने उसे ही सीता समझ लिया था और 'सीता को पा लिया 'सोचकर प्रसन्नता से झूम उठे थे। (सुं.कां .10.54) किंतु फिर उन्हें अहसास हुआ कि यह सीता नहीं हो सकती क्योंकि वह पूरा श्रगार किए हुए निश्चिन्तता से सोई हुई थी तथा मदिरापान भी किये हुए थी।
अन्य रामायणों में भी मंदोदरी के सौंदर्य को देखकर हनुमान को उसे ही सीता समझने के भ्रम का उल्लेख है। कंबर रचित तमिल कंब रामायण में कंब लिखते हैं कि रावण के महल से पृथक् एक श्रेष्ठ महल में इस अपूर्व सुंदरी को देख हनुमान प्रसन्न हुए कि यही सीता है। रम्भा, मेनका आदि अप्सराएं उसके चरण-पल्लवों को सहला रही थी। किंतु उसकी गतिविधियां देख हनुमान संशय-ग्रस्त भी हो गये। पर फिर उन्होंने विचारा, सीता मानव-शरीरी है, यह भिन्न शरीर वाली दिखती है। यह यक्षिणी या दानवी लगती है। जो हो, यह जानकी नहीं हो सकती। फिर, इसके सामुद्रिक लक्षण भी कुछ और ही कहते हैं। इसमें उत्तम स्त्री होने के लक्षण है किंतु इसके असीम दुख पाने का समय निकट है। लगता है इसका पति शीघ्र मर जायेगा। तब उन्हें पक्का विश्वास हुआ कि यह सीता नहीं है (सुं.कां. 262-270)।
असमिया रामायण माधवकंदली के अनुसार भी हनुमान ने पहले मंदोदरी के अनिंद्य सौंदर्य को देखकर उसे ही सीता समझा था किंतु एक तो वह रावण के बगल में सोई थी, दूसरे वह मदिरापान किये हुए प्रतीत हो रही थी, इसलिये हनुमान को उसके सीता होने में संदेह हुआ। देवी सीता रावण के साथ शयन नहीं कर सकती थी... और मदिरापान, यह वे कैसे कर सकती हैं! रहा नहीं गया तो हनुमान निद्रालीन मंदोदरी के पास पहुंचे। फिर उन्होंने उसकी वेणी मापकर देखा। देवी सीता की एक ही पहचान उनके पास थी कि उनकी वेणी आठ हाथ लंबी है। इस सुंदरी की वेणी आठ हाथ से बित्ते भर कम थी। तब हनुमान संतुष्ट हुए कि यह सीता नहीं है(4145-50 )।
श्रीधर की मराठी राम विजय रामायण में भी हनुमान ने मंदोदरी को पहले सीता ही समझा किंतु जैसे ही दशानन आया, मंदोदरी ने उठकर उसके चरण धोये। मंदोदरी को सीता समझ बैठे हनुमान पहले तो यह देख कर क्रोधित हुए किंतु शीघ्र ही उन्हें अपनी भूल का अहसास हो गया जब नींद में वह बड़बड़ाने लगी कि मेरा मंगलसूत्र जल गया है। एक वानर ने अशोकवाटिका को उजाड़ दिया है ...हमारे पुत्र अक्षय का वध कर दिया है! आप शीघ्र ही सीता को लौटा दीजिये।
रावण की मृत्यु पर विलाप करती मंदोदरी
जैसा कि हमने ऊपर देखा, मंदोदरी ने रावण को राम के बल का वास्ता देते हुए कई बार युद्ध से विरत करने और सीता को लौटाने की सलाह दी थी, फिर भी उसे सहसा विश्वास ही नहीं हो रहा था कि तीनों लोकों पर विजय प्राप्त करने वाला उसका पति एक तपस्वी के हाथों मारा गया है! (वा.रा.यु.कां.111.6-7) रावण के शव के सामने बैठी अश्रुमुखी वह कहती है-जब देवराज तक में आपकी ओर देखने का साहस नहीं था तब राम आपको कैसे मार सकते थे? या फिर साक्षात् काल ही माया रचकर आपके विनाश के लिये राम के रुप में पहुंचा है... या फिर राम सनातन परमात्मा ही है ! अवश्य स्वयं विष्णु ने ही राम के रुप में अवतार लिया है ।
आगे मंदोदरी रावण को ही उसकी मृत्यु का उत्तरदायी बताती है...इसमें संदेह नहीं कि पापकर्म का फल अवश्य मिलता है। शुभकर्म करने वाले को उत्तमफल की प्राप्ति होती है और पापी को पाप का फल दुख के रुप में भोगना पड़ता है। विभीषण को अपने शुभ कर्म के कारण ही सुख प्राप्त हुआ है और आपको अपने पाप के कारण ऐसा दुख भोगना पड़ा है। आपने सती सीता का अपहरण कर बहुत बड़ा पाप किया है। आश्चर्य तो यह है अपहरण करते समय ही आप जलकर राख कैसे नहीं हो गये। (वही ,111.24 ) आप तीनों लोकों में अपने को सबसे बड़ा शूरवीर मानते थे फिर भी आपने पराई नारी को छल से चुराने का निम्न कृत्य किया है। संसार में किसी की मृत्यु अकारण नहीं होती। इस नियम के अनुसार ही मैथिली आपकी मृत्यु का कारण बनी है। आप दूर से अपनी मृत्यु को स्वयं लेकर आये है। आगे वह सीता के पातिव्रत्य की प्रशंसा भी करती है-पतिव्रताओं के आंसू इस पृथ्वी पर व्यर्थ नहीं गिरते, यह कहावत आपके ऊपर ठीक-ठीक घटी है। (वही 111.66)
मानस के अनुसार भी मंदोदरी ने अपनी ओर से रावण को रोकने का पूरा प्रयास किया था। वह जानती थी कि रावण राम से युद्ध में नहीं बच सकता। पत्नी होने के कारण वह रावण की मृत्यु पर विलाप अवश्य करती है किंतु यहां मंदोदरी राम की बिल्कुल भी आलोचना नहीं करती। वह अपने पति के बाहुबल की प्रशंसा करती है जिससे देवताओं को भी विजय प्राप्त की थी किंतु राम के आगे नतमस्तक होते हुए कहती है कि राम विमुख होने से ऐसा हाल हो गया है कि आज कुल में कोई रोने वाला नहीं बचा है। मृत रावण के पास बैठी मंदोदरी रोते हुए कहती है कि
अब तव सिर भुज जंबुक खाहीं। राम बिमुख यह अनुचित नाहीं।।
काल बिबस पति कहा न माना। अग जग नाथु मनुज करि जाना।। (लं.कां.104.6)
अर्थात् जिसके सामने सारे लोकपाल भयभीत होकर शीश नवाते थे अब उसके सिर और भुजाओं को गीदड़ खाएंगे। रामविमुख के लिये ऐसा होना अनुचित भी नहीं है। काल के विवश होकर आपने मेरा कहा नहीं माना और चराचर के नाथ को मनुष्य ही समझा।
मंदोदरी को एक संतोष था कि राम के हाथों मरकर उसके पति को योगियों के लिये भी दुर्लभ गति मिली है। सबसे बैर कर इतना पापसमूह एकत्रित करने के बाद भी राम ने रावण को योगियों को भी दुर्लभ अपना धाम दिया है-
आजन्म ते परद्रोहरत पापौघमय तव तनु अयं ।
तुम्हहू दियो निज धाम राम नमामि ब्रह्म निरामयं।।
अहह नाथ रघुनाथ सम कृपासिंधु नहिं आन।
जोगि बृंद दुर्लभ गति तोहि दीन्हि भगवान।। (लं.कां.104)
रावण की मृत्यु के बाद मंदोदरी
यहां एक प्रश्न उठता है कि रावण की मृत्यु के बाद मंदोदरी का क्या हुआ? इस विषय में विभिन्न कथाकारों ने अलग-अलग मत रखे हैं। वाल्मीकि रामायण इस संबंध में मौन है। कंबर की मंदोदरी पति के साथ सती हुई।(यु.कां.3890) संस्कृत आनंद रामायण (सारकंाड 11.255) एवं एकनाथ की मराठी भावार्थ रामायण के अनुसार भी मंदोदरी सती हुई। राम की स्तुति कर विभीषण को प्रणाम कर वह रावण की चिता में चढ़ गई और देहत्याग कर राम के स्वरुप में विलीन हो गई। (यु.कां. 65) अनेक रामायणों के अनुसार विभीषण ने उससे ब्याह कर लिया। तुलसी के मानस में प्रत्यक्ष तो नहीं, किंतु अप्रत्यक्ष रुप से विभीषण द्वारा मंदोदरी से विवाह करने का उल्लेख है।
जेहिं अघ बधेउ ब्याध जिमि बाली। फिरि सुकंठ सोइ कीन्हि कुचाली।
सोइ करतूति बिभीशन केरी। सपनेहुं सो न राम हिय हेरी।।(बा.कां .29.6-7)
अर्थात् जिस पाप के कारण राम ने बाली को मारा था वही पाप फिर सुग्रीव ने किया। वही करनी विभीषण की भी थी किंतु राम ने स्वप्न में भी उसका मन में विचार नहीं किया। यहां संकेत है कि विभीषण ने मंदोदरी को रावण की मृत्यु के बाद अपना लिया था पर यहां इसकी प्रशंसा नहीं है वरन इसे पाप ही बताया गया है। वस्तुत: यहां भक्त की महिमा गाई गई है जिनके अपराध को प्रभु क्षमा करते हैं। बंगला कृत्तिवास रामायण में भी रावणवध के बाद मंदोदरी और विभीषण के विवाह की कथा है। थाई रामायण रामकियेन में भी मंदोदरी विभीषण की पत्नी बन जाती है। ओडिया जगमोहन रामायण में तो रावण के जीते जी ही मंदोदरी विभीषण की हो जाती है। अस्तु , यहां प्रश्न उठता है कि जो मंदोदरी अपने पति से इतना प्रेम करती थी वह कैसे विभीषण से रावण वध के तुरंत बाद विवाह कर सकती थी? कुछ रामायणकारों ने यहां मंदोदरी को राम का दिया वरदान कारण बताया है जो राम उसे तब देते हैं जब वह रावण वध के बाद रोते हुए उनके चरणों में पहुंचती हैं। कृत्तिवास के अनुसार रावणवध के पश्चात् विलाप करती मंदोदरी यह कहते हुए राम के पास पहुंची कि जिसने लंकेष को मारा है उन्हें मैं एक बार अपनी अंाखों से देखना चाहती हूं। सेना से घिरे राम के पास पहुंच कर मंदोदरी ने जैसे ही उनके चरणों में अपना मस्तक रखा, राम ने उसे सीता समझ कर अखंड सौभाग्यवती होने का आशीर्वाद दे दिया। (तुलनीय -महाभारत में भीष्म के द्वारा द्रौपदी को अखंड सौभाग्यवती रहने का वरदान ऐसे ही धोखे से मिला था। ) तब मंदोदरी का परिचय जानकर लज्जित राम ने कहा कि रावण की चिता सदा जलती रहेगी और तुम सदा सधवा बनी रहोगी। ...और फिर राम ने अपने वचनों की रक्षा के लिये विभीषण से अनुरोध किया कि वह मंदोदरी से विवाह करे। (कृ.रा.लं.कां.पृ545)
हनुमन्ननाटक में दूसरी ही बात है । यहां उल्लेख है कि रावण की मृत्यु के बाद मंदोदरी जब राम को प्रणाम करने आती है तो राम नीचे की ओर मुख किये ही उससे पूछते हैं -किमाज्ञापयति महाभागा मंदोदरी? महाभागा मंदोदरी की क्या आज्ञा है? इस पर वह कहती है -
धन्या राम ! त्वया माता धन्यो राम! त्वया पिता।
धन्यो राम त्वया वंश: परदारान् न पश्यसि।। (14.59)
अर्थात् राम आप धन्य हैं । आपकी माता, पिता एवं वंश भी धन्य है जो परनारी को आप नहीं देखते हैं। इसके बाद वह पूछती है -अब मेरी क्या गति होगी? तब राम कहते हैं -राक्षसियों के लिये पति के साथ सती होने का धर्म नहीं है। इसलिये तुम विभीषण के राजमहल में रह कर लंका नगरी में चिरकाल तक राज्य का उपभोग करो। (14.59)
कुछ रामकथाएं ऐसी भी हैं जहां मंदोदरी के सतीत्व के कारण रावण को अवध्य बताया गया है। जैसे पुराणों में विष्णु द्वारा जलांधर राक्षस की पत्नी वृंदा का सतीत्व भंग कर जलांधर को मारने की कथा मिलती है वैसे ही कहीं-कहीं मंदोदरी के सतीत्व को भंग करने की कथा भी कही गई है। ओडिय़ा जगमोहन रामायण में नारद मंदोदरी का सतीत्व भंग करने मंदोदरी से ही कहते हैं कि राम की पत्नी का अपहरण करने के कारण रावण की मृत्यु राम द्वारा निश्चित है। तुम विभीषण से प्रीति कर लो ताकि तुम्हारा भविष्य भी सुरक्षित रहे। तब मंदोदरी ऐसा ही करती है। उधर मंदोदरी का सतीत्व भंग होने से रावण की मृत्यु भी सहज हो जाती है। (अर.कां.पृ.777)
थाई रामायण रामकियेन में मंदोदरी रावण को सीता को लौटाने बार-बार कहती है किंतु पतिव्रता होने के कारण वह पति का साथ नहीं छोड़ती। युद्ध में उसकी सहायता करती है। उसने उमा से अमृत बनाने की कला सीखी थी। सो वह मृतकों को जीवित करने के लिये अमृत बनाती है। इससे कुंभकर्ण आदि राक्षस जीवित हो जाते हैं। यह देख वानरसेना में खलबली मचना स्वाभाविक थी। तब मंदोदरी को रोकने हनुमान ने एक चाल चली। रावण के वेश में वह मंदोदरी के पास गये और बोले कि अब अमृत बनाने की आवश्यकता नहीं है क्योंकि राम-लक्ष्मण तो युद्ध में मारे जा चुके है। यह सुनकर मंदोदरी प्रसन्न हो वासनापूर्ण आनंद के साथ रावण के वेश में आए हनुमान से लिपट पड़ी। इससे उसकी पवित्रता नष्ट हो गई। इधर अमृत की राह देखता रावण जब महल में आया तो उसे हनुमान के छल का पता चला। हनुमान पर वह बहुत क्रोधित हुआ किंतु अपनी प्रिय रानी के प्रति उसका प्रेम बना रहा। (पृ.109-111)
जहां तक रावण की मृत्यु के बाद मंदोदरी की स्थिति का प्रश्न है , रामकियेन के अनुसार रावण स्वयं मृत्युपूर्व विभीषण को मंदोदरी का ध्यान रखने कहता है। इसीलिये सिंहासन पर बैठते समय विभीषण के बाएं ओर उसकी रानी त्रिजटा (विभीषण की पत्नी) और दाएं ओर मंडो बैठती है। (पृ.124)
यहां उल्लेखनीय है कि रावण की विधवा होते हुए भी विभीषण से पुनर्विवाह करने वाली मंदोदरी को हमारे पौराणिक कथाकारों ने पंचकन्याओं में रख कर उसे गौरव प्रदान किया है। अहल्या, द्रौपदी तारा, कुंती, मंदोदरी तथा। पंचकन्या: स्मरेत्प्रात: सर्वपातकषान्तये।। इति व्यासवचनात् अर्थात् अहल्या, द्रौपदी, तारा, कुंती और मंदोदरी ये पंचकन्याएं प्रात:स्मरणीय हैं। इनका प्रात:काल में स्मरण करना सर्वपापों का नाश करने वाला है।
वैसे उपरोक्त पांचों नारियां हिंदू धर्म द्वारा घोषित नारी का सर्वश्रेष्ठ आभूषण ' एकपतिव्रत 'से हीन हैं फिर भी इन्हें इतना बड़ा पद दिया जाना आश्चर्य की बात ही कही जायेगी। संभवत: परमात्मा की भक्ति इन नारियों को श्रेष्ठ बनाती है। इसे हम हिंदू धर्म की खूबी ही कहेंगे।
रावण-वध के बाद अनेक रामायणकारों ने मंदोदरी को विभीषण की पटरानी बनते बताया है, जैसा कि हमने ऊपर देखा, किंतु एक मराठी रामायण रामविजय ऐसी भी है जहां विभीषण आदर-पूर्वक मंदोदरी को 'मां'कहते हुए उसका हाथ थाम कर उसे महल ले जाते हैं। (33.165 )
जैन रामकथा में मंदोदरी का चरित्र और ऊंचा बताया गया है। विमलसूरि के परमचरियं में रावण की मृत्यु के बाद वह रावण की अन्य रानियों के साथ प्रवज्या ग्रहण करती है। (पर्व 75) इतना ही नहीं स्वयंभूदेवकृत परमचरिउ में मंदोदरी के विभीषण के विवाह की बात पर प्रश्नचिह्न भी दिखाई देते हैं। यहां श्रेणिक गौतम से कहता है कि जिस विभीषण ने परस्त्री में आसक्त अपने अग्रज रावण का वध करवाया, वह जननीतुल्य मंदोदरी को कैसे ग्रहण कर सकता था? (1,10,9)
यहां एक प्रश्न उठता है कि सीता को अपने सारे दुखों की जड़ समझ कर क्या मंदोदरी को सीता के प्रति कभी क्रोध नहीं आया होगा? कृत्तिवास के अनुसार आया था, बहुत आया था, इतना कि सब कुछ जानने और समझने वाली होकर भी मंदोदरी रावणवध के बाद सीता से इतनी नाराज होती है कि सीता को सजसंवर कर पालकी में बैठ कर राम से मिलने जाते देख बिफरी शेरनी के समान वह रास्ते में आ जाती है और सीता को शाप दे बैठती है कि तुम जो इतनी उत्सुकता और प्रसन्नता से पियामिलन हेतु जा रही हो, वह थोड़ी ही देर में आंसुओं में बदल जाएगा। राघव तुम्हें विषदृष्टि से देखेंगे। यदि मैं सती हूं तो मेरा शाप व्यर्थ नहीं जाएगा। (लं.कां. पृ.548) शायद यह मंदोदरी का शाप ही था कि राम सीता के चरित्र पर संदेह करते हुए उनकी अग्निपरीक्षा लेते हैं। किंतु कुछ रामायणों, जैसे कश्मीरी रामायण रामावतार में मंदोदरी स्वयं सीता को सादर राम के पास ले जाती है। (यु.कां.54)
वैसे वाल्मीकीय रामायण में मंदोदरी को सीता के प्रति सदय बताया गया है। इसमें तथा इसके अनुकरण पर अध्यात्मरामायण, रंगनाथरामायण तथा मानस आदि में उल्लेख है कि रावण जब अशोकवाटिका में सीता को मारने तलवार लेकर दौड़ता है तब यह मंदोदरी ही थी जो उसे बचाती है। बेचारी मंदोदरी! जिस सीता के लिये रावण उसे सबके और स्वयं उसके सामने ही सीता की दासी बनाने की बात करता है उसी सीता को बचाने वह आगे आती है । मानस में रावण सीता से कहता है -
कह रावनु सुनु सुमुखि सयानी। मंदोदरी आदि सब रानी।।
तव अनुचरीं करउं पन मोरा। एक बार बिलोकु मम ओरा।। (सुं.कां .9.2) सीता के तब भी न मानने पर जब वह चन्द्रहास निकाल कर उसे मारने दौड़ता है तब मयतनयां कहि नीति बुझावा।। अर्थात् नीति की बात कह कर मंदोदरी उसे रोकती है।
गुणभद्र की जैन रामायण उत्तरपुराण के अनुसार सीता को मारने हेतु तत्पर रावण को मंदोदरी यह कहकर शांत करती है कि सती स्त्री का अपमान करने से आकाशगामिनी आदि विद्याएं नष्ट हो जाती है।
अस्तु, प्राय: भारतीय रामकथाकारों ने वाल्मीकि के अनुसरण पर ही मंदोदरी को मय दानव एवं हेमा अप्सरा की पुत्री बताया है किंतु थाईलैंड की रामकथा रामकियेन (रामकीर्ति) में मंदोदरी के जन्म की कथा कुछ अलग है। यहां इसका नाम मंडो है। यहां कथा है कि पहले वह एक मेंढकी थी जिसे कुछ ऋषिगण बचा हुआ दूध दे देते थे। एक बार एक नागकन्या इन ऋषियों से नाराज हो गई । बदला लेने के लिये उसने ऋषियों के दुग्धपात्र में विष उगल दिया जिसे मेंढकी ने देख लिया। कहीं ऋषिगण इस विषमिश्रित दूध को पी न ले , यह सोचकर वह मेढकी स्वयं उस दुग्धपात्र में कूद गई । इधर ऋषियों ने जब उसे मृतावस्था में दुग्धपात्र में तैरते देखा तो यह सोचकर उस पर द्रवित हुए कि भूख लगने के कारण यह इस पात्र में कूदी होगी फिर निकल नहीं पाई होगी, इसलिये मृत्यु को प्राप्त हुई । तब ऋषियों ने दयावश उसे मंत्रबल से जीवित कर दिया। पुनर्जीवित हुई उस मेंढकी ने ऋषियों को सारा हाल बताया। इस पर जीवन से उपकृत हुए उन ऋषियों ने मेंढकी को एक सुंदर युवती बना दिया और शिव की सेवा में भेज दिया। रावण ने शिव से ही मंदोदरी को प्राप्त किया। मंदोदरी उसकी प्रिय रानी बनी। एक बार राजा दशरथ के यज्ञ की गंध उसे इतनी भाई कि वह रावण से प्रार्थना करने लगी कि उसे भी इस यज्ञ का प्रसाद चाहिये । तब रावण ने एक राक्षसी को कौए के रुप में अयोध्या भेजा ताकि वह चोरी से पुरोडाश ला सके। वह राक्षसी पुरोडाश का एक भाग लाने में सफल हुई जिसे खाकर मंदोदरी गर्भवती हो गई और उसने एक कन्या को जन्म दिया। किंतु ज्योतिषियों के कहने पर कि यह कन्या रावण के वध का कारण बनेगी, रावण ने उसे हांडी में बंद कर नदी में बहा दिया। यह कन्या राजा जनक को मिली। यही सीता थी।
उल्लेखनीय है कि कुछ भारतीय रामायणों में भी सीता को मंदोदरी की पुत्री बताया गया है। गुणभद्र के उत्तरपुराण में आई जैन रामकथा में भी सीता रावण और मंदोदरी की पुत्री बताई गई हैे। संस्कृत रामकथा अद्भुत रामायण तथा कश्मीरी रामायण रामावतारचरित में भी सीता को रावण और मंदोदरी की पुत्री बताया गया है किंतु ऐसे विवरण बहुत कम है।
अस्तु, भारतीय जनमानस में मयदानव की पुत्री मंदोदरी रावण की पत्नी होते हुए भी अन्य राक्षसियों से बिल्कुल अलग कोमल हृदय की नारी है जो राम के ईश्वरत्व का ज्ञान रखती है, यह समझती है कि सीता का अहपरण कर रावण ने पाप किया है अत: उसे सही राह पर लाने बराबर प्रयत्नशील रहती है।
(लेखिका सेवानिवृत्त प्राचार्य हैं एवं वर्तमान में भारत सरकार के संस्कृति विभाग के सीनियर फैलोशिप के अंतर्गत रामायण पर शोधकार्य कर रही हैं।)