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Sunday 19 Nov 2017

मुखबर

मुखबर

 सोचता हूं

अनमना होकर

कि यह वर्षा ऋतु है

इसमें नया क्या है

यदि चीटियों के

निकल आए पर।

 

स्वभाविक है

कि बरसात होगी

मेढकों की और भीग कर

चुक जाएंगे

कोयलों के स्वर।

गगन चुम्बी

एंटिलो की

बाढ़ आएगी

डूब जाएंगे

घर गरीबों के

बह जाएंगे छप्पर।

 

सुन कर

आतताईयों का

मेघ गर्जन

हो जाएगा

टूटने को

सब्र का बांध तत्पर।

 

देख कर

विभीषणों को

प्रसाद में

मिली स्वर्ण नगरी

होने लगे हैं

देशभक्तों के

स्वर मुखर।

 

देय

ए नदी!

मैं समुन्दर हूं

और

यह सच

कि मैं खारा हूं

और यह भी सच है

कि हर बार

मैंने तुझको भेजा है

बादलों द्वारा

मीठा पानी

पर बदले में तूने

क्या दिया मुझे?

धरती के जीवन का

खारापन

 

रणनीति

 जो तर्क से

नहीं कटता

उसे

श्रद्धा से

काट देते हैं

मेध यज्ञ के

प्रसाद सा

बांट देते हैं।