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Sunday 21 Oct 2018

मित्रवर, मुझे चिट्ठी लिखो न!

मित्रवर,

मुझे चिट्ठी लिखो न!

 

मानता हूं-

हम सरपट भाग रहे हैं,

सड़कों के पीछे 'स्पीड ब्रेकरÓ भी

अपने वजूद के नकारे जाने से उदास है

मुंह चिढ़ाती रहती है उसे

भागमभाग वाली •िान्दगी।

 

मंजूर है मुझे

कुछ कदम पीछे लौटना,

आंखें मृतप्राय उस मंजर को

पुनर्जीवित कर सुकून पाना चाहती हैं-

खाली टोपी, खाकी थैला,

थैले से निकलकर तुम्हारा सामने खड़ा होना;

 

सांसें और धड़कनें बैगवाले को देखकर

संवाद की बांसुरी से

सम्पर्क की धुन छेडऩा चाहती है।

 

लिखे शब्दों से उदास होना चाहता हूं,

खुश होना चाहता हूं,

नाराज होना चाहता हूं,

अपने सीने में

स्पर्श का खुश्बूदार एहसास भरना चाहता हूं।

 

क्रांति, तरक्की, नास्टेलजिया

तुम्हारे कदमों में गति ला दी है

गतिमान कदमों को कभी-कभार

रोक लिया करो न!

 

फिर से एक चिट्ठी लिखो न!

जिसके चार शब्दों में हमें मिलते हैं

अवसाद, विषाद, सुख-दुख वाला जीवन का

महाकाव्य पढऩे का चरमसुख-

 

प्रार्थना : कुछ अच्छे शब्दों के लिए

 

हे ईश्वर!

अगर कुछ देना ही है तो मुझे

अच्छे, खूबसूरत पाक-साफ शब्द दे!

 

अच्छे शब्द रोटी देंगे,

पानी देंगे, कपड़ा देंगे

और वह सब जो नहीं हैं

खरबपतियों के पास।

 

जिनके पास अच्छे शब्द हैं

वह दुनिया से प्यार करते हैं

और खूबसूरत बात यह है कि

नतमस्तक रहता है मजहब भी

हाथ जोड़े।

 

शब्द ईश्वर का मानसपुत्र है-

कभी गोपनीय नहीं रही

शब्द और ईश्वर की निकटता।

 

शब्दों का सौदागर नहीं होना चाहता,

नहीं होना चाहता शब्दों का जादूगर।

अच्छे शब्दों को देकर

तुझे पछताना नहीं पड़ेगा ईश्वर!

 

मसाला पिसती औरत

 

मसाला पिसती औरत को देखना

कोई अजूबा नहीं,

आपके घर में मेरे घर में

मसाला पिसती है औरत।

 

अदरख, लहसुन, प्याज मिर्च को

प्यार स्नेह और वात्सल्य की

छींटें मार-मारकर

मसाला पिसती है औरत।

 

अपने लोगों को जायकेदार

भोजन खिलाने की कोशिश में

बहुत कुछ और भी है

कूटती, पिसती, छांटती, चुनती है औरत।

 

यह जानते हुए भी कि

अपने लोगों की सील पर

रोज-रोज

कूटी-पिसी जाती है औरत।