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Sunday 19 Nov 2017

क्या कहते हो?

 

क्या कहते हो?

मैं एक घर बनाना चाहता हूँ

बड़ा सा

जिसके आँगन में

छाँह देते पेड़ हों

जिसकी घनी टहनियों से

झाँकता दिखाई दे

गोरैया का घोंसला

दो-चार क्यारियाँ हो

फूलों से लदी सजी

और दौड़ लगाती गिलहरियाँ।

क्या कहते हो

इन सबके लिए

जरूरत होगी

मिट्टी की

अपनी मिट्टी

 

मैं और तुम  

 

मैं

मिलना चाहता था

तुमसे

जैसे

वेग से बहती

कोई नदी

मिलती है

सागर से

तुम मिलती रहीं

मुझसे

जैसे मिल आती हैं

सागर की लहरें  

किनारे की रेत से !

 

दुख  

 

पहाड़ ने देखा था

खुद को

बारूद से

नष्ट होते हुए

 

उतारी थी

फिर उसने

अपने सीने से

वो नदी नहीं

बह चली थीं

एक साथ

कई-कई

अश्रुधाराएँ !

 

सुनवाई    

 

कुछ मत कहना

उनके सामने

वो इल्जाम लगा देंगे तुम पर

बहस करने का

बस खड़े रहना

हाथ बांधे

जैसे खड़े रहते हैं मुजरिम

 

कौन दोषी है

कौन नहीं

तय करते हैं

वो खुद  

वो नहीं समझते

किसी गवाह की जरूरत

कहते हैं वो प्रतिबद्ध है 

न्याय के लिए !

 

बूझो तो  

 

वहाँ रेल की पटरी है

उसके बायीं ओर है

एक झुग्गी-झोंपड़ी बस्ती

दायीं ओर

कुछ दूर से

शुरू होती है

एक आलीशान कॉलोनी ।

 

दिन भर गुजरती

उस पटरी से

जाने क्यों

कोई गाड़ी

पहुंचा न सकी

किसी व्यक्ति को

दायीं से बायीं ओर !