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Thursday 18 Jan 2018

कुछ दिन पहले

कुछ दिन पहले इस किताब में, महक रहे थे बरक नये

जिल्दसाज तुम बतलाओ, वे सफे सुनहरे किधर गये

जहाँ इत्र की महक रवां थी, जलने की बू आती है

दहशत वाले बादल कैसे,आसमान में पसर गये

बूढ़ा होकर इंकलाब क्यों, लगा चापलूसी करने

कलमों को चाकू होना था, क्यों चम्मच में बदल गये

बंधे रहेंगे सब किताब में, मजबूती के धागे से

एक तमन्ना रखने वाले, बरक बरक क्यों बिखर गए

जिल्दों से नाजुक बरकों को, क्या तहरीर बचाएगी

क्या मजनून बदलने होंगे, गढऩे होंगे लफ्ज नए