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Tuesday 21 Nov 2017

जंगल राज

मीलों लम्बा चौड़ा एक बहुत घना जंगल है। उसमें एक शेर और एक शेरनी रहते हैं। शेर बाहर गया हुआ है। शेरनी लेटी हुई है। जून का महीना। तपती दोपहरी। कभी हवा का झोंका आ जाता है, तो कभी घंटों पत्ता तक नहीं हिलता। यह जंगल का पश्चिमी भाग है। उबड़-खाबड़ धरती, कहीं टीले, कहीं गड्ढे। कहीं लम्बी-लम्बी घास तो कहीं बांहों में बांहें डाले वृक्षों के झुरमुट। वहीं वृक्षों और झाडिय़ों के झुरमुट के पास एक बड़े से गड्ढे में, बायीं करवट किए हुए तरुण शेरनी लेटी हुई है। बहुत खूबसूरत लग रही है वह। छोटे-छोटे बालों वाली, बादामी रंग की, सुन्दर कालीन जैसी त्वचा, चौड़ा चेहरा, उठे हुए कान, सफेद लम्बी लम्बी मूंछें, बिजली के बल्ब जैसी चमकती मोटी-मोटी आंखें। धड़ का अधिकांश भाग बायीं ओर झुका हुआ है। चार गुलाबी छोटे-छोटे स्तन दिखाई दे रहे हैं। शेरनी के नन्हें दो बच्चे, आंखें कभी खोलते, कभी मिचमिचाते, अपने कोमल होठों से मां के स्तनों को चूंघ रहे हैं। जहां वह सोई हुई थी, उस स्थान से दो-चार कदम आगे, एक वृक्ष पर बैठे, तपती दोपहर में सुस्ताते बंदरों के समूह में से दो बंदरों के बच्चे फुदकते हुए पेड़ से नीचे उतरे। बड़ी देर से शेरनी के दोनों बच्चों को इतनी देर तक सुख-भोग करते उनसे देखा नहीं गया। वे दोनों पेड़ से नीचे उतरे, दबे पांव शेरनी के पास पहुंचे और अपने काम में व्यस्त शावकों की पीठ पर जोर से कई थप्पड़ मारकर फौरन भागकर पुन: वापस उसी वृक्ष पर जा चढ़े। शावकों का पेट अब तक भर चुका था। दूध पीना छोड़कर वे आसपास टहलने लगे। बंदरों द्वारा मारे गए थप्पड़ों का उन पर कोई असर नहीं हुआ। पास ही बरगद का एक पेड़ था। उसकी जड़ में एक छोटी सी खोड़ में एक गिलहरी रहती थी। दोनों अल्हड़ शावकों की हरकतों को और उनकी मखमली त्वचा को वह काफी देर से देख रही थी। वह खोड़ से बाहर निकली और स्केटिंग-सी करती हुई झट एक शावक के ऊपर जा जढ़ी। शावक को यह खेल अच्छा लगा। दोनों गिलहरी से लुका-छिपी खेलने लगे। जब गिलहरी भाग गई तो दोनों शावक आपस में खेलते हुए दूर जाकर लम्बी-लम्बी घास में छुप गए।
नींद की खुमारी में पड़ी शेरनी को अहसास हुआ कि उसके बच्चे अब उसके शरीर से सटे हुए नहीं है। आलस्य और तन्द्रा को उसने धीरे-धीरे उतारा। आंखें मिचमिचाई, लम्बी मूंछों को हिलाया और अंगड़ाई लेकर खड़ी हो गई। उसने पूरा जबड़ा खोला और जोर से भीतर की सांस को बाहर फेंका। तभी उसकी लयबद्घ सांसों से उफनती-दबती सुन्दर देह पर बैठी पांचों चिडिय़ा 'फुर्र’ से उड़ गई। शेरनी ने अपनी बड़ी-बड़ी आंखें पूरी खोलकर इधर-उधर देखा और एक बार फिर नथुने फुलाकर इतने जोर से 'घुर्रऽरऽर’ की आवाज के साथ सांस छोड़ी कि देर तक उस वन क्षेत्र की हवा थर-थर कांपती रही। उसके बाद उसने अपना सिर ऊपर उठाकर आकाश की ओर देखा। वृक्षों की छाया में से दिखाई देते टुकड़े-टुकड़े आकाश पर उसने एक उचटती हुई निगाह डाली और फिर चौड़े नथुने फुलाकर दूर-दूर तक व्याप्त गंध को उसने अपने अंदर आत्मसात कर लिया। उसके भीतर बसी हुई उसके शावकों की गंध को उसने पकडऩे की चेष्टा की। यह उसकी सूंघने की शक्ति का परिणाम था या उसकी छटी इन्द्री से प्राप्त संदेश, यह तो पता नहीं, परन्तु हवा को सूंघने के बाद शेरनी को विश्वास हो गया कि उसके दोनों शावक किसी संकट में नहीं है। लेकिन उसका अपना शेर?... कहां होगा?... क्या कर रहा होगा?... कब तक लौटेगा?... इन प्रश्नों का उत्तर वह ढूंढ पाई या नहीं, इसका किसी को पता नहीं परन्तु उसका अपना शेर उसे बताकर गया था कि वह छ: किलोमीटर दूर जंगल के मध्य क्षेत्र में बहने वाली बड़ी नदी में जलक्रीड़ा करने जा रहा है। शेरनी पहले से जानती थी कि उसका प्रिय शेर स्वभाव से स्वच्छन्द प्रकृति का है। शेर जो ठहरा! हर दिन उसके लिए मौजमस्ती भरा वीक-एंड होता है। वन में शेरों के लिए भोजन की कोई कमी नहीं। भैंसा मिले या हिरन, भेड़ मिले या बकरी, जेब्रा मिले या कोई अन्य जानवर। चाहे झुंडे में से हो, चाहे इक्का-दुक्का जंगल में घूमता हुआ। किसी न किसी जंगली जानवर का शिकार तो मिल ही जाता है।
परन्तु वन की संस्कृति यह है कि प्राय: सब पशु झुंड बनाकर चलते हैं और झुंड बनाकर रहते हैं- अपनी रक्षा के लिए। झुंड में नर भी होते हैं और मादा भी। शेरों के समाज में भी यह प्रचलन है कि जंगल में विचरण के लिए जा रहे शेरों के झुंड में शेर भी होते हैं और शेरनियां भी। परन्तु शेरनियां शेरों के झुंड में तब शामिल होती हैं, जब झुंड में कई शेरनियां हों। एक अकेली शेरनी नर शेरों के झुंड में विचरण के लिए नहीं जाती।
शेर शेरनियों के समाज की एक और विशेषता है कि प्राय: शेरनी कई-कई शेरों को नहीं अपनाती है। वह सामान्यत: अपने एक ही शेर के साथ तब तक रहती है जब तक उसका अपना शेर उसे छोड़ कर किसी अन्य के साथ न चला जाए या मर न जाए। अपवाद बहुत कम हैं। अपने नर के प्रति वफादारी निभाने वाले जीवों में उसका भी शुमार है। नागवार लगने पर भी शेरनी अपने शेर का साथ नहीं छोड़ती। एक परिस्थिति जरूर ऐसी है, जिसमें शेरनी कुछ अर्से के लिए अपने शेर को अपने से दूर रखती है, और तब वह है जब प्रसव के बाद शेरनी को अपने नन्हें शावकों को शेर के मुंह से बचाना होता है। ममता शेर में नहीं, शेरनी में होती है। प्रजनन के बाद अपनी संतान की रक्षा करने का दायित्व प्रकृति ने मां को ही सौंपा है।
शेरनी अभी तक घास पर टहल रही है। कभी आकाश को देखती है, कभी पक्षियों को, कभी झाडिय़ों में से निकलकर भागते खरगोश को तो कभी नेवले को। शाम को जंगल में हलचल बढ़ जाती है। सब पशु-पक्षी अपने-अपने रैनबसेरों की ओर लौटने लगते हैं। दिन भर की रुकी हुई हवा अब हल्के झोकों में बदल गई है। शेरनी को अपने बच्चों की याद आ रही है- 'अब तक उन्हें आ जाना चाहिए’- वह सोच रही है।
अचानक यह क्या हुआ!!!- शेरनी भौंचक रह गई! पल दो पल में ही कुछ से कुछ हो गया, हिरनों का एक छोटा समूह, बहुत चौकन्ना, हवा से बातें करता, बड़ी-बड़ी कुलांचें भरता, धूल उड़ाता हुआ तेजी से पूरब की दिशा से आया। अचानक सामने शेरनी को देखकर वह बिजली के तेज गति से, पश्चिम की बजाय दक्षिण की ओर मुड़ गया।
खुले आकाश के नीचे, ऊंची-ऊंची घास में छुपकर एक बूढ़ा चीता देर से घात लगाए बैठा था। बहुत अधिक दूर से उसने कुलांचे भरते, भागते हिरनों के उस झुंड को देखा- 'शिकार अच्छा है।‘ वह सरपट दौड़ा उस ओर। चीते की सरपट दौड़ से हवा में हुई तेज हलचल से घबराकर हिरणों के झुंडे के सरदार ने पीछे मुड़कर देखा। ओह! अब क्या करें?- उसने सांकेतिक ध्वनि से पूरे झुंड को 'मृत्यु निकट है’ बता दिया। इतने में चीता अपने शिकार के बिल्कुल निकट पहुंच गया। मृत्यु सामने पाकर हिरनों की टांगों में गजब की गति आ गई। एक गर्भवती हिरनी कुछ पीछे रह गई। चीते ने उसी को दबोचना चाहा। हिरनी और भी अधिक तेजी से भागी। चीते को अपने बिल्कुल निकट पाकर गर्भवती हिरनी बौखलाहट में उधर भागी जिधर वह बड़ा सा गड्ढा था जिसमें शेरनी दिनभर लेटी रही थी। चीते ने जोर से झपट्टा मारा। हिरनी की आंखों के आगे अंधेरा छा गया। उसका पूरा शरीर दहशत से इतने जोर से कांपा कि उसका गर्भस्थ शिशु एक झटके के साथ उसी गड्ढे में जा गिरा। प्रकृति का विधान ऐसा है कि चरम संकट को सामने पाकर प्राणी में एक अद्भुत, असाधारण शक्ति न जाने कहां से आ जाती है जो सामान्य अवस्था में कभी नहीं आ पाती। उस समय भी ऐसी ही हुआ। हिरनी बिजली की गति से भागी। चीता हिरनी की प्रजनन क्रिया से क्षण भर तो स्तब्ध होकर पल भर के लिए ठिठक कर फिसला। इतने में हिरनी चीते के चंगुल से बच निकली।
उस तूफानी भाग दौड़ में हिरनी की चेतना अद्र्घविक्षिप्त जैसी थी। उसे बिल्कुल याद नहीं आ रहा था कि उसका बच्चा कहीं गिरा था, वह उसे कहां ढूंढे। प्रसव के बाद पलभर को भी उसने न तो अपने बच्चे को छुआ, न देखा, न शरीर से लगाया, इसलिए उस मृगछौने के प्रति ममता और अनुराग का भाव उसमें जागृत ही नहीं हुआ। हिरनी का नवजात मृगछौना जहां गिरा था, वहीं पड़ा रहा। वह उठकर खड़ा नहीं हो सकता था। अपनी मोटी-मोटी, चमकीली आंखों से वह क्या निहार रहा था, उसे स्वयं पता नहीं। उसकी सांस चल रही थी और होंठ... ऐसे हिल रहे थे जैसे स्तनपान कर रहे हों।
इस पूरे घटनाक्रम को शेरनी ने क्षणिक उत्तेजना से देखा। पलभर में ही उसका ध्यान वहां से हट गया। ऐसे दृश्य जंगल में प्राय: दिखाई देते रहते हैं। किसी पशु का शिकार करना या किसी पशु को किसी अन्य का शिकार बनते हुए देखना जंगल में एक सामान्य बात है।
शेरनी के दोनों शावकों को गए हुए बहुत देर हो चुकी थी। सूर्य छिपने को था। वह मन ही मन अपने दोनों बच्चों के आने का इंतजार कर रही थी। तभी परस्पर लड़ते-भिड़ते, खेलते शावक वहां आ पहुंचे। बच्चों के दो ही काम होते हैं- खेलना और मां का दूध पीना। शेरनी चुपचाप खड़ी, दूर से आकर पेड़ पर बैठी 'चीं-चीं’ चिल्लाती चिडिय़ों का शोर सुन रही थी। दोनों शावक उचक-उचक कर शेरनी के स्तनों से खिलवाड़ करने लगे। शेरनी उन दोनों की तरफ देखकर प्यार भरे गुस्से के साथ नथुने फुलाकर गुर्राई। पलभर बाद उन्हें दूध पिलाने के लिए वह बायीं करवट लेट गई। शावकों ने तुरंत स्तनपान शुरू कर दिया।
जहां शेरनी थी, उस जगह से केवल पांच-छ: इंच दूर उस दुर्भाग्यशाली हिरनी का वह मृगछौना पड़ा था जो उसका होने पर भी उसका नहीं हो सका। वह सर्वथा लावारिस पड़ा था। शेरनी को इस बात का बिलकुल पता नहीं था। बेतहाशा भागती हिरनी के गर्भ से बच्चे के गिर जाने की घटना को शेरनी ने बेपरवाही से देखा था कुछ ही देर पहले जन्मा वह नन्हा मृगछौना वहां पड़ा है, इस बात का पता शेरनी को तब चला जब उसे अहसास हुआ कि उसके तीसरे स्तन को कोई पपोल रहा है। उसने सिर झुकाकर देखा- बहुत ही मुलायम छोटा सा प्राणी, छोटा सा मुंह, मोटी-मोटी चमचमाती आंखें, बहुत पतली छोटी-छोटी चार टांगे। वह पहचान गई कि यह हिरनी की बच्चा है। एक विजातीय का बच्चा!- इसे अपना दूध पिलाऊं या नहीं? यह प्रश्न शेरनी के मन में उठा न हो, यह तो हो नहीं सकता। परन्तु तत्काल उसके भीतर एक संवेदना जागी- एक मादा की संवेदना- एक बेहद छोटे शिशु के प्रति अनुराग और ममता की अनुभूति- जो पशुओं में अभी जिंदा है।
शेरनी ने न तो झटक कर मृगछौने के मुंह से अपने स्तन को हटाया और न अपने पैरों से मृगछौने को कुचला। वह पूरी आंखें खोलकर उस कोमल से मृगछौने को थोड़ी देर निहारती रही। उसके बाद उसने शावकों पर दृष्टि डाली। शावकों ने जब देखा कि कोई अन्य शिशु, किसी अन्य रूपाकार का, उनके एकाधिकार को छीन रहा है तो दोनों नथुनों से 'घुर्र-घुर्र’ की आवाज करते हुए मृगछौने की ओर बढ़े। शेरनी ने तुरंत अपने अगले दोनों पैरों के बीच से मृगछौने को छुपा लिया और अपनी लम्बी-लम्बी मूंछे हिलाकर पहले एक और फिर दूसरे शावक के कान में कुछ कहा। तभी दोनों ने मृगछौने पर आक्रमण करने का इरादा छोड़ कर उसे बार-बार सूंघना शुरू कर दिया। शायद शेरनी ने कहा है कि कि यह तुम्हारा मित्र है- तीसरा साथी है, परन्तु अभी बहुत छोटा है।
इस प्रकार मृगछौना बड़ा होने लगा। शावकों की तुलना में मृगछौने जल्दी बड़े हो जाते हैं। दो दिन में हिरनों के बच्चे उठकर खड़े हो जाते हैं परन्तु इतने कम समय में चलने-फिरने योग्य नहीं हो पाते। इसलिए शावकों के साथ ही मृगछौना भी शेरनी का दूध पीता रहा और शावकों के साथ खेलता रहा।
दो सप्ताह बीत गए। एक शाम दोनों शावक घनी घास के अंदर जाकर खेल रहे थे। अचानक पेड़ों पर बैठे पक्षियों ने उछलकूद मचाकर शोर मचाया। बंदर निचली टहनियों से कूदकर ऊंची टहनियों पर जा बैठे। शेरनी मृगछौने से खेल रही थी। पक्षियों का शोर और बंदरों की उछलकूद की ओर जैसे ही उसने ध्यान दिया, उसने देखा कि सामने से उसका अपना शेर लम्बे-लम्बे बालों से भरी अपनी गर्दन उठाए, चौड़े गद्दीदार पैरों से शाही चाल चलता उसी ओर आ रहा है। शेरनी ने गर्दन उठाकर उसे देखा। अपनी सफेद लम्बी मूंछें हवा में लहराई। उसकी आंखें चमक उठी। शेर पास आ गया। निकट आकर उसने शेरनी को सूंघा। शेरनी से सटकर दो मिनट खड़ा रहा रहा। फिर न जाने क्या हुआ कि एक भयावह आवाज के साथ शेरनी से सटकर खड़े एक छोटे से हिरन के बच्चे पर उसने झपट्टा मारा और अपने लम्बे पैने दांत उसकी कोमल गर्दन पर गड़ा दिए। गर्दन से लहू टपकने लगा। शेर मृगछौने की गर्दन मुंह में दबाए उसे घसीटकर दूर ले गया एक पेड़ के नीचे। वहां बैठकर उसने मृगछौने का पूरा मांस बड़े स्वाद से खाया। उसके लिए वह सिर्फ एक जंगली जानवर था। संवेदनाओं से उसका कोई संबंध नहीं था।
शेरनी ने उधर देखा जिधर कुछ पल पहले उसका मृगछौना उससे खेल रहा था। कई दिनों के प्रवास के बाद उसका प्रिय शेर उसके पास लौटकर आया था। उसकी हर नागवार हरकत को वह सहन करती रही है, परन्तु मादा होकर भी आज पहली बार वह क्रोधित होकर शेर की ओर मुंह करके जोर से गुर्राई।