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Sunday 19 Nov 2017

नन्हा सिपाही

चिंगीज़ अइत्मातोव (1928-2008) किर्गीज़स्तान के सर्वश्रेष्ठ लेखकों में से हैं जिन्होंने किर्गीज़ और रूसी दोनों ही साहित्यों को एक साथ समृद्ध किया है। इसलिए आपकी गिनती द्विभाषी लेखकों में की जाती है। किर्गीज़ भाषा में लिखीं अपनी रचनाओं का आपने स्वयं ही रूसी में अनुवाद किया है। किर्गीज़ भाषा से लिखना शुरू करने के बाद आप रूसी भाषा में ही लिखने लगे। इसलिए यह कहना अनुचित नहीं होगा कि मुख्यत: रूसी भाषा के माध्यम से ही आप विश्वविख्यात लेखक बने। नन्हा सिपाही एक छोटे बच्चे की कहानी है जिसके पिता युद्ध में शहीद हो चुके हैं।

मूल रूसी से अनुवाद: किरण सिंह वर्मा, रूसी अध्ययन केन्द्र, जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय, नई दिल्ली-110067

उसने अपने पिता को पहली बार फिल्म के पर्दे पर देखा था। उस समय वह करीब पाँच साल का था।
यह घटना सफेद भेड़ों के उस बाड़े की है जहाँ हर साल भेड़ों की ऊन उतारी जाती थी। भेड़ों का वह बाड़ा सड़क के नज़दीक, पहाड़ की तलहटी पर राजकीय फ़ार्म में गाँव के उस पार आज भी मौजूद है। वह वहाँ अपनी माँ के साथ दौड़ कर आया था। उसकी माँ याएन्गुल गाँव के डाकखाने में टेलीफोन आपरेटर का काम करती थी। हर साल गर्मियों में जब ऊन उतारने का मौसम शुरू होता था तब वह अस्थायी रूप से भेड़शाला में काम करने लगती थी। इस काम के लिये वह छुट्टी लेकर आती थी और ऊन उतारने का काम पूरा होने के आखिरी दिन तक वहीं रहती थी। वहाँ वह ठेके पर काम करती थी, इसलिये उसका यह निर्णय व्यर्थ नहीं जाता था। सिपाही की पत्नी होने के नाते उसके लिये एक-एक कोपेक कीमती था। बेशक, उसका परिवार बड़ा नहीं था - एक वह स्वयं थी और दूसरा उसका बेटा था। पर बात तो वही है - परिवार तो परिवार ही है, कपड़े-लत्ते, जूते आदि तो .... चाहिये ही होते हैं। हाँ, आपको बहुत-कुछ चाहिये होता है।
उसके बेटे को घर पर अकेले ही रहना पड़ता था, इसलिये वह उसे अपने साथ काम पर ले आती थी। वहाँ वह धूल से सना चेहरा लिये हँसता-खेलता गड़रियों और उनके कुत्तों के बीच दिन भर इधर-उधर दौड़ता रहता था।
भेड़ों के बाड़े के अहाते में प्रवेश करती हुई चलती-फिरती सिनेमा की गाड़ी को उसने पहले-पहल देखा था और इस विचित्र घटना का समाचार सबसे पहले उसी ने सब जगह फैलाया था।
''सिनेमा आ गया! सिनेमा आ गया!" - वह चिल्लाया था।
सिनेमा काम खत्म होने के बाद शुरू हुआ जब अँधेरा हो गया था। वह युद्ध के बारे में था।
बालक ने और उसकी माँ ने सबसे पीछे ऊन के गट्ठरों के ऊपर अपने लिये जगह ढूँढ ली थी। वहाँ बैठ कर अच्छी तरह दिखाई दे रहा था। वैसे, वह सबसे आगे वाली पंक्ति में बैठना चाहता था जहाँ पर्दे के आसपास लड़कों की टोली इकठ्ठा हो गई थी। वह उनकी तरफ बढऩे लगा तो उसकी माँ ने उसे टोक दिया -
''बहुत हो गया। दिन भर तो इधर-उधर भाग रहा है। अब मेरे पास बैठा रह।"
माँ ने उसे अपनी गोदी में बिठा लिया।
सिनेमा-प्रोजेक्टर किट्-किट् कर चल पड़ा और युद्ध शुरू हो गया। सभी लोग भावुक होकर देख रहे थे। बालक की माँ गहरी साँस लेती हुई फिल्म को देख रही थी। बीच-बीच में वह मारे डर के सिहर उठती थी और अपने बेटे को कस कर पकड़ लेती थी। वास्तव में उसके लिये ये सब डरने की बातें नहीं थीं। इसके विपरीत, सच तो यह है कि उसे यह सब अजीब लग रहा था क्योंकि फासिस्ट लोग युद्ध में मारे जा रहे थे। और जब हमारे सिपाहियों में से कोई मर कर गिर पड़ता था तो उसे लगता था कि वह अभी फिर से खड़ा हो उठेगा। आम तौर पर तो युद्ध में लोगों का मारा जाना खेल जैसा लगता है। वैसे ही जब बच्चे लड़ाई-लड़ाई खेलते हैं, वह खुद को भी उसी तरह गिरा देते हैं। इससे थोड़ी चोट तो जरूर लगती थी पर यह इतना कष्टदायक नहीं होता था। बस, उसे फिर से उठना होता था और वह फिर से वार करने को तैयार हो जाता था। पर पर्दे पर के लोग तो फिर नहीं उठे। वे लोग मैदान में ऐसे ही पड़े रहे। वह तो अलग ही तरह से मारा जाता था, जैसे कि गोली हमेशा सीधे उसके पेट पर आकर लगती थी। फिर वह स्वयं ही घोषणा कर देता था कि वह मरा नहीं है और फिर से लडऩे को तैयार हो जाता था। पर वे लोग तो उठ कर फिर लड़ नहीं रहे थे।
युद्ध चलता रहा। सिनेमा प्रोजेक्टर ने रोशनी फेंकी। फिर तोप चलाने में कुशल सैनिक पर्दे पर दिखाई दिए। कुल मिला कर सात सैनिक थे जिनमें से एक रूसी जैसा नहीं लग रहा था। लड़के का ध्यान उसकी ओर शायद ही जाता अगर उसकी अम्मी ने कुछ ऐसा न कहा होता - 'देख, वह तेरे अब्बा हैं।" - अम्मी ने बेटे के कान में फुसफुसा कर कहा था।
उसी क्षण से बालक के लिये वह आदमी उसका अब्बा हो गया। अब तो सारी फिल्म इसी को लेकर थी, उसके अब्बा के बारे में। उसके अब्बा काफी जवान लग रहे थे, बिल्कुल गाँव के बालकों की तरह। वह कोई खास लम्बे नहीं थे, उनका चेहरा गोल था और आँखों में तेज था।
''अम्मी, क्या वही मेरे अब्बा हैं?" - अवेलबेक ने अपनी अम्मी से पूछा।
''क्या-आ? चुपचाप बैठ कर सिनेमा देख!"
''पर तुमने ही तो कहा था वह मेरे अब्बा हैं।"
''बिल्कुल हैं। वह तेरे अब्बा ही हैं। अब बोलना बन्द कर! लोगों को परेशान मत कर।"
अम्मी ने ऐसा क्यों कहा? आखिऱ क्यों? शायद, उन्होंने उस क्षण बिना सोचे-समझे ऐसे ही कह दिया था, शायद वह इतना खो गई थीं कि उन्हें पति की याद हो आई थी। बालक को तो इसी बात पर विश्वास हो गया था जिससे आह्लादित होकर वह आशातीत उमंग और अपार खुशी के मारे पागल-सा हो गया था। जैसा कि हर बच्चे को होता है, उसे भी अपने सैनिक पिता पर गर्व था। पिता हो तो ऐसा हो! यह सोच कर दूसरे लड़के उसे चिढ़ाते थे कि उसके पास पिता हैं ही नहीं। अभी तो इन सबको देखने दो! गड़रियों को भी। इन गड़रियों ने उस बालक को कभी भी अच्छे-से जानने की कोशिश नहीं की थी। पर अब सभी गड़रिये, एक-एक गड़रिया, निश्चय ही, उससे पूछेगा -
''क्या नाम है तुम्हारा?"
''अवेलबेक।" - वह जवाब देगा।
''तुम किसकी औलाद हो?"
'मैं तोक्तासुन का बेटा हूँ।"
यह सुन कर गड़रिये सकते में पड़ जाएँगे। समझ नहीं पाएँगे कि यह किसके बारे में बात कर रहा है।
''तोक्तासुन?" - वे लोग आश्चर्य प्रकट करेंगे। - ''ये तोक्तासुन कौन था, भई?"
उसकी माँ ने उसे ऐसे ही जवाब देना सिखाया था और उसकी अंधी दादी ने उससे कहा था कि अपने पिता का नाम कभी मत भूलना।
''ओहो, जऱा रुको। तुम तो उस डाकखाने की टेलीफोन आपरेटर के बेटे हो ना?"
'नहीं, मैं तोक्तासुन का बेटा हूँ।"
अपनी बात पर अड़ा रह कर वह कहता चला गया।
अब तो गड़रिये उलझन में पड़ गए कि मामला क्या है।
''अच्छा, तो तुम तोक्तासुन के बेटे हो, अच्छे बच्चे। बात का बुरा मत माना करो, हम सारे साल पहाड़ों पर काम करते हैं, उस समय जब तुम बच्चे यहाँ बढ़ते रहते हो। इसलिये सभी बच्चों को पहचानना हमारे लिये मुश्किल होता है।"
फिर गड़रिये आपस में बच्चे के पिता को याद करने लगे कि वह कौन है। उनकी खुसर-पुसर चल रही थी कि वह बहुत कम उम्र का था जब वह युद्ध के मोर्चे पर चला गया था, ज्यादातर लोगों को उसकी याद तक न थी। लेकिन अच्छा है कि अपने पीछे वह एक बेटा छोड़ गया क्योंकि युद्ध के मोर्चे पर जाने वालों में बहुत-से कुआँरे भी थे जिनका वंश चलाने के लिये कोई नहीं बचा है।
उस क्षण से जब से उसकी अम्मी ने उसके कान में फुसफुसाया था कि ''देख, वह तेरे अब्बा है", पर्दे पर का वही आदमी उसका पिता बन गया था। बच्चा उसी आदमी को अपना पिता मान चुका था। वैसे, सच में ही, फिल्म में दिखाए गए युवा सैनिक की शक्ल उसके पिता से बहुत अधिक मिलती थी जिनकी फोटो बड़ी करके शीशे के फ्रेम में लगा कर दीवार पर टांगी हुई थी।
तब से अवेलबेक अपने उस पिता को बेटे की ही नजऱ से देखने लगा था। इस समय भी बच्चे के दिल में अनजाना-सा संतान-धर्म और पुत्र-प्रेम भावुक ज्वार-भाटे की तरह उमड़ रहा था। कुछ ऐसा लग रहा था जैसे कि उसके पिता पर्दे के अन्दर से यह महसूस कर रहे हों कि उनका बेटा उन्हें देख रहा है और वह अपने आप को दिखाना चाह रहा था, अपनी कुछ पल की अनुपस्थिति के जरिये, इस तरह कि उनका बेटा हमेशा के लिये याद रखे और उनके सैनिक होने पर उसे गर्व हो। इस क्षण के बाद से लड़ाई में उसकी कोई रुचि नहीं रह गई थी। लोगों का मारा जाना उसके लिये मनोरंजक नहीं रह गया था। युद्ध अब बहुत विकट, अषांत और भयानक हो चला था। पहली बार उसे किसी अपने के लिये भय-सा महसूस हुआ, उसके लिये जिसकी कमी उसने हमेशा महसूस की थी।
फिल्म प्रोजेक्टर चलता जा रहा था और युद्ध भी जारी था। सैनिक अपने सामने टैंकों को करीब आते देख रहे थे। उनकी संख्या बहुत अधिक थी। सब कुछ बहुत भयावह होता जा रहा था।
बालक को लग रहा था जैसे कि वह स्वयं युद्ध की गर्जनाओं के बीच उपस्थित हो। अपने सैनिकों को गिरता हुआ देख कर वह शांत-सा हो गया था। अपने सैनिक लगातार कम होते जा रहे थे।.... उसकी माँ रो रही थी, उसका चेहरा गीला और गर्म था।
फिल्म प्रोजेक्टर चलता जा रहा था और युद्ध भी जारी था। लड़ाई तेज होती जा रही थी। नए सैन्य-बल और टैंक पास आते जा रहे थे। एक और जवान शहीद हो गया। अब सिर्फ दो ही बचे थे - उसके पिता और एक दूसरा सैनिक। सिर्फ एक सैनिक युद्ध के मैदान से उठा था। वह उसके पिता ही थे। वह अभी भी जीवित थे। धीरे से मैदान से उठ कर वह टैंक की तरफ चल दिए। उनके हाथ में एक हथगोला था।
उसकी माँ ने अपने हाथों को इतनी सख्ती से जकड़ लिया कि उसकी साँस फूलने लगी। बालक उठना चाहता था और भाग कर पिता के पास जाना चाहता था। लेकिन उसके पिता कटे हुए पेड़ की तरह गिर पड़े थे। उसके पिता ने एक बार खड़े होने की कोशिश की पर फिर से अपनी बाँहें फैला कर वह ढेर हो गए थे।
सिनेमा प्रोजेक्टर बंद हो गया और युद्ध भी एकाएक रुक गया। फिल्म का पहला भाग समाप्त हुआ था। फिल्म दिखाने वाले ने बत्तियाँ जला दीं।
जैसे ही भेड़ों के बाड़े में रोशनी भर गई सबकी आँखें चौंधिया गईं। लोग आँखों को झपकाने लगे। फिल्म की दुनिया से, युद्ध की दुनिया से अपनी जिंदगी की तरफ वापस लौट आए थे। उसी क्षण वह बालक ऊन के गट्ठर से फिसलते हुए नीचे को आ गया और मानो विजेता के रूप में हर्षातिरेेक से चिल्ला उठा - ''लड़को, ये मेरे अब्बा थे! देखा ना? वही मेरे अब्बा थे जिनको उन्होंने मार डाला।"
किसी को भी यह अनुमान न था, न ही वे कुछ स्पष्ट कर पा रहे थे कि अभी-अभी क्या घटित हुआ था। बालक खुशी से चिल्लाते हुए पर्दे की तरफ भागा, पहली पंक्ति की तरफ जहाँ उसके हमउम्र दोस्त बैठे हुए थे। वह खास तौर से उनके पास गया जो उसके करीबी थे। भेड़ों के बाड़े में एक अजब-सा सन्नाटा छा गया था। बालक को एक बेतुकी खुशी का अहसास हुआ जो पहली बार अपने पिता को देखने पर हुआ था। उसकी यह खुशी अभी तक दूसरे लोगों तक नहीं पहुँच पाई थी। किसी को कुछ भी समझ नहीं आ रहा था। सभी लोग विभ्रम में उलझे हुए चुपचाप बैठे थे और कंधे उचकाए जा रहे थे।
फिल्म चलाने वाले ने फिल्म का बक्सा उतार कर नीचे रख दिया। पर नन्हा सिपाही अर्थात् उस शहीद हुए सैनिक का बेटा सब लोगों को यकीन दिलाने की कोशिश करता जा रहा था-
''आपने उन्हें देखा! वह मेरे पिता थे!.... उन लोगों ने उन्हें मार डाला!"
वह बालक जितना ही अधिक उत्तेजित हो रहा था, बाकी लोग उतनी ही अधिक चुप्पी धारण करते जा रहे थे। बालक को यह समझ में नहीं आ रहा था कि बाकी लोग उतना खुश क्यों नहीं दिखाई दे रहे हैं जितना कि उसे अपने पिता पर गर्व हो रहा था।
लोगों ने उसे सच्चाई बताने का निश्चय कर लिया।
''वह तेरे पिता नहीं थे। इतना शोर क्यों मचा रखा है तूने? निश्चय ही, वह तेरे अब्बा नहीं थे, वह तो एक अभिनेता था। जाकर फिल्म वाले से पूछ ले।"
पर बुजुर्ग लोग बालक के उस कटु, किन्तु असाधारण विभ्रम को भंग नहीं करना चाहते थे, उन्होंने सोचा कि प्रोजेक्टर चलाने वाला सही-सही बता कर बालक को अपने रास्ते पर ले आएगा। वे उसकी ओर देख रहे थे, पर वह शांत बना रहा। वह तो अपने प्रोजेक्टर को सँभालने में लगा हुआ था और ऐसे दिख रहा था जैसे कि बहुत व्यस्त हो।
''नहीं, वह मेरे पिता थे! मेरे अब्बा थे!" - बालक ने विचलित होकर कहा।
''कौन-से थे तेरे पिता? कौन-से?"- बालक के एक पड़ोसी ने उसे चुनौती देते हुए पूछा।
''वही जो टैंक तक हथगोला लेकर गए थे। आपने क्या सच में उन्हें नहीं देखा? वह इस तरह गिर पड़े थे।"
ऐसा कह कर बालक ने अपने आप को नीचे गिरा दिया और अपने पिता की तरह पल्टी खाकर दिखाई, जैसे कि उसके पिता ढेर हो गए थे। बालक ने बिल्कुल वैसा ही करके दिखाया जैसा कि पर्दे पर घटित हुआ था। वह पर्दे के सामने अपने हाथ फैला कर लेट गया।
दूसरे लोग अपने आप को रोक न पाए और उनकी हँसी फूट गई। बालक वहीं पड़ा रहा, जैसे कि मर ही गया हो, बिना हँसे। फिर वहाँ एक अजब सन्नाटा छा गया।
''यह सब क्या है? जयनगुल, तू क्या कर रहा है?" - गड़ेरिन ने उसे डाँटते हुए कहा। सबने देखा कि उसकी माँ आँखों में आँसू भर कर दृढ़तापूर्वक अपने बेटे की तरफ आगे बढ़ी। उसने अपने बेटे को ज़मीन पर से उठाया।
''चल, बेटा, चलें। यही तेरे अब्बा थे।" - माँ ने धीमे से कहा। अपने बेटे को लेकर वह उसे भेड़ों के बाड़े से बाहर ले गई।
चाँद आसमान की ऊँचाई पर आ गया था। पहाड़ों की चोटियाँ गहरी नीली रात में शोभायमान हो रही थीं। नीचे घाटी में घुप्प अँधेरा छाया हुआ था। उसी क्षण, अपने जीवन में पहली बार, उस बालक को कुछ खोने का कड़वा अहसास हुआ। उसे अचानक ही असह्य आघात लगा, वह घोर पीड़ा से भर उठा और अपने पिता की मौत को देख कर उसे दुख का अनुभव हुआ। उसे अकस्मात् ही अपनी माँ के साथ लिपटने का मन हुआ और रोने को जी चाहा। वह चाहता था कि माँ भी उसके साथ मिल कर रोए। पर वह एकदम चुप थी। इसलिये उसने भी मुट्ठी  भींच कर और अपने आँसुओं पर काबू पाकर चुप्पी साध ली।
उसे आभास ही नहीं हुआ कि उसके पिता जो अभी कुछ समय पहले युद्ध में शहीद हुए थे इसी क्षण उसके अन्दर प्रविष्ट होकर जीवित हो उठे थे।