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Friday 15 Dec 2017

असल में मेरा अपना परिचय क्या है? मुद्दतों सोचूं तो भी एक ही निष्कर्ष निकलेगा कि मैं शुरू से लेकर आखीर तक बस पढ़ता ही रहा।

इस बार भी मैं हाल में पढ़ी एक नई पुस्तक की चर्चा करना चाहता हूं। उसके पहले मन हो रहा है कि देश के प्रकाशन व्यवसाय पर एक टिप्पणी करूं। ऐसा करने से मूल विषय से थोड़ा भटक जाने का खतरा तो है तथापि एक लेखक के अथक परिश्रम और प्रकाशक की व्यापारी दृष्टि दोनों के बीच जो संबंध है वह कुछ स्पष्ट हो पाएगा। मेरा मानना है कि हमारे हिन्दी प्रकाशकों में अमूमन उद्यमशीलता तथा कल्पनाशीलता का अभाव है। गो कि बीच-बीच में कुछ अपवाद सामने आते हैं। उद्यमशीलता से मेरा तात्पर्य जोखिम उठाने की क्षमता, दीर्घकालीन दृष्टिकोण और धीरज जैसे गुणों से है। सच्चे अर्थों में जो उद्यमी होगा उसकी निगाह अपने उपक्रम की विश्वसनीयता कायम करने और तुरत-फुरत मुनाफा कमाने के बजाय लम्बे समय तक लाभ लेने की ओर होगी। जिसमें यह क्षमता नहीं है वह तत्कालीन प्राप्तियों से भले प्रसन्न हो ले, पुस्तकों की दुनिया में वह अपनी साख कायम नहीं कर सकता। पुस्तक प्रकाशन के व्यवसाय में कल्पनाशीलता भी एक आवश्यक तत्व है। वर्तमान में कहां-क्या लिखा जा रहा है, क्या प्रकाशन योग्य है, कैसे नए नामों को आगे लाया जाए, पाठकों को पुस्तकों की ओर आकर्षित कैसे किया जाए, ये सब विचारणीय बिन्दु हैं। इनके अभाव में ही पुस्तकों के प्रति हिन्दी समाज की रुचि समाप्त हो रही है।
मेरे सामने ...और यूं तारे बने शीर्षक पुस्तक है जिसके लेखक अली एम. सैयद हैं जो जगदलपुर, बस्तर के एक शासकीय महाविद्यालय में प्रोफेसर हैं। इस पुस्तक का प्रकाशन भी शासकीय काकतीय स्नातकोत्तर महाविद्यालय जगदलपुर ने किया है। यह संभवत: पहली बार है जब छत्तीसगढ़ में किसी कॉलेज ने अपने एक प्राध्यापक की पुस्तक प्रकाशित की है। पुस्तक में लेखक का जो संक्षिप्त परिचय है उससे पता नहीं लगता कि वे किस विषय के लेखक हैं। यह अवश्य ज्ञात होता है कि वे पैंतीस साल से सरकारी कॉलेजों में पढ़ा रहे हैं। अपने बारे में बहुत संकोच के साथ लेखक इतना ही लिखता है-
असल में मेरा अपना परिचय क्या है? मुद्दतों सोचूं तो भी एक ही निष्कर्ष निकलेगा कि मैं शुरू से लेकर आखीर तक बस पढ़ता ही रहा। जिन्दगी कस्बे से शुरू होकर कस्बों तक महदूद रही और नौकरी मिली भी तो पढ़ाने की... सो जो कुछ भी कमाया और गंवाया, वो सब किताबों और हर्फों के दायरे के अंदर। लेकिन श्री अली एक दृष्टिसम्पन्न अध्यापक हैं तथा सामाजिक सरोकारों की गहरी चिंता करते हैं, यह भी हमें इसी परिचय की आखिरी पंक्ति से मालूम पड़ता है।
अब जा के जाना कि साधारण और सहज बने रहना भी कठिन कार्य है, जबकि दुनिया के तमाम संसाधन चंद हाथों में सिमटकर रह गए हों और बहुसंख्य आबादियां, बुनियादी अधिकारों के वंचन और अप्रतिष्ठा के भयावह संकट के दौर से गुज़र रही हों...
मेरा प्रोफेसर अली के साथ कोई परिचय नहीं है। उनके साथ कभी भेंट भी नहीं हुई। कुछ माह पूर्व बस्तर के ट्रेड यूनियन नेता शेख नजीमुद्दीन ने मुझे उनकी यह पुस्तक भेंट की थी। मेरे लिए यह निजी दुख का सबब है कि साथी नजीमुद्दीन का कुछ समय पूर्व निधन हो गया। यह एक अटपटी सच्चाई है कि बस्तर के हमारे मित्रों ने भी कभी प्रोफेसर अली का जिक्र नहीं किया। संभव है कि वे संकोची स्वभाव के हों तथा अपने लिखने-पढऩे के अलावा बाहर की दुनिया से वास्ता कम ही रखते हों। मेरा यह विचार गलत भी हो सकता है। हम अक्सर पाते हैं कि अंतर्मुखी व्यक्ति के सामने अभिव्यक्ति का संकट होता है। श्री अली पर यह आरोप नहीं लगाया जा सकता। वे विचार सम्पन्न तो हैं ही, उनके पास एक समृद्ध भाषा भी है। इससे एक दूसरा अनुमान लगता है कि लेखक अपना समय निठल्ले लोगों के बीच बिताने के बजाय आमजनों के बीच गुजारता हो, जिनसे उसने सहज सरल और प्रवाहमय भाषा पाई है।
...और यूं तारे बने का विषय अपने आप में नया है। इसमें विश्व के कई सारे देशों की लोकगाथाएं संकलित की गई हैं। यह स्वयं में कोई नई बात नहीं है। नयापन इसमें है कि लेखक ने हर लोकगाथा का बारीकी से विश्लेषण किया है। वह कहानी की चर्चा करते हुए तत्कालीन कालखंड का चित्र खींचता है, उस समय राजनैतिक परिस्थितियां क्या थीं, आर्थिक व्यवहार कैसा था, सामाजिक परिपाटियां क्या थीं, प्राकृतिक परिवेश क्या था और इन सबके बीच उस कहानी का जन्म कैसे हुआ, उसकी भावभूमि क्या है, उसका अंत कहां आकर होता है, ऐसे तमाम घटकों की विशद व्याख्या लेखक ने की है और इस तरह वह लोकगाथा को निरी भावुकता के धरातल से उठा व्यावहारिक जीवन की समर भूमि में लाकर स्थापित कर देता है। दो सौ पृष्ठों की इस पुस्तक में छियासठ लोककथाएं संकलित हैं और वे लैटिन अमेरिका, उत्तर अमेरिका, अरब, अफ्रीका, रूस से लेकर चीन, जापान, मंगोलिया और कोरिया तक की हैं।
इस संकलन में एक कहानी है किनतू-नाम्बी नाम की। किनतू इस धरती का आदि पुरुष है। उसके पास उदर पोषण के लिए एक गाय है। आकाश के शासक गुलू की पुत्री नाम्बी से उसका प्रेम होता है। एक तरफ ऊंचाई पर बैठा राजा, दूसरी तरफ धरती पुत्र। राजा को कैसे पसंद आएगा कि उसकी नाजों में पली बेटी एक गरीब से शादी करे सो वह किनतू की हर तरह से परीक्षा लेता है, जिसमें वह सफल होता है। राजा गुलू किनतू की चतुराई से प्रभावित हो अपनी हार मान लेता है। किनतू और नाम्बी का विवाह हो जाता है। इस मुख्य कथा में बहुत से प्रसंग हैं। इनका परीक्षण करते हुए लेखक इस नतीजे पर पहुंचता है- लेकिन किनतू और नाम्बी अपने भावी जीवन के लिए गाय, बछड़े के अतिरिक्त भेड़, बकरी, मुर्गी, रतालू और केला ही लेकर वापस होते हैं, जिससे इस तथ्य की पुन: पुष्टि होती है कि कथाकालीन समाज पशुपालक रहा होगा और उसने रतालू और केले के माध्यम से कृषक समाज होने की दहलीज में कदम रख दिया होगा। मोटे तौर पर यह प्रणय कथा पशुपालक जगत और कृषक जागतिकता के संधिकाल की कथा है।
राज हित एक चीनी लोककथा है। इसमें एक युवक है जो चीन की दीवार बनते समय बेगारी से बचने के लिए अंगूर के बगीचे में जाकर छुप जाता है। वहीं मालिक की बेटी से कालांतर में उसका प्रेम, फिर विवाह होता है। राजा के सैनिकों को पता चलता है तो वे उसे गिरफ्तार कर ले जाते हैं। वह बनती हुई दीवाल के नीचे दबकर मर जाता है। उसकी पत्नी के आर्तनाद से आसमान आहत हो जाता है, स्वर्ग उसके आंसुओं में बहने लगता है, दीवार का एक हिस्सा ढहता है, पति का शव बाहर निकल आता है, वह अपने मृत पति को देख पाती है, लेकिन पति अपने प्रिया को नहीं देख सकता, क्योंकि वह तो मर चुका है। कहानी यहां समाप्त होती है। लेखक यहां निम्न शब्दों में एक लम्बी व्याख्या करता है:- इसमें कोई आश्चर्य नहीं कि दुनिया के महान आश्चर्यों की बुनियाद रक्तरंजित है। आज उन्हें देखने, पर्यटकों की भीड़ लगी रहती है, निर्मित देखकर सब अश-अश करते हैं, पर कोई सोचता भी नहीं कि इसने कितने इंसानों का लहू खुश्क कर दिया है। कितने घर उजाड़ डाले थे और आज भी कमोबेश आत्मकेन्द्रित सुख ध्यानी ज्ञानी इंसानी लक्ष्यों के चरमोत्कर्ष, उसकी महानतायें, उसकी ही लाशों के ढेर पर खड़ी हुई हैं।
अहलिया गोया चांद शीर्षक कहानी में सूर्य और चंद्रमा को पति-पत्नी बताया गया है। सूर्य बदसूरत और झगड़ालू है, चंद्रमा सुंदर। सूर्य चंद्रमा पर अत्याचार करता है। अंतत: वह भाग निकलती है। सूर्य उसका पीछा करता है, लेकिन उसे पकडऩे से बार-बार चूक जाता है। इसी कहानी में जिक्र है कि उनका पुत्र एक बड़ा तारा था। सूर्य ने गुस्से में उसके टुकड़े-टुकड़े कर दिए थे जिससे आकाश के असंख्य तारे बने। इस कथा पर लेखक अली की टिप्पणी है कि इनका विवाह प्रेमवश न होकर परिवार द्वारा तय रहा होगा और पति की सतत आक्रामकता के विरुद्ध पत्नी को इसीलिए समाज से कोई संरक्षण नहीं मिलता। लेखक यहां दक्षिण पूर्व एशियाई समाज की एक अन्य लोक कथा की ओर ध्यान आकर्षित कराता है जहां एक स्त्री चावल के दानों को आकाश में बिखेर देती है, जिससे तारों का जन्म होता है। इस व्याख्या को पढ़ते हुए मुझे सहज ही तेजिंदर के उपन्यास काला पादरी का ध्यान हो आया जहां एक गरीब को आकाश के तारे चावल के दाने जैसा प्रतीत होते हैं।
कैलीफोर्निया के चेरॉकी आदिवासियों को सोने की खोज में निकले गौरांगों ने उनकी धरती से बेदखल कर दिया। सुफैद गुलाब शीर्षक कथा दो सौ या तीन सौ साल से अधिक पुरानी नहीं है। इसमें जब आदिवासी गौरवर्णी स्वर्ण पिपासुओं द्वारा बलपूर्वक खदेड़े जा रहे थे तब वे एक शाम अपने कबीले की देवी का आह्वान करते हैं। देवी उन्हें आश्वस्त करती है कि तुम्हारे कबीले का अंत नहीं होगा। कल एक पौधा उगेगा जिसमें सफेद रंग का गुलाब खिलेगा, जिसके बीच सुनहरे रंग का गुच्छा तुम्हें आताताइयों की हमेशा याद दिलाएगा और उस पौधे के कांटे नुकसान पहुंचाने वाले से तुम्हारी रक्षा करेंगे। यहां लेखक की टिप्पणी पर ध्यान दीजिए- उस कालखंड में यूरोपीय मूल के लोग जहां भी गए, उन्होंने अपनी पहुंच की धरती को कमोबेश रौंद ही डाला था, स्थानीय संसाधनों पर बलात कब्जेधारियों और लूट खसोट के उस दौर में सामूहिक अप्रवास के लिए विवश कर दी गई स्थानीय आबादियों को नितांत अप्राकृतिक/मानव लोलुपताजन्य कारणों से अपनी जड़ों से उखडऩा पड़ा था।
पुस्तक का शीर्षक जिस कथा से लिया गया है वह आस्ट्रेलिया की है। इसमें एक वृद्ध है जो समुद्र किनारे पर मछलियां पकड़ रहा है। निकट से गुजर रही दो युवतियों को देखकर वह उन पर जाल फेंकता है। एक युवती जाल से बचने के लिए समुद्र में कूद गई। वृद्ध उसके पीछे जलती लकड़ी लेकर समुद्र में कूदा। लकड़ी जैसे ही समुद्र की सतह से टकराई, रोशनी के कण आकाश में बिखर गए और इस तरह तारों का जन्म हुआ। इस कथा में समुद्र, मोती, मूंगा, शैवाल, समुद्री घास, केकड़ा, आक्टोपस इत्यादि का जो उल्लेख हुआ है उसे समेटते हुए लेखक मानता है कि प्राकृतिक संसाधनों पर स्थानीय अधिकारियों के हक की अवधारणा अत्यंत पुरानी है। इसी कहानी की व्याख्या करते हुए लेखक यह भी स्थापित करता है कि स्त्रियों में अंधकार को आलोकित करने की ऊर्जा निहित है। उसकी यह स्त्रीवादी व्याख्या अन्यत्र भी देखने मिलती है।
एक नाईजीरियाई कहानी है- चाह बर्बाद करेगी। इसमें मत्स्य कुमार तेंदुए का मित्र है और उसकी पत्नी से प्रेम करने लगता है। तेंदुए को यह बात पता चल जाती है। वह राजा के पास शिकायत करने पहुंचता है। राजा न्याय करता है। मत्स्य कुमार ने विश्वासघात किया है इसलिए अब उसे धरती के बजाय जल में रहना होगा। वह यदि धरती पर आने की कोशिश करेगा तो उसकी मृत्यु हो जाएगी। राजा यह व्यवस्था भी देता है कि जब भी कोई मनुष्य या पशु मत्स्य कुमार को पकड़ पाएं, उसे मारकर खा लें। लेखक का मानना है कि यह कथा एक सुव्यवस्थित न्याय प्रणाली का उदाहरण है। इसमें राजा सार्वजनिक सुनवाई करता है। विश्वासघाती को उसका पक्ष रखने का अवसर भी मिलता है और पारदर्शिता के साथ न्याय होता है। इस व्याख्या में अंत में की गई टिप्पणी भी विचारणीय है:-
घटनाक्रम में राजा का न्याय तथा समाज का बहिष्कार समझ में आता है, किन्तु मारे जाने की अंतहीन सजा कि जो भी, उसे जब भी पाए, उसका भक्षण कर जाए, औचित्यहीन है। कब समाप्त होगी ये सजा?
मैंने यहां कुछ कथाओं के उद्धरण दिए हैं। पूर्व में अनेक प्रकाशकों ने विभिन्न देशों और प्रांतों की लोककथाओं के संकलन प्रकाशित किए हैं। इस पुस्तक की विशेषता है कि अली एम. सैयद हर कहानी की वस्तुनिष्ठ व्याख्या करते हैं। वे बतलाते हैं कि प्राचीन समय में स्त्री पुरुष संबंध कैसे थे, न्याय व्यवस्था कैसी थी, पारिवारिक रिश्तों का स्वरूप क्या था, प्रभुत्वशाली लोगों द्वारा गरीब और मजदूर लोगों के साथ कैसा बर्ताव किया जाता था, शस्त्रबल से कैसे जनता आतंकित रहती थी, प्रकृति के विभिन्न उपादानों का मनुष्य जीवन में क्या महत्व था इत्यादि।
इन कहानियों के आईने में हम मनुष्य सभ्यता के विकास क्रम को देख सकते हैं; उसमें क्या-कैसे परिवर्तन आए हैं, इनकी झलकियां मिलती हैं; कबीलाई समाज, सामंतशाही और राजतंत्र की भिन्न-भिन्न व्यवस्थाओं से परिचय होता है। मनुष्य की जिजीविषा का बयान इन कहानियों में है। कुल मिलाकर यह संकलन लोककथाओं के माध्यम से पाठकों के मनोरंजन का माध्यम मात्र नहीं है, बल्कि अपने समय और जीवन का विश्लेषण करने का भी अवसर जुटाता है।
मुझे लेकिन इस पुस्तक से एक बड़ी शिकायत है। अगर किसी अच्छे प्रकाशक के पास यह पांडुलिपि गई होती तो पुस्तक का गेटअप बेहतर और नयनाभिराम होता। इसका मुद्रण साफ-सुथरा है, लेकिन उम्दा विचारों की ये किताब उम्दा तरीके से छपना भी चाहिए थी। मुझे अनुपम मिश्र का एक कथन याद आता है। मैंने आज भी खरे हैं तालाब के सुंदर ले-आउट और गेटअप की प्रशंसा की तो उन्होंने कहा- ''भैया! पानी सुंदर विषय है, उस पर लिखी पुस्तक भी तो सुंदर होना चाहिए। अगर प्रोफेसर अली को साधन उपलब्ध होते तो वे भी शायद वैसा ही कुछ करते। लेकिन बात फिर हमारे पुस्तक प्रकाशकों की है। वे खुद अच्छी पांडुलिपियां खोजने का कष्ट क्यों नहीं उठाते? बहरहाल प्रोफेसर अली एम. सैयद को उनके इस सुंदर प्रयत्न के लिए बधाई देता हूं। उनके महाविद्यालय ने प्रकाशन का बीड़ा उठाया। वे भी बधाई के पात्र हैं। हमें ऐसी पुस्तकों की जरूरत है।