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Thursday 18 Oct 2018

पत्र

अक्षर पर्व मई 2017 पढ़ा। क्षमा चाहूंगा मै नियमित पाठक नहीं हूँ। यदा-कदा पाठक हूँ। आदरणीय ललित जी की प्रस्तावना में कुमार विनोद जी के गज़़ल संग्रह सजदे में आकाश की चर्चा कुछ इस प्रकार उन्होंने की है कि गज़़ल संग्रह खरीद के पढऩे का मन बन गया। नये बिम्बों की प्रयोगशीलता के बारे में आप ने अच्छी  बात रेखांकित की है कि कुमार विनोद जी आसानी से मजे में नए शब्दों को इस तरह पिरो लेते हैं कि न तो रस भंग होता है, न अनाधिकार चेष्टा लगती है। नये स्तम्भ - भूले बिसरे शायर में जनाब जहीर कुरेशी जी ने शैख कदीर कुरैशी दर्द जैसे परफेक्शनिस्ट शायर की सदाबहार जीवंत गज़़लों से रूबरू करवाया। जब तक न पढ़ी हो गज़़ल हमेशा पहली बार पढऩे सा सुख देती है। दूसरी बात उससे भी महत्वपूर्ण ये है कि जहीर साहेब की इसी वर्ष प्रकाशित नयी पुस्तक कुछ भूले बिसरे शायर को पढ़कर  रसानंद  ले चुका हूँ। उनकी गज़़लें तो हमें पहले से पसंद थीं, अब उनकी पसंद भी पसंद आ रही है। प्रदीप मिश्र जी की कविताएं पढ़ीं। पत्नी के सानिध्य की पावन उपस्थिति और चाँद सूरज के प्रतिबिम्बों के माध्यम से प्रेमिका और पत्नी  की तुलना से कविता अपनी बात कह जाती है।                                              

  रवि गेहलोत, 94255155