Monthly Magzine
Wednesday 18 Jul 2018

पत्र

अक्षर पर्व के अप्रैल अंक के प्रस्तावना स्तम्भ में आपने जो लिखा वह मेरे मन के बहुत करीब की बात है। यह कितना विडम्बनापूर्ण है कि लोगों ने शादियों पर खर्च की बात ही जैसे भुला दी है।  घरों में शादियां होनी बंद ही हो गई है ( जो पहले बड़ा अशकुनी मन जाता था ), जो लाखों रुपयों के मंच पहले सिर्फ एक दिन के लिए किराए पर लिए जाते थे वे अब महिला संगीत के बहाने कम से कम दो दिन के लिए जरूरी माने जाने लगे हैं। आपने इस बारे में बहुत अच्छा लिखा है। बधाई !

सदाशिव