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Monday 20 Nov 2017

पत्र

आदरणीय ललित भैया,
अक्षर पर्व के मई 2017 के अंक की प्रस्तावना में कुमार विनोद की कविताओं के बारे में पढ़ा। बहुत ही रोचक ढंग से लिखा है आपने, जैसा कि हमेशा ही होता है। मैं गणितज्ञ- साहित्यिकों के बारे में कुछ कहना चाहती हूँ: ललित भैया की लिखी हुई कुमार विनोद की 78 कविताओं वाली किताब की समीक्षा बेहद दिलचस्प लगी। उनका प्रश्न 78 कविताएँ ही क्यों, इसका जवाब ये हो सकता है, कि 7,8 कविताएँ लिखना चाहते होंगे विनोद जी, जो अल्पविराम हट जाने के कारण 78 हो गई होंगी। ऐसे बहुत से उदाहरण मिल जाएँगे, जहाँ किसी प्रसिद्ध रचना का रचनाकर मैथेमेटिक्स से संबंधित हो। मुझे याद है, (संदर्भ ढूँढ नहीं पा रही हूँ।) – वाग्नेर की रूसी भाषा की पुस्तक में एक छोटा सा लेख था, इस बारे में, कि मैथेमैटिक्स से जुड़े लोग अच्छे साहित्यकार होते हैं।
वाकई में, जैसी कल्पना शक्ति की जरूरत गणित की समस्याएँ सुलझाने में होती है, वैसी ही साहित्य लेखन में भी होती है। मैथेमेटिशियन की भाषा अत्यंत चुस्त, वर्णन – सिर्फ उतने ही, जितने आवश्यक हों, भाषा की, समय की परिधि के भीतर और उसके बाहर भी छलाँग लगाने की ललक उनकी रचनाओं में देखी जाती है।
अनेक प्रसिद्ध मैथेमेटिशियन्स के उदाहरण दिए जा सकते हैं, जिनकी साहित्यिक रचनाएँ भी काी प्रसिद्ध हुई हैं: अंतरराष्ट्रीय गणितज्ञ, शिक्षाविद, दार्शनिक, वैज्ञानिक बर्टेण्ड रसेल को नोबेल पुरस्कार गणित के लिए नहीं बल्कि साहित्य में उनके योगदान के लिए दिया गया था; अलेक्सांद्र सोल्झेनीत्सिन गणितज्ञ थे;
प्रसिद्ध टीवी शो 'दि सिम्पसन्स शो' के कई लेखक गणित की पाश्र्वभूमि से हैं; उदाहरण तो कई दिए जा सकते हैं।
बहुत अच्छा लगा कि कुमार विनोद साहित्य के क्षेत्र में उतर आए हैं और इससे भी ज्यादा अच्छी बात ये है कि 'अक्षरपर्व' ने उनका बढिय़ा परिचय करवाया है। बधाई!
चारुमति रामदास