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Sunday 19 Nov 2017

पत्र


अक्षर पर्व पिता स्व. अमरकांत जी के नाम उनके निवास पर बराबर भेजी जाती रही है और आज भी जारी है। इसके लिए मैं, धन्यवाद देता हूं। पत्रिका का मैं नियमित पाठक हूं, साथ ही परिवार भी। सभी अंक महत्वपूर्ण लगते हैं। जीवंत मसलों पर प्रस्तावना, उपसंहार एवं दी गई सामग्री (लेख, आलेख, साक्षात्कार, कविता, कहानी) सार्थक, गंभीर उद्देश्य के साथ हम सभी के सम्मुख प्रस्तुत होती रही हैं। अंक दर अंक प्रगतिशील सोच, वैज्ञानिक दृष्टिकोण से विकसित, अपनी ताकतवर वजूद को सरसता से समझाने में सफल हैं।
अप्रैल अंक 2017 में प्रस्तावना, सामग्री एवं उपसंहार पठनीय है, सभी समयनिष्ठा के साथ हैं। ललित सुरजन की प्रस्तावना का मैं मुरीद हूं, पहली दृष्टि उसी पर फिर अन्य के लिए आगे बढ़ता हूं। सम्प्रेषणीय ताकत और संवेदनशीलता से परिपूर्ण किसी भी मसले पर उनकी पकड़ की विश्वसनीयता देखी जा सकती है। प्रस्तावना कांग्रेस सदस्य श्रीमती रंजीत रंजन के विधेयक से शुरू की गई है, जो विवाह के खर्च, अतिथियों और व्यंजनों की सीमा से जुड़ा हुआ है।
वास्तव में, समारोहों में खर्च की सीमा निर्धारित हो तो अतिथियों और व्यंजनों पर भी प्रभाव पड़ेगा ही, साथ ही अनुशासनहीनता, अराजकता और उच्छृंखलता पर भी लगाम लगेगी। यह देश किसी के पिता का नहीं है, सभी का समान अधिकार है। प्रधानमंत्री, राष्ट्रपति एवं मजदूर सभी के जीने के लिए अलग-अलग मत नहीं रखा जा सकता। सवाल है लोगों के पास इतना धन आया कैसे? जांच-पड़ताल होनी चाहिए। यह संभव हो गया तो नेता, अफसर, बहुत से लोग कई सफेदपोश संदिग्ध एवं ठगों की श्रेणी में जरूर आ जाएंगे। हमारा समाज अराजकता की गिरफ्त में है, बहुत से लोग बगैर मेहनत से धन अर्जित कर, जो जनता का ही है, समाराहों और पुश्तों के लिए एकत्र करते हैं।
80 के दशक का एक प्रसंग, \'नदिया के पार\'इसी दशक की फिल्म थी। फिल्म में अनुशासन और सीमा दोनों ही नजर आयी। केशव प्रसाद मिश्र की कहानी \'कोहबर की शर्त\'पर आधारित, गोविन्द मुनीष के साफ-सुथरे निर्देशन में जो भारतीय परिवेश के अनुकूल फिल्म, जनता को बहुत पसंद आई। राजश्री प्रोडक्शन की फिल्म, ताराचंद बडज़ात्या ने करोड़ों कमाए। फिल्म के प्रथम प्रदर्शन के पश्चात दोनों महानुभाव घर आए थे। फिल्म के निर्देशक, गोविन्द मुनीष जी, अमरकांतजी के दो उपन्यास \'आकाश पक्षी\' एवं \'ग्राम सेविका\' पर फिल्म बनाना चाहते थे, अनुमति लेना चाहते थे और उपन्यास के अंत में कुछ अपने अनुसार बदलाव चाहते थे। बदलाव की सहमति न हो पाई। बातचीत के दरम्यान केशव प्रसाद मिश्र ने बताया दस हजार फिल्म से मिले हंै। गोविन्द मुनीष को 40 हजार, दोनों लोग संतुष्ट थे।
केशव प्रसाद की बेटी का विवाह था या प्रयास में थे। कहने लगे वैसे विवाह में बहुत ज्यादा खर्च तो करना नहीं है, चलिए इस पैसे से कुछ सहयोग भी होगा। लेकिन लोगों का दिमाग बहुत खराब हो रहा है। पैसे की भूख बढ़ रही है। गोविंद जी की भी कुछ ऐसी ही टिप्पणी हुई। आशय है दिमागी फूहड़पन की दस्तक शुरू हो गई थी, जो 90 के दशक में उक्त कहानी पर बनी फिल्म \'हम आपके हैं कौन\'में देखने में आया।
खर्च की सीमा पर कानून तो होना ही चाहिए जो नियंत्रित करे। समाज को भी सोचने पर बाध्य होना पड़ेगा वरना क्षणिक सुख ज्यादा दिन नहीं, अगली पीढ़ी के लिए दुखों का पहाड़ होगा, जो सभी को दबोचेगा। मैं दो कथन कोट करना चाहूंगा, 1. ब्रिटिश इतिहासकार मैकाले का है \'इस देश के लोगों की शिक्षा ऐसी होनी चाहिए जिनका खून लाल हो और दिखने में काले जरूर लगे मगर निष्ठा अंग्रेजों के प्रति हो। 2. विंस्टन चर्चिल का, जिन्होंने माउन्टबेटेन से कहा \'हिन्दुस्तान जा रहे हो अपने मिशन में जरूर कामयाब हो जाओगे, लेकिन यह संभव तभी होगा जब तुम्हें एक व्यक्ति की परवाह करनी होगी वह नाम है मोहनदास करमचंद गांधी। उसी के पास मौलिक सोच है बाकी किसी के पास नहीं।\' प्रवृत्ति उक्त कथनों के अनुसार हो, निष्ठा अंग्रेजों के प्रति हो तो अपने ही देश को लूटने में कैसे संकोच-आडंबर, स्वार्थ, हिंसा स्वत: ही उत्पन्न होगा।
अंक में \'वैज्ञानिक दृष्टि क्या होती हैÓ आलेख सारगर्भित एवं प्रहारुक्त है। विज्ञान का प्रयोग करने वाला समाज, व्यक्ति वैज्ञानिक दृष्टि से वंचित हो तो मौलिकता और तर्कसंगत पर सवालिया निशान बना ही रहेगा। \'अपने-अपने महाभारत\' समीक्षा समझ में आती है। सत्यमूर्ति की पुस्तक तो नहीं पढ़ी मगर समीक्षार्थ तथ्य ने उत्पन्न कई सवालों को पुख्ता करने का प्रयास किया है। यह सत्य है कि महाभारत धार्मिक ग्रंथ नहीं है। रामचरितमानस भी। दोनों ही ग्रंथ साहित्यिक है। वास्तविकता से दूर, किरदार और कथा दोनों में ही रोचकता की अनुभूति होती है। महाभारत के सभी पात्र मनुष्य हैं। कृष्ण मनुष्य थे किन्तु राजा थे। पहले लोग पढ़े-लिखे नहीं थे, राजा को ही भगवान मान बैठते थे। भगवान क्या है कोई भी नहीं जानता। भगवान के आशय का शाब्दिक यह अर्थ सार्थक जरूर है भूमि, गगन, वायु, नीर (भगवान), प्रकृति से ही सभी कुछ है- सत्य, ईमानदारी, स्वाभिमान, नि:स्वार्थ, शांति, अहिंसा यह प्रकृति का रूप है, हम प्रकृति से हैं। महाभारत में छल, हिंसा, राजनीति, भेदभाव सभी कुछ है जो समाज को यह सब न करने की प्रेरणा देता है। यही बात रामचरित मानस पर भी लागू होती है। दोनों ही ग्रंथ समाज और काल की व्याख्या करते हैं। कथा उस काल के हैरीपाटर के रूप में कलाकार की कला है। समीक्षा आपके अधिकार में है, आलोचना की दिशा ठीक हो यही ग्रंथों का सार है। अंक में कविता, कहानी सभी कुछ पठनीय है।
सर्वमित्रा सुरजन के उपसंहार का विषय संवेदनशील, छोटे में बड़ी बात कह देना उनकी लेखनी की विशेषता है। \'समानता से वंचना\' शीर्षक सवालिया निशान खड़ा करता हैा। सामाजिक और सरकारी व्यवस्था की निरंकुशता पर प्रहार है। बहुत कुछ कहने को है, यहां खत्म करता हूं।

अरविन्द बिन्दु
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