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Saturday 18 Nov 2017

प्रश्न पूछना भी देशप्रेम है

दया, धर्म, करुणा, उदारता और ऐसे अनेक मानवीय गुणों की माला जपने वाला भारतीय समाज कब और कैसे इतना हिंसक हो गया कि अपने स्वार्थ के लिए किसी निर्दोष की जान लेने से भी न झिझके, यह गहरी चिंता का विषय है। संकीर्णता, स्वार्थ, बेईमानी, कपट ये सब भी मानवीय स्वभाव का हिस्सा हैं, लेकिन अंतत: ये पराजित होते हैं, यही सीख बचपन से दी जाती है। सत्यमेव जयते तो भारत का नीति वाक्य ही है, जिस पर चलना हरेक हिंदुस्तानी का परम कत्र्तव्य होना चाहिए। लेकिन इस वक्त देश में जो वातावरण बना हुआ है, उसमें तो हिंसा की अहिंसा पर जीत होती दिख रही है। धर्म हार रहा है, अधर्म जीत रहा है। सच पर झूठ हावी होता जा रहा है, तथ्यों की जगह भावनाओं के सहारे भ्रम फैलाने की साजिशें हो रही हैं और जनता शायद अब भी किसी चमत्कार की प्रतीक्षा में है। जब घर में गोमांस रखने की अफवाह पर अखलाक को भीड़ ने पीट-पीटकर मार डाला, तब थोड़ा बहुत हो-हल्ला हुआ कि जो हुआ, गलत हुआ। कानून किसी को हाथ में नहींलेना चाहिए, जांच होने के बाद दोषियों को सजा मिलनी चाहिए, आदि, आदि। आज भीड़ की हिंसा का शिकार हुए अखलाक के आगे कई और नाम जुड़ गए हैं, कुछ अनाम भी रह गए हैं, लेकिन अब न हंगामा मचता है, न सभ्य समाज को यह सब अजीब, असंगत, अन्यायपूर्ण लगता है। सब अपने में ऐसे रमे हुए हैं कि उन्हें कोई फिक्र नहींकि किसी और के साथ क्या हो रहा है। 18 जून को भारत-पाकिस्तान के बीच चैंपियंस ट्राफी का फाइनल मैच था, जिसमें भारत की करारी हार हुई। लेकिन जब से यह तय हुआ था कि भारत-पाकिस्तान एक बार फिर आमने-सामने होंगे, राषट्रवाद के प्रदर्शन की उन्मादी लहर चल पड़ी थी। सोशल मीडिया से लेकर इलेक्ट्रानिक मीडिया तक टिप्पणियों और कार्यक्रमों की भरमार थी। ऐसा माहौल बना दिया गया था मानो अभी हमारे देश की सबसे बड़ी प्राथमिकता पाकिस्तान को हराना है। युवाओं से लेकर बच्चे तक कह रहे थे, पाकिस्तान से बदला लेना है, हम बाप हैं, फादर्स डे पर बेटे को हराएंगे। अरे भाई, जब बाप-बेटे का रिश्ता मान रहे हो, तो बदले की बात कहां से आई। और अभी किस बात का बदला लेना है, इस पर अगर इन युवाओं से चर्चा की जाए तो जवाब मिलेगा, कश्मीर का। कश्मीर में क्या हो रहा है, क्यों वहां के नौजवानों के हाथों में पत्थर हैं, क्यों हमारे जवान रोजाना वहां मर रहे हैं और हम केवल शहीदों की संख्या गिनने में लगे हैं, ये सारे सवाल उनसे किए जाएं, तो बहुत कम लोगों को इसके जवाब जानने, समस्या के विस्तार में जाने, विश्लेषण करने की फुर्सत होगी। भाइयों और बहनों सुनते ही देशप्रेमी होने का गर्व पाले लोगों को इस बात से भी फर्क नहींपड़ता कि उनके देश में कामगारों की दशा कैसी है, क्यों यहां रोज किसानों को आत्महत्या करने पर मजबूर होना पड़ रहा है, क्यों गोरखालैंड की मांग ने हिंसक रूप ले लिया है, क्यों यहां की स्त्रियां हर दिन और असुरक्षित होती जा रही हैं, क्यों भीड़तंत्र कानून पर हावी होता जा रहा है, क्यों फिर एक निर्दोष को पीट-पीट कर मार डाला गया। इन सवालों पर गौर करेंगे तो राषट्रवाद का मुलम्मा उखडऩे लगेगा, जो शायद कुछ लोगों के स्वार्थ के आड़े आ सकता है। इसलिए बेहतर है कि लोग अपने खोलों में सिमटे रहें। टीवी पर क्रिकेट देखें, फिर क्रिकेट के समाचार दीर्घ विश्लेषणों के साथ देखें। लेकिन एक कौम के रूप में हमें जिंदा रहना है तो सवाल पूछने की आदत छूटनी नहींचाहिए। सत्ता की हां में हां मिलाना ही देशप्रेम नहींहै, उसे अपने प्रश्नों के साथ असहज करना भी देशप्रेम का ही रूप है। इसलिए पूछा जाना चाहिए कि कभी गौरक्षा, कभी माताओं-बहनों की रक्षा, तो कभी योजनाओं की रक्षा के नाम पर भीड़ की गुंडागर्दी को बढ़ावा देकर कौन सी राजनीति साधी जा रही है। अभी कुछ समय पहले राजस्थान में पहलू खां को गाय ले जाने के नाम पर पीट-पीट कर मार दिया गया था। फिर यहींपर तमिलनाडु पशुपालन विभाग के अधिकारी कानूनी तौर पर मवेशियों को ले जा रहे थे तो लगभग 2 सौ लोगों की भीड़ ने उन पर हमला किया। अब इसी राजस्थान में स्वच्छ भारत अभियान के लिए काम कर रहे नगर पालिका के कर्मचारियों ने एक प्रौढ़ व्यक्ति को पीट-पीट कर मार डाला। मृतक जफर खान का कसूर इतना ही था किउसने एकसभ्य नागरिक होने का फर्ज अदा किया था। प्रतापगढ़ की कच्ची बस्ती की महिलाएं सुबह शौच के लिए खुली जगह गई थीं, क्योंकि वहां का जो सार्वजनिक शौचालय था, वह इस्तेमाल लायक नहींथा। इन महिलाओं की तस्वीरें पालिका के कर्मचारी लेने लगे तो जफर खान ने उन्हें रोका, बस इसी बात पर उसे इतनी बुरी तरह पीटा गया कि उसकी मौत हो गई। माना कि भारत का स्वच्छ होना बहुत जरूरी है, लेकिन उससे भी जरूरी आचरण और मानसिकता के स्वच्छ होने की है। आपने गौरक्षकों की गुंडागर्दी से हाथ पीछे खींच लिया है, महिलाओं की सच में रक्षा करने वाले को आपके कार्यकर्ता मार रहे हैं और आप अब भी जनता को दिवास्वप्न दिखा रहे हैं कि अच्छे दिन आने वाले हैं।