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Friday 24 Nov 2017

संत कबीर का चिन्तन

ब्राह्मण ते गदहा भला, आन देव से कुत्ता।
मुल्ला ते मुरगा भला, सहर जगावे सुत्ता ।। 1
कबीरदास जी के इस दोहे में भले ही तीखापन है परन्तु कथ्य वैविध्य के न होते हुए भी वर्तमान समय में इसका महत्व है। कबीरदास जी ने अपने समय के सामाजिक माहौल के सभी ढकोसलों को बेनकाब किया है। उन्होंने सामाजिक, सांस्कृतिक कुरीतियों को दूर करने के लिए जो कुछ कहा सही कहा है। अपने समकालीन समाज में समाहित अनाचार और रूढिय़ों के खिलाफ अपनी आवाज को बड़ी ही निर्भीकता से बुलन्द किया है। जिसकी प्रासंगिकता आज के समय में भी उतनी बनी हुए। भक्तिकाल को सामान्यत: दो भागों में विभक्त किया गया है। निर्गुण धारा एवं सगुण धारा। निर्गुण धारा के अन्तर्गत -ज्ञानाश्रयी शाखा एवं प्रेमाश्रयी शाखा हैं तथा सगुण धारा के अन्तर्गत रामकाव्य एवं कृष्णकाव्य है। सामान्यत: ईश्वर के दो रूप माने गये हैं-सगुण एवं निर्गुण। इसमें परमात्मा को निराकार, सर्वव्यापी, अज, अनादि, अगोचर, सूक्ष्म मानकर उसकी विवेचना की जाती है तब उसे निर्गुण ब्रह्म कहा जाता है इसी धारा के सबसे बड़े कवि कबीरदास जी का चिन्तन है। ज्ञानाश्रयी शाखा के प्रतिनिधि कवि हैं-कबीर। इस में कोई शक नहीं कि कबीर संत पहले व कवि बाद में है। काव्य रचना करना उनका उद्देश्य नहीं था। काव्य परंपरा से उनका कोई मेल नहीं था। ना ही उन्होंने काव्य के तत्वों व अंगों का अध्ययन किया था। उन्हें अलंकार, छन्द, रस, रीति, गुण, वक्रोक्ति आदि का शास्त्रीय ज्ञान नहीं था। परन्तु फिर भी कबीरदास का हिन्दी साहित्य के इतिहास में वर्णन बड़ी प्रमुखता से मिलता है। कबीर की वाणी की विशेषताओ़़़ं के आधार पर उन्हें कवि रूप में प्रतिष्ठा प्राप्त हुई है। आचार्य रामचन्द्र शुक्ल ने कबीरदास के सम्बन्ध में लिखा- यद्यपि वे पढ़े-लिखे न थे पर उनकी प्रतिभा बड़ी प्रखर थी। 2
कबीर ने सभी मनुष्यों को बराबर माना है। उनमें न कोई ऊँचा है, न नीचा। परमात्मा के दरबार में सभी बराबर हैं। हिन्दू, मुसलमान, ब्राह्मण, शूद्र आदि का भेद ईश्वर द्वारा नहीं बनाया गया है। यह तो मनुष्य द्वारा किया गया वर्गीकरण है जिसे कबीर अपनी कविताओं में नकारते हैं। जाति पाँति पूछै नहीं कोई, हरि को भजै सो हरि को होई।3
उन्होंने हिन्दू धर्म में फैले आडम्बरों को नकार दिया और दूसरी ओर मुसलमानों को भी उनमें फैली बुराइयों के लिए लताड़ा। सामाजिक कुरीतियों पर उन्होंने करारी चोट की, वे समाज में सुधार के पक्षधर रहे। कबीरदास ने जीवन के हर क्षेत्र में सत्य और पवित्रता पर बल दिया है। समाज सुधार, राष्ट्रीय और धार्मिक एकता उनके उपदेशों का काव्यमय स्वरूप था। उनमें समर्पित भक्त कवि और अक्खड़ समाज सुधारक का विस्मयकारी सामंजस्य है। समाज की गहरी जानकारी रखने वाले कबीर ने अपनी वाणी से समाज एवं मानव जीवन को मंगलकारी सन्देश दिए हैं।
कथनी मीठी खाँड सी, करनी विष की लोय।
कथनी तज करनी करें, नर नारायण होय।। 4
हिन्दी साहित्य के स्वर्ण युग माने जाने वाले भक्तिकाल के महान कवि कबीर अपने काव्य की सहजता, उत्कृष्टता के कारण उच्च स्थान के अधिकारी हैं। कहा जाता है कि काशी में मरने से स्वर्ग और मगहर में मरने पर नरक मिलता है। अन्धविश्वासों के विरोधी कबीर मृत्यु के समय विशेष रूप से मगहर चले गये । कबीर ने सामाजिक विकारों को दूर करने का भरसक प्रयास किया।
दूर्बल को न सताइए, जाकी मोटी हाय।
मरी चाम की स्वांस से, लौह भसम हृै जाय।। 5
अंधविश्वास, छुआछूत, वर्गभेद, जाति-पाति आदि का विरोध करते हुए समतामूलक समाज सुधारक के रूप में विख्यात इस कवि ने निर्भीकतापूर्वक सत्य का उद्घाटन किया है। गुरू महिमा, सदाचार, इन्द्रिय निग्रह, आडम्बरहीनता पर उन्होंने बल दिया है। कबीरदास की भाषा सीधी सरल व्यावहारिक है। इनकी भाषा में अरबी, फारसी, राजस्थानी, ब्रज आदि के शब्दों का मिश्रण है।
कबीरदास जी ने मूर्तिपूजा, धर्म के नाम पर की जाने वाली हिंसा, तीर्थ, व्रत, रोजा नमाज, हज आदि विधि विधानों, जाति-पाति, भेद, बाहृयांडबरों का डटकर विरोध किया-
कांकर पाथर जोरि के, मस्जिद लई बनाय।
ता चढि़ मुल्ला बांग दे, क्या बहिरा हुआ खुदाय।।6
इसी प्रकार हिन्दुओं के लिए-
पत्थर पूजे हरि मिले तो मैं पूजूं पहार।
ताते तो चक्की भली पीस खाय संसार।। 7
इस प्रकार की कठोर व निर्गुण वाणी के कारण कबीरदास जी को सिकंदर लोधी द्वारा प्रताडि़त किया गया था और इसी कारण उनसे हिन्दू और मुसलमान दोनों चिढ़ गए थे। फिर भी कबीरदास जी ने कभी किसी के आगे अपने को नहीं झुकाया तथा निरन्तर अपनी वाणी से वास्तविकता को उजागर किया है।
कामी क्रोधी लालची, इन पै भक्ति न होय।
भक्ति करै कोइ शूरमाँ, जाति वरण कुल खोय।। 8
कबीर ने नारी के अच्छे व बुरे दोनों ही रूपों को अपनी वाणी के माध्यम से चित्रित किया है। एक ओर तो उन्होंने नारी को माया का रूप मानकर उसकी निंदा की हैं-
''नारी की झाई परत अंधा होत भुजंग ।
कबिरा तिनकी कौन गति नित नारी के संग।। 9
वहीं दूसरी तरफ नारी की पवित्रता व सती के आदर्श रूप की भी मुक्त कंठ से प्रशंसा की है। कबीरदास जी के अनुसार - ''पवित्रता मैली भली, काली कुचित कुरूप।
पवित्रता के रूप पर वारो कोटि सरूप।। 10
उन्होंने नारी का पक्ष लेते हुए इससे भी आगे तक कहते हुए श्रीराम तक को भी नहीं बख्शा है।
नारी जननी जगत की, पाल पोष दे तोष।
मूरख राम बिसार कर, ताहि लगावै दोष।। 11
कबीर ने हमेशा ही सत्य का पक्ष लिया है। असत्य से उन्हें बहुत घृणा थी। भ्रष्टाचारी व शोषक तथा दुर्जनों के वे घोर विरोधी थे।
लिंडा हेज़ ने रेडिकल कबीर की खोज में कबीर को पुनर्जन्म के पचड़े से बाहर खड़े माना है। कबीर ने अपने श्रोताओं के अनेक भ्रम तोड़े थे लेकिन आज के पाठकों का भ्रम तब टूटता है जब वे मानते हैं कि कबीर पुनर्जन्म में विश्वास नहीं करते थे और मृत्यु से नहीं डरते थे। कबीर की दो साखियों के अनुसार यह बात सिद्ध होती है-
''मानस जन्म दुर्लभ अहै, बहुरि न दूजी बार।
पका फल जो गिर परा, बहुरि न लागै डार। 12
मृत्यु के लिए कबीर ने कहा है
पंडित सोधि कहो समझाई, जाते आवगमन नसाई।।
अर्थ धर्म औ काम मोक्ष कहु, कवन दिसा बसे भाईं
उत्तर कि दक्षित पूर्व कि पश्चिम, स्वर्ग पताल कि माहीं।।
अनजाने को स्वर्ग नरक है, हरि जाने को नाहीं।
ज्ेाहि डर को सब लोग डरत हैं, सो डर हमरे नाहीं।।
पाप पुन्य की संका नाहीं, स्वर्ग नरक नहिं जाही।
कहैं कबीर सुनो हो संतो, जहाँ का पद है तहाँ तमाही। 13
पं. हजारी प्रसाद द्विवेदी ने कबीर की भाषा पर व्याकरण की दृष्टि से विचार करना महत्पूर्ण नहीं समझा है। उन्होंने कबीर की भाषा पर विचार करते हुए उसकी अभिव्यक्ति क्षमता की सराहना की है-''भाषा पर कबीर का जबर्दस्त अधिकार था। वे वाणी के डिक्टेटर थे। जिस बात को उन्होंने जिस रूप मे प्रकट करना चाहा है, उसे उसी रूप में भाषा से कहलवा लिया है बन गया है तो सीधे-सीधे नहीं तो दरेरा देकर। भाषा कुछ कबीर के सामने लाचार सी नजर आती है। उसमें मानो ऐसी हिम्मत ही नहीं है कि इस लापरवाह फक्कड़ की किसी फरमाइश को नाहीं कर सके। 14
भक्तिकाल की निर्गुण धारा के सन्त कवि कबीर उन कवियों में अग्रणी है जो निर्गुण ईश्वर के उपासक होने के साथ-साथ वैष्णव भक्ति भावना के प्रेम तत्व का समावेश अपनी भक्ति पद्धति में किए थे। उनके निर्गुण ब्रह्म पर भारतीय अद्वैतवाद तथा मुस्लिम एकेश्वरवाद का प्रभाव परिलक्षित होता है। कबीर ने निर्गुण निराकार परमात्मा के लिए अनेक नामों का प्रयोग किया है। एक ओर तो वे उसे अल्ला, करीम, खुदा, रहमान, रहीम, कहते हैं तो दूसरी ओर उसे केशव, माधव, जगदीश, हरि, गोविन्द, नरहरि, राम आदि नामों से सम्बोधित करते हैं। कबीर के लिए ये सभी नाम एक ही हैं, अत: वे नाम के विवाद में नहीं पडऩा चाहते हैं।
काशी काबा एक है एक राम रहीम
मैदा इक पकवान बहु बैठ कबीरा जीम।15
कबीरदास जी कहते हैं कि वास्तव में ब्रह्म एक है। उसी के नाम अलग-अलग हैं। मूर्ख जन सारतत्व को नहीं पहचानते नाम की भिन्नता के आधार पर इधर उधर भटकते रहते हैं। निरन्तर एक दूसरे से जूझते हैं।
आधुनिक समय में कबीर को विशेष महत्व प्रदान किया जा रहा है। वह इसलिए की कबीर मध्यकाल के एक मात्र कवि है, जिन्होंने रूढिय़ों व बाह्य आडम्बरों का खुल कर विरोध किया। आज का कवि और साहित्यकार कबीर की मानसिकता को अपनी काव्य संवेदना के काफी निकट पाता है। यहाँ तक की आदिकवि सरहपा से लेकर वर्तमान समय के प्रभाकर माचवे, रघुवीर सहाय, अजीत कुमार वर्मा, राजकमल चौधरी व मुद्राराक्षस जैसे कवियों ने कबीर का नाम आदरपूर्वक लिया है। हरिशंकर परसाई अपनी व्यंग्य दृष्टि को कबीर के बहुत निकट अनुभव करते हैं। यहाँ तक की गुरूदेव रविन्द्रनाथ टैगोर ने अपनी महानतम रचना गीतांजली को कबीर दर्शन से प्रेरित बताया है।
वास्तव में कबीर का चिन्तन आध्यात्मिक था। कबीर समाज सुधारक ही नहीं अपितु मानव आत्मा की मुक्ति के लिए आध्यात्मिक संघर्ष करने वाले साधक थे। उनका सारा का सारा चिन्तन आसक्ति एवं तृष्णा के विरूद्ध था। वे मन को जीतने के लिए संतों व भक्तों को प्रेरित करते रहते थे। वे इस संसार में व्याप्त दु:ख के मूल कारणों पर विचार करते रहते थे तो उन्हें लगता था कि आसक्तियों पर विजय प्राप्त न करने के कारण सारा संसार दु:खी है। उन्होंने अपने समय के जीवन प्रवाह को खुले नेत्रों से देखा था। वे कागद की लेखी पर विश्वास नहीं करते थे। इन्होंने जो कुछ कहा है उसके पीछे उनका गहनतम अनुभव समाहित था। वे निडर, स्पष्टवक्ता, विवकेशील और पक्षपात रहित थे। उन्होंने किसी की झूठी खुशामद नहीं की। सभी की दुर्बलताओं पर समान भाव से प्रहार किया। वे सच्चे विद्रोही थे।
ऐसी मार कबीर की, मुआ न दीसै कोय।
कहै कबीर सो ऊबरै, धड पर सीस न कोय।।16
कबीरदास जी कहते हैं कि सदगुरू के ज्ञान रूपी तलवार की मार ऐसी अद्भुत है कि मारे हुए को कोई अज्ञानी अपनी स्थूल दृष्टि से देख ही नहीं पाता। उस मार से केवल उसी का कल्याण होता है जिसके धड़ पर अंहकार रूपी सिर नहीं होता।
ऊँच कुल क्या जनमियाँ, जे करणी ऊँच न होर।
सेवन कलस सुरै मद्या साधु निधां सोई।। 17
कबीर कहते है कि ऊँचे श्रेष्ठ नहीं हैं तो उच्च कुल में जन्म लेने से क्या लाभ। जिस प्रकार शराब से भरे सोने के कलश की भी सज्जनों के द्वारा निन्दा ही की जायेगी। वैसे ही निम्न कर्म करने वाला निन्दा का ही पात्र होगा।
समाज की गहरी जानकारी रखने वाले कबीर ने अपनी वाणी के माध्यम से समाज एवं मानव जीवन के मंगलकारी संदेश दिए गए हैं। भक्ति का जो पथ कबीर ने दिखाया है, उसका चिन्तन काफी गहन है।
संदर्भ सूची:-
1. टोकी डॉ. राजेन्द्र (सं.) कबीर दृष्टि-प्रतिदृष्टि पृष्ठ संख्या न. 69
2. तिवारी डॉ. रामचन्द्र कबीर मीमांसा पृष्ठ संख्या 47
3. तिवारी अशोक हिन्दी-तृतीय पृष्ठ संख्या-123
4. टोकी डॉ. राजेन्द्र(सं.) ''कबीर दृष्टि-प्रतिदृष्टि'' पृष्ठ संख्या-7
5. तिवारी अशोक ''हिन्दी-।।। पृष्ठ संख्या-285
6. तिवारी डॉ. रामचन्द्र कबीर मीमांसा पृष्ठ संख्या -73
7. वही
8. चौहान जी. एस. 'कबीर के दोहे' पृष्ठ संख्या-38
9. वही पृष्ठ संख्या-56
10.टोकी डॉ. राजेन्द्र (सं.) ''कबीर दृष्टि-प्रतिदृष्टि'' पृष्ठ संख्या न. 69
11. चौहान जी. एस. ''कबीर के दोहे'' पृष्ठ संख्या-67
12. धर्मवीर डॉ. ''कबीर के कुछ और आलोचक'' पृष्ठ संख्या -136
13.वही
14. तिवारी अशोक 'हिन्दी-।।।' पृष्ठ संख्या- 288
15. टोकी डॉ. राजेन्द (सं.) ''कबीर दृष्टि-प्रतिदृष्टि'' पृष्ठ संख्या -78
16. चौहान जी. एस. 'कबीर के दोहे' पृष्ठ संख्या -95
17. तिवारी डॉ. रामचन्द्र ''कबीर मीमांसा'' पृष्ठ संख्या-47