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Thursday 23 Nov 2017

अज्ञान और कबीर का \'कांकर पाथर...

अजान को लेकर समय-समय पर देश-दुनिया में घमासान होता रहा है, कई तरह की टिप्पणियां होती रही है, लेकिन डॉ. चावला को सुबह की अजान के समय उठना सुखकर लगता रहा है। वे सुबह कीे अजान को अपने उठने का अलार्म मानते रहे हंै, लेकिन इन दिनों अजान को लेकर कई तरह की बातें हो रही हैं। कोई सलीम फेकू हैं जिन्होंने सोशल मीडिया पर ट्वीट किया कि- मैं हैदराबाद में रहता हूं जहां एयरपोर्ट बहुत नजदीक है। जहाजों की आवाज से नींद खराब होती है, सरकार से अपील है कि एयरपोर्ट बंद करवाए, इसके पहले क्या लोग यात्रा नहीं करते थे? सुना है कि मुंबई के मिल्लत नगर के रिक्शे, ऑटो रिक्शे वाले हार्न नहीं बजा रहे हैं कि सोनू भाई की नींद में खलल पड़ेगी, लेकिन अजान से होने वाली असुविधा से हमारे देश में इन दिनों कुछ ज्यादा ही लोग परेशान नजर आ रहे हैं। जहां देश में शोर शराबा और हो-हल्ला करती हुई हजारों किस्म की धार्मिक-अधार्मिक आस्थाएं हैं, मेला, ठेला है, नाच-गाने हैं, कान फोड़ो बाबाओं के भजन-कीर्तन हैं, जागरण हैं, कव्वालियां हैं, वहां एक-दो मिनट की अजान पर इतनी आपत्ति क्यों हो सकती है। इतना बारे-ए-समाअत अर्थात श्रमण पर भार क्यों है? यह प्रश्न जरूर उन आपत्तिधारकों से पूछा जाना चाहिए। यह सच है कि सुप्रीम कोर्ट के आदेशानुसार लाउडस्पीकर का इस्तेमाल रात के दस बजे के बाद से सुबह छ: बजे तक सार्वजनिक स्थलों पर नहीं किया जा सकता, हां सुप्रीम कोर्ट ने राज्य सरकारों को यह अधिकार दिया है वे साल में पन्द्रह दिन किसी विशेष पंद्रह अवसरों पर रात के बारह बजे तक लाउडस्पीकर के इस्तेमाल की अनुमति दे सकती हैं, अत: अनुमति प्राप्त अवसरों पर 12 से साढ़े 12 बजे तक लाउडस्पीकर का इस्तेमाल किया जा सकता है। फज़ऱ की अजान जो सुबह छ: बजे से पहले दी जाती है और जो सुप्रीम कोर्ट के आदेशानुसार ठीक नहीं है, यानि सुप्रीम कोर्ट के आदेश की अवमानना है, मुसलमानों को चाहिए कि सुबह की अजान को बहुत धीमी या लाउडस्पीकर से नहीं ही दे, अब तो घर-घर में मोबाइल है, उसके अलार्म का इस्ेमाल करें। बेवजह विवाद में पडऩे की क्या जरूरत है। कोई करे या न करे मुसलमानों को कानून का पालन करना चाहिए। उनके लिए यह एक प्रकार से देशभक्ति ही है।
इस्लाम में पांच वक्त की नमाज के लिए पांच बार अजान की पुकार दी जाती है- फजर (4-4.30 बजे भोर में) जोहर (12 बजे-12.10 पर दिन में), असर (4-4.30बजे दिन ढले), मगरिब, (5-5.30 शाम), ईशा (8 से लेकर 8.30 तक रात में)।
अधिकतर सुबह (फज़र) की अजान को लेकर असुविधा व्यक्त की जाती है। रात के बारह बज रहे हैं और इस मुस्लिम बहुल आबादी में खाजा बाबा के उर्स पर जलसा हो रहा है, लाउडस्पीकर की तेज आवाज से यकीनन लोगों की नींद में खलल पड़ रही होगी। इन शान-ए-औलिया कान्फ्रेंस से इस्लाम का कितना लाभ हो रहा है इसका पता तो नहीं है लेकिन घरों में आराम कर रहे लोगों को इस चीख भरी तकरीर से परेशानी जरूर हो रही है। लेकिन इसका एहसास उन चंदापरस्त मुसलमानों को नहीं है। उधर देश में एक बाबू खान हैं जो लाउडस्पीकर से नमाज़ और अजान को पाक रखने के लिए वर्षों से मुहिम छेड़े हुए हैं। उनका मानना है कि इस्लाम में इस प्रकार यांत्रिक प्रचार या इस्तेमाल की इजाजत नहीं होनी चाहिए। कुछ लोग यह भी कह रहे हैं कि तब तो मस्जिदों में इलेक्ट्रिक बल्ब और बिजली की रोशनी, हवाई जहाज से हज यात्रा, मशीन द्वारा तैयार किया गया- धार्मिक वस्त्र इत्र, तसवी दाना, नमाज पढऩे को जाय-ए-नमाज़ आदि सबका त्याग कर छठवीं सदी में चले जाना चाहिए। चराग जलाकर कुरआन पढऩी चाहिए और काबा की मुख्य मस्जिद में लगे एसी, माइक, फ्रीज, पंखे सबका बहिष्कार करना चाहिए क्योंकि यह सब काफिरों के अविष्कार है।
वैसे यह सच है कि यदि किसी को धार्मिक आस्था से तकलीफ पहुंचती है तो उससे परहेज करना चाहिए। इस्लाम में तो यहां तक कहा गया है कि यदि किसी को कुरआन पढऩे की तेज आवा•ा से कष्ट हो रहा है तो आप कुरआन धीमी आवाज में पढ़ें- तिलावत बुलंद आवाज में न करें।
मगर यहां तो धर्म का दिखावा अधिक है। धर्म कम है। धर्म के माध्यम से राजनीति हो रही है। धर्म की आड़ में आस्था का बेजा प्रदर्शन कर दहशत पैदा की जा रही है। धर्म को अपनी कुण्ठा-क्रोध और प्रतिशोध दिखलाने का माध्यम बनाया जा रहा हैा।
मुसलमान अजान का सम्मान करते हैं, अजान समाप्त होने के बाद एक दुआ भी पढ़ी जाती है। अजान में है क्या, अल्लाह हो अकबर, अल्लाह (ईश्वर) बड़ा है, नहीं है कोई इबादत के योग्य केवल अल्लाह के, मैं इसकी गवाही देता हूं... आओ नेकी (पुण्य) की ओर आओ- अल्लाह सबसे बड़ा है और हजरत मुहम्मद अल्लाह के रसूल है (नबी है, पैगम्बर है)... हां सुबह की अजान (फजर) में अंतिम पंक्ति बदल जाती है। उसकी अंतिम पंक्ति अन्य चार अजानों से कुछ भिन्न है और बड़ी अर्थपूर्ण है- असलातो खेरून मिन्नोम- 'उठो नींद से बेहतर इबादत है' इस बंद पंक्ति को तीन बार दोहराया जाता है।
अजान देने वाले को मुअज्जिन कहा जाता है, अजान का शाब्दिक अर्थ सुनना होता है। अजान के इतिहास से पता चलता है कि इस्लाम के प्रारंभिक काल में जब नव मुस्लिम छुपछुपाकर इबादत के लिए बुलाए जाते थे तब उन्हें व्यक्तिगत रूप से बुलाया जाता था। फिर ढोल पीटा जाता था। कुछ दिनों तक मशाल जलाकर नमाज के समय की सूचना दी जाती थी। मक्का विजय के बाद जब इस्लाम ने पूर्ण रूप से अरब की धरती पर अपना वर्चस्व स्थापित कर लिया तब अजान की बुनियाद पड़ी। हजरत मुहम्मद साहब के हुक्म से काबा की छत पर चढ़कर आजाद किए गए एक हब्शीर अफ्रीकन गुलाम बिलाल इब्नए-रबाह ने अजान दी। हजरत बिलाल ने किस वक्त की अजान दी थी, इसका जिक्र नहीं मिलता है। बिलाल की आवाज़ बड़ी बुलंद थी और सुरीली भी थी। जिसे सुनकर अरबियों में आस्था की लहर जागती थी। इस प्रकार हजरत मोहम्मद साहब ने एक उपेक्षित अफ्रीकन काले व्यक्ति को इस्लाम का पहला मुज्जन (अजान देने वाला) स्थापित किया जो उन अहंकारी अरबियों के लिए क्रांति जैसी बात थी और इसे स्वीकार कराना भी मुश्किल था, लेकिन मुहम्मद साहब ने अपने प्रभाव से यह कर दिखाया और उस उपेक्षित काले हब्शी को मुअज्जिन जैसा सम्मान दिया।
विलियम मोर ने अपनी पुस्तक 'मोहम्मद...' में उल्लेख दिया है कि कुरेश कबीला में सभ्रांत लोग बिलाल को उनके रंग रूप के कारण उनकी उपेक्षा करते हुए उन्हें 'इब्न-ए-सौदा' काली कलूटी मां का पुत्र कहकर बुलाते थे, लेकिन हजरत मुहम्मद साहब ने बिलाल को सम्मान दिया। हजरत मुहम्मद साहब के देहांत (632 ई.) के बाद बिलाल की उपेक्षा होने लगी। उनसे मुज्जन का पद भी छीन लिया गया वे खलीफाओं के कोप का शिकार भी होते रहे, अंत में दुखी होकर बिलाल सीरिया चले गए। कहा जाता है कि खलीफा उमर से कुछ लोगों ने निवेदन किया कि एक बार वे हजरत बिलाल से अजान देने को कहे... और हजरत उमर के निवेदन पर बिलाल ने अजान दी। उसी जोश मधुरिमा और आवाज़ की बुलंदी में अजान देकर अरबवासियों को अपनी उपस्थिति से आगाह किया। बिलाल की अजान सुनकर अरबवासियों को हजरत मुहम्मद साहब की याद हो आई और उनकी स्मृतियों में लोग डूब गए। उल्लेख आता है कि बिलाल अपने अंतिम समय में बहुत दुखी और उपेक्षित हो गए थे। सीरिया में 642 ई. में 63 वर्ष की आयु में बिलाल ने दम तोड़ दिया। यही उनका मकबरा भी है। लेकिन बिलाल की मृत्यु को लेकर कई तरह के विवरण मिलते हैं, यही नहीं उनके मकबरे का भी कोई प्रमाणिक इतिहास नहीं मिलता।
अजान को लेकर खुद मुसलमानों में कई तरह के विचार हैं। शिया, सुन्नी की अलग-अलग अजान है। जो अजान सर्वप्रथम बिलाल के काबा की छत पर चढ़ कर दी थी आज उस अजान में कई तरह के बदलाव आ गए हैं- शिया, सुन्नी, फातिमी, इस्माइली, दाऊदी बोहरा के अलग-अलग अजान हैं, लेकिन सबके अजान में बुनियादी तथ्य एक ही है कि अल्लाह सबसे बड़ा है, उसके सिवाय कोई खुदा नहीं और हजरत मुहम्मद साहब खुदा के नबी हैं। मगर शियाओं ने अपनी अजान में 'यलीअन वलीउल्ला'जोड़ा, जिसका अर्थ है कि अली अल्लाह के वली अर्थात उत्तराधिकारी हैं।
यह भी सच है कि कई मुल्कों में लाउडस्पीकर से तेज आवाज़ में अजान देने पर पाबंदी है। तुर्की में अतातुर कमाल पाशा (1923-1938) ने तो अरबी भाषा की अजान पर प्रतिबंध लगा दिया था और तुर्की भाषा में अजान देने का आदेश दे दिया था। इस आदेश का विरोध करने वालों को फांसी पर लटका दिया गया। लेकिन यह बहुत दिनों तक नहीं चल सका। 16 जुलाई 1950 में अदनान मैंडेरेश की नई सरकार ने फिर से अरबी मूल की अजान बहाल कर दी और स्वयं शपथ भी उन्होंने अरबी में ली, यही नहीं तुर्की के नए राष्ट्रगीत में खुदा, इस्लाम और अजान का उल्लेख भी किया गया।
भारत में सुन्नी अजान का ही अधिक प्रचलन है, और इसी अजान पर समय-समय पर प्रश्न चिन्ह लगते रहे हैं, क्योंकि इन्हीं को मस्जिदों में तेज माइक से देने का अधिक प्रचलन है। कहीं-कहीं तो मस्जिदों में लाउडस्पीकर को इको साउंड में सेट करके अजान दी जाती है। जिससे अजान की पुकार डरावनी भयावह ध्वनि बनकर वातावरण में फैलती है और गैर मुस्लिमों में दहशत का संचार करती है। इसमें दिल के मरीज, सोये हुए बच्चे, बीमार परेशान होते हैं, मगर कोई नहीं बोलता, जबकि अजान का मजाक बनाने वालों के प्रति स्वयं मुसलमानों को विरोध करना चाहिए और जब दूसरा कोई विरोध करता है तो भाई लोग हाय हल्ला करने लगते हैं। धर्म में यह जो तमाशा है, इसी से लोगों को परेशानी है, नहीं तो आप आस्था के नाम पर उल्टा लटके रहिए, त्रिशूल पर खड़े हो जाइये, तलवार पर चलकर कट मरिये, इससे किसी का क्या आता-जाता है। कहीं-कहीं अजान नमाज से भी अधिक धर्म संगत और पवित्र समझी जाती है। गांवों में बीमारी, आपदा, विपत्ति महामारी के समय मस्जिदों में ईशा (रात की अजान) सात-सात बार दी जाती है। उनका विश्वास है कि अजान की आवाज से प्रेत, शैतान और गै़बी आपदा दूर भागती है।
धर्म के नाम पर ऐसे टोटके, मान्यताएं अन्य धर्मों के साथ इस्लाम में भी खूब प्रचलन में है। मुसलमान भी डीजे और धूम धड़ाके के साथ अपने-अपने पीर बाबाओं का जुलूस निकालते हैं लेकिन मस्जिद के सामने आते ही गाना-बजाना बंद कर देते हैं। या अजान की आयत कान में टकराते ही गाली-गलौज और गलत हरकतें रोक देते हैं। मुसलमानों में कम से कम अभी इतना सम्मान अजान के प्रति बचा हुआ है- ताश खेलने वाला पत्ता रोक देता है, गाली देने वाला गाल पर हाथ रख क्षमा मांगता है। कुछ लोग जो अजान देते हैं वे अपनी गायन शैली की भी भड़ास निकालते हैं जो इस्लामी सिद्घांत के विरुद्घ है। अकबर इलाहाबादी (1846-1921) ने ऐसे ही लोगों के लिए कहा था- ''उन्हें है शौक-ए-इबादत और गाने की आदत भी, निकलती है दुआएं उनके मुंह से ठुमरियां होकर''।
इस अजान प्रकरण में सामाजिक कार्यकर्ता अग्निवेश ने कबीर को कोट कर अपनी बात की सार्थकता स्थापित की है। कबीर का यह दोहा प्राय: हम सभी पढ़ चुके हैं-
''कांकर पाथर जोरि के मस्जिद लेई बनाय।
ता चढि़ मुल्ला बांग दे, क्या बहरा हुआ खुदाय।''
दरअसल यह दोहा उस दोहे के तोड़ में रखा गया जिसमें कबीर कहते हैं कि-
''पाहन पूजे हरि मिले, तो मैं पुंजू पहाड़।''
या
''घर की चाकी कोऊ न पूजै, जाकी पीसा खाय।।''
स्वामी जैसे हजारों विद्वानों, लेखकों, बुद्घिजीवियों ने इस दोहे (कांकर पाथर...) को समय-समय पर उद्घृत कर अपनी धर्मनिरपेक्षता व्यक्त की है। मगर यह दोहा (कांकर पाथर...) अपने अर्थ कथ्य को दृष्टि से अशुद्घ अर्थहीन है। पहली बात तो यह है कि अजान खुदा को नहीं सुनाई जाती है। यह नमाजियों को जगाने-बुलाने का एक प्रकार से आह्वान है। मगर इस पर किसी ने गौर नहीं किया। अभी हाल ही में एक केन्द्रीय मंत्री महोदया ने भी कह दिया कि हर घंटे अजान होती है। क्या खुदा बहरा है... मंत्री महोदया को मालूम होना चाहिए, अजान और नमाज केवल पांच वक्त होती है सुबह, दोपहर, दोपहर के बाद, शाम को और अंत में रात के 9 बजे के आसपास। कबीर को क्या खुदा, इस्लाम, अजान के विषय में कोई जानकारी नहीं थी? बिलकुल थी। उन्होंने खुदा-ईश्वर, इस्लाम और अजान, हज पर भी प्रचुर मात्रा में दोहे, शबद वाणी कहे हैं। दरअसल कबीर ने धर्म के नाम पर हो रहे अधर्म, कुकर्म, रुढि़, कर्मकांडों पर खुलकर प्रहार किया। उन्होंने हिन्दू-मुसलमानों के प्रचलित कर्मकांडों पर तर्कसंगत अपनी बात रखकर यह बताना चाहा है कि वे धर्म के नाम पर जो कष्ट भोग रहे हैं यह धर्म नहीं है।
कबीर का यह जो प्रचलित दोहा (कांकर पाथर....) है उसमें मूल रूप से गलती यह हुई है कि संग्रहकर्ताओं, समीक्षकों और भाष्यकारों ने तथ्य की दृष्टि से दोहे को न उद्घृत कर दो धर्मों के बीच प्रचलित कर्मकांडों पर प्रहार करने वाले दोहे को प्रस्तुत कर साम्प्रदायिक द्वेष को कम करने की चेष्टा की है। कबीर के दोहे शबद, रमैनी आदि उनके शिष्यों के माध्यम से संग्रहित किए गए हैं अर्थात कबीर का सृजन श्रुति आधारित है अत: वर्तनी की अशुद्घि के कारण ''कांकर पाथर....'' वाला दोहा अर्थहीन हो गया है। गुरुग्रंथ साहिब में संग्रहित होने का स्वरभाव गुरुमुखी हो गए हैं। उन दोहों के भाव तो नहीं बदले लेकिन स्वर ट्यून बदल गए हैं। अर्थात कबीर को जिसने भी उद्घृत किया उसे अपनी संस्कृति-स्वर संस्कार के नजरिए से उद्घृत किया। जिन-जिन माध्यमों से ऐसी श्रुतियां ली गई है, वहां अशुद्घियों का होना कोई नई बात नहीं है। कबीर के यहां भी इस प्रकार की अशुद्घियां-अर्थहीनता भयंकर रूप से हुई है। ध्यान देना चाहिए था कि मस्जिद स्त्रीलिंग है और ''मस्जिद लेई बनाय''के जगह ''बनाई'' होना चाहिए था। केवल ''य'' के स्थान पर ''ई'' कर देने से दोहा अपने अर्थकथ्य में पूर्ण हो जाएगा। अर्थात् कबीर का यह दोहा (प्रचलित) कांकर-पाथर... इस प्रकार होना चाहिए-
''कांकर-पाथर जोरि के मस्जिद लेई बनाई।
ता चढि़ मुल्ला बांग दे, क्या बहरी हुई खुदाई।।''
अब इसका यूं अर्थ हो जाएगा कि कंकर पत्थर जोड़कर मुसलमानों ने मस्जिद तो बना ली और उस पर चढ़कर बांग (अजान) दे रहे हैं तो क्या (खुदा नहीं) खुदाई-दुनिया (नमाजी) बहरी है। इस प्रकार अजान का अर्थ और भाव कथ्य सच-शुद्घ सार्थक और अर्थपूर्ण हो जाता है।
आशा है कबीर विशेषज्ञों, चिंतकों, अध्यापकों, प्राध्यापकों के लिए कबीर के इस प्रचलित दोहे का शुद्घ अर्थपूर्ण और संशोधित संस्करण कुछ नया सोचने की दिशा में एक तुच्छ कदम सिद्घ होगा।
और डॉ. अल्लामा इकबाल (1877-1938) के इस शे'र और उससे संबंधित उस घटना का उल्लेख कर अपनी बात खत्म करता हूं।
''मस्जिद तो बना ली शब भर में, इमां की हरारत वालों ने
मन अपना पुराना पापी था, बरसों से नमाजी हो न सका।''
उल्लेखनीय है कि पाकिस्तान में एक मस्जिद है, जिसका नाम मस्जिद शब भर है यानि एक ही रात में निर्माण की हुई मस्जिद। कहा जाता है कि यह विवादित जमीन थी। जिस पर अगले दिन कोर्ट का फैसला आना था। उस खाली जमीन पर मालिकाना हक पाने वाला मस्जिद बनने नहीं देता। इसलिए रातों रात उस खाली जमीन पर सैकड़ों लोगों ने मिलकर मस्जिद की तामीर कर दी।
यह घटना इकबाल को अच्छी नहीं लगी और उसने उपर्युक्त शे'र कहकर अपना दुख व्यक्त किया।
अजान पर एक बात और ध्यान देने योग्य है कि रमजान में अजान की बड़ी अहमियत हो जाती है। वह भी शाम यानी मगरिब की अजान जो छ: बजे के आसपास होती है। यह अजान सुनकर रोजेदार रोजा तोड़ते हैं। अजान देने वाले अर्थात् मुअज्जिन स्वयं कुछ खाकर रोजा तोड़ता है फिर वह अजान देता है। उसके बाद रोजेदारों को सुबह फजर की अजान तक खाने-पीने की इजाजत होती है। शाम मगरिब की अजान के बाद मस्जिदों में लाल बत्ती जल जाती है जो नकारात्मकता, निषेधात्मक की सूचक है, जलनी चाहिए हरी बत्ती, लेकिन इसमें कोई संशोधन नहीं कर सकता। वजू करते समय नल खोलकर कई बाल्टी पानी लोग गिरा देते हैं। पानी की किल्लत की वजह से चुल्लू भर-भरकर वजू करने का अरब में नियम बना। लेकिन इन सब रुढिय़ों पर कोई नहीं बोल सकता, नई सोच के लोगों को इस्लाम के मशीनीकरण के साथ-साथ इन सब बातों पर विचार करना चाहिए।