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Thursday 23 Nov 2017

एक नजर में हिन्दी गजल

हिन्दुस्तान में गजल का इतिहास बहुत पुराना है। यों इसका जन्म तो ईरान में हुआ, लेकिन गज़ल एक लोकप्रिय विधा के रूप में तब स्थापित हुई जब यह उर्दू में लिखी गई। उर्दू में वली दकनी गज़ल के पहले शायर माने गए, जिन्होंने गज़ल को अरबी-फारसी से निकालकर आम बोलचाल की लश्करी जबान में लिखा। ग़ज़ल का उद्भव तशबीब से माना गया है, जो कसीदे में प्रयुक्त एक प्रकार का प्रेम काव्य है, ग़ज़ल का अर्थ भी 'औरतों से बात करना है। अत: अपनी प्रारंभिक अवस्था में गज़ल विषयगत दृष्टि से यौवन-वर्णन, प्रेम तथा श्रृंगार तक ही सीमित रही। वली दकनी से गालिब, मीर, फैज़ , फिराक तक यह परंपरा मौजूद रही, लेकिन जदीद शायरी में प्रेम के साथ आम लोगों की पीड़ा, सुख, दु:ख आदि का निरुपण होने लगा। वली दकनी से गालिब तक का काल उर्दू शायरी के उत्थान का काल है। इन शायरों ने ग़ज़ल को इतना लोकप्रिय बना दिया कि एक समय में शायरी का मतलब ग़ज़ल ही समझा जाने लगा। आज उर्दू शायरी ग़ज़ल के बिना अधूरी है। यों गज़़ल की आलोचना भी कम नहींहुई। कहा गया कि गज़़ल का दामन तंग होता है। इश्क-व-आशिकी के सिवा यहां कुछ नहीं है। ग़ज़ल के शायरों को पाबंदियों (काफिया, रदीफ बहर आदि) का सामना करना पड़ता है। इस ऐतराज के बाद भी ग़ज़ल आगे बढ़ती गई, क्योंकि यही बंदिश और प्रेम का वैविध्यपूर्ण वर्णन तो ग़ज़ल की विशेषता है।
ग़ज़ल का अपना एक बुनियादी ढांचा है। यह एक छंदोबद्घ काव्य है, जो काफिया, रदीफ, बहर, मतला, मकता आदि का पालन करती है। गज़ल का प्रत्येक शेर कथ्य के प्रकटीकरण का स्वयंमेव सशक्त माध्यम है। ग़ज़ल एक छांदसिक पद्यात्मक विधा है। ग़ज़ल के लिए निर्धारित पारंपरिक बहरों का होना जरूरी है, साथ ही यह भी लाजिमी है कि उसमें शेरियत हो। सिर्फ छंद का अनुपालन कर लेने से कोई काव्य विधा ग़ज़ल नहीं बन जाती। गज़ल में वह शक्ति है कि यह हमारे दिलों पर राज करती है। इसलिए इसे उर्दू कविता का 'मुकुटमणि' कहा गया है। ग़ज़ल हमारे समाज का सुंदर चित्र प्रस्तुत करती है। इसमें खुदगर्जी है तो भाईचारगी भी है, रिन्द है तो सूफियानापन भी है।
हिन्दुस्तान में ग़ज़ल लेखन की शुरूआत अमीर खुसरो से मानी जाती है। उन्होंने अपने अनुभवों को तत्कालीन बोलचाल की भाषा में ही व्यक्त किया है। उनके बाद बाबा हुसैनी और वा'न ने रेख़्ता में ग़ज़लें लिखीं। उर्दू में ग़ज़ल लाने का श्रेय दक्षिण के बादशाहों को है। इसमें कुली कुतुबशाह, आदिल शाह आदि विशेष महत्व रखते हैं। आज उर्दू शायरी जिस रूप में है उसका बीजारोपण वली दकनी ने किया। वली जब ग़ज़ल लेकर दिल्ली पहुंचे तो लोग उनकी रचनाओं से प्रभावित हुए बिना नही रह सके। उर्दू में जो ग़ज़ल लिखने की धूम मची, वह आज भी कायम है। आठवी सदी तक तो उर्दू में मीर, सौदा, दर्द, नासिख, तिश जैसी एक से एक हस्तियां पैदा हो गई थीं। फिर जब इसे गालिब, जौंक, मोमिन, दाग आदि उस्ताद शायरों ने अपना लिया तो ग़ज़ल उस दुल्हन की तरह निखर गई जिसे चाहने वाले बड़े-बूढ़े, बच्चे सब होगए।
वर्तमान दौर में भी उर्दू साहित्य को गज़ल के कई उम्दा शायर दिए और आज भी गज़ल की दुनिया का कई नामवर नाम मौजूद है। निजा फाजली, शहरयार, डॉ. बशीर बद्र, परवीन शाकिर, मोनव्वर राना, वसीम बरेलवी आदि ऐसे कितने ही चमकते हुए नाम हैं।
उर्दू गज़ल की इस लोकप्रियता ने हिन्दुस्तान की अन्य भाषाओं, लोकभाषाओं को भी अपनी ओर आकृष्ट किया। हिन्दी में भी गज़लें लिखी जाने लगीं और कहना न होगा कि उर्दू के बाद सबसे ज्यादा हिन्दी में ही गज़लें लिखी गईं। हिन्दी गज़लों के सूत्र अमीर खुसरो और कबीर से जोड़े गए, लेकिन सच तो यह है कि कबीर ने गज़ल के तौर पर गज़ल नहीं लिखी। भारतेन्दु ने भी 'रसा' उपनाम से इसे अपनाया। द्विवेदी युग में हिरऔध और छायावाद काल में प्रसाद और निराला ने भी गज़ल में आजमाइश की लेकिन एक विधा के तौर पर गज़ल को दुष्यंत ने ही लिया। यों दुष्यंत से पहले शमशेर, बलवीर सिंह रंग और बाबा त्रिलोचन भी इस फन को आजमा चुके थे. तभी तो दुष्यंत ने इसे स्वीकारते हुए लिखा था कि गज़ल मुझ पर नाजिल नहीं हुई। मैं पिछले पच्चीस वर्षों से इसे सुनता और पसंद करता आ रहा हूं। बावजूद इसके हिन्दी गज़ल आज जिस रूप में है, उसे लाने का श्रेय दुष्यंत को ही है। जैसे वली दकनी ने गज़ल लिखकर गज़ल का एक माहौल बना दिया था, वैसे ही दुष्यंत ने भी इस क्षेत्र में क्रांति फैला दी।
दुष्यंत अपने शेरों के जरिए अपने समय की स्थिति का बयान करते हैं। सत्ता से बगावत और विद्रोह की आवाज बुलंद करते हैं और इस कोशिश में अकेले हो जाते हैं। दुष्यंत की पूरी शायरी सर्वहारा वर्ग के लिए थी। दुष्यंत की शायरी में पहली बार गज़ल सर्वहारा वर्ग के दवाजे से बाहर आकर सामाजिक चुनौतियों और सरोकारों के साथ जुड़ गईं। दुष्यंत की गज़लों में जो विद्रोह और रोष है उसकी गरमाहट बहुत दूर तक पहुंची है। उनकी पैनी निगाह से राजनीति, व्यवस्था, दुष्चक्र कुछ नहीं बच पाता।
दुष्यंत के बाद सैकड़ों शायरों ने इस विधा को अपनाया और अपनी शिनाख्त दर्ज की। ज़हीर कुरैशी, सूर्यभानु गुप्त, अदम गोंडवी, नीरज, राजेश रेड्डी, कमलेश भट्ट कमल, उर्मिलेश, चन्द्रसेन विराट ऐसे ही नाम हैं, जिनके बिना के बिना हिन्दी गज़ल की बात अधूरी रहेगी। विज्ञान व्रत छोटी बहरों को अपनाते हैं। चंद्रसेन विराट गज़ल में तत्सम शब्दों को पिरोते हैं, तो ज़हीर कुरैशी अपनी हिन्दी गज़ल को आम लोगों की पीड़ा से जोड़ते हैं।
आज हिन्दी उर्दू दोनों में समान रूप से गज़लें लिखी जा रही है। कथ्य के स्तर पर दोनों में एकरूपता है, लेकिन प्रस्तुतीकरण के लिहाज से आज भी हिन्दी गज़ल उर्दू गज़ल के सामने खरी नहीं उतरती। हिन्दी में वे भी धड़़ल्ले से गज़लें लिख रहे हैं, जिन्हें गज़ल के बुनियाद तत्व की भी जानकारी नहीं है। क़ाफिया , रदीफ की गलती कर रहे हैं।
बावजूद इसके हिन्दी गज़ल आज भी बहुपठित काव्य विधा है। देश की पत्रिकाओं में गज़लें छप रही हैं। विश्वविद्यालय के पाठ्यक्रम में इसे शामिल किया गया है। पचास से अधिक छात्र विभिन्न विश्वविद्यालयों में गज़ल पर शोध कर रहे हैं। गज़ल के विकास और इतिहास पर प्रामाणिक पुस्तकें उपलब्ध हैं। उर्दू के साथ हिन्दी गज़ल की लोकप्रियता देखते हुए, अन्य भाषाओं ने भी इसे अपनाया। आज लगभग हिन्दुस्तान की सारी भाषाओं में गज़लें कही जा रही हैं। मैथिली, मगही, भोजपुरी और अन्य लोकभाषाओं ने भी गज़लों को अपनाया है। और यहां भी बेहतर गज़लें रची जा रही हैं। कहना न होगा कि उर्दू-हिन्दी और लोकभाषाओं की गज़लें हिन्दी साहित्य के इतिहास में अपना स्थान बना सकेंगी। वह इसलिए भी कि गूढ़ से गूढ़ तथा सूक्ष्म विषयों को भी कम से कम शब्दों में पूरी कलात्मकता के साथ रखने वाली काव्य विधा हिन्दी काव्य परम्परा में गज़ल को छोड़कर और कोई नहीं है।