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Wednesday 22 Nov 2017

विस्मृत लालित्य की खोज

मुख्यधारा के आंदोलनों एवं विचार सरणियों के विपरीत अथवा समानांतर सक्रियता निश्चित रूप से साहसिकता की मांग करती है। इस उपक्रम के साथ विस्मृति के खोह में ढकेल दिए जाने का खतरा भी मौजूद होता है। ऐसे विपरीत गामी प्रयत्न उपेक्षा का दंश झेलने के लिए भी अभिशप्त होते हैं। कुबेरनाथ राय एवं स्वामी सहजानंद सरस्वती साहित्य एवं राजनीति के ऐसे दो व्यक्तित्व हैं जिन पर उपर्युक्त स्थापना सटीक रूप से लागू होती है। कुबेरनाथ राय हिन्दी की ललित निबंध परंपरा के कीर्तिमान पुरुष हैं। वे आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी की निबंध परम्परा के समर्थ प्रतिनिधि हैं, जिनके निबंधों में गंभीर पांडित्य के साथ-साथ एक विश्लेषणात्मक मेधा एवं भारतीय संस्कृित के वृहत्तर आयामों से सन्नद्ध एक विचार प्रवण दृष्टि है। उनके ललित निबंधों में ग्राम एवं कृषि संस्कृति में निहित मानवीय संबंधों, रागात्मक मूल्यबोध एवं सांस्कृतिक परिवेश की रम्यता और आकांक्षाओं का स्थितिशील सभ्यता विमर्श अपने पूरे वैभव के साथ मौजूद है। इनमें भारत की सांस्कृतिक अस्मिता की तलाश का स्वप्निल संदर्भ भी है और उसका मनोहर पाठ भी। एक ललित निबंधकार के लिए आवश्यक स्वत:स्फूर्तता, कल्पना का प्राधान्य, आकर्षण वैयक्तिकता जैसे गुण कुबेरनाथ राय के निबंधों में प्रचुरता से उपलब्ध होते हैं। रवीन्द्रनाथ ने ललित निबंधकार को ज्ञानपथी न कहकर भावपथ का पथिक कहा है। वह भावजगत की सुषमा और सुनृत के प्रति उन्मुख होता है। कुबेरनाथ राय 'आनंद शैव सिद्धांत' में आस्थावान हैं। प्रकृित की सुषमा में वे धरती के पुण्य एवं नारी में सृष्टि के पुण्य का साक्षात्कार करते हैं। इस सत्य को अस्वीकार करने वाले साहित्य को वे मनुष्य विरोधी मानते हैं। समकालीन साहित्य मेंं नारी, प्रकृति और ईश्वर की अनुपस्थिति उन्हें विचलित करती है। उनकी दृष्टि में समकालीन साहित्य मानव नियति की उदात्त कल्पना से वंचित एवं सत्यं, शिवम, सुंदरम के आनंददायी त्रिक से निरपेक्ष है। संभवत: साहित्य की समकालीन प्रवृत्तियों के प्रति उनका उपेक्षा भाव आलोचकों को उनके साहित्य की समुचित अभिशंसा से विरत रखता है। कारण चाहे कुछ भी हो, हिन्दी के इस विशिष्ट ललित निबंधकार की वादानुवाद में निमग्न आग्रह सम्पन्न आलोचना ने उपेक्षा की है, इसमें शक नहीं है। इसी उपेक्षा की भरपाई करने का प्रयास किया है युवा सम्पादक मुहम्मद हारून रशीद खान ने। उन्होंने श्री राय के मरणोपरांत उनकी कई पुस्तकों का सम्पादन किया है। इसी क्रम में उनकी दो कृतियों क्रमश: 'रस आखेटक' एवं 'कुबेरनाथ राय की दृष्टि में स्वामी सहजानंद सरस्वती' का सम्पादन-प्रकाशन कर उन्होंने साहित्य एवं राजनीति के उन उपेक्षित नायकों के कृतित्व के पुनर्मूल्यांकन की पीठिका प्रस्तुत की है। इन दोनों पुस्तकों की भूमिका में सम्पादक ने कई जरूरी सवाल खड़े किए हैं जिनके उत्तर हिन्दी आलोचना को देने पड़ेंगे। कुबेरनाथ राय के ललित निबंध पाठकों- आलोचकों के लिए एक चुनौती प्रस्तुत करते हैं। इस चुनौती को ठीक ढंग से स्वीकार न कर पाने के कारण उन पर बोझिलता और अप्रगतिशीलता जैसे आक्षेप भी चस्पा किए जाते हैं। हारुन रशीद ने लिखा है, 'कुबेरनाथ राय हिन्दी के प्रगतिशील आलोचकों की उपेक्षा से बिंधते रहे, क्योंकि उन्होंने इन्हें 'प्रतिक्रियावादी', 'हिन्दूवादी' लेखक मानकर उनकी उपेक्षा की है।'
हिन्दी साहित्य ललित निबंध की सुपरिभाषित परम्परा की दृष्टि से कोई विपुलता का संभार वहन नहीं करता। प्रकीर्ण उपस्थितियों के क्रम में आचार्य द्विवेदी के निबंधन प्रौढि़ एवं प्रतिमानगत छलांग के उदाहरण हैं। हिन्दी ललित निबंध की समूची परम्परा पर आ. द्विवेदी के व्यक्तित्व की अमिट छाप है। उनके परवर्ती निबंधकार इस परम्परा की व्याख्या नहीं करते बल्कि लालित्य तत्व की केन्द्रीयता का सबमें सहज स्वीकार है। लालित्य के अभिनिवेश के इस उपक्रम में भाषिक क्लिष्टता, उद्धरण बहुलता, शब्दों की व्युत्पति के प्रति अतिरिक्त मोहाकुलता एवं संस्कृति बोध के नाम पर अतीत प्रेम मुखर हो उठता है। आधुनिकता के अस्वीकार तथा विट् एवं रोचक व्यंग्य की अनुपस्थिति कई बार ललित निबंधों के समक्ष साधारणीकरण की समस्या खड़ी करते हैं।
दरअसल श्री राय की वैचारिक समानांतरता टी.एस. इलियट से है जो धार्मिक आस्था के स्तर पर रोमन कैथोलिक, राजनीतिक मतवाद में राजशाही के समर्थक और साहित्यिक अभिरुचि में शास्त्रीयतावादी थे। कुबेरनाथ राय धार्मिक आस्था के स्तर पर सनातनी और साहित्यिक संवेदना में शास्त्रीयतावादी रुझानों के समीप थे। किन्तु प्रश्न यह है कि क्या किसी लेखक के व्यक्तिगत मताग्रह उसके गौरवमय एवं विराट फलक पर किए गए लेखन को अवमूल्यित करने का आधार बन सकते हैं। क्या इससे उनके लेखन की विलक्षणता, व्यापक एवं गंभीर सांस्कृतिक दृष्टि, कल्पनाशीलता, बहुकालिक स्मृति पर्यटन जैसी विशिष्टताओं की अवहेलना संभव है? क्या आलोचकीय तात्कालिकता किसी लेखक के साहित्यिक अवदान के आस्वादन-मूल्यांकन को बाधित कर व्यापक साहित्यिक संस्कृति की क्षति नहीं कर रही है? ये सभी प्रश्न विशेष रूप से कुबेरनाथ राय के संदर्भ में उत्तर की अपेक्षा रखते हैं।
कुबेरनाथ राय ने अपने निबंधों को 'क्रुद्ध ललित' एवं शीलनद्ध घोषित किया है। इनकी सोद्देश्यता हिन्दी पाठकों के मानसिक क्षितिज के विस्तार में निहित है। वे रचना की आधारभूमि के रूप में देशी संस्कारों की कठोर जमीन पर खड़े हैं। इसी भूमिका में वे भारतीयता का संयोग विश्व चेतना से कराते हैं जो मानसिक ऋद्धि का अर्जन करता है। साहित्यकार के रूप में श्री राय स्वयं को भरतमुनि का शिष्य मानते हैं। यही शिष्यतत्व रंजित संस्कार पुरुषार्थ चतुष्टर्यों में मोक्ष के पहले सौन्दर्य बोध को जोडऩे में विशिष्ट भूमिका का निर्वहन करता है। 'गंधमादन' में उन्होंने लिखा है 'साहित्य मोक्ष का ही लौकिक रूपांतर है क्योंकि मोक्ष और साहित्य दोनों का अनुभव भोक्ता के सांसारिक व्यकित्त्व के लोप की अपेक्षा करते हैं, और दोनों का अनुभव शुद्ध आनंद है।' प्रकारांतर से यह 'रसानंद को ब्रह्मानंद सहोदर' मानना ही है। वे 'रस' को सार्वभौम एवं सार्वकालिक साहित्यिक मूल्य के रूप में देखते हैं। वे मनुष्यता की चेतना को ईश्वरीयता, रहस्य बोध और सौंदर्यबोध से संबद्ध करते हैं जो परस्पर सम्पृक्त भी है।
'रस आखेटक' निबंध संग्रह 1970 में सर्वप्रथम प्रकाशित हुआ था। छायावादोत्तर काल में आलोचकों ने साहित्य के प्रतिमान के रूप में रस को खारिज कर दिया। इसकी प्रतिक्रिया स्वरूप श्री राय रस की पुनप्र्रतिष्ठा के आकांक्षी हैं। उनकी दृष्टि में साहित्यकार का उद्देश्य 'पंचकोषीय मनुष्यता की पुष्टि-तुष्टि' करना है। जातीय मानस से तादात्म्य के बिना साहित्य सार्वकालिक एवं सार्वजनीन आस्वादन तथा आनंद का स्रोत नहीं हो सकता। केवल इतिहास चेतना को लेकर प्रामाणिक और महत्वपूर्ण साहित्य नहीं लिखा जा सकता।
'विषाद योग' में वे साहित्य की चतुष्पादी व्याख्या करते हैं। काव्य को वे स्वर्णपाद, निबंधन एवं प्रबंधात्मक साहित्य को रजतपाद की संज्ञा देते हैं। विपुलकाय कथा साहित्य उनकी दृष्टि में ताम्रपाद है तथा पत्रकारिता है लौहपाद जो एक प्रति साहित्य भी है। निश्चित रूप से इस स्थापना से पूर्ण सहमति कठिन है क्योंकि कथा साहित्य ही आधुनिक युग का प्रतिनिधि साहित्य है। रसवादी दृष्टि के प्रति अतिशय आग्रह एवं उन्हें आधुनिक जीवन की जटिलता के समर्थ अंकन में काव्य की सीमा का अनुभव नहीं होने देते। काव्य सामंती समाज की प्रतिनिधि विधा थी। आज महाकाव्यों और प्रबंध काव्यों का युग नहीं है। जीवन की जटिलता के प्रातिभ ज्ञान के लिए कथा साहित्य विशेषकर उपन्यास की आवश्यकता है।
श्री राय की साहित्यिक दृष्टि शास्त्रीयता सम्पन्न शुद्धतावादी है। उनके लिए साहित्यिक श्रेष्ठता के मापदंड हैं, मेघदूत और कामायनी। वे मानव मन और संस्कृति की उदात अभिव्यंजना के पैरोकार हैं। वे कवि कर्म के केन्द्र में पुन: कल्पना को प्रतिष्ठित करना चाहते हैं। इसके लिए प्रकृति और नारी दोनों के सम्मोहन से आहत होने की क्षमता आवश्यक है। साहित्य सत्ता के वर्तमान बोध तक सीमित नहीं। श्री राय के साहित्यिक-सांस्कृतिक बोध में लोक संस्कृति का प्रमुख स्थान है जिसे वे कृषि संस्कृति की सहोदरा बताते हैं। वे कृषि संस्कृति की शांत और स्थिर पीठिका में ही 'रस रुचि' 'शीलधार' और 'पाकशास्त्र'आदि से सम्पृक्त संस्कार परम्परा की कल्पना कर पाते हैं। उनकी साहित्य साधना देहता का अतिक्रमण और अधिमानस की संभावनाओं का मूर्तन है। उनके साहित्यिक संस्कार की आधारभूमि है, मन एवं पराचैतन्य के तल का जीवन।
श्री राय ने स्वीकार किया है कि उनकी वैष्णवता का झुकाव आनंदवादी शैव सिद्धांत की ओर है। शास्त्रीयतावादी एवं आनंदवादी रुझानों के बावजूद शोषण एवं अत्याचार के सामाजिक रूपों के प्रति वे सजग हैं एवं अपनी लेखकीय भूमिका में उसका तीव्र प्रतिकार करते हैं। दलितों द्वारा गोबर के अन्न बीनते देख वे सात्विक रोष से भर उठते हैं, ''रस आखेटक जब यह सब सोचता है उसकी आत्मा में घाव हो जाता है, उसका घोड़ा तनकर खड़ा हो जाता है, उसके मन में क्रोध के पवित्र फूल फूटने लगते हैं। 'होमर : आत्मकथ्य' शीर्षक निबंध में वे ग्रीक महाकाव्यों की सांस्कृतिक-ऐतिहासिक विवेचना करते हैं। इस क्रम में उन्होंने यूरोपीय तथा भारतीय साहित्य की मूलभूत विशिष्टताओं को रेखांकित किया है। उनकी दृष्टि में ग्रीक महाकाव्यों में वर्णित स्वर ही यूरोपीय साहित्य का सनातन स्वर है। इसके चार आयामों को वे रेखांकित करते हैं। वे क्रमश: यथार्थवाद, विडम्बना, ट्रेजडी और साहसिकता हैं, जिनमें होमर के लगभग दो हजार वर्ष बाद पांचवें आयाम के रूप में ईसाई भावाकुलता का योग होता है। इसके विपरीत भारतीय कवि, वैदिक युग से ही मनुष्य को यथार्थोत्तर, उदात्त और अमृत पुत्र के रूप में देखता है। इसी आर्ष साहित्यिक चेतना से प्रेरित होकर वे वर्ग संघर्ष और वर्ग स्वार्थ वाली इतिहास चेतना का अतिक्रमण करते हैं एवं वैदिक श्रमण संस्कृतियों के समाहार में निष्पति, पारम्परिक अथवा सनातनी दृष्टिकोण की ओर आकर्षित होते हैं। वे मनुष्यों के बीच आपसी रिश्तों को 'शील एवं धर्म से अनुशासित एवं नियंत्रित होने की मांग करते हैं। उनका मत है कि साहित्य क्रांति पर ही नहीं रुक जाता व उत्क्रांति तक जाता है। जेनुइन साहित्य कालबोध के स्तर पर कभी अप्रासंगिक नहीं होता।'' 'कुबेरनाथ राय की दृष्टि में स्वामी सहजानंद सरस्वती' शीर्षक पुस्तक उनके ललित निबंधकार से इतर एक समर्थक आलोचक रूप को सामने लाती है। स्वामी सहजानंद जैसे तपोनिष्ठ कर्मयोगी संन्यासी पर श्री राय जैसे ज्ञानयोगी का कलम चलाना एक चुनौती से कम प्रतीत नहीं होता। कहना न होगा कि स्वामी जी की पुस्तकों के मर्म को यथातथ्य उद्घाटित करने में श्री राय सर्वथा सफल रहे हैं। एक चिंतक के रूप में स्वामीजी की पुस्तकों पर विचार करते हुए कुबेरनाथ राय उन्हें नास्तिक या अधार्मिक घोषित नहीं करते। उनके अनुसार ऐसा करने पर बुद्ध, नानक तथा कबीर को भी अधार्मिक कहना पड़ेगा। श्री राय मानते हैं कि स्वामीजी ''माक्र्सवादी जरूर थे किन्तु 'कम्युनिस्ट' नहीं थे। सोवियत यूनियन की पक्षधरता में विश्वयुद्ध को उन्होंने जनयुद्ध जरूर कहा था लेकिन वे कम्युनिस्ट पार्टी के कपटाचार से भी परिचित थे। 1945 तक आते-आते उससे उनका पूर्णतय मोहभंग हो चुका था।''
कुबेरनाथ राय की दृष्टि में स्वामी सहजानंद आजीवन अकेले रहे। उनकी परिणति उनके अवदान की उपेक्षा एवं विस्मरण में हुई। स्वामीजी के अकेलेपन का यह दुष्परिणाम ही था कि राहुलजी द्वारा की गई छिटपुट चर्चा के अलावा व्यापक साहित्यिक समाज उनके कृतित्व के प्रति उदासीन एवं परांगमुख ही रहा। स्वामीजी अनजाने महापुरुष थे जिन्होंने राजनीति की मुख्य धारा के प्रतिकूल अपने किसान आंदोलन का नेतृत्व किया। संभवत: इसी कारण उन्हें उपेक्षा का दंश झेलना पड़ा। श्री राय स्वामीजी को भुला दिए जाने पर क्षोभ व्यक्त करते हैं। वे किसान आंदोलन के सबसे बड़े नेता के रूप में उनकी परिचिति के पुनस्र्थापन के प्रति आग्रही हैं। कुबेरनाथ राय के अनुसार स्वामी सहजानंद की सर्वश्रेष्ठ कृति उनकी आत्मकथा 'मेरा जीवन संघर्ष' है। कर्मसंकुल एवं प्रामाणिक जीवन की सहज एवं प्रवाहमयी अभिव्यक्ति के रूप में इस आत्मकथा का विशिष्ट महत्व है। हिन्दी में शुद्ध आत्मकथा का नितांत अभाव है। श्री राय आत्मकथाओं की प्रामाणिकता की कसौटी उनका 'आत्मा का रूपक'होना मानते हैं। लेखकीय ईमानदारी और निष्ठा के मानकों पर स्वामी जी की आत्मकथा उनकी सार्वजनिक जीवन संबंधी भूमिका की सफल प्रतिकृति है। इस पुस्तक की गद्य रीति भी अत्यंत रोचक एवं सुलझी हुई है। इस संदर्भ में श्री राय ने लिखा है,''हिन्दी गद्य के प्रसन्न, गंभीर, निर्मल परंतु गहरे रूप का इसमें दर्शन होता है। स्वामी सहजानंद की यह प्रतिनिधि पुस्तक है जिससे उनका आद्यंत समझा जा सकता है।''
1942 के हजारीबाग जेल प्रवास के दौरान 'गीता हृदय' एवं मेरा जीवन संघर्ष के साथ 'क्रांति और संयुक्त मोर्चा' पुस्तक का प्रणयन स्वामी जी ने किया। इसे किसानों के लिए क्रांति की पाठ्य पुस्तक कहा जा सकता है। इसमें तत्कालीन विश्व की राजनैतिक स्थिति का भी आकलन है साथ ही चीन और भारत की राजनीतिक परिस्थितियों का तुलनात्मक विवेचन किया गया है। इस पुस्तक की विशिष्टता है स्पष्ट एवं निभ्रांत विवेचन।
कुबेरनाथ राय स्वामीजी को शास्त्र निष्णात विदग्ध मन सम्पन्न व्यक्तित्व की संज्ञा देते हैं। यह संस्कार उनके शास्त्रीय भावबोध में यदा-कदा प्रकट हो ही जाता है। अथर्ववेद के अनुसार जो क्षुधित है, वही रूद्र है। किसान जागरण को वे 'महारुद्र' का प्रतीक देते हैं। इस शीर्षक बिम्ब को छोड़कर 'महारुद्र का महातांडव' की भाषा सादी और अलंकरण विहीन है। स्वामी सहजानंद विरचित 'गीता हृदय' एक महत्वपूर्ण पुस्तक है जिसमें वे गीता की अभिनव व्याख्या करते हैं। इस ग्रंथ की भूमिका में वे गीता दर्शन एवं माक्र्सवाद का विलक्षण संवाद स्थापित करने की प्रचेष्टा करते हैं। यूरोप में भी फ्रेरबाख ने ईसाइयत के मूल तत्वों के साथ माक्र्सवाद का संवाद स्थापित करने का प्रयत्न किया था। स्वामीजी ने गीता और माक्र्सवाद की संगति बिठाने का काम अद्वैत वेदांत की भूमि को आधार बनाकर किया। श्री राय 'गीता हृदय' को माक्र्सवादी भाष्य नहीं मानते, भले ही इसके भाष्यकार माक्र्सवाद से प्रभावित हों। स्वतंत्र चिंतन की दृष्टि से भी इस पुस्तक का महत्व असंदिग्ध है। 'किसान कैसे लड़ते हैं'और 'किसान क्या करे' स्वामीजी की 1940 की रचनाएं हैं। ये रचनाएं श्री राय के शब्दों में 'क्रांति और संयुक्त मोर्चा' और 'मेरा जीवन संघर्ष' का पूर्वराग अथवा मंगलाचरण हैं। इन दोनों की टोन जुझारू है एवं इनमें स्थापित मूल्यों के प्रति मोहभंग स्पष्ट है।
स्वामी सहजानंद को महाश्वेता देवी ने बीसवीं सदी का सबसे बड़ा किसान नेता कहा था। स्वामीजी रोटी पैदा करने वाले किसान को भगवान मानते थे। दूसरी ओर कुबेरनाथ राय के ललित निबंध भी कृषि संस्कृति के औदात्य से परिपूर्ण है। ऐसे समय में जब देश कृषि संकट के सम्मुखीन हो तथा परिदृश्य में किसानों की आत्महत्याएं हो कृषि संस्कृति से संबद्ध इन दो महत्वपूर्ण व्यक्तित्वों को पुन: विमर्श में लाना एक प्रशंसनीय कार्य है। भारत की सांस्कृतिक आत्मा के पोषण के इस उल्लेखनीय कार्य का श्रेय इन दोनों पुस्तकों के सम्पादक डॉ. हारुन रशीद खां को दिया जाना चाहिए। एकाकी एवं विस्मृत साहित्य सेवियों का मूल्यांकन एवं उन पर चर्चा भी आलोचना का महत दायित्व है।
संदर्भ :
1. रस आखेटक
कुबेरनाथ राय
सम्पादक : मु. हारुन रशीद खां
विद्या विकास एकेदमी
3637, नेताजी सुभाष मार्ग
दरियागंज, नई दिल्ली-110002
2. कुबेरनाथ राय की दृष्टि में स्वामी सहजानंद सरस्वती
सम्पादक : मु. हारुन रशीद खां
विकल्प प्रकाशन
2226/बी, प्रथम तल, गली नं. 33
सोनिया विहार, दिल्ली-110094
प्रथम संस्करण- 2014
मूल्य- 300 रुपए