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Saturday 25 Nov 2017

डॉ. बूला कार

प्रसिद्घ रचनाकार जनार्दन मिश्र ने सभी विधाओं में लिखा है। अनेक सम्मानों से सम्मानित कवि किसी पहचान के मोहताज नहीं है। उसी लेखक का लेखन मर्मस्पर्शी बनता है, जो स्वयं पाठक की तरह स्थितियों से जूझकर उन्हें शब्द देता है। इन अर्थों में लेखन कर्म कोई आकाशी चीज नहीं है, बल्कि भोगे हुए यथार्थ को और अनुभव जनित सत्य को शब्द देने का कर्म है, जिसमें भाषा और शैली उसे सर्वग्राह्य बनाने में मदद करते हैं।
कवि की 'एक सौ एक कविताएं' नहीं, अपितु सोने के तार में गुंथी बेशकीमती हीरे की कनियां हैं। हर कविता मन में हलचल मचाती, आगे बढ़ते जाती है। कवि की छटपटाहट एक ऊष्मा पैदा करती है, जिसमें पाठक सुलगता है।
एक बार पार्वती ने शिव से पूछा- आप बताएं आप हमें क्यों प्रेम करते हैं, इस प्रेम के कारण क्या हैं? शिव तटस्थ हुए और बोले- देवी, प्रेम तो प्रेम होता है, निश्छल, नि:स्वार्थ प्रेम का कोई कारण नहीं होता। यह प्रेम शाश्वत होता है, कहीं, कभी अंत नहीं होता। यह उक्ति कवि के प्रेम को चरितार्थ करती है। प्रेम कभी दुखदायी नहीं होता है। इसे केवल अनुभव किया जा सकता है। अद्भुत, अतुलनीय विरह में आशान्वित यह कवि के शब्दों में देखा जाता है। समय का मलहम लगाएं में कवि 'श्यामली' में अपनी वेदना को देखता हैऔर चोटों से बचता, उसी में घायल भी होता है। जब वे कहते हैं-
''ऐसा क्या है कि निरंतर जल रहा हूं, इस आग में
पल-पल याद आ रही हो तुम
कि कैसे मिले थे, कभी और कहां अनायास
याद करो जब दूसरी बार कहीं मिले थे हम
किसी आयोजन के बहाने
उस वक्त तुम्हीं ने कहा था मुझसे कि-
ऐसा तो होना ही था।''
इस कविता में कवि के अन्तर्मन की रागात्मक चेतना पूर्ण रूप से प्रस्फुटित हुई है, जो व्यक्ति से समाज की ओर उन्मुख है। यह ध्यातव्य है कि एक रचनाकार अपनी संवेदना को जब मन में छिपाकर रखता है, तभी तक व्यक्तिगत होती है, किन्तु प्रकट होते ही वह पूरे समाज की हो जाती है।
''ठीक इसी प्रकार हमारा आपस में मिलना
या परिस्थितिजन्य कारणों से न मिलना
इन सभी का अर्थ अब नहीं रहा हमारे जीवन में।''
'श्यामली' कविता में कवि अथाह प्रेम में डूबकर बाहर निकलने की कोशिश करता है। कवि को मालूम है कि यह आसान काम नहीं है। फिर भी मुश्किलों से जूझते हुए प्रयासरत है। कवि यह भी जानते हैं कि प्रेम के विष का पान जब कर लिया तो क्या डरना। यह विष बार-बार पिएंगे, और बार-बार मरेंगे। यह भी सच है कि जब इतने अधिक आगे बढ़ चुके हैं तो
''जहां से किसी का मुडऩा या हमेशा के लिए छोड़ देना, बहुत दुष्कर होता है।''
कवि की कुछ कविताएं 'मीरा' की प्रेम वेदना की याद दिलाती है। कवि का कहना 'अगर मैं जानता कि किसी प्यार की जलन बड़ी बेतरतीब होती है, जो हर पल रुलाती है-'
... तो मैंने कभी उससे
प्यार नहीं किया होता
पर अब मैं क्या करूं
...कि यह सब कैसे हुआ। क्यों हुआ
और किस तरह से हुआ।
जनार्दन मिश्र की कविता केवल शाब्दिक यात्रा भर नहीं है, यह एक आंतरिक यात्रा है, जो पाठक के मानस की संस्कारित करती और झकझोर कर जगाती है। कवि को स्मृतियों के झरोखे से अतीत का वह प्रस्थान बिन्दु दिखाई देता है, जिसे क्षितिज कहते हैं। वहां से उसका संवाद शुरू होता है। सहज, सरल, प्रवाहपूर्ण एवं सम्प्रेषणीय भाषा कविता-संग्रह में व्याप्त है, जो प्रसादगुण सम्पन्न तो है ही, संवेदित करने में सक्षम है। कवि का अनेकश: कुंठा, निराशा एवं पीड़ा के होते हुए भी आशावादी दृष्टिकोण प्रभावित करता है। घर, अजायबघर, सरकस की लड़कियां, रामलाल का घोड़ा, रामदेव दादा, ओ नाविक, चुनाव, माइल-स्टोन, मित्रों, अब आप सोचिए, चेतक, राजा, शिनाख्त, शोर आदि कविताएं सघन वैचारिक पृष्ठभूमि और सार्थक चिंताओं के लिए है। इन कविताओं में उठती चीख और आहत नागरिकों की कराह सुनाई देती है। साथ ही तेजी से दौड़ती हमारी जिन्दगी से अनेक प्रश्न करती हैं। शिल्प की दृष्टि से कविताएं बहुत अच्छी हैं। कवि के मन में, एक अवचेतन मन है, बाह्य वातावरण, उनमें विचारधारा और सोचने की प्रक्रिया के साथ परिवर्तन लाता है। कवि अन्र्तमुखी और बहुमुखी प्रवृत्ति के कर्मशील व्यक्ति हैं। उनमें वैचारिक और भावात्मक जटिलता नहीं है, अमूत्र्तन नहीं है, अनावश्यक प्रतीकात्मकता या सघन बिम्बात्मकता नहीं है। पर उनकी कविताओं में उनका मंतव्य स्पष्ट है। जनार्दन मिश्र की कविताओं को पढऩा अपने आप में एक नये अनुभव से गुजरना है। पढ़ते समय मन-मस्तिष्क पर गहरा असर छोड़ती है। हम अपने को ऐसे माहौल में पाते हैं जहां पात्र परिचित लगता है, हर घटनाएं देखी-सी लगती हैं। मानो वह अन्र्तमन में रची बसी यादों में से कुछ ढूंढना चाहती हो। कवि की काव्यात्मक भाषा सहज और बोधगम्य है, जो मन की गहराइयों तक अपनी उपस्थिति दर्ज कराने में सक्षम है, कोई भी कविता कृत्रिम नहीं लगती। तात्कालिक समस्याओं के प्रति कवि सजग है।
''वे कहां है'' कविता में कवि कहते हैं-
''वे कहां हैं? / जिन्हें ढंढा जाय और पहचाना जाए दुबारा / अपनी जमीन से कटे, अपने आसमान से टूटे/ किन्हीं ज्ञात-अज्ञात दलदलों में धंसे/ कितनी जातियां प्रजातियां सुनामी लहरों में गुम होती जा रही है।'' कवि की छटपटाहट अंतस के उबाल में शब्द-शब्द जोड़ती है। आकुल-व्याकुल जीवन, उन्मन हिचकिचाहट हमारे लिए ढेरों पैगाम छोड़ती है।
किसे फिक्र है उन सभी की...। जो कोई नाम होते हुए भी बेनाम है / सड़कों पर भीख मांगते, जूठी पत्तलों को चाटते, पुलिस के डंडे खाते / जेलों में यातनाओं को सहते / नित यौन-शोषण का शिकार हो रहे हैं / वे भी हैं जिनका कहीं घर नहीं.. उन्हें भी वही चाहिए / जिनसे बचकर/ कोई आम आदमी नहीं रह सकता/ जैसे आज की पूरी व्यवस्था ही दृश्य-अदृश्य रूप से / विविध मकडज़ालों में उलझकर रह गई है / ... मित्रो! अब आप ही सोचिए कि कैसे बची रहेगी किसी की अस्मिता/ जहां दहशत और खौफ से आक्रांत दिख रहे हैं लोग / कि कौन जाने?/ कब... किसकी कर दी जाएगी हत्या / कब कर लिया जाएगा किसी का अपहरण.../
यह कविता आत्मा को झकझोरती है, चोट करती है। उत्पीडऩ को सहने की बेचारगी मन में अवसाद पैदा करती है। बेबाकी और साफगोई को बांचने का साहस है। रिश्तों को किस कदर अहमियत देते हैं 'जोरन', 'तुम्हारे न रहने के बाद से', 'पिता', 'पहली बार', कविता के माध्यम से समझा जा सकता है।
कवि के लिए विषय का महत्व नहीं होता, जरूरी है कि जो उसका सृजन है, उसमें कितनी गहराई एवं भाव संवेदना है। विषय कुछ भी हो, महत्व अनुभूति का होता है जो हमें दिखाई नहीं देता पर भाव हृदय को छू जाते हैं। कवि की कविताएं विषय की गहराई को प्रदर्शित करती हैं। कवि का मानना है कि संसार के सारे दुख प्रिय के साथ रहने मात्र से दूर हो जाते हैं। कवि का दुख वर्तमान का है पर वर्तमान का होते हुए भी इसकी जड़ें अतीत के महासमुद्र में बहुत गहराई तक धंसी हुई है। अतीत से संचित वेदना का बोझ कवि ढो रहा है।
जनार्दन मिश्र की 'एक सौ एक' कविता संग्रह की सभी कविताएं विविधता लिए हुए हैं। रिश्ते हैं, प्रकृति का अनोखा सौन्दर्य है, राजनीतिक पारिवारिक, आर्थिक व्यवस्था है, याने बहुआयामी कवि जनार्दन मिश्र की इस कविता संग्रह का शीर्षक कुछ यूं होता, तो पाठकों को और ज्यादा भाती, जैसे- श्यामली तुम कहां हो?, स्मृति दीवानगी, हद से ज्यादा, या अंतस की उफनती आग।
कवि कहते हैं अपनी स्मृतियों के सहारे भला कितने दिनों तक / कोई जिन्दा रख सकता है / अपने भीतर कुलांचे भरती / अपनी किसी नदी को''- तो पाठक ईश्वर से प्रार्थना करता है। श्यामली जहां कहीं हो, कवि के प्रश्न का उत्तर दो।
जनार्दन मिश्र के इस कविता संग्रह में कुल एक सौ एक कविताओं में प्रेम की अभिव्यक्ति अधिक है। प्रेम को समर्पित यह अनूठी काव्य रचना है प्रेम कविता के आकाश के सारे शब्द अपने ढंग से अनूठे सितारे हैं। प्रेम को सही मायने में परिभाषित करना एक असाध्य कार्य है। साधना के बिना साधा नहीं जा सकता। प्रेम को समर्पित ये कविताएं प्रेम की अबूझ पहेली को समझने का प्रवेश द्वार है। सभी कविताएं शिल्प-भावाभिव्यक्ति तथा शब्द चयन की दृष्टि से बेजोड़ तथा अनुपम जान पड़ती हैं। प्रेम को समझकर उस पर लुट जाना, एक प्रेमिल हृदय ही कर सकता है। क्योंकि प्रेम का आकाश असंख्या तारों की आंखों से जगमगाता है फिर भी वह सूर्य की प्रचण्ड रोशनी का अभीष्ट कभी नहीं रहा। यह एक ऐसी अनुभूति है, जिसे घनानंद, देव, मतिराम, बिहारी, मीरा ही व्यक्त कर सके थे। जिसकी आंखों में प्रेम की पुतली हो, वह दूसरों को कैसे देखेगा। प्रेम, मान-अपमान, सुख-दुख, हर्ष-शोक, आकर्षण-विकर्षण, संतोष असंतोष, मिलन-विरह, तृप्ति-अतृप्ति आदि के विविध द्वन्दों से घिरा हुआ है। प्रेम के सभी आयामों, पक्षों की चर्चा यथार्थ के धरातल पर खड़े होकर किया जाना, यह इस काव्य संग्रह की प्रमुख विशेषता है कि प्रारंभ से प्रेम को फैन्टेसी के रूप में प्रस्तुत किया जाता रहा है। जनार्दन मिश्र की कविताएं यथार्थवादी कही जा सकती हंै। 'भीड़ में वह लड़की' कविता में कवि कहते हैं ''जैसे तुम मिली थीं मुझे किसी भीड़ में / जहां कोई आदमी ढूंढ रहा होता है। कोई ठौर.../ तुम स्वयं कोई स्वर्णिम विहान हो / ... जहां कोई भी समन्दर हिलोरें भरने के लिए हर पल रहता हो आतुर / और भर देता हो तुममें असंख्य अमूल्य भाव-व्यंजन। कि जब तक तुम रहोगी अपनी तल्लीनता में तो ढूंढी जा सकती है तुममें कोई नई राह / कि जीवन को कैसे और संघर्षमय बनाया जा सकता है...।''
प्रेमी मन के असमंजस तथा कशमकश को व्यक्त करते हुए कवि का कथन है ''अगर तुम न मिली हो/ तो नहीं जान पाया होता दुख / कि इसी की जीर्ण-शीर्ण चादर में ही लगती है प्यास/ तड़पती है इच्छा/ और बढऩे लग जाते हैं पैर/ अथाह तपन के बीच भी / ... ऐसा कहने के लिए मैं बहुत कुछ झेल चुका हूं। अभी भी और झेलना बाकी है। तुम्हारे लिए ही शस्य-श्यामली।''
जनार्दन मिश्र की कविताओं में ऐसा कुछ है जो पाठक के मन मस्तिष्क से ऊपर सीधे हृदय में प्रवेश कर जाती है। कविता के माध्यम से प्रत्येक पाठक या प्रेमी के भीतर छिपी हुई भाव संवेदना न केवल व्यक्त होती है, अपितु उसे भाव-पंख देकर नये आयाम प्रदान करती है। प्रेम अदृश्य, अवाच्य, अव्यक्त, अपरिभाषित होता है पर हर किसी के हृदय में बसता है। प्रेम कब, कहां किसको होगा, यह कोई नहीं जानता। घनानंद-सुजान, सोहनी-महिवाल, हीर-रांझा, लैला-मजनू, सलीम-अनारकली, रोमियो-जूलियट, राधा-कृष्ण के अद्भुत आकर्षण के पीछे छिपे कारणों को आज तक कोई नहीं जान पाया है। दार्शनिक-विचारक का कहना है कि अनारकली के प्रेम को देखने के लिए सलीम की आंखें चाहिए।
अंत में कहा जा सकता है कि इस काव्य संग्रह में यथार्थ सत्य के साथ-साथ संवेदना, करुणा, संघर्ष, विहलता, अराजकता तथा रूमानियत का बेहतरीन संगम है। भाषा और शिल्प की दृष्टि से कविता संग्रह सफल है। उनके काव्य में उनकी व्यक्तिगत पीड़ा के साथ-साथ जीवन के अनेक घात-प्रतिघाट मौजूद हैं, जो शब्दों के माध्यम से ज्वालामुखी के लावा की तरह एक तीव्र आवेग एवं गर्माहट के साथ जनमानस में अपना असर छोड़ता है। संग्रह के लिए कवि को साधुवाद एवं मंगल कामनाएं।

पुस्तक-   मेरी एक सौ एक कविताएं

कवि- जनार्दन मिश्र

प्रकाशक- नीलेश प्रकाशन

 दिल्ली- 110051

मूल्य- 350 रुपए