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Wednesday 22 Nov 2017

रिश्तों की बुनियाद पर रची- बुनी ग़ज़लें

प्रत्येक ललित कला मानव की सौंदर्योंपासक वृत्ति की देन होती है। काव्य को शाब्दिक या भाषिक कला कहा जाता है, अर्थात् भाषा के विशिष्ट प्रयोग से ही लालित्य की सृष्टि संभव है। यहां भाषा काव्य की बाह्य वस्तु नहीं, वरन् काव्य की अंतर्वस्तु होती है। पॉल वेलरी ने ठीक ही कहा है कि काव्य भाषा के अंदर की भाषा है। दरअसल जो कहा न जा सके, उसे कहने की कलात्मक चेष्टा ही काव्य है। इस संदर्भ में शायर बशीर बद्र की ये पंक्तियां अनायास याद आ जाती है :-
''मुझे इश्तहार सी लगती हैं ये मोहब्बतों की कहानियां
जो कहा नहीं वो सुना करो जो सुना नहीं वो कहा करो।''
एक बात और- काव्य 'अ-भाव' का 'भाव' में रूपांतरण है, जिसमें श्रेय और प्रेय दोनों का सामंजस्य हुआ करता है। इसी सामंजस्यमूलक विशेषता के कारण काव्य को 'साहित्य' भी कहा जाता है। ग़ज़ल काव्य की एक ऐसी विधा है, जिसमें वाग्वैदग्ध्य से बतरस पैदा होता है- चाहे वह उर्दू की हो अथवा हिन्दी की। ग़ज़ल तो गज़ ल होती है। एक साक्षात्कार में बशीर बद्र ने विजय वाते से कहा था कि शायरी वही सच्ची और अच्छी है, जिन्दगी की सेवा करे। शायरी आर्ट है और ज़िंदगी उससे भी बड़ा आर्ट। जो शब्द हमारी जिंदगी में घुल-मिल गए हैं, गज़ल की भाषा उन्हीं से बनती है। रदीफ और क़ाफिया बाहर की पाबंदियां हैं। असली हैं शेर का वज़न और कहन। उस्ताद ह़फीज अहमद खान ने एक और बात कही है कि ग़ज़ल वही, जो गाई जा सके।
अनूप अशेष की किताब कोई नाम दीजिए 81 हिन्दी-ग़ज़लों का संग्रह है, जिसमें दोनों प्रकार की गज़लें हैं- एक ही सोच की ज़मीन पर मुसलसल और जुदा-जुदा सोच के शेरों वाली रिवायती अंदाज़ की। इस प्रकार, अनूप अशेष की गज़लों में विविधता है। वे वक़्त को संजीदगी से अलग-अलग अंदाज में पकडऩे की कोशिश करते हुए कभी कहते हैं :-
''मेरी आंखों में वक़्त के घर हैं
इनमें कबूतर के नुचे-से पर हैं'' (7)
तो कभी उन्हें वक़्त बोझ-सा लगने लगता है :
''वक़्त के बोझ में कंधे होंगे'' (8)
दरअसल, वक़्त ज़िंदगी पर बोझ नहीं होता; ज़िंदगी को बोझ समझकर ढोनेवालों को ही वक़्त बोझ लगता है। संभवत: उनकी आस्था जब डगमगाने लगती है, तब ऐसी पंक्तियां निकलती हैं :
''वक़्त के हाथ नहीं उंगलियों में आटा होगा
इस सदी जैसा ही आगे भी सन्नाटा होगा।'' (9)
फिर वे इसकी तह तक जाने की कोशिश करते हैं कि आ$िखर वक़्त को बोझिल किसने बनाया। इसका उत्तर है सियासत जो आज घुन की तरह सबको अंदर से खोखला करने पर आमादा है :
''झोपड़ी में चढ़ गया है सियासत का ज़हर'' (42)
जिसमें आदमी को आदमी बना रहना एक चुनौती है :-
''$खूब तहजीब है सियासत में
आदमी इसमें बेलिबास रहा'' (45)
और कुछ तो ज़माने की हवा का भी दोष है :
''हवा है पश्चिमी किवाड़ें पूरब'' (47)
इस तहजीब में गांव-गांव नहीं रहे :
''गांव इस तहजीब में सस्ते हुए
शहर छाती पर खड़े हंसते हुए'' (69)
उत्तर-आधुनिक समय में संस्कृति, सभ्यता तथा समूची जीवन-पद्घति में ऐसा बदलाव आया है कि उसे न तो निगला जा सकता है और न ही उगला जा सकता है- ''भई गति सांप छछुंदर केरी।'' इसका असर सबसे •यादा रिश्तों में देखा जा सकता है :-
''आंखों में हादसे हैं रिश्ते नहीं रहे'' (21)
सबके साथ रहकर भी आदमी अकेला, अनजाना, बेपहचाना-सा रह गया है। अनूप ठीक ही कहते हैं :-
''रिश्तों की किताबों में मेरा नाम नहीं है'' (48)
कोई नाम दीजिए किताब रिश्तों की बुनियाद पर रची गई है। औपचारिकताएं अब शिष्टाचार का विपर्याय बन गई हैं :
''सगे-से संबंध गुलदस्ते हुए'' (69)
जो भाई सहोदर ही नहीं, सुख-दुख का सहभागी हुआ करता है, उसे अब ढूंढना पड़ रहा है:
''भाई किसे कहते हैं पूछते रहे हमीं'' (21)
वृद्घ माता-पिता तो जैसे फटे-पुराने कपड़े हो गए हैं, जबकि वस्तु-स्थिति यह है कि सारे रिश्ते-नातों का बीज माता-पिता की कोख़ में ही पलता-फलता-फूलता है-
''मां को देखूं तो यह घर देखूं
पिता में सांझ-दोपहर देखूं'' (17)
अनूप को अ$फसोस इस बात का है कि ''हर घर का दायरा अब सिकुड़कर कहां गया'' (71)
मानवीय रिश्ते केवल मानव तक सिमटकर नहीं रहते; उनका प्रसार पशु-पक्षियों, वृक्ष-पादपों तक भी होता है। जिसे हम पर्यावरण कहते हैं, वह आज बुरी तरह प्रदूषित हो रहा है, जिसके भयावह परिणाम नज़र आ रहे हैं। अनूप इस रिश्ते को भली-भांति चीन्हते हैं और कहते हैं :-
''यहां पे पेड़ कटे परिंदे जलते हुए
कहां तलाश करे घर थकी गिलहरी है'' (43)
क्योंकि
''छांव ठंडी पेड़ निर्वासित यहां से''(69)
''टूटे हुए दरख़्त उठता हुआ धुआं'' (33)
ज़िंदगी केवल चारदीवारों में $कैद सांसों का नाम नहीं है, वरन् प्रकृति का वरदान है :-
''अपने लिए किताब कोई जिंदगी की ढूंढ
जिस घर में खिड़कियां नहीं उस कैद से निकल'' (25)
''सामान अपना खोल लगने दे कुछ हवा
इन पेड़ों के झुरमुट में बैठी है तेरी ग़ज़ल '' (25)
जीवन, जन्म, भरम-पोषण अथवा सांसों के आने-जाने से कदापि चरितार्थ नहीं होता; वह व्यक्त होकर ही चरितार्थ होता है। अनूप की ये पंक्तियां-
''बातों-बातों में कुछ जिया जाए
अपना आदिम अभाव क्या कहिए'' (63)
(यहां 'अभाव' की जगह 'स्वभाव' उपयुक्त प्रतीत होता है।)Todorov की इन पंक्तियों की याद दिलाती है-
Narration Equals life ;Its absence ,death "
विषयगत विविधता पर गिरिराज शरण अग्रवाल ने अपना अभिमत रखते हुए कहा है कि विषयों की विविधता चाहे कितनी ही नवीनता लिए हो, पर वह किसी काव्यकृति को उच्च स्तर प्रदान नहीं करती। उच्च स्तर तो प्राप्त होता है सशक्त अभिव्यक्ति से। हिन्दी-ग़ज़ल के क्षितिज-विस्तार को उपलब्धि मानने वालों के लिए वे कहते हैं कि ''हिन्दी-ग़ज़ल में विषयों की विविधता पर संतोष कर उसके स्तर को जांचने वाला पक्ष साहित्य-रचना के इस रहस्य से शायद परिचित नहीं है कि काव्य का रस उसके विषयों में नहीं, प्रस्तुतीकरण में है।"
बोलचाल की सहज-सरल भाषा में वज़नी बातें कहना सबसे कठिन कला है- बिना चीर-फाड़ के प्रसव की तरह, जो सबके बस की बात नहीं होती। अनूप ने रदीफ़-काक़ाफियो के चलते कहीं-कहीं ऐसे प्रयोग भी किए हैं, जो असहज-असामान्य-सी अनुभूति जगाते हैं, जैसे-
''पुरखों के कोठरों में इक घर बना तू पक्का
रहने के लिए छोटी हुई ये जेल'' (27)
''सुबह जली, रात लेट गई
भूख चूल्हे की भौजाई है'' (87)
कुछ व्याकरण-संबंधी भूलें भी हैं, जो खटकती ही हैं:
''दीवार में'' (70), ''कुटिलते हैं'' (79),
''यह नदियां'' (14)
दरअसल, सब-कुछ कहने के फेर में बहुत-कुछ अनकहा रह जाता है तथा कलात्मकता फीकी पड़ जाती है। हिन्दी और बघेली के जाने-माने नवगीतकार अनूप अशेष की ग़ज़लें कुल मिलाकर पाठकों पर मिला-जुला प्रभाव छोड़ती हैं। यदि ग़ज़लों का कलेवर थोड़ा मोटा होता, तो वे और अधिक प्रभावशाली बन पातीं और गेय भी होतीं।