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Sunday 19 Nov 2017

\'दूसरों को खूब पढऩा अच्छा लिखने की जरूरी शर्त है’’

पढऩा... खूब पढऩा... दूसरों को खूब पढऩा अच्छा लिखने की जरूरी शर्त है'', यह कहना है पंजाबी के प्रसिद्ध कथाकार नछत्तरजी का। वे तो यहां तक कहते हैं कि 90 प्रतिशत पढ़ो, 10 प्रतिशत लिखो। इसीलिए वे खूब पढ़ते और खूब घूमते-फिरते हुए 46 सालों में 6 कहानी संग्रह और उपन्यास लिख पाए हैं मगर जो लिखा वह कथ्य वह शिल्प की दृष्टि से बहुत सार्थक व महत्वपूर्ण।
श्री नछत्तर का जन्म 20 मार्च 1950 को बरनाला (पंजाब) में हुआ। उन्होंने एम.ए. (पंजाबी) तक शिक्षा पाई और वृत्ति के रूप में 2010 तक बैंक की नौकरी करते रहे। लोक संपर्क की उनमें अद्भुत कला है, मित्रता उनकी निधि है। उनका कहना है कि अगर मैं लोगों से न जुड़ूं तो मेरी कहानियां और उपन्यास किसके लिए? उनके सुख-दु:ख, समस्या, संघर्ष, शक्ति, बेबसी ही तो मेरी रचनाओं की आधारभूमि है।
बीते दिनों नछत्तर जी ने बड़ी साफगोई से खुलकर अपनी रचनाओं के पात्रों, रचना-प्रक्रिया, पंजाबी साहित्य की मूल प्रवृत्ति व विभिन्न पक्षों पर बात की, प्रस्तुत है उस बातचीत के अंश :-
प्र. आप लेखन के क्षेत्र में आए? क्या आपके परिवार में कोई साहित्यिक रुचि का व्यक्ति था जिससे आप प्रेरित हुए हों?
उ. नहीं, परिवार में ऐसा कोई नहीं था। लेखन के बीज तो बचपन में ही पड़ गए थे। स्कूल के दिनों में मेरे सहपाठी मित्र जासूसी किताबें लाया करते थे। हम आपस में उन्हें बांटकर पढ़ा करते थे। एक दिन मेरा एक मित्र एक सामाजिक किताब लाया। हमने नानक सिंह की कहानियां पढ़ी। उनकी कहानियां मुझे बहुत अच्छी लगी। मेरी रुचि साहित्य में बढ़ गई। बड़ा हुआ तो बरनाला से लुधियाना आ गया। यहां मुझे पंजाब कृषि विश्वविद्यालय में एक नौकरी मिली और यहीं एक बहुत बड़े पुस्तकालय से संपर्क हुआ। मैं यहां नियमित रूप से आता था। यहां मैंने रूसी लेखकों चेखव, टालस्टाय, गोर्की और भारतीय भाषाओं जैसे मराठी, हिन्दी आदि के साहित्य पढ़े। मेरे रचना कर्म की आधारभूमि यहां तैयार हुई।
प्र. कहानियां लिखने की बात मन में कैसे आई?
उ. स्कूल के दिनों की बात है। मेरे दो-तीन मित्र छोटी-छोटी कहानियां लिखते थे और मुझे पढ़ाते थे। मेरे मन में आया कि जब ये लोग लिख सकते हैं, तो मैं क्यों नहीं? बस, मैंने भी लिखना शुरू कर दिया।
प्र. आपकी पहली कहानी कब और कहां छपी? पहली बार प्रकाशित रचना को देककर आपके मन में क्या भाव आए?
उ.- मेरी पहली कहानी सन् 1970 में दिल्ली की एक पंजाबी पत्रिका 'प्रीतम'में छपी थी। कहानी का नाम 'जोड़-अनजोड़Ó था। यह कहानी बेमेल शादी की सामाजिक समस्या पर आधारित थी। अपनी पहली प्रकाशित कहानी देखकर मैं सुखद उत्तेजना से भर गया। उत्तेजना स्वाभाविक थी। उस समय उम्र ही क्या थी- महज बीस वर्ष।
प्र. आपने कहानियां और उपन्यास ही लिखे हैं, कविताएं क्यों नहीं लिखीं?
उ. भ्रमण मेरी प्रवृत्ति रही है। मैं नौकरी में था तो कई जगह रहना पड़ा। नौकरी के बाद भी अभी भी मैं किसी न किसी बहाने घूमता रहता हूं। जहां भी जाता हूं, वहां के परिवेश और समाज से तादात्म्य स्थापित करता हूं। उनके सुख-दुख, संघर्ष, जीवन शैली में गहरी ताक-झांक करता हूं। वे अनुभव मेरे मन में उतरते जाते हैं। मेरे अनुभवों को विस्तार मिलता है। अनुभवों को कहने के लिए इतनी ज्यादा बातें होती है जो कविता के 'फार्मेट' में समा नहीं सकते। यह गद्य में ही संभव है अर्थात् मेरे लिए कथा और उपन्यास में। इन दोनों विधाओं में मैं पूरी तरह खुल जाता हंू।
प्र. पंजाबी कथा साहित्य की यात्रा नानक सिंह, गुरबख्श सिंह 'प्रीतलड़ी' से शुरू हुई और आज पांचवीं पीढ़ी लेखन में सक्रिय है। पांच पीढिय़ों की इस रचना यात्रा में आपको क्या महत्वपूर्ण बदलाव लगा?
उ. साहित्य अपने समय का आईना होता है। वह अपने समय के समाज के सच, खूबियों, बारीकियों और सभ्याचार (संस्कृति) को दिखाता है। गुण-दोष का फैसला तो इतिहास करता है।
पंजाबी कहानियां नानक सिंह और गुरबख्श सिंह 'प्रीतलड़ी' से शुरू होती है। उनके समय के समाज के जीवन-मूल्य, धार्मिक मान्यताएं, सांस्कृतिक परिदृश्य आज के विपरीत थे। जनजीवन पर संतों का प्रभाव था। फिर भी स्त्रियों, दलितों, वंचितों की दशा में कोई सुधार नहीं था। उस समय भी बाल-विवाह, विधवा-प्रताडऩा आदि कुप्रथाएं प्रचलित थीं।
गुरबख्श सिंह 'प्रीतलड़ी' की 'भाभी मैना' अत्यंत संवेदनशील कहानी थी। पूरी कहानी यौवन की दहलीज पर कदम रखती एक विधवा की व्यथा कथा है। जो जैन साध्वी बनने की प्रक्रिया से गुजरती है। धर्म के पंडे उसे अपनी मान्यताओं के सांचे में ढालना चाहते हैं, कठोर नियमों का वास्ता दिया जाता है। वह सब कुछ सहने को तैयार होती है, पर अपने केश खोना नहीं चाहती। यही उसका मर्म बिन्दु है। वह ऊपर ऊंचे बरामदे से नीचे कूदकर आत्महत्या कर लेती है। लेखक का शिल्प देखिए। संवेदना का ऐसा जाल बुनता है कि पाठक स्तब्ध रह जाता है। प्रसंग मार्मिक बन जाता है पर स्त्री के लिए प्रतिरोध का बस यही चरम पंथ था। यह उनके समय का सच था।
आज कहानियां बहुत आगे बढ़ चुकी हैं क्योंकि समाज पूरी तरह बदल चुका है। आज प्रतिरोध मुखर है, धर्म पीछे छूट गया है। भौतिकता हावी है। मानवीय संबंधों के स्वरूप बदल रहे हैं। पंजाबी कहानियों, उपन्यासों में यही सब तो आ रहा है। यही तो बदलाव है।
प्र. क्या आप भी मानते हैं कि लेखक का किसी विचारधारा से प्रतिबद्ध होना आवश्यक है?
उ. हां, एक लेखक अवश्यमेव किसी न किसी विचारधारा से बंधा होता है। यह विचारधारा उसकी रचनाओं में झलकती है। आप उदाहरण ले लीजिए- सत्तर के दशक में नक्सलबाड़ी आंदोलन जोरों पर था। भूमिहीन किसानों, श्रमिक शोषण, पूंजीपतियों के विरुद्ध बगावत, सशस्त्र विद्रोह की वकालत, उसी विचारधारा के प्रस्फुटन थे। ये सारे तत्व तत्कालीन साहित्य में जोरों पर थे। पंजाबी में भी।
एक बात और, पंजाबी साहित्य में सत्तर के दशक से पहले सर्वहारा,वंचित, शोषित, श्रमिक, खेतिहर की बातें नहीं होती थी। बस, छिटपुट नारे थे। उन पर गंभीरता से काम नहीं हो रहा था। सत्तर के दशक से इस वर्ग को जमकर जगह मिली। इन पर खूब लिखा गया। नब्बे के दशक के उत्तराद्र्ध के साहित्य में भूमंडलीकरण और आर्थिक उदारीकरण की आंधी आई। सारी मानवीय संवेदनाएं, संबंध, समाज की प्राथमिकताएं ढह गई। इस भूचाल से भारतीय समाज, परिवार के किले ढह गए। नए व्यक्ति और अर्थ-केन्द्रित इकाइयां अस्तित्व में आई। इस समय का साहित्य इन्हीं तत्वों से लबालब भरा है। मेरा उपन्यास 'स्लोडाउन' इसी भूचाल की औपन्यासिक रिपोर्टिंग है। यह क्या है, विचारधारा ही तो है।
प्र. अपनी रचना-प्रक्रिया के बारे में बताएं।
उ. मेरे लेखक के निर्माण में तीन प्रमुख कारक रहे- भ्रमण, पढऩा और लोक संपर्क। बैंक की 34 वर्षों की नौकरी के दौरान मैं बरनाला, लुधियाना, ब्यास, जयपुर फिर स्थायी रूप से दिल्ली में रहने लगा। स्थान बदलने से परिवेश में विविधता आती है। मैं बहुत तरह के लोगों के संपर्क में रहा, उनके सुख-दु:ख, संघर्ष, बेबसी से रूबरू रहा। मेरे अनुभवों को विविधता मिली। मेरे अनुभवों को नया आयाम मिला।
इसके अतिरिक्त मुझे पढऩे का बहुत शौक है। मैं देशी, विदेशी लेखकों को खूब पढ़ता हूं। लुधियाने रहते हुए मैंने चेखव, टालस्टाय, गोर्की, मोपांसा को पढ़ लिया था। भारतीय लेखकों को तो मैं बहुत पढ़ता हूं। इस अध्ययन से विचारधारा और सोच एक ठोस आकार लेती है।
इन सबने मिलकर मेरी रचना-प्रक्रिया में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। मेरी एक कहानी 'आग्ग दी रोटी' है जो श्मशानघाट के शोकमय वातावरण में भी वहां काम करते तीन-चार बच्चों के जीवन-संघर्ष को दिखाती है। यह कहानी दिल्ली के पंचकुइयां श्मशान पर कुछ बच्चों से बात करने, उनकी बातें सुनने, उनकी कठिनाइयों को जानने के बाद संघनित हुए मेरे अनुभवों से बनी। मेरे उपन्यास 'हनेरी गलियां' (2007) के अधिकांश पात्र मेरे मित्र थे। वे अपने गांवों, कस्बों से सपनों की बोरियां पीठ पर लादे दिल्ली महानगर आए थे। यहां जब उनका सामना महानगर की कड़वी सच्चाइयों से हुआ तो उनके सपने चूर-चूर हो गए। वापस लौटना भी मुश्किल। सारी चकाचौंध गायब। यह था जीवन का कटु यथार्थ। यही एक उपन्यास में छाया रहा। यह उपन्यास सपनों-टूटे हुए सपनों, सच से मुठभेड़ की दास्तान है।
मेरा एक उपन्यास 'स्लोडाउन' (2012) का कथानक मुझे जयपुर प्रवास के दौरान मिला। जिस मकान में मैं किराए पर रहा था, उसके अगल-बगल के कमरों में रहने वाले परिवार, उनके सदस्य, कम्पनियों में नौकरी करते युवा, कहीं छंटनी, कहीं प्रतिस्पद्र्धा से दु:खी युवा मन के उतार-चढ़ाव, परिवारों के आंतरिक संबंधों में क्षरण मैं खुद देखता रहा। टूटते जीवन-मूल्य, बिखरते मानवीय संबंध, उदासी, अकेलापन झेलते युवा मुझे झकझोरते रहे। तीन-चार साल बाद यह उपन्यास 2012 में पूरा हुआ। आप इस उपन्यास को पढ़ेंगे तो मेरे इस अनुभव को शेयर करेंगे कि पूंजी से सुख-सुविधाएं आती हैं, जो जीवन को सरल बनाती हैं तो साथ में मानवीय रिश्तवों को दरकाती हैं। उदासी एकाकीपन, निचोड़ लिए गए युवा शक्ति की बेबसी का काफिला भी लाती है।
प्र. आप अपनी कहानियों और उपन्यास को कितने ड्राफ्टों में अंतिम रूप देते हैं।
उ. आम तौर पर मैं तीन चार ड्राफ्ट में अंतिम रूप देता हूं। परंतु कई बार ऐसा होता है कि कहानियां बहुत दिनों तक दिमाग में घूमती है। कई बिन्दुओं को नोट भी करता है। फिर कडिय़ां जोड़कर उन्हें एक शक्ल देता हूं। अभी मैंने बताया कि 'स्लोडाउन' के कई टुकड़े दो-तीन साल तक दिमाग में घूमते रहे। जब तक कहानी या उपन्यास के तैयार अंतिम रूप के प्रति मन पूरी तरह संतुष्ट नहीं होता। तोडफ़ोड़, ड्राफ्टिंग-रिड्राफ्टिंग चलती रहती है।
प्र. क्या आप मानते हैं कि उपन्यास कहानी का ही विस्तार है?
उ. नहीं, ऐसा नहीं है कि कहानी की परिधि छोटी होती है। उपन्यास की बहुत बड़ी। उपन्यास में अपनी बात कहने का पूरा 'स्पेस' होता है। कहानी में स्पेस लिमिटेड होता है। कहानी का एक ही ट्रैक होता है एक कथ्य होता है। उपन्यास में कई 'ट्रैक्सÓ होते हैं, उपन्यास उनका जंक्शन होता है जबकि कहानी में एक ही घटना-विशेष, अनुभव विशेष की व्याख्या होती है।
प्र. कहानी/ उपन्यास रचने के क्रम में शिल्प का आपके लिए क्या महत्व है।
उ. कहानी उपन्यास में ही क्यों, कविता, नाटक में भी शिल्प जरूरी है। पर शिल्प एक हद तक बेहद जरूरी होते हुए भी इतना ज्यादा न हो कि रचना पर भारी पड़ जाय। जो महत्व स्त्री के लिए श्रृंगार का है वही कहानी में शिल्प का है। अत्यधिक श्रृंगार वास्तविक सौंदर्य को ढंक लेता है। पाठक को आकर्षित करने का शिल्प एक बढिय़ा जरिया है। कला और यथार्थ का अनुपात रचना की उत्कृष्टता तय करता है।
प्र. आप लेखन के क्षेत्र में गत 46 वर्षों से सक्रिय हैं। क्या ऐसा भी हुआ है कि रचना पूरी होने के बाद भी कोई चरित्र या पात्र देर तक आपका पीछा कर रहा है? ऐसा नहीं हुई कि कृति समाप्त पात्र, चरित्र का भी परिदृश्य से गायब?
उ. जिस समय किसी कहानी या उपन्यास का काम चल रहा होता है, उसका कोई न कोई पात्र तब तक पीछा करता रहता है जब तक वह कृति पूरी न हो जाए। वह चरित्र ऐसा होता है जैसे उसके साथ अधिकतम अन्याय, शोषण या दुर्गति हो रही है या उसका चरित्र अतिशय उदारता दिखा रहा है। रचना समाप्त होते ही फिर दूसरी कृति पर ध्यान जाएगा। तब दूसरे पात्र दिमाग में घूमते हैं। पहले वाले पात्र विस्मृति के गर्त में चले जाते हैं। यह क्रम चलता रहता है। हर कृति में एक न एक पात्र मिल ही जाता है जो अंत तक आपको 'हांट' करता रहेगा।
प्र. आपकी रचनाओं में ताजगी, समकालीनता-बोध, शिल्प, संवेदना की प्रचुरता व पाठकों का विशाल वर्ग होने के बावजूद आलोचकों का ध्यान आप पर नहीं गया?
उ. मेरा मानना है कि पंजाबी साहित्य में आलोचना विधा उतनी वस्तुनिष्ठ नहीं हुई है। कई बार चर्चा होती है कि आलोचना 'मैनेज' की जा सकती है। मैं इस बात से संतुष्ट हूं कि मेरे पाठक मेरी रचनाएं पसंद करते हैं और चिट्ठियां लिखते हैं, विभिन्न स्थितियों पर अपने सुझाव देते हैं।
प्र. पंजाबी के किन साहित्यकारों ने आपको प्रभावित किया है?
उ.- मेरे अंदर साहित्य की भूमि तैयार करने में उपन्यास नानक सिंह, कुलवंत सिंह विर्क, संत सिंह शेखो, प्रो. मोहन सिंह, गुरशरण सिंह, संतराम उदासी, हरभजन सिंह हलवारवी की रचनाओं का बड़ा हाथ रहा है। दिल्ली आने पर मुझे यहां गुरबचन सिंह भुल्लर, मोहनजीत, डॉ. सुतिन्दर नूर, डॉ. जगबीर, स्वराजवीर, मनमोहन, डॉ. रवेल सिंह जैसे लेखक-मित्रों से भी प्रोत्साहन मिला।
प्र. संख्या और गुणवत्ता के मानदंड पर पंजाबी कथा-साहित्य हिन्दी व अन्य भारतीय भाषाओं के कथा साहित्य की तुलना में कहां खड़ा है?
उ. किसी भी भारतीय भाषा की तुलना में पंजाबी में काफी ज्यादा लिखा जा चुका है। ऐसे कहानी और उपन्यास लिखे गए हैं जो मील के पत्थर हैं। चांदनी रात दो दुखांत (करतार सिंह, दुग्गल), रसीदी टिकट (अमृता प्रीतम), सांझ (गुरदयाल सिंह), ना मारो (अजीत कौर), बर्फ का दानव (जसबीर भुल्लर), गुमशुदा (कृपाल कज्जाक), सपने और सौदागर (एस. बलवंत), खारा दूध (रामस्वरूप अणखी), डेड लाइन (प्रेमप्रकाश) रिश्तों के आरपार (दलबीर चेतन), भविक्ख दे वारिस (बलदेव सिंह), कत्ल (जिंदर) दबाब (देशराज काली), तीजा नेत्तर (भगवंत सिंह रसूलपुरी), सारंगी दी मौत (गुरमीत कडिय़ालवी) जैसी कई रचनाएं पंजाबी कथा जगत ही नहीं, अन्य भारतीय भाषाओं के कथा साहित्य में संवेदना, कथ्य व शिल्प की दृष्टि से मील के पत्थर हैं। पहली पीढ़ी के कहानीकार गुरबख्श सिंह 'प्रीतलड़ी' की 'भाभी मैना' को हिन्दी के 'उसने कहा थाÓ के समानान्तर कहा जाता है।
प्र. पंजाबी के बहुत से साहित्यकार विदेशों में जाकर बस गए हैं। वे वहीं से लिख रहे हैं। क्या विदेश में होने के कारण उनके लेखक की गुणवत्ता में कोई बदलाव आया है?
उ. जो साहित्यकार विदेश में बस गए हैं, वे अच्छा लिख रहे हैं। वहां जाने से उनको बदले परिवेश की बात करनी है। शैली तो नहीं बदलती, परिवेश, पात्र, परिस्थितियों में परिवर्तन तो आ जाता है। वैसे अगर देखा जाए तो मानव की मूलभूत समस्या, प्रकृति, परिस्थिति, सोच लगभग एक जैसी होती है, मनोभाव वही होते हैं- दुख में आंसू सुख में मुस्कान, गरीबी, अमीरी, तनाव, स्पर्धा,देश मुल्क कोई भी हो। कहानियों में भी तो यही सब आएंगे न।
प्र. पंजाबी के युवा कथाकारों के बारे में कुछ कहना चाहेंगे?
उ. देखिए, हम उन्हें दोष तो देेते हैं, मगर उम्र का तकाजा भी तो है। वे थोड़ा लिखकर ज्यादा और जल्दी छा जाने की जल्दी में रहते हैं। पढ़ते कम हैं। आप उनके लिए मेरा यह संदेश समझ लें कि पढ़े 90 प्रतिशत, लिखे 10 प्रतिशत। जमीन से न भागें। पुरस्कार, बेस्ट सेलर आदि के फेर में न पड़ें। वैसे बहुत से युवा जैसे जसबीर राणा, देशराज काली, केसरा राम, जतिंदर हांस, सुखजीत, सांवल पासी, भगवंत रसूलपुरी आदि अच्छा लिख रहे हैं और इनके हाथ में पंजाबी कथा साहित्य का भविष्य सुरक्षित है।
प्र. आपको पंजाबी अकादमी सहित कई पुरस्कार व सम्मान मिले हैं। ये पुरस्कार/सम्मान लेखन में क्या भूमिका अदा करते हैं।
उ. मेरी समझ से किसी सरकारी या गैर-सरकारी संस्थाओं द्वारा दिया जाने वाला पुरस्कार या सम्मान लेखक के अब तक के किए काम को मान्यता देना है, उसकी पीठ थपथपाने जैसा है- 'शाबाश, ऐसे ही आगे लिखते रहो।' पुरस्कारों से लिखने वाले को यह संदेश जरूर मिलता है कि 'और अच्छा लिखें', 'यही अंतिम मंजिल नहीं है', पर आप सोचें कि पुरस्कार से लेखक के रचना की गुणवत्ता पर असर पड़ेगा तो मैं ऐसा नहीं मानता। मुझे कई संस्थाओं से सम्मान मिले हैं परंतु लिखने के तौर-तरीकों में कोई बदलाव नहीं आया है। मैं अपने तरीके से लिख रहा हूं।
प्र. क्या आप मानते हैं कि हर लेखक के जीवन में एक ऐसा दौर आता है जब वह चूक जाता है कुछ नया नहीं रच पाता? खुद को दोहराता भर है।
उ. हां, मैं मानता हूं कि प्राय: लेखक के जीवन में ऐसा दौर आता है। पर कई लेखक ऐसा नहीं मानते। वे जीवन के अंतिम क्षण तक लोगों से, समाज से, चरित्रों से जुड़े रहते हैं। सजग रहते हैं और वहीं से अपनी खुराक पाते हैं। ऐसे लेखक न चूकते हैं, न खुद को दोहराते हैं।