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Tuesday 21 Nov 2017

कानों सुनी आंखों देखी

जोश' मलीहाबादी 'आजकल' के सम्पादक बने तो दिल्ली के शायर प्राय: और बाहर के शायर दिल्ली आने पर 'जोश' साहिब को सलाम करने जाने लगे। तब शायद यही एक पत्रिका थी जो रचनाओं का पारिश्रमिक देती थी।
दिल्ली के एक उभरते हुए शायर भी एक दिन सलाम करने गए। 'जोश' साहिब ने अन्दर बुला लिया। युवा कवि ने पूछा, 'हुजूर के मिज़ाज कैसे हैं?'''जोश' साहिब बोले, 'साहिबज़ादे, अपना तो एक ही मिज़ाज है, वो अच्छा है। जिनके पास एक से ज्य़ादा मिज़ाज है, उनसे मालूम कर लो।'
युवा कवि अपना-सा मुंह लेकर रह गए। समझ गए कि मिज़ाज शब्द एकवचन है, बहुवचन नहीं।
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राजों-महाराजाओं का ज़माना था। रियासत मालेरकोटला के राज्य कवि, सेवानिवृत्त इंस्पेक्टर ऑफ स्कूलज़ , शेख बशीर हसन 'बशीर' अपने बड़े से मकान के बड़े-से आंगन में तख़्त पर विराजमान थे। तख़्त के एक ओर मेज़ पर रेडियो रखा हुआ था। दूसरी ओर तिपाई पर पानी की सुराही और दो चांदी के गिलास। आंगन में बिछी कुर्सियों पर मौलाना 'कमाल', मेज़र अब्दुल हमीद 'फरहत' और मैं बैठे हुए थे। रेडियो पर गज़ल शुरू हुई तो शे$ख साहिब की बांछें खिल गई। बोले, 'ये हमारी गज़ल कहां से ले गई मोहतरमा।'गाने वाली शेर का पहला मिसरा गाती, शेख साहिब लहककर शेर का दूसरा मिसरा बोल देते। उनकी प्रसन्नता छलक-छलक पड़ रही थी। गायिका ने जब गज़ल का मकता गाया और उसमें 'बशीर' के स्थान पर 'ज़मीर'पढा तो शेख साहिब पर जैसे घड़ों पानी पड़ गया। सारी प्रसन्नता काफूर हो गई। चेहरा लटक गया।
दरअसल, उनको याद ही नहीं था कि वे यह गज़ल नवाब इफ्तिखार अली खां को दे चुके थे, जिनका तखल्लुस ' ज़मीर' था। वास्तव में शे$ख साहिब ने नवाब साहिब को 'ज़मीर'उपनाम इसलिए ही दिया था कि जब आदेश होगा, वे अपनी किसी गज़ल के म$कते में 'बशीर' के स्थान पर 'ज़मीर' लिखकर गज़ल उनकी सेवा में प्रस्तुत कर देंगे।
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एक बार 'जोश'मलीहाबादी तत्कालीन शिक्षा मंत्री मौलाना अबुल कलाम से मिलने गए। उनके नाम की पर्ची अंदर भिजवा दी गई। का$फी देर वे वेटिंग रूम में बैठे बुलाए जाने की प्रतीक्षा करते रहे। अन्तत: उनका धैर्य चुक गया। और अधिक प्रतीक्षा करना उनके अहम् को स्वीकार्य न था। उन्होंने एक काग•ा पर एक शे'र लिखकर स्टाफ के हवाले किया और चले आए। शे'र था-
किसलिए अपना खून खौलाना।
फिर किसी और वक़्त मौलाना।
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पंडित हरिचन्द 'अख़्तर' बड़े बा-कमाल शायर थे। वे साधारण बातचीत भी शायरी में कर सकते थे। इस प्रकार तुरंत शे'र कहने को फिल्बदीह कहते हैं।
मुशायरा हो रहा था। एक शायर बहुत ही सुरीली आवाज़ में ग़ज़ल पढ़ रहा था। उसकी गज़ल के का काफ़िया-रदीफ थे- ''बात क्या क्या, रात क्या क्या।'' उसने एक मिसरा लहक-लहककर तर्जें बदल-बदलकर गाया- ''ये दिल है ये जिगर है ये कलेजा।''
मंच पर बैठे हरिचन्द 'अख़्तर' दूसरे मिसरे की प्रतीक्षा करते-करते थक गए तो फि़ल्बदीह बोले, ''कसाई लाया है, सौगा़त क्या क्या।