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Friday 17 Nov 2017

चंद्रसेन विराट : जीवन से जुड़े रहने का संकल्प

गीत' के प्रति चन्द्रसेन विराट के मन में बहुत सम्मान का भाव है। वे मानते हैं कि रचनाकार का दुख ही गीत बनता है- 'जब-जब सिसका गान बन गया / दुख उसकी पहचान बन गया।' गीत को 'देवता' बताना भी उसके महत्व का उद्घाटक है-

हर गीत देवता है वह भावों का

स्वर-गंगा का जिसको अभिषेक मिला

मस्तक पीड़ा के चंदन से चर्चित

हर अश्रु कुसुम जिसके पग तले खिला

(ओ मेरे अनाम)

'किरण के कशीदे' संग्रह में गीत को रचनाकार के उदात्तीकरण में अपनी महत्वपूर्ण निभाता हुआ माना गया है- 'गीत संस्कार दे कवि के / अहम् को ओम करता है / गलाकर वक्ष पत्थर का / गीत ही मोम करता है।' 'ओ, गीत के गरुड़' संग्रह में श्री विराट की अपेक्षा है कि जमीन से जुड़ा गीत ही श्रेयस्कर है- 'मेरे गीत! निराश न होना / रहना जुड़कर ही जीवन से / ऊध्र्वमूल आकाश न होना।' वर्तमान औद्योगीकरण, अवमूल्यन, मशीनीकरण के दौर में जब संवेदनाओं का क्षरण हो रहा हो, विराट 'गीत'की प्रासंगिकता के प्रति संदेहशील नहीं हो पाते हैं, बल्कि उनका आह्वान है-

मेला मशीनों का लगा

इस शोर के संत्रास से

टूटो न मेरे गीत-कवि

गाना सतत जारी रखो

स्वयं श्री विराट ने लंबे समय तक 'गीत-साधना की है।' 'मेहंदी रची हथेली', 'ओ मेरे अनाम', 'स्वर के सोपान', 'किरण के कशीदे', 'पीले चावल द्वार पर', 'दर्द कैसे चुप रहे', 'सन्नाटे की चीख', 'गाओ कि जिये जीवन' और 'ओ, गीत के गरुड़' आदि गीत संग्रहों में वे समर्थ गीतकार के रूप में उपस्थित हैं। उनके गीतों की अन्तर्वस्तु व्यापक है। उनका अपना दुख तो 'गीत' बना ही है, परिवेश की कुरुपताएं भी 'गीत' में संश्लिष्ट हैं। दिनकर सोनवलकर ने लिखा है- ''अक्सर गीत-विधा पर यह आरोप लगाया जाता है कि वह आधुनिक जीवन की जटिल संवेदनाओं को व्यक्त करने में सक्षम है। इस आरोप को झूठा साबित करने के लिए 'विराट' के गीत ही पर्याप्त हैं।'' (किरण के कशीदे, 'गीतविधा को समर्पित एक विशिष्ट हस्ताक्षर।')

विराट के प्रारंभिक गीतों में प्रकृति, रूप-सौंदर्य, प्रणयानुभूति से संबंधित काव्यानुभव अधिक स्थान घेरते हैं। कई गीतों में रूप-जल से आंख धोने, रूप को डिठौना लगाने और रूप को निरखे हुए एक अरसा होने की अनुभूतियां हैं। श्री विराट के गीतों में स्त्री-सौांदर्य और प्रकृति सौंदर्य एकाकार से हैं। स्त्री के रूप वर्णन में उन्हें प्रकृति की सुन्दरता याद आती है और प्रकृति का सौंदर्य भी कई स्थलों पर स्त्री-रूप में मानवीकरण का आश्रय लिए हुए हैं।  'प्रथम बरसात का पानी' गीत में प्रिय के बरसात में भीगे रूप को 'शबनम', 'कमल', 'शेफालिका' जैसे अप्रस्तुतों के द्वारा कुछ इस तरह रचा गया है-

बहुत दिन हो गए मुझको तुम्हारा रूप यह निरखे

कि जैसे भोर में कोई कली शबनम नहाई हो

कि ज्यों नीला कमल कोई खिला हो दूध के सर में

कि जो शेफालिका ही चांदनी तल में तिराई हो

कुछ गीतों में स्त्री-सौंदर्य का अंकन उद्दाम न होकर उदात्त है। 'दर्शन पा लिया' में तुलसी-पूजन कर रही स्वकीया का चित्र बहुत घरेलू और सहज है-

संगमरमरी बांह, हथेली हलदिया

उस पर जलता हुआ मौन घी का दिया

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यह सौंदर्य-किरण का / परस प्रभाव है

ऊध्र्वमुखी चेतना कि पूजा भाव है

कहीं सौंदर्य-वर्णन आध्यात्मिक संकेत भी लिए हुए हैं। 'मन की चिर क्वांरी दुल्हनियां;की दुल्हन साधारण नहीं है- 'पहनी चुनरी तारों वाली गोटा जड़े किनारों वाली / सूरज चंदा वाली चोली खिलती हुई बहारों वाली।;इसी प्रकार कहीं प्रकृति और रमणी रूप एकाकार होकर चित्ताकर्षक बन गए हैं-

फिसल तुम्हारे वक्षस्थल से गिरे रेशमी ओढऩी,

आज बहुत कुछ वैसी ही फैली है नभ पर चांदनी।

गीतकार ने 'प्रेम; को बहुत मूल्यवान और महत्वपूर्ण माना है। एक ओर उसकी धारणा है- 'प्यार सनातन भाव का जो संसार में / सभी धड़कते हृदयों में उपलब्ध है' तो दूसरी ओर प्यार को परमात्मा के समकक्ष रख दिया है- 'तीर्थ है मेरे हृदय में ही समाया / प्यार का परमात्मा पहचानता हूं।'कई गीतों में स्पष्ट संकेत है कि प्यार व्यक्ति के जीवन में सकारात्मक बदलाव लाता है। एक गीत में प्रणयी के जीवन में प्रवेश से हुए परिवर्तन- 'तीर्थ सा मन' हो जाने की अनुभूति इन शब्दों में व्यक्त हुई है-

अब मुझे वीराना भी मेला बना है

पर्व प्राणों को मनाना आ गया है

अब न संन्यासी रहा है हृदय मेरा

सत्य सपनों को बनाना आ गया है

'दर्द कैसे चुप रहे' गीत-संग्रह के कई गीतों में प्यार के साहचर्य में 'जीवन' लगने और नई चेतना से सम्पन्न होने की अनुभूतियां हैं। 'इतना ही आधार बहुत है'शीर्षक गीत में प्यार के आलंबन के दूर होने को भी कम महत्वपूर्ण नहीं माना गया है-

चाहे दूरी पर जलता हो

दीप रूप का जलता तो है

जिसे देखकर दुर्गम्य पथ पर

खास-पथिक यह चलता तो है

प्रेम के आलोकधर्मा चरित्र को दृष्टि में रखकर विराट को विश्वास है कि अन्य विषयों पर लिखे गीत पुराने पड़ सकते हैं, प्यार के गीत कभी पुराने नहीं पड़ेंगे-

सभी पुराने पड़ जाते हैं साधन इस संसार के।

सदा नये हैं और रहेंगे गीत मगर ये प्यार के।

प्रेम को महत्व देने का स्पष्ट आशय है, अवमूल्यों पर मनुष्यता की प्रतिष्ठा, प्रेम न केवल मनुष्य को बेहतर मनुष्य बनाता है, अपितु, इसकी उपस्थिति समाज और दुनिया को बेहतर और सुंदर बनाने में सक्षम है। लेकिन विराट के गीतों में प्रेम की अवधारणा में देहभोग और उच्छृंखलता का स्पष्ट तिरस्कार है-

आज प्रेम के नाम जगत में

संयम नियम न नीति रही है

देहों का भूगोल बचा है

केवल रति की रीति रही है

काम-केलि के कांच घरों में

              अपना प्रणय कहां ले जाऊं?

विराट के गीतों में प्रकृति बहुविध रूप में है। कोमल-कठोर, सभी तरह के रूप गीतकार के अनुभव-क्षेत्र की विस्तृति के द्योतक हैं। वैसे तो इन गीतों में 'पुनमिया रजनी', 'बादल गुमसुम आवारा', 'नृत्य कत्थक किये जा रही है किरण', 'घन की घुमड़ घिराव', 'मेघ में मधुरस भरा है' आदि अनेक पद गीतकार की पर्यवेक्षण शक्ति के परिचायक हैं। लेकिन प्रारंभिक गीतों में संध्या से संबंधित बिम्ब विशेष ध्यान आकर्षित करते हैं। कुछ उदाहरण इस प्रकार हैं-

0 समर्पिता संध्या ने

खोंस लिए जूड़े में

              तट के शैवाल-

(किरण के कशीदे)

0 सिमट गये किरणों के कोण

              शाम जामुनी हुई

       (पीले चावल द्वार पर)

0 मैके को लौट गयी

धूप उतर फुनगी से

मछुओं की झुग्गी में

दीप जले चिनगी से

(किरण के कशीदे)

'ओ मेरे अनाम' में दो गीत संध्या केन्द्रित है। एक गीत में संध्या उदास है और दूसरे में प्रसन्न है। उदासी और प्रसन्नता को गीतकार ने मनोभाव के अनुरूप और उपयुक्त बिम्बों से भलीभांति सिरजा है। उदासी के संदर्भ में वीभत्स बिम्ब है- 'रंग क्षितिज पर हैं कि चिता की लपटें हैं / सूरज कापालिक समाधि में बैठ गया।' संध्या की प्रसन्नता या कहें गीतकार का प्रसन्न भाव कुछ इस रूप में उभरा है-

पश्चिम के गालों पर लाली दौड़ गई

चित्रकार सूरज अब शयनागर चला।

जाते-जाते श्रृंगों को दे दिये मुकुट

चंचल लहरों के मुख पर सिंदूर मला।

मन:स्थिति के अनुरूप और उसे संप्रेषण में सक्षम बिम्बविधान इन गीतों को सार्थक बना सका है। 'खाएगी मेरा हृदय नोच / यह सांध्य-चील क्रूरता भरी', 'प्यासी हिरणी सी / वैशाखी दुपहरिया हॉंफ रही है'जैसे अवतरण उल्लेखनीय हैं। विराट की गीतयात्रा में धीरे-धीरे बिम्बों का हस्तक्षेप कम हुआ है, वैचारिकता के दबाववश सीधे कथन की प्रवृत्ति बढ़ी है। 'गाओ कि जिये जीवन', और 'ओ गीत के गरुड़' के कई गीतों- 'यदि साधन दूषित होंगे तो दूषित ही परिणाम मिलेगा', 'अधिक सभ्य होकर मनुष्य अब / पहले से भी कुटिल हो गया' आदि में गीत विधा के लिए वांछित बिम्बधर्मिता और सांकेतिकता न होकर सपाट कथन मिलता है। इसी दौर के कुछ गीतों में अपने समय के यथार्थ को गीतविधा की शर्तों पर उभारने के प्रमाण कम नहीं हैं-

धीमे उजड़ रहा है

जल कैद, सड़ रहा है

फैली सड़ांध, काई चारों तरफ जमी है

पूववर्ती संग्रहों में भी आसपास की कुरुपताओं की अभिव्यक्ति सलीके से हुई है। बढ़ते संबंधाभाव की भयावहता का एक पक्ष निम्नलिखित है-

सिर्फ औपचारिकता भर है

रस ही कहां रहा रिश्तों में

एक उम्र जीने की खातिर

रह रहकर मरना किश्तों में

इसी तरह संवेदनशीलता के छीनने की त्रासदी का बयान इन शब्दों में की है-

जड़ता को पूजती सभ्यता

चेतन कारागृह में बंदी

बौद्धिकता का शासन निष्ठुर

मन पर तर्कों की पाबंदी

इन प्रतिकूल परिस्थितियों में भी गीतकार का 'विजन' निराशा लिए हुए नहीं है, यह बड़ी बात है। लोकतंत्र की खातिर एकतंत्र की चिंता और आजादी की परछाई तक न दिखाई देने की विडम्बनाओं के बीच भी सकारात्मक परिवर्तन का विश्वास कई गीतों को महत्वपूर्ण बनाता है।

खड़ा पुरुषार्थ पहरे पर

किरण स्वच्छंद डोलेगी

जहां भी ज्योति बंदी है

वहां के द्वार खोलेगी

अपने परिवर्तनकामी विजन को पुष्ट करने के लिए विराट ने 'दुख की पिछली रजनी बीच / विहंसता सुख का नवल प्रभात', जैसे जीवन दर्शन का सहारा भी लिया है। 'रात का प्रात निश्चित / अस्त का है उदय' के साथ 'हर तम के पीछे है किरण प्रकाश की / और पतन के पीछे ही उत्कर्ष है' जैसे उद्गार ध्यानाकर्षक हैं। वांछित परिवर्तन के लिए विराट ने जूझने की जरूरत दर्शाई है। 'दर्द कैसे चुप रहे' के एक गीत में यह जुझारू चेतना बहुत मुखर है-

सागर है यह आंधी तूफां आएंगे

तट से नैया छोड़ धार में जाने दे

तट पाने मंझधार पार करना होगा

छोड़ उसे तू लहरों से टकराने दे

परिवर्तन के लिए नई पीढ़ी में विश्वास 'कोई परिवर्तित हो' गीत में व्यक्त हुआ है। गीतकार का यह आह्वान जीवन के हर क्षेत्र की जरूरत है-

अब मुकुट उतारें खुद बूढ़े मस्तक

तरुणाई से शोभित सिंहासन हो

कब से दस्तक देती हैं प्रतिभाएं

अब समय आ गया, दरवाजा खोलो

अपनी अनुभव-सम्पदा और 'विजन' के बल पर विराट की गीतयात्रा जारी है और उम्मीद है कि जारी रहेगी। क्योंकि गीतकार की स्वीकारोक्ति है- 'सुन विराट, तू लाख कहे पर/मुझको मालूम है निश्चित/तुझसे गीत नहीं छूटेगा।