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Tuesday 21 Nov 2017

कवि जी

मैंउन्हें कवि के रूप में जानता हूं। वे स्वयं को आशु कवि मानते हैं। उनके जानने वाले उन्हें चाटू कवि कहते हैं। रास्ते में मिल गये तो कम-से-कम एक घंटा, मिलने घर आ गए तो कम-से-कम दो घंटे और उनके घर के आसपास पकड़ लिए गए तो कम-से-कम तीन घंटे की कुर्बानी निश्चित है। उनके घर में पता नहीं कौन-सा रडार लगा हुआ है कि कोई परिचित साहित्य-प्रेमी उधर से गुजरा नहीं कि पकड़ में आ जाता है। वे सड़क से खींचकर आग्रहपूर्वक अपने घर ले जाते। एक कप चाय और दो मारीगोल्ड बिस्किट में बेचारे के तीन घंटे पर अपना अधिकार जमा लेते। पहले तो अपनी आठ-दस लेटेस्ट कविताएं सुनाते फिर अपनी खाट के नीचे से एक पुराना बक्सा खींचकर निकालते। बक्से से बहुत-सी पत्र-पत्रिकाएं और सजिल्द कापियां निकालते। जब वे छठी कक्षा में पढ़ते थे तब उनकी पहली कविता स्कूल-मैगजीन में छपी थी। तब से लेकर अद्यतन छपी रचनाओं के कतरन कापियों में चिपकाकर एवं कुछ पत्र-पत्रिकाओं को उन्होंने अत्यंत सहेजकर रखा है। जैसे कोई साड़ी बेचने वाला प्रत्येक साड़ी की तह खोलकर ग्राहक को दिखलाता है और उसका वैशिष्ट्य बताते जाता है वैसे ही अपनी रचनाओं को अत्यंत उत्साहित होकर दिखाते और प्रत्येक का साहित्यिक वैशिष्ट्य बताते चलते। उनकी बेटी चाय-पानी लेकर आती तो मुंह में चुनरी का छोर दबाकर आती। फिर भी उसकी हंसी छिपती नहीं थी। छोटा बेटा पर्दे की आड़ से इस प्रकार हुलसता जैसे आम के मंजर से टिकोला हुलसता है। उस पर नजर पड़ते ही वह फिक् से हंसकर भाग जाता। फिर थोड़ी देर बाद उसी तरह हुलसता। बीच-बीच में उनकी धर्मपत्नी भी पर्दे की आड़ से झांककर, एक मुस्कान फेंककर चली जाती। परिवार में सबको पता था कि दि एंड कब होगा। सप्ताह में एक-दो मुर्गा पकड़ा ही जाता था। उधर कवि जी अपनी कविताएं पढ़-पढ़कर सुनाते जाते इधर बेचारा मुर्गा अपनी घड़ी देखता रहता और उस घड़ी को कोसता जाता जब उसने उधर से गुजरने का मन बनाया था।

शहर में आयोजित होने वाली किसी भी साहित्यिक गोष्ठी की गंध कवि जी को लग जाती और वे पहुंच जाते। कवि जी संचालक को ध्वनि विस्तार दंड (माइक) देने को मजबूर कर देते। उनके माइक थामते ही कुछ श्रोता 'चाटू... चाटू'कहकर चिल्लाने लगते, पर वे अविचलित ऐसे वाणों को झेल लेते। फिर शुरू होती पंचम स्वर में सरस्वती वंदना। फिर ससुर कविता के नाम पर कुछ असुर कविताएं सुनाने लगते। कुछ श्रोता गमगीन होकर एक-दो-तीन होने लगते तब संचालक के लिए तमाशबीन बने रहना असह्य हो जाता और वे हस्तक्षेप करने को बाध्य हो जाते।

एक दिन मेरे एक मित्र ने बताया कि कवि जी ने एक साहित्यिक-संस्था बनाई है। शहर के नये-पुराने कवियों की कविताओं का एक संग्रह वे प्रकाशित करेंगे। एक भव्य आयोजन कर उस संग्रह का विमोचन और शहर के कुछ साहित्यकारों को सम्मानित करने की उनकी योजना है। फिर उन्होंने कहा कि वे उनके पास आए थे। उनसे दो कविताएं और पांच सौ रुपए सहयोग राशि तथा सम्मान हेतु पांच हजार रुपए मांग रहे थे।

मैंने पूछा- ''आपने दे दिये?''

उन्होंने कहा- ''कविताएं और पांच सौ रुपए दिये। सम्मान लेने से मना कर दिया।'' फिर उन्होंने मुझसे पूछा- ''क्या वे आपके पास आये थे?''

मैंने कहा- ''नहीं, और ईश्वर से प्रार्थना करता हूं कि न आवें।''

परंतु ईश्वर ने मेरी प्रार्थना अनसुनी कर दी। एक दिन जनाब मेरे घर पधारे। मुझे सम्मानित करने की खुशखबरी दी। मैंने अत्यंत दीनभाव से कहा, ''क्षमा कीजिएगा, मुझमें इतनी क्षमता नहीं है कि आपके सम्मान का भार उठा सकूं।''

वे आशय ताड़ गए। कहा, ''आप चिंता मत कीजिए। मैं आप पर कोई बोझ नहीं डालूंगा, लेकिन मेरा एक आग्रह है।''

मेरे कान सूप हो गए। उन्होंने कहा, ''बस, आप अपनी संस्था द्वारा मुझे सम्मानित कर दीजिएगा।''

मैं हड़बड़ा गया। कलम मेरे हाथ से छूटकर नीचे गिर गई। उसे उठाने नीचे झुका तो वे चिहुंककर कुर्सी से उछल पड़े और उनके मुख से निकला, अरे-अरे चरण-स्पर्श कर क्यों मुझे लज्जित कर रहे हैं?

मैं भौंचक था, वे निर्विकार थे।