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Wednesday 22 Nov 2017

ऐसे थे उनके चेहरे

अल्पायु बच्चे ये सब कैसे जान पाये? यह कदापि जेहन में नहीं उतरेगा। अलावा इसके, यह जानने की दरकार रहेगी कि आखिर उन्होंने क्या जाना, क्या कि जिसे वयस्क पहले ही से जानते आये। अलबत्ता, यह धारणा, कि उसे ख्वाब नहीं हकीकत ही माना जाये, मन में बैठती है; सिर्फ़  वे लोग जो उनसे, या उनके स्कूलों से, या उनके शिक्षकों से नावाकिफ  रहे आये, वे ही, किसी संदेह की टीस के बगैर, मुकर सकते हैं।

जिस क्षण घंटी बजायी गयी- बेमतलब, रोजमर्रा, रिवाजी, यूँ कि दूध का वक्त हो गया, या, कुछ पल बाद, अन्तराल के अनन्तर, जब वे पिछवाड़े आँगन की जानिब दौड़े: शायद, बहुत करके अनायास, शनै:-शनै: वे अनवरत, आयु या लिंग के भेद के बगैर उसे जानने के निकट जा पहुंचे, मैंने जानबूझ निकट जा पहुँचे कहा क्योंकि नाना लक्षणों से ऐसा भाव उपजा कि उस क्षण तक वे किसी न किसी ऐसी बात की प्रतीक्षा में रहे आये, जो उन्हें अन्तिम दफा एक बार और किसी न किसी अत्यन्त महत्त्वपूर्ण बात के लिए प्रतीक्षारत रखे। बेशक, उस क्षण के बाद (उस क्षण कि जिसकी जानिब मैं यूँ ही एकाग्र हो रही हूँ, हालाँकि वह सहस्रों अटकलों का कथ्य है), अपनी मासूमियत खोये बगैर, अलबत्ता, बचपन की विशेष चारित्रिकता से युक्त उस प्रत्यक्ष बेफिक्री को तज, बच्चे किंचित भी अन्यमनस्क नहीं हुए।

गहरे चिन्तन ही के अवान्तर, विवश हो यह मानना ही होगा कि सभी बच्चों के जेहन में उसका तत्क्षण, एक साथ उद्भव हुआ। शयनालय में सोते क्षण, भोजनालय में खाते क्षण; गिरजे के प्रासाद में प्रार्थना के क्षण; प्रांगणों मेें छुआछुई या उछल-कूद खेलते वक्त; पुस्तकें रखीं अपनी चौकियों से सटे बैठ अभ्यास करते या सजा पाते क्षण; चौक में झूले झूलते क्षण; गुस्लखानों में देह की धुलाई-सफाई के क्षण (इन सभी महत्त्वपूर्ण क्षणों क्योंकि उनके दौरान चिन्ताएँ बिसरी रहती हैं), अपने चेहरों की एक जैसी उच्चाट, गुमसुम सूरत के बरक्स, छोटे-छोटे यंत्रों समान उनके मस्तिष्क मात्र एक ही ख्याल, एक ही अभिलाषा, एक ही प्रत्याषा पर घुमड़ रहे थे।

अतीव साफ झक रविवारी परिधान पहने, राष्ट्रीय या धार्मिक छुट्टियों के दिनों, या किसी भी रविवारीय दिन स्वच्छ और सजे-सँवरे उनको देख हर कोई कहता, ''वे सभी बच्चे किसी एक ही कुटुम्ब से या किसी एक ही भेदभरी संगत से सम्बद्ध लगते हैं। वे समरूप हैं! उनके बेचारे माता-पिता! वे अपने-अपने बच्चों को नहीं चीह्न सकते! ओह ये कैसा अर्वाचीन युग! उन सभी के केश एक से कर्तनालय में कटे हुए (छोटी-छोटी लड़कियाँ लड़कों की और लड़के लड़कियों समान दिखते हुए): कितना निर्मम अनाध्यात्मिक युग।''

दरअसल उनके चेहरे उसी मात्रा में परस्पर सादृश्य थे ही; अपने-अपने बिल्लों में लगी तसवीरों ही की तरह या अपने वक्षों पर धारी हुई वरजिन ऑफ़  ल्यूजान की प्रतिमाओं के समान ही वे नाना भाव-भंगिमाएँ गँवाये हुए थे।

लेकिन, उन्हें, प्रत्येक को, आरम्भिक क्षणों यों तन्हाई महसूस हुई, मानो किसी तंग इस्पाती कटोरे ने उन्हें ढँक कर अलगाते हुए अनम्य बना दिया हो। हर एक की पीड़ा वैयक्तिक और विकराल होगी; उनकी खुशियाँ भी, जो ठीक उसी वजह दर्दनाक थी। अवमानित, उन्होंने स्वयं को एक-दूसरे से भिन्न रूप में मन में उतारा: विभिन्न नस्लों के श्वानों की तरह, या चित्रों में उकेरे हुए प्रागैतिहासिक दैत्यों समान। उन्होंने सोचा कि वह रहस्य, जो उसी क्षण चालीस भेदों में बँट रहा, मिल-जुलकर आनन्द नहीं मना रहा, बल्कि कदापि नहीं मनायेगा। तथापि, कोई फरिश्ता, वह फरिश्ता जो यदाकदा सहस्रों जन के जमघट में घुलमिल उन्हें सुनता-समझता रहता होगा, आया, चित्रों में प्रदर्शित किन्हीं जुलूसों में ऊपर उठा ले जाये जाते किसी उम्मीदवार, या हीरो या अत्याचारी के समान, अपना उत्तंग उद्दीप्त आईना झलकाता हुआ वह आया और बोला- तुम्हारे चेहरे सादृश्य हैं। चालीस चेहरे सभी एक से चेहरे थे; चालीस दिमाग सभी एक से दिमाग थे- उम्रों और परिवारों में अन्तर होने के बावजूद।

तथापि, कोई रहस्य कितना ही वीभत्स क्यों न हो, लेकिन जब वह परस्पर बतियाया, बहसाया जाये तब वह कभी-कभार अपनी भयानकता तज देता है, क्योंकि उसका आतंक आनन्द- हाँ अनवरत चर्चा का आनन्द- प्रदान करता है।

लेकिन उसे वीभत्स मानना तो किसी आवेग के वश उछलकर निष्कर्ष निकालना कहा जायेगा। दरअसल, हम नहीं जानते कि क्या वह वीभत्स था और फिर सुन्दर हो गया, या क्या वह सुन्दर था और फिर वीभत्स हो गया।

जब वे कुछ ज़्यादा आश्वस्त हुए, उन्होंने किनारों पर गोट लगे या चित्र चिपकाये हुए रंग-बिरंगे वरक के ऊपर एक दूसरे को पत्र लिखे। आरम्भ में संक्षिप्त, बाद में लम्बे और ज़्यादा क्षुब्ध। उन्होंने डाकपेटी स्वरूप कतिपय मौके की जगहें चुनीं, जहाँ से दूसरे छात्र पत्र ले जायें।

अब किसी खुशदिल मिलीभगत के तहत वे जीवन की सामान्य दिक्कतों से परे हो गये।

अगर कोई छात्र कुछ करने का ताना-बाना रचता तो अन्य तत्काल वही करने का तय करते।

बराबरी के इरादे नाटे छात्र ऊँचे लगने के लिए पंजों के बल चलते; ऊँचे छात्र झुककर ताकि छोटे लगें। यूँ भी कहें कि लालकेशधारियों ने अपने बालों की चमक घटायी और स्याहवर्णियों ने अपनी तपी हुई कांस्य त्वचा का रंग धुसराया। सभी आँखें एक सा, फीके रंग की चारित्रिक विशेषताधारी आँखों समान, भूरा या धूसर रंग झलका रही थीं। हाँ, अब उनमें से कोई भी कदापि अपने नाखून नहीं चबाता, और मात्र एक वो कि जो अपना अँगूठा चूसता आया उसने बंद कर दिया।

वे अपनी भाव-भंगिमाओं की उग्रता के, अपने हमआवाज़ ठहाकों, आंखों में छिपी, खड़े या किंचित घुँघराले बालों में बसी एकजुटता की किसी हुड़दंगी के, और, रूक्षता में निमग्न उदास भावना के द्वारा भी सम्बद्ध थे। अतिशय जड़ता के साथ जुड़े हुए वे, किसी फौज क्या भूखे, भेडिय़ों के किसी झुण्ड, ताऊन, भूख-प्यास, या घोर थकान, कि जो सभ्यताओं का नाश कर दें, से बढ़-चढ़कर थे।

खिसलपट्टी के शिखर पर, बेशक किसी द्वेष के नहीं महज कौतुहल के वश, उनके बीच आ पहुँचे किसी अनजान बच्चे की उन्होंने जान ही ले ली होती। सड़क पर, उनके शानदार उत्साह को थामें क्या थामें कि उन्होंने फूलों से भरी गुमटी को उसके मालिक के साथ प्राय: समूल नष्ट कर दिया।

ड्रेसिंग रूम में, रात के वक्त, गाढ़े नीले चुन्नटदार स्कर्ट, पेंट, कुरतियाँ, खुरदरी सफेद जाँघियाँ, और रूमाल सभी अँधेरे में ठुँसे हुए, उसी जीवन के अनन्तर कि जिसके अवान्तर दिन में उनके धारक उलझे रहते। जूते, सभी एकजुट, कुछ ज़्यादा ही एकजुट, जोरदार ढंग से संगठित किसी फौज के समान; जबकि उनके प्रयोक्ता, रात के क्षणों, उनके बगैर ही उतना ही चलते कि जितना दिन के वक्त, उनको कस कर। उनके सोल पर कोई बेतुकी गंदगी चिपकी रहती। जूते, तन्हा होने पर, यूँ भी बहुत कुछ दयनीय ही रहते हैं! साबुन की बट्टी एक से दूसरे हाथ, एक से दूसरे चेहरे, एक से दूसरे वक्ष तक, उनकी आत्माओं का रूप ग्रहण करती हुई, खिसकती है। साबुन की बट्टियाँ, टूथपेस्ट और हेयरब्रशों और टूथब्रशों के बीच गुम रहती है! क्या फर्क है!

''एक आवाज़, जो बोलते हैं उनके दरम्यान विसरित होती है। जो नहीं बोलते हैं वे उसकी ताकत उन्हें घेरी हुई वस्तुओं को प्रेषित कर देते हैं'', किसी एक शिक्षिका, फेबिआ हेरनाँदेज़ ने कहा; लेकिन न तो वह स्वयं न ही उसकी सहयोगी शिक्षिकाएँ, लेलिया इस्नागा या अलबिना रोमेटिन उस संघनित संसार में घुस पायीं, जो यदाकदा उस तन्हा आदमी (जो अपने दुर्भाग्य या सौभाग्य के समक्ष ही स्वयं का बचाव या मनोरंजन करता हो) के हृदय में बसा होता है। वो संघनित संसार चालीस बच्चों के हृदय में बसा हुआ था। शिक्षिकाएँ कि जो अपने काम के प्रति पूरी निष्ठा से अनुरागी होंगी, रहस्य को रंगे हाथों पकडऩा चाहती थीं। उन्हें मालूम रहा आया कि रहस्य आत्मा के लिए विषैला है। अपने बच्चों पर पड़ सकते उसके प्रभावों के प्रति माँएँ आशंकित रहतीं; फिर वह चाहे जितना सुन्दर क्यों न हो; क्या मालूम कौन-कौन से दैत्य उसमें दुबके हो सकते हैं!

वे उन्हें रंगे हाथों पकडऩा चाहती थीं। वे सहसा खटके दबा शयनकक्षों को, इस बहाने कि ऊपर बह रहे पानी की वजह छत देखना है, या, सदर दफ्तर में आ घुसे चूहे को खोजना है, उजाल देती हैं; वे अन्तरालों में चल रहे हल्ले-गुल्लों और खेलकूदों को, ऐसी मिथ्या बात का हवाला दे कि किसी रुग्ण पड़ोसी की चिकित्सा, या, किसी जागरण की क्रिया के लिए ज़रूरी विश्राम शोरगुल से बाधित हो रहा है, थाम देती है; इस बहाने के तहत कि बच्चों का धार्मिक आचरण जांचना है वे गिरजे में जा घुसती हैं जहाँ प्रेमानन्द के लिए प्रगाढ़ रहस्यवाद स्वीकृत है कि जिसके अनन्तर बच्चे बाह्य प्रभावों से रक्षित अपने चेहरों को चिलकाती लपटें-लहराती मोमबत्तियों के समक्ष छिन्न-भिन्न तथापि कठिन शब्दों को शोर मचा-मचा उच्चार रहे होते।

बच्चे, फडफ़ड़ाते पंछियों समान, सहायतार्थ संयोजित किसी सांगीतिक कार्यक्रम को देखने किसी सिनेमाघर या रंगशाला में जा धमकते हैं, जहाँ चल रहे झिलमिलाते प्रदर्शनों से मौज मनाने या मन बहलाने का अवसर उन्हें प्रदान किया गया होता है। उनके सिर दाँये से बाँये, बाँये से दाँये, सभी एक साथ, स्वांग को पूरे विस्तार के साथ प्रगट करते हुए, घुमड़ते हैं।

सबसे पहले सुश्री फेबिआ हेरनाँदेज़ के जेहन में उतरा कि सारे बच्चों के ख्याल एक से, कि अपनी कापियों में सभी ने एक सी गलतियाँ कीं, और कि जब उसने उन्हें उनकी व्यक्तित्व शून्यता के लिए धिक्कारा, उन्होंने मधुर मुस्कानें बिखेरीं, उनकी ऐसी प्रतिक्रिया असामान्य थी।

किसी सहपाठी की शरारत के बदले सजा पाने पर किसी को भी रंज नहीं हुआ। कोई भी, अपने ही काम के एवज में अन्यों को श्रेय दिये जाने पर विचलित नहीं हुआ।

किन्हीं मौकों पर, शिक्षिकाओं ने, दो एक छात्रों पर, शेष छात्रों का भी, दत्त कार्य करने का इल्जाम लगाया, लेकिन यह भेद नहीं खुल पाया कि लिखावट इतनी मिलती-जुलती कैसे हुई; वाक्य-विन्यास इस कदर समरूप कैसे हुए। शिक्षिकाओं ने पुष्टि की कि उनसे भूल हुई है। 

चित्रशाला में, बच्चों की कल्पना को उद्दीप्त करने की दृष्टि से, शिक्षिका ने, उनका मन जो चाहे वैसा, चित्रांकन करने को कहा; सभी ने, विचलित करते विलम्ब से, पंख चितरे कि जिनके रूप और आकार, जैसा कि शिक्षिका ने कहा, पूरी आकृति की नीरसता से विलग नहीं होते हुए, अपरिमित रूप से भिन्न थे। फिर, जब उन्हें, हमेशा वही की वही वस्तु चितरने का दोष लगा, फटकारा गया, वे कुलबुलाये, और अपनी भावनाओं के चरम उफान पर उन्होंने ब्लैकबोर्ड पर लिखा, ''हमें महसूस होते हैं पंख, मिस।''

किसी बेअदब भूल में न पड़, क्या यह एहसास मुमकिन होगा कि वे प्रसन्न थे? बच्चे अपने आनन्द की सीमा तक, उनकी हदों के अनन्तर, ऐसा मानने की जानिब मन को लुढ़काता है कि वे, सिर्फ़  ग्रीष्म के दिनों को छोड़ शेष वक्त, खुश रहे। नगर की गर्मी शिक्षिकाओं पर भारी पड़ती थी। वह वक्त कि जब बच्चे दौडऩा, पेड़ चढऩा, घास के मैदान पर लुढ़कना, या टीले पर से घुड़कते हुए उतरना, ये सारे मनोविनोद दोपहरी झपकी, क्या दोपहरी झपकी के खतरनाक रिवाज द्वारा प्रतिस्थापित हो गये। सिकाडा (उड़ते कीट) भिनभिनाते, लेकिन बच्चे वह भिनभिन नहीं सुनते, जो गर्मी को कुछ ज़्यादा ही प्रचण्ड बनाती। रेडियो चीखते लेकिन बच्चे वह शोर नहीं सुनते, जो चिपचिपे डामर में निमग्न गर्मी को असह्य बनाता।

वे कई घंटे बर्बाद करते हुए शिक्षिकाओं के पीछे दुबके रहते, जो नन्ही-नन्ही छतरियाँ ताने सूरज के उतरने की बाट जोहतीं ताकि ताप घट जाये। जब तन्हा होते, वे अनायास कोई चुहल करते जैसे छज्जे पर घूम रहे किसी कुत्ते को पुकारते जो तत्क्षण इतने सारे सम्भावी स्वामियों को देख उन्माद से भर हवा में उछल उनके पास आ पहुँचे। या, सड़क पर चलती किसी सम्भ्रान्त महिला पर सीटी मारते, जो नाराज़ हो घंटी बजा उनकी गुस्ताखी की शिकायत करती।

किसी अप्रत्याशित चंदे के ज़रिये वे समुद्र की ओर छुट्टियाँ मनाने जाते। छोटी लड़कियाँ अपने लिए औसत दर्जे की तैराकी-पोशाकें बनवातीं; लड़के किसी सस्ती दुकान से अपने सूट खरीद लाते- जो माडर्न काट का तो होता (हर किसी पर फबे)- लेकिन, कपड़ा एरंड के तेल से गंधाता।

इस तथ्य को जरा ज़्यादा ही अहमियत- कि हम पहली दफा सैर कर रहे होंगे- देने की दृष्टि से, किसी संकेतक द्वारा, शिक्षिकाओं ने, एटलांटिक सागर तट बसे किसी स्थान को, नक्शे पर बने किसी नीले बिन्दु के ऊपर टक-टक कर बताया।

बच्चों के तखैयुल में सागर का, बालू का (नितान्त एक जैसा) तसव्वुर उभरा।

स्टेशन के आगे बढ़ी ट्रेन की खिड़कियों में से रूमाल- कबूतरों के झुण्ड समान- आगे-पीछे फरफराये; किन्हीं अख़बारों में प्रकाशित यह नजारा हिफाजत से रखा हुआ है।

जब वे सागर तक पहुँचे होंगे, उसे वस्तुत: उन्होंने नहीं देखा; उनकी नजऱों के भीतर कल्पित या अनुमानित समुद्र ही समाया  रहा, वे वास्तविक सागर नहीं देख रह थे। जब वे नये परिदृश्य से अभ्यस्त हुए, उन्हें नियंत्रण में रखना बड़ा मुश्किल हुआ। वे फेन के पीछे लपके जो तुषार के ही जैसे पुंज बना रहे थे। तथापि वह आनन्द भेद से उनका पीछा नहीं छुड़ा पाया, उन्हें तो उदासमना ही उन कक्षों में लौटना होगा जहाँ उनके दरम्यान परस्पर सम्प्रेषण सहज होता रहा है। उन्हें जो महसूस हुआ वह अगर प्रेम नहीं तो भी प्रेम से बहुत कुछ मिलता-जुलता कुछ न कुछ होगा ही जो उन्हें जोड़े हुए, प्रसन्न रखे हुए, उल्लसित बनाये हुए था। कमतर आयु के छात्रों से प्रभावित बड़ी वय के छात्र- शिक्षिकाओं द्वारा ट्रिक भरी पहेलियाँ पूछी जाने और पल बीते झटपट गरदन लहरा उत्तर बताने पर- शरमाते। अल्पायु छात्र, पूरे सँजीदा, वयस्कों से नजऱ आते; उन्हें कोई बात दिक्कत में नहीं डालती। अधिकांश के नाम फूलों पर थे- जैसे: जेसिंटो, डहेलिया, डैसी, जैस्मीन, वायोलेट, रोज़, नारसिस्यूस, हारटेंस, केमिला: माँ-पिता द्वारा चुने हुए कितने प्यारे नाम! उनको उन्होंने, शेरों के से अपने सख्त नाखूनों से, पेड़ों के तनों पर उकेरे, तीखी पेंसिलों से दीवारों पर लिखे, उँगलियों से रेत में बनाये।

       वे नगर की ज़ानिब, फूले न समाये हृदयों के साथ, क्योंकि अब वायुयान से यात्रा होगी, लौटने लगे। उस दिन किसी फि़ल्म समारोह का आगाज होना था, सो संयोगवश उन्हें हवाई अड्डे पर लुके दुबके एक्टरों की झलकें मिल गयीं। घोर ठहाकों से उनके गले दुखते हुए। घूरने से उनकी आँखें सुर्ख लाल होती हुईं।

समाचार पत्रों में खबर इस तरह के मजमूनों में प्रकाशित हुई: मूक-वधिर के लिए संचालित किसी स्कूल के चालीस बच्चों को उनकी प्रथम सागर तटीय सैर से लौटा रही हवाई यात्रा के अनन्तर वायुयान किसी अनपेक्षित दुर्घटना का शिकार हो गया। उड़ान के दौरान एक दरवाज़े के अचानक खुल जाने ने हादसे को अंजाम दिया। सिर्फ़  शिक्षिकाएँ, पायलट, और यानकर्मी ही बच पाये। मिस फेबिआ हेरनाँदेज ने, अख़बारनवीसों को चर्चा के अन्तर्गत पूरे इत्मीनान के साथ कायल कराया कि जब बच्चों ने महाशून्य में छलाँग लगाई, उनके पर निकल आये थे। उसने अन्तिम बच्चे को थामा, क्या थामा कि जोर लगा छूटकर किसी फरिश्ते ही के समान साथियों में जा मिला। बेइन्तिहा अद्भुत नजारे की बेनजीर खूबसूरती से अवाक् शिक्षिका ने आरम्भ में दृश्य को भयंकर विनाश की बनिस्बत ऐसा दिव्य दर्शन माना जिसे कदापि नहीं बिसार सकेगी। उसे तो अभी तक भी यकीन नहीं हो रहा कि बच्चे लोप हो गये।

''ईश्वर ने कोई तुच्छ चाल चल हमें जन्नत का दर्शन करा जहन्नुम में जा गिराया'', मिस लिलिआ इसाँगा बोली- ''मुझे हादसे पर तनिक भी विश्वास नहीं हो रहा।''

अलविना रोमारिन कहती है, ''वह तो बच्चों ने कोई सपना दिखा हमें चौंकाने का खेल किया है, ठीक उस तरह कि जिस तरह उन्होंने चौक पर हिंडोलों में झूलते क्षण किया था। आप लोग मुझे मत समझाइये कि वे गायब हो गये हैं।''

न तो संकेत देती लाल झंडियाँ कि जहाँ स्कूल रहा आया वह घर किराये से देना है न बंद झिलमिलियाँ फेबिआ हेरनाँदेज का विश्वास डिगाती हैं। अपनी सहयोगियों के साथ वह उसी तरह जुड़ी हुई कि जिस तरह बच्चे अपनों बीच परस्पर सम्बद्ध होंगे, वह पुराने भवन तक रोज जा दीवालों पर लिखेे बच्चों के नामों (वे उत्कीर्णन कि जिनके लिए उन्हें सजा मिली थी), और भोले कौशल के साथ चितरे हुए पंखों, जो चमत्कार के साक्ष्य की थाती हैं, के समक्ष- आँखें गड़ाये खड़ी रहती हैं ।

अनुवाद: इन्दुप्रकाश कानूनगो

282, रोहित नगर (प्रथम)

गुलमोहर, भोपाल-462039

मो.-09981014157