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Saturday 18 Nov 2017

फ्रॉड

उस दिन अजीत साहब के आमंत्रण को अस्वीकार नहीं कर सका था विजय। कुछ ही पल सोचने के बाद उसने हामी भर दी थी और दूसरे ही दिन उसने ड्यूटी ज्वाइन कर ली थी, 'मार्केटिंग मैनेजर' के पद पर। एक छोटा-सा केबिन, पूर्णत: एयर कंडीशन्ड, टेबल पर ताजा अखबार, फिर बिना आर्डर के चाय-कॉफी की प्यालियां और फिर अजीत साहब ने उसे अपनी कम्पनी के सफल व्यवसाय के लिए एक 'मोबाइल फोन' भी दे रखा था। ...साथ ही एक आकर्षक सैलरी पैकेज तो था ही। इससे ज्यादा और क्या चाहिए था उसे।

पहले ही दिन दफ्तर में बैठने के साथ ही वह खुशी से जैसे झूम उठा था। भगवान ने आखिर उसकी मुराद जो पूरी कर दी थी। एक पढ़े-लिखे योग्य व्यक्ति को बिना कोई प्रतियोगिता परीक्षा दिए अच्छी कम्पनी में नौकरी लग जाए, इससे ज्यादा एक बेरोजगार युवक की और क्या तमन्ना हो सकती है?

उसी दिन उसने यह खुशखबरी विभिन्न जगहों में फैले अपने परिवार के लोगों में, अपने कम्पनी के मोबाइल के मार्फत फैला दी। मां-पिता, भाई-बहन के घर से लेकर मौसा-मौसी, फूफा-फूफी, नाना-नानी, के घर तक कि उसे मुंबई में एक कंपनी में अच्छी नौकरी मिल गई है, साथ में अपना प्राइवेट केबिन और मोबाइल वगैरह भी...। यह सुनकर पूरा परिवार जैसे गदगद हो उठा था। उन्हें लगा कि भगवान ने उनकी सुन ली।

उसकी मां हर सोमवार को गांव के शंकर भगवान के मंदिर में जल चढ़ाती और नारियल फोड़ती; इसी आकांक्षा के साथ कि कब उसके बेटे को एक अच्छी रोजी मिल जाय, ताकि अपना जीवन सफलतापूर्वक बिता सकें। ...और फिर उस दिन तो उसकी मां ने पूरे गांव में मिठाइयां बांटी थी।

मुंबई के फुटपाथ की नौकरी से तंग आ गया था वह। बहुत दिनों तक उसने फुटपाथ की धूल और वहां के हवलदारों की धौल खाई थी। एक पढ़ा-लिखा इंसान होकर भी ऐसी जिंदगी व्यतीत करने के लिए बाध्य था। गर्मी के दिनों में चिलचिलाती धूप में पसीने से तर-बतर हो जाता था वह, और बरसात के दिनों में तो खैर पूछिये ही मत, हर वक्त गीले कपड़े ही पहनना जैसे उसके भाग्य में लिखा था।

...लेकिन अनायास ही उसके जीवन में अजीत साहब के आने से जैसे उसकी किस्मत के द्वार आप ही खुल गए थे। उसकी योग्यता को समझकर उन्होंने शीघ्र ही उसे अपनी कम्पनी में काम करने का ऑफर दे डाला था। विजय को लगा कि जैसे ब्रम्हा जी ने साक्षात दर्शन देकर उसे अपने यहां नौकरी करने का न्यौता भेजा है, बिना कोई डोनेशन करप्शन के।

आज की इस परिग्रही दुनिया में बिना डोनेशन के तो कोई काम ही नहीं होता है। एक चपरासी की नौकरी के लिए जाओ, तो बाबू-साहब कम-से-कम पचास हजार मांगेंगे। और अगर किसी बड़े पद के लिए पर्ची भरी तो यह रकम कई गुना बढ़ जाती है। जिसे वसूलने के लिए वह भी अनैतिकता का सहारा लेता है और फिर समाज भ्रष्ट से भ्रष्टतम होता चला जाता है।

अजीत साहब को तो जैसे भगवान ही समझने लगा था वह। और भगवान भी समझे क्यों नहीं, बड़े-बड़े वादे जो किए थे उन्होंने। कंधे पर हाथ रखकर कहा था कि विजय तुम मेरे साथ हो, समझ लो, अपने घर-परिवार के साथ हो। अब तुम्हें किसी भी तरह का टेंशन लेने की जरूरत नहीं है। मेरे साथ तुम्हारा दिमाग भी बढ़ जाएगा। इस मायानगरी मुंबई में बिजनेस कैसे किया जाता है, इसका पूरा आइडिया भी मिल जाएगा। मैं वादा करता हूं तुमसे कि तुम सिर्फ छ: मास मेंं ही एक सफल बिजनेसमैन बन जाओगे। तुम्हें रहने के लिए घर की आवश्यकता हो तो फ्लैट की भी व्यवस्था हो जाएगी। अगर आगे पढऩा भी चाहते हो तो पढ़ सकते हो। यूनिवर्सिटी में नाम लिखवाना, फीस भरना, सब मेरी जिम्मेदारी। अगर वहां किसी भी तरह का प्राब्लम होगा तो मैं संभाल लूंगा। अपने मां-पिताजी को यहां रहने-घुमाने के लिए लाना चाहते हो तो ले आओ। उनका सारा खर्च मैं वहन करूंगा। जब तक तुम मेरे पास हो, तो तुम्हें किसी भी तरह की फिक्र करने की जररूत नहीं है।

अजीत साहब के इन आश्वासनों से विजय के कदम जैसे जमीन पर ही नहीं पड़ रहे थे। इतने दिनों तक खाक छानने के बाद इतनी अच्छी नौकरी मिली थी, फिर इतने अच्छे साहब का मिलना, जैसे साक्षात भगवान के मिल जाने के बराबर है। विजय ने भी बड़े-ही जोश के साथ कहा था कि आपके जैसे साहब का मिलना तो इस संसार में बहुत ही मुश्किल है। मुझे लगता है कि आपके रूप में यहां मुझे भगवान ही मिल गए हंै। शायद एक बाप भी अपने बेटे पर इतनी हमदर्दी नहीं दिखलाता होगा।

इसके बाद तो विजय बड़े-बड़े ख्वाब देखने लगा था। साहब ने कहा है कि मुंबई में फ्लैट खरीद दूंगा, बस अब मुझे करना ही क्या है? अब एक खूबसूरत-सी लड़की से शादी करूंगा, फिर अपना परिवार बसाऊंगा। बच्चे होंगे। उन्हें अच्छे स्कूल में पढ़ाऊंगा और एक अच्छा इंसान बनाऊंगा। गांव से अपने मां बाबू जी को भी ले आऊंगा। साथ में रहेंगे सभी। उनके मन को भी शांति मिलेगी और महानगर घूमने की तमन्ना भी पूरी हो जोगी। बच्चों के साथ मां-बाबूजी खेलते रहेंगे। आह! कैसा खुशहाल परिवार होगा हमारा।

विजय को लगा कि वह अब दुनिया की सारी खुशियां समेट लेगा। लेकिन वह इस बात से अनभिज्ञ था कि इस महानगर में कोई किसी पर एहसान नहीं करता है और अगर करता भी है तो इसके पीछे कुछ-न-कुछ राज जरूर छिपा होता है। जब यहां कोई अपने भाई-को-भाई नहीं समझता, तो फिर इसके पीछे अजीत साहब की इतनी कृपादृष्टि? ...शायद उसे कभी सोचने का मौका ही नहीं मिला हो; वह तो अजीत साहब के अहसानों तले दबा था और ख्याली पुलाव पकाने में व्यस्त था। एक बार ठंडे दिमाग से सोचा होता, तो शायद आज यह नौबत नहीं आती। दो दिनों तक उन गुंडे-मवालियों के गिरफ्त में नहीं रहता और उनके इशारों का गुलाम नहीं बनता।

मौत के साये में घिरे विजय को अब यथार्थ महसूस होने लगा था। अजीत साहब के वादे-इरादे सब उसे बेबुनियाद लगने लगे थे। अजीत साहब उस वक्त पूर्णत: 'फ्रॉड' नजर आने लगे थे, जब उसके सामने उन लोगों ने चार-चार थाने की रिपोर्ट दिखाई और कहा, 'अब तुम्हें पूर्णत: यकीन हो गया होगा कि तुम्हारे अजीत साहब कितने बड़े फ्रॉड हंै। उसने हमारा पांच लाख का नुकसान किया है। हमारी गाड़ी को कान्ट्रेक्ट बेसिस पर चलाने के बहाने पूरी गाड़ी का ही गबन कर दिया है। और सिर्फ मेरी नहीं, बल्कि इस अक्खे मुंबई में न जाने कितने ही लोगों के साथ उसने ऐसा किया है। लगभग पांच-छ: करोड़ का घपला कर चुका है। उस कमीने का धंधा है, गाड़ी को कान्ट्रेक्ट पर लेना, फर्जी चेक काटकर कस्टमर को  बहलाना और फिर पूरी गाड़ी को ही पचा जाना। प्रत्येक दो महीने में उसका ऑफिस बदलता है, अपना मोबाइल नम्बर बदलता है, नाम बदलता है और दो महीने में ही अपना स्टॉफ बदलता  है। बिना मेहनत किए ही लाखों की सम्पत्ति अकेले चट कर जाता है... अपने स्टाफ के साथ भी दगा कर जाता है। बेचारे फंस जाते हैं, जैसा कि तुम फंसे हो। पुलिस इसकी तलाश में बराबर रहती है। उसके घर में बीवी-बच्चे तो मिलते हैं, मगर वो फ्रॉड नहीं। बीबी का कहना है, उसे मारो, पीटो या फिर फांसी पर झुला दो, उससे मुझे कोई मतलब नहीं, उसे कुछ भी करो, उसके साथ मैंने रिश्ता तोड़ लिया है... और जब वह अपने बीवी-बच्चे का नहीं है तो वह किसी और का कैसे हो सकता है। उसकी सबसे बड़ी पॉलिसी है, स्टॉफ और कस्टमर को बड़े-बड़े सपने दिखाना और अपने जाल में फंसाकर अपना बिजनेस बढ़ाना।

... आज मैं तुम्हें बाइज्जत इसलिए छोड़ रहा हूं कि यह तुम्हारी गलती नहीं है। तुम भी हमारी तरह ही गलतफहमी के शिकार हुए हो। और तुम्हारा मासूम चेहरा भी मुझे हाथ उठाने नहीं दे रहा है। आज तुम्हारी जगह वह फ्रॉड होता तो अपने पीछे देख लो, उसके लिए मैंने क्या-क्या इंतजाम नहीं किए थे। उसकी नजर शराब की बड़ी-बड़ी बोतलों पर पड़ी। उसके नीचे रखे धारदार छुरे और कटारियां। यह देख उसकी रुह जैसे कांप उठी थी। उसके मन मस्तिष्क पर एकबारगी मौत का खौफ नाच गया था, और चेहरे पर नन्हीं-नन्हीं पसीने की बूंदे चुहचुहा आई थी।

शराब पीाकर हम उसके सिर पर  बोतलें ही नहीं तोड़ते, बल्कि इन छुरे और कटारियां से उसके जिस्म के इतने टुकड़े करते, जितने लोगों को उसने उल्लू बनाया और फिर चील-कौओं को खाने के लिए उस पहाड़ी में दे देते। वह दूसरी ओर की ऊंची पहाड़ी की ओर इशारा करते हुए कहा।.

विजय के चेहरे पर हवाइयां उडऩे लगी थीं। ऐसा लगा जैसे उसके शरीर में प्राण ही न बचे हों।

तुम्हारी भलाई के लिए सिर्फ एक बात कहूंगा कि तुम जैसे सीधे सादे इंसानों के लिए यह मुंबई नहीं है। वरना हर जगह ऐसे ही लोगों का शिकार बनते रहोगे। जिस तरह घर से आए थे उसी तरह वापस चले जाओ। चूंकि अब तुम उसके काम के लायक नहीं रह गए हो, और न ही तुम्हें अपना मेहनताना देगा, बल्कि अब तक अपना सब कुछ बदल चुका होगा नाम, नम्बर से लेकर ऑफिस तक। फिर किसी तुम्हारे-ही जैसे सीधे-सादे लड़के को काम पर रखेगा।

विजय के दिल पर बहुत-ही गहरी चोट पहुंची। शुक्र है, उन लोगों ने उसके साथ कुछ किया नहीं। वरना आज वह सही-सलामत नहीं रह पाता।

उसे लगा कि यह जगह क्षणभर के लिए भी उपयुक्त नहीं है। शीघ्र ही रेलवे स्टेशन पहुंचा और ट्रेन पकड़कर अपने घर की ओर रवाना हो गया।