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Tuesday 21 Nov 2017

सॉरी मैडम

तुम्हारी मृत्यु की खबर ने मुझे चौंका दिया। तुम कोई ऐसा फैसला भी ले सकती हो। तुम्हारे चेहरे से बिल्कुल नहीं लगा था। अब तमाशबीनों की तरह (हां, मैं स्वयं भी तुम्हारी सारी स्थितियों को जानकर भी निरूपाय तमाशबीन बनी रही) मैं अभी कुछ देर पहले तुम्हारे घर से लौटी हूं।

पंखे से लटकी तुम्हारी लाश, एक तरफ को झुकी गर्दन, बाहर को निकल पड़ती आंखें, गर्दन में पड़ा तुम्हारी ही उस साड़ी का फंदा जिसे तुम अक्सर पहनकर आया करती थीं, वहीं लाल फूलों वाली टेरिलीन की, जिसमें तुम्हारा सौंदर्य खिल उठता था, गोरा रंग, सुतवां नाक, मध्यम आंखें, ऊंचा माथा और माथे के बीचोंबीच लाल बड़ी सी सिन्दूर की बिन्दी, बालों को दो भागों में बांटती अखण्ड सौभाग्यवती होने की सूचक सिंदूर की रेखा, मौन लेकिन चुस्त, तुम झूल गईं कान्ता। तुम्हारी फटी-फटी आंखें भय से आक्रान्त लेकिन पनाह मांगती हुई- मैं सामना न कर सकी। मैंने मुंह फेर लिया। मेरी नजरें अपनी असमर्थता पर स्वयं ही झुक गईं। मैं अपनी विवशता पर रो पडऩा चाहती थी, लेकिन ओंठ भींचकर अपनी बेचारगी का दर्प पी गई।

तभी 'पुलिस आई गई’, 'पुलिस आ गई’ का शोर मच गया। उस कमरे में उमड़ आई भीड़ एक तरफ छंट गई। रास्ता बन गया। तुम्हारी लाश आहिस्ते से उतारी गई। जमीन पर लिटा दिया गया। उपस्थित सभी लोगों से बयान लिए गए, लेकिन मैं वहां रहकर भी कुछ सुन न सकी क्योंकि मैं स्वयं को तौल रही थी। कहीं तुम्हारी मृत्यु की जिम्मेदार मैं तो नहीं। जड़ हुई बुद्घि विवेक का नहीं भावुकता का सहारा लेती है।

''मैडम! आपसे इंस्पेक्टर साहब कुछ पूछना चाहते हैं।‘’

मुझे किसी ने संबोधित किया था। मैं अपनी तन्द्रा में बाहर निकल आई। मैंने दृष्टि उठा अपने आसपास देखा। तुम्हारा पति उमेश गर्दन झुकाए लाश के करीब खड़ा था और तुम्हारा पांच वर्षीय पुत्र पूरी भीड़ को झटक मेरे आंचल को थामकर खड़ा हो गया था। वह मेरा आंचल पकड़कर क्या कहना चाह रहा था-मैं नहीं समझ पा रही थी। मनु के सिर पर हाथ फेरते हुए मेरी आंखें क्रोध से उबलने लगीं। मेरे मन में विचार उठ रहा था- इस पापी को इसके किए की सजा तो मिलनी ही चाहिए। मैं सच-सच बता दूंगी कि कान्ता का हत्यारा उमेश है। यह विचार आते ही मेरे चेहरे पर दृढ़ता आ गई।

''मैडम! आप कान्ता को कब से जानती हैं।‘’इंस्पेक्टर ने मुझसे पूछा।

उत्तर देने से पहले मैंने उमेश की ओर देखा। वह भी मेरी ओर ही देख रहा था। पल भर को नजरें मिलीं। उन आंखों में ढेरों याचना थी। तभी मनु ने आंचल खींचते हुए कहा-

''आंटी! मम्मी कब जागेंगी?’’

और मनु के इस मासूम सवाल ने उलझन में डाल दिाय। कैसे कह पाती कि बेटा तेरी मम्मी अब कभी नहीं जागेंगी। अब कभी मेरे यहां काम करने नहीं आएगी और तेरे पापा को पुलिस पकड़कर ले जाएगी। तू अकेला रह जाएगा। या तो बालसुधार गृह में पड़ा रहेगा या सड़कों पर अवारा घूमता चोरी-चकारी करना सीख जाएगा। क्षणांश में मेरे ज्ञान चक्षु खुल गए और मैं ये सब सोच गई।

क्या बाल मन को नियति ने पहले से आभास दे दिया था। क्या इसीलिए मेरे आंचल की छांह चाह रहा था, या मुझे मेरे कर्तव्य की ओर उन्मुख कर याचक बन आया था कि मेरी मां तो गई, अब पापा को पकड़वाकर, मुझे अनाथ न करें। एक ही पल में कितनी हलचल मच गई थी।

मेरी अंगुलियों का कसाव थोड़ा ढीला पड़ा और मनु के बालों को सहलाते हुए जैसे उसे अभय दे बैठी-

''कान्ता मेरे यहां पिछले पांच सालों से काम कर रही थी। इसके अलावा मैं उसके विषय में कुछ नहीं जानती।‘’

किसी प्रकार मनु से अपना आंचल छुड़ाकर दरवाजे की ओर लपकी और फिर अनायास नजरें उमेश से टकरा गई जिसके भाव बदल चुके थे, वहां अब याचना की जगह कृतज्ञता थी। ऐसी छिछोरी कृतज्ञता मुझे नहीं चाहिए थी। यहां यदि एक पल भी रुकी तो कहीं ऐसा न हो कि मेरे विचार ही बदल जाएं। यही सोचकर उलटे पैर लौट पड़ी।

यहां दफ्तर में बैठी तुम्हारा ही चिन्तन कर रही हूं। तुम्हारे बारे में मैंने कभी इतना नहीं सोचा था। तुम मरकर भी जैसे मेरी इस संस्था के कण-कण में जीवित हो उठी हो। तुम्हारा मौन हजारों हजार जिलाओं से मुखरित हो रहा है। मिसेज भार्गव और मिसेज सिन्हा कह रही हैं-

''मैडम! आपने कान्ता के पति को बचाकर अच्छा नहीं किया। उस पापी को सजा अवश्य मिलनी चाहिए थी।‘’

मैं चाहकर भी उन्हें नहीं समझा पा रही हूं या वे समझ नहीं पा रही हैं। कुछ तो है अवश्य। सभी कामगार तुम्हारी ही चर्चा में तल्लीन हैं। सभी मुझसे नाराज हैं क्योंकि मैंने तुम्हारे बेटे को अनाथ होने से बचा लिया है, क्योंकि तुम्हारे पति को फांसी के फंदे तक नहीं पहुंचाया है।

मैं जानता हूं कान्ता, मेरे मुंह भर खोलने की देर थी। सैकड़ों गवाहियां तुम्हारे पति के खिलाफ मिल जातीं। कोई ताकत उसे जेल की सींखचों से बाहर नहीं ला सकती थी, लेकिन क्या तुम भी मुझे कसूरवार समझती हो?

शोकसभा कराकर सबकी छुट्टी कर दी है, लेकिन आज किसी को भी घर जाने की जल्दी नहीं है। आज न किसी का बेटा भूखा है और न किसी को आवश्यक काम है। तुम मरकर भी सबके लिए जीवित हो गई हो, लेकिन ये सभी महिलाएं जो कभी मेरी सहृदयता के प्रति नत रहा करती थीं आज उन सबके मन में मेरे प्रति विद्रोह भर गया है।

कपड़े काटती, मशीन पर सिलाई करती,  बडिय़ां तोड़ती, पापड़ बनाती और मेरे बच्चों की तरह कक्ष में बैठकर ककहरा सीखती, जाने कितने रूपों में मेरे इर्द-गिर्द मंडरा रही हो।

मुझे याद है जब पहली बार तुम्हें चैक मिला था और तुम्हें बैंक से उसका पैसा लेना था। इससे पहले न कभी तुम्हें चैक मिला था और न बैंक से पैसा निकालना पड़ा था। तुम्हें खाता खोलने के लिए कहा गया था। तुम खाते का मतलब रिश्वत देना समझी थी। तुम्हारी अल्पज्ञता पर मुझे हंसना चाहिए था, लेकिन मैं गंभीर हो गई थी। कितनी मुश्किल से तुम्हें खाते का अर्थ समझा सकी थी और उस दिन से मैंने अनपढ़, कामकाजी महिलाओं को साक्षर करने का संकल्प ले लिया था।

''तुमने पढऩा क्यों नहीं सीखा?’’

मेरे इस प्रश्न पर तुम पहले पैर के अंगूठे से जमीन खुरचने का एक निरर्थक सा प्रयास कर रही थीं, लेकिन मैं तुम्हारे जेहन में मचल रहे विचारों में गुबार को देख रही थी। वह तुम्हारे असमंजस की स्थिति थी, लेकिन कुछ ही पलों में निर्णय लेकर तुमने अपना चेहरा ऊपर उठाया था तो अपनी लाचारी के चंद जलकण तुम्हारे दिल का दर्पण बन तुम्हारी आंखों में झिलमिला रहे थे। मुझे डर भी लगा कि कहीं तुम्हारी आंखें झील न बन जाएं। मैंने हौसला बढ़ाया-

''कहो क्या बात है कान्ता?’’

''दीदी जी...’’ कहते-कहते तुम हकला उठीं। यह तुम्हारी आदत थी कि दीदी के साथ जी लगाकर बोलतीं। मैंने कई बार तुम्हें टोका, लेकिन तुम स्वयं को संभाल न सकीं। हां तुमने आगे बताया-

''...मैं नानी के पास रही। मां-बाप बचपन में ही मर गए। उन्होंने स्कूल जाने ही नहीं दिया। पड़ोस के बच्चों को स्कूल जाते देख मैं भी जिद्द करती। तब नानी कहतीं-

''करमजली, पैदा होते ही मां-बाप को खा गई। अब तुझे पाल पोसकर बड़ा करें कि तेरी पढ़ाई में पैसा उड़ाएं?’’

सुनकर चुप रह जाती। और बच्चों की देखादेखी जमीन पर लकीरें खींचती, नानी आकर कान उमेठ देती या धौल जमा देतीं। मामा-मामी भी हर वक्त डांटते रहते। खूब गालियां देते। सारा दिन घर का काम करती और जब थक हार कर जमीन पर चटाई बिछाकर लेटती तो रोते-रोते सो जाती।

सोलह साल की होते ही मामा ने अपना फर्ज पूरा कर अनचाहे बोझ को यह कहकर उतार फेंका कि मां-बाप कर्म के साथी होते हैं भाग्य के नहीं। यदि कान्ता के भाग्य में दु:ख ही लिखे हैं तो सुख कहां से आ सकते हैं।

और इसके बाद की कहानी कुछ कान्ता से कुछ और महिलाओं से पता चली। शादी के दो साल बाद ही कान्ता हमारी संस्था में काम करने लगी। अपनी उदासी और परेशानी को कान्ता मौन के आवरण में ढंके रहती। उसे अपनी गलती पर जब डांट पड़ती वह रटे-रटाए तोते की तरह बिना परिणाम सोचे जल्दी-जल्दी बोलने लगती-

''गलती हो गई दीदी जी। माफ कर दो। अब नहीं करूंगी।‘’

शुरू-शुरू में उसका इस तरह बोलना बड़ा अटपटा सा लगा लेकिन धीरे-धीरे पता लग गया कि तुम अपने अत्याचारी पति द्वारा प्रताडि़त होने पर इसी प्रकार बोलती हो और यह तोता  रटन्त उसी की देना है।

एक दिन तुम्हारे सिर पर पट्टी बंधी थी। तुम चुपचाप कपड़े काट रही थीं। अचानक मेरी नजर पड़ी-

 ''क्या हुआ कान्ता? सिर में चोट कैसे लगी?’’

''दीदी जी, गुसलखाने में फिसल गई थी। किवाड़ का कुन्दा लग गया था।‘’

''ज्यादा गहरा तो नहीं लगा न?’’

नहीं में गर्दन हिलाकर तुम व्यस्त हो गई। तुमने नजर उठाकर एक बार भी मेरी ओर नहीं देखा था। इसीलिए कि कहीं बात छुपाते पकड़ न ली जाओ। नत दृष्टि कर तुम अपने मनोभाव छुपाना खूब जानती थीं।

लेकिन तुम्हारे जाने के बाद अस्मा ने बताया कि तुम्हारे पति ने तुम्हारा सिर दीवार में दे मारा था क्योंकि तुमने अपनी मेहनत के पैसे शराब के लिए देने से मना कर दिया था। बाहर बैठक में उसके दोस्त बैठे थे और दोस्तों की खातिर के लिए वह तुमने पैसे मांग रहा था।

कभी तुम्हारा ओंठ सूजा होता, कभी नील पड़े होते, लेकिन हर बार तुम एक सफल अभिनेत्री का अभिनय कर साथ बच निकलती। तुम्हारे पास अपने बचाव के लिए एक नया बहाना  हमेशा तैयार रहता। लेकिन कोई न कोई तुम्हारे बहानों का पर्दाफाश कर ही देता। सभी को तुम्हारे साथ सहानुभूति थी क्योंकि तुम सबसे कम आयु की और सबसे खूबसूरत महिला थीं। जितनी भी महिलाएं यहां पर हैं वे सब प्रौढ़ तलाकशुदा अथवा विधवा हैं। उनकी आवश्यकताओं में तुम्हारी तरह प्रताडऩा का दु:ख शामिल नहीं है।

तुम्हारे प्रति मेरा हृदय हमेशा सदय रहा। तुम्हारे बारे में मैंने कई बार सोचा था, लेकिन पति से अलग कराकर घर से बेघर करने का साहस मुझमें नहीं था। पति प्रताडऩा का अंत तलाक ही तो नहीं है। फिर क्या है? मेरे विचारों में नई-नई उलझनें पैदा हो जातीं। यदि तुम पति से अलग रहने लगी तो समाज की भूखी नजरों का सामना कैसे कर पाओगी? कदम-कदम पर भेडिय़े घूमते हैं। फिर तुम्हारा बेटा मनु बड़ा होकर जब अपने पिता के विषय में जानना चाहेगा तब तुम उसे किस प्रकार आश्वस्त कर पाओगी? और सबसे बड़ी बात, तुम्हारे दाम्पत्य जीवन में दखल देने वाली मैं कौन?

उस दिन इत्तेफाक से एक बजे मैं राउंड पर निकलीं। सभी महिलाएं अपना-अपना लंच ले रही थीं। तुम भी रोटी को पानी में भिगो-भिगोकर मनु के साथ खा रही थीं। तुम्हारे पास न सब्जी थी, न अचार। तुम्हारा मनु ललचाई नजर से चारों ओर देख रहा था और तुम उसे आंखों ही आंखों में बरजकर खाने के लिए प्रोत्साहित कर रही थीं।

हठात् तुम्हारा हाथ मुंह तक जाते-जाते रुक गया। जैसे कंठ में कुछ अटका हो। तुमने गिलास उठाकर बड़े यत्न से दो घूंट पानी पिया और फिर आंचल से मुंह पोंछने का बहाना करते-करते आंखें भी पोंछ ली थीं। क्या यह सब मुझे उद्वेलित करने के लिए कम था।

थोड़ी देर में मैंने तुम्हें अपने दफ्तर में बुलाया- ''कान्ता! कल ही तो पैसे मिले थे, फिर रूखी रोटी का क्या मतलब?’’

तब बड़ी कठिनाई से तुम मुंह खोल सकी थीं- ''दीदी जी, वे सारे पैसे मनु के पिताजी ने ले लिए। घर में केवल दो ही रोटी का आटा बचा था। नमक डालकर रोटी  बना ली। अपनी कमजोरी में किसी के सामने हाथ फैलाने का भी साहस नहीं रहता। कल का भरोसा हो तो मांगा जाए।‘’तुम्हारे इस उत्तर ने मेरे सारे प्रयास को नकार दिया था। क्या नारी कभी स्वावलम्बी हो सकेगी? आर्थिक रूप से स्वतंत्र होकर भी कितनी परतंत्र है, जिसे अपने कल का कोई भरोसा नहीं। मुझे नारी स्वावलंबन का अपना प्रयास कितना खोखला लगा था। स्वयं से लड़ती नारी हर पल कितना सहती है।

मेरे द्वारा दिए गए पचास रुपए तुमने बहुत मुश्किल से केवल इस शर्त पर स्वीकार किए थे कि आगामी तनख्वाह से कट जाएंगे। तुम्हारे आत्मसम्मान को ठेस पहुंचाना मेरा उद्देश्य नहीं था, लेकिन मनु की ललचाई निगाहें मुझे बेचैन किए थीं। इस मासूम का क्या कसूर?

इस दौरान जाने कितनी घटनाएं तुम्हारे साथ हुई। तुम सभी की करुणा का पात्र बन गईं। हां कल फिर, शायद तुम्हारे साथ वही कुछ दोहराया गया था। तुम सदा की तरह मौन कर्मपथ पर अडिग रहीं। तुम्हारा मौन मैंने लक्ष्य अवश्य किया था, लेकिन बार-बार कुरेद कर मैं तुम्हारी भावनाओं से खिलवाड़ करना नहीं चाहती थी। कल शाम तुम जल्दी ही काम खत्म करके लौट गईं।

तुम्हारे जाने के बाद शकुन्तला ने बताया कि तुम्हारे पति ने तुम्हारा सिर दीवार पर दे मारा था। पता नहीं कैसे क्या हुआ कि तुम्हारी आवाज ही बंद हो गई। सुनकर मुझे बड़ी चिंता हुई थी, लेकिन फिर सोचा कि तुम्हें एक दो दिन में आराम हो जाएगा। बार-बार सबके सामने अपमानित होने की जगह तुमने मौन का आवरण चढ़ा लिया था।

हां सचमुच यही तो किया था तुमने और तुम सदा-सदा के लिए मौन हो गई। तुम रोज मरती और जीती रहीं, लेकिन रोज-रोज का यह जीवन मरण तुम्हारे अंतर में रिसते नासूर को बांधे रखने में असमर्थ रहा। प्रतिकार का तुम्हारे पास कोई साधन न था। कोई इतना प्रिय संबंधी भी न था जिसके कंधे पर सिर रखकर कुछ खारा जल बहा पातीं।

जहां तुम्हें फूल मिलने चाहिए थे वहां तुम्हें आकंठ दलदल मिली। तुम उस दलदल से निकलने के लिए तड़पती रहीं, संघर्ष करती रहीं और अंत में टूट गईं।

तुम्हारी फटी-फटी आंखें मेरे संकल्प को क्षत-विक्षत कर देना चाहती हैं। कहीं तुम्हारा स्वावलम्बन ही तुम्हारी मृत्यु का कारण तो नहीं बन गया। शनै: शनै: मृत्यु पथ पर चलती गईं और मैं व्यक्तित्व की पहचान का दंभ लिए अपनी ही नजरों में छोटी हो गई।

क्षमा करना कान्ता। मैं जिन मजबूत हाथों का अभिमान करती हूं, वह तो जैसे लुंज-पुंज है। शक्ति की परख तो आज हो पाई है। बालू के ढेर पर तुम नहीं मैं खड़ी हूं और धीरे-धीरे अपनी ही मृगतृष्णा में ढहती जा रही हूं।

तुम्हें प्रणाम करती हूं कान्ता। तुमने साहस से मौत को गले लगा लिया, लेकिन मैं तो यह भी नहीं कर सकती। यही तो हर नारी का खोखलापन है।

मैंने मिसेज भार्गव और मिसेज सिन्हा को अपने कक्ष में बुलाया। मुझे लगा कि किसी के सामने तो अपनी मन:स्थिति प्रकट करनी चाहिए। वरना मुझे भी चैन नहीं मिलेगा। वे दोनों मेरे सामने कुर्सी पर बैठी हैं। मैंने  बोलना शुरू किया-

''आप सोचती हैं मैंने उमेश को बचाकर एक गुनहगार को बचाया है। आप ये क्यों नहीं सोचतीं कि मैंने मनु को अनाथ होने से बचाया है। उमेश के पकड़े जाने पर वह कहां जाता? वह या तो गलियों में आवारा घूमता, भीख मांगता, लोगों की झिड़कियां सहता या किसी बालग्रह में रहता।‘’

सुनकर दोनों हतप्रभ रह गईं। ''मैडम! इस तरह तो हम सोच ही नहीं पाए। आपने गुनहगार को नहीं मनु का बचपन बचाया है। सॉरी मैडम।