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Saturday 18 Nov 2017

एक वचन

रामजी लाल ने बहू सुरभि को आवाज देते हुए कहा- बहू, मुझे कुछ खाने को दे दो ताकि मैं अपनी ब्लड प्रेशर की दवाई खा सकूं। सुरभि ने अपने श्वसुर की आवाज सुन तो ली पर दो-तीन बार अनसुना कर दिया। जब रमेश ने सुरभि से कहा- 'जाकर कुछ खाने को दे आओ, बाबूजी को दवाई खानी होगी।Ó तब कहीं सुरभि एक प्लेट में सूखी-सी दो पूडिय़ां और आलू की सब्जी लेकर रामजी लाल के सामने पटककर रख गई। वह जाते-जाते बड़बड़ाती रही- 'सबेरे से इन्हें खाना चाहिए दवाई खाना नहीं हो गया कोई आफत हो गई।'

सुरभि रोजाना ही इस तरह से बड़बड़ाकर अपने श्वसुर को खाने को देती है।

रामजी लाल की पत्नी का निधन उस समय हो गया था, जब रमेश सिर्फ 10 वर्ष का था। मां और पिता दोनों के दायित्वों को रामजी लाल ने संभाला था। आज रामजी लाल की गिनती नगर के संभ्रांत धनिक वर्ग के रूप में होती है। ये प्रसिद्ध समाजसेवी के रूप में भी गिने जाते हैं। कभी-कभी एकांत में रामजी लाल सोचते आखिर मैं पूरी जिंदगी इतना पैसा कमाता रहा और आज बुढ़ापे के दिनों में मेरे लिए ही समय पर चाय-नाश्ता नहीं मिलता। बेटे को इतना प्यार दिया वह भी कभी दो-चार मिनट समय निकालकर पिता के पास नहीं बैठता। उसे फुर्सत नहीं कि कभी आकर पूछे- ''बाबूजी, आपको क्या चाहिए? या आपकी तबियत तो ठीक है''पर यह सब कभी नहीं होता।

रमेश का लड़का अभिषेक जरुर अपने दादाजी के पास आकर बैठता। दादाजी भी अभिषेक को भरपूर प्यार करते थे उसे अच्छी-अच्छी कहानियां भी सुनाते। कई बार ऐसा भी होता जब अभिषेक दादाजी के पास बैठा होता तब सुरभि बड़े जोर से चिल्लाती- ''हमेशा दादाजी के पास बैठा रहता है। अपना समय खराब करता है, इतनी देर में अपनी पढ़ाई करता।''दादाजी को बुरा-भला कहकर सुरभि चुप हो जाती। ऐसे में रामजीलाल को भारी ठेस पहुंचती- क्या उन्हें ये भी अधिकार नहीं कि उनका पोता कुछ देर उनके पास बैठ सके। रामजी लाल कुछ देर बाद अपने मन को समझा लेते- ''हां, बहू सही कह रही है। मेरे पास अभिषेक के बैठने से उसकी पढ़ाई का नुकसान होगा। उसे भला मेरे पास बैठने से क्या मिलेगा।''

आज अभिषेक का जन्मदिन था। सुरभि ने काफी पहले से 'बर्थ-डे' मनाने की तैयारियां कर रखी थीं। घर में तमाम प्रकार के व्यंजन बने थे। सुबह जब रामजी लाल ने नाश्ता मांगी तो सुरभि एक प्लेट में दो रोटियां अचार के साथ दे आई। जब सुरभि प्लेट लेकर आई तो रामजी लाल बोले- ''बहू, सूखी रोटियां मुझसे नहीं खाई जाती। मुझे ये रोटियां पड़ोसी के कुत्ते को डालनी पड़ती है। अच्छा हो, मुझे पोहे बनाकर दे दिया करो।'' सुरभि ने श्वसुर रामजी लाल की सारी बातें खारिज कर दीं। मुंह बनाकर बोली- ''लो, अब इन्हें सुबह-सुबह पोहे चाहिए। मैं इनके लिए गरम नाश्ता बनाऊं। अपने लड़के से ही क्यों नहीं बनवा लेते पोहे?''

आज सुबह से ही रामजी लाल की तबियत खराब थी- वे लेटे हुए थे। तभी सुरभि आई और बोली- ''बाबूजी, अभिषेक को उसके स्कूल पहुंचा आइए- तब तक मैं आपके लिए पोहे बनाकर रखती हूं।'' रामजी लाल से उठा नहीं जा रहा था। उन्हें वायरल था, वे बोले- ''बहू, आज तो मेरी तबियत ठीक नहीं है।''

सुरभि तुनक कर बोली- ''आपकी तो हमेशा ही तबियत खराब रहती है। जरा-सी दूर जाने से कोई मौत नहीं आएगी।''

बहू के व्यंग्य बाणों को रामजी लाल ज्यादा देर तक सुन न सके। वे उठे और छड़ी उठाकर अभिषेक के साथ उसके स्कूल चल दिए। रास्ते में दो जगह रामजी लाल को बैठना पड़ा। उनकी सांस फूल रही थी। अभिषेक बोला- ''दादा जी, आप घर लौट जाइए मैं स्कूल चला जाऊंगा। आप चिन्ता न करें।''

रामजी लाल बोले- बेटा, तू तो सही कह रहा है पर तेरी मम्मी को पता चलेगा कि मैं तेरे स्कूल तक नहीं गया तो मुझे बुरा-भला कहेंगी। किसी तरह रामजी लाल ने अभिषेक को उसके स्कूल पहुंचाया। लौटते वक्त वे एक जगह गिर पड़े और बेहोश हो गए। उन्हें सड़क पर गिरा देख एक परिचित ने किसी तरह अस्पताल पहुंचाया।

इधर जैसे ही रमेश को खबर मिली कि उनके पिता बेहोश होकर गिर पड़े थे, और किसी ने उन्हें अस्पताल पहुंचाया, वह भी दौड़ा-दौड़ा अस्पताल पहुंचा। उसके साथ सुरभि को अस्पताल में पहुंचना पड़ा।

अस्पताल में रमेश ने अपने पिता के सामने ही सुरभि को डांटा- ''आखिर बाबूजी को क्यों भेजा अभिषेक के स्कूल। अब तो वह स्वयं स्कूल जा सकता है। तुम्हें मालूम है आजकल बाबूजी की तबियत ठीक नहीं रहती। '' सुरभि के ऊपर रमेश की डांट का कोई असर नहीं था। वह चुप थी।

रामजी लाल थोड़े होश में थे- वे रमेश से बोले- ''बेटे, अब मैं जा रहा हूं। मरने से पहले एक वचन तुमसे चाहता था। रमेश पिताजी की आंखों में आंसू देखकर भाव-विह्वल हो रहा था- बोला- बाबूजी कहिए, आप क्या वचन लेना चाहते हैं?''रामजी लाल के मुंह से अस्पष्ट रूप से शब्द निकले- ''अपने बेटे को, मेरे बेटे जैसा नहीं बनाना, जिसे कभी अपने पिता के पास बैठने का समय ही न हो! पिता की तबियत पूछने का वक्त ही न हो।''

 

इन शब्दों के साथ ही रामजी लाल का शरीर एक तरफ लुढ़क गया। डॉक्टर ने नब्ज देखी तो रामजी लाल इस संसार से विदा ले चुके थे।