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Monday 20 Nov 2017

चौथा स्तंभ

इकबाल ने जब उसे बताया था कि राजेश को राधे ने गोली मार दी, उसे कोई विशेष आश्चर्य तो नहीं हुआ था लेकिन अंतर में कुछ ऐसा जरूर टूटा था जिसकी किरचों से वह लहूलुहान हो गया है। राजेश जैसे स्वभाव के लोगों को कोई अधिक सहन नहीं कर पाता और जिसके हाथ में सत्ता हो उसके लिए तो सहन करना और भी कठिन हो जाता है। राजेश जितना मितभाषी था, उतना ही तीखा और स्पष्टवादी, इसीलिए मिल मैनेजर अग्रवाल और यूनियन लीडर राधे दोनों ही उसके शत्रु हो गये थे। राजेश किसी भी अन्याय के विरुद्ध जूझने को सदैव तत्पर रहता था यही कारण था कि वह यूनियन में कुछ न होने पर भी नेता था।

राजेश को उसने कभी समझौता करते नहीं देखा और न ही मजदूरों की शक्ति के बल पर उसने कभी मैनेजमेंट को ब्लैकमेल किया। अनुचित मांग को लेकर उसने कभी मजदूरों को हड़ताल नहीं करने दी और उचित मांग के लिए उसने अपनी जान की परवाह नहीं की। निकाले गए पांच मजदूरों की वापसी के लिए उसने जो आमरण-अनशन किया था उसमें वह मौत के करीब ही पहुंच गया था लेकिन मजदूरों के उग्र होते रूप को देखकर मैनेजमेंट ने उसकी मांग स्वीकार कर मजदूरों को वापस काम पर बुला लिया था।

राजेश जो उसके लेखन का प्रशंसक था, बाद में वह उसके प्रति उतना ही कटु हो गया था। अक्सर ही वह उस पर तीखे कटाक्ष करने लगा था कि तुम तो वही छापोगे जो मिल मैनेजर डिक्टेट कराएंगे। तुम्हें तो चंदे और विज्ञापन के अतिरिक्त कुछ दिखता ही नहीं। चौथा स्तंभ और सिद्धांत की थोथी बातों से तुम लोग लोगों को मूर्ख बनाते हो वरना तुम लोग भी एक बिजनेसमैन की तरह सिर्फ लाभ पर ही नजर रखते हो।

उसने राजेश की बात को कई बार पुलिस और गुंडों द्वारा पत्रकारों की पिटाई की दलीलों से काटने का प्रयास किया लेकिन हर बार राजेश यही कहता कि रणक्षेत्र में उतरकर जीवन का मोह करना गद्दारी है।

वह कैसे समझाए कि बात एक जीवन की नहीं है उसके साथ पूरे परिवार का जीवन जुड़ा हुआ है, हर व्यक्ति उसकी तरह निर्मम नहीं हो सकता कि सिद्धांतों के नाम पर घर-परिवार की ओर से आंख ही मूंद ले। 'प्रकाश पुंज' अखबार ही उसकी आजीविका है जिसके लिए वह लगातार दौड़ता रहता है। अखबार छपता रहे और विज्ञापन तथा चंदा अधिक से अधिक मिलता रहे, यही उसका ध्येय बन गया है, लेखन के नाम पर अब समाचार और विज्ञापन मैटर लिखने तक सीमित हो गया है।

कल ही राजेश मिला था, कह रहा था पुराना प्रदीप तो मर गया जिसका लेखन ही उसकी पहचान थी।

टेलीफोन की घंटी ने उसकी तंद्रा भंग कर दी, उसने रिसीवर उठा लिया।

'हलो... मैं प्रदीप बोल रहा हूं', उसने कहा।

'प्रदीप जी, मैं वी.के. अग्रवाल बोल रहा हूं। आपको तो खबर मिल ही गई होगी कि राजेश को किसी ने गोली मार दी।' दूसरी ओर से अग्रवाल ने बताया।

'मैं अभी आ रहा हूं', कहते हुए उसने रिसीवर रख दिया।

वह जानता है अग्रवाल से मिलने का अर्थ होगा, विज्ञापन का दस हजार रुपए का चेक और राजेश हत्याकांड समाचार को उनके हिसाब से छापना होगा।

स्कूटर की चाबी उठाकर वह बाहर आ गया और  मिल की ओर चल दिया। यह सत्य है कि वह पूर्ण व्यावसायिक बन चुका है, विज्ञापन के लिए वह गलत काम की ओर से आंखें मूंद लेता है। लेकिन उसे लगता है कि पुराना प्रदीप कहीं अंतर से उखड़ी-उखड़ी सांसें ले रहा है इसीलिए 'प्रेस' लिखे इस स्कूटर पर बैठते समय जो गर्व की अनुभूति होती थी वह अपराध बोध में परिवर्तित हो चुकी है। राजेश जानकर भी बहुत कुछ नहीं जानता था कि पत्रकारिता अब व्यावसायिक तो नहीं आपराधिक व्यवसाय का रूप धारण करती जा रही है। समाचारों के विनिमय के समय उसे महसूस होने लगता है कि देश में सफेदपोश अपराधियों की एक और जमात तैयार हो गई है और वह एक प्रभावशाली संगठन का सदस्य बन गया है।

'आइये-आइये प्रदीप जी, मैं आपकी ही प्रतीक्षा कर रहा था'ऑफिस में घुसते ही अग्रवाल ने उसका जोरदार स्वागत किया।

'राजेश को तो राधे ने गोली मारी है', उसने कहा।

'आप कहां झगड़े में पड़ रहे हैं कोई गवाही तो मिलेगी नहीं। राजेश का भी दिमाग खराब हो गए थे, मैनेजमेंट सहन कर सकता है लेकिन भदौरिया दरोगा अपना अपमान कैसे सह लेता', अग्रवाल बोला।

वह समझा अग्रवाल, भदौरिया और राधे एक ओर इकट्ठा हो गए और राजेश मर गया। कब किससे कैसा समझौता हो जाए, कुछ कहा नहीं जा सकता। कल भदौरिया दरोगा नशे में धुत राधे के घर में घुसकर उसकी बहन से बलात्कार का प्रयास कर रहा था, जिसे राजेश ने बचाया था और भदौरिया दरोगा की पिटाई कर दी थी। एक ही रात में सारे समीकरण बन गए और राधे ने राजेश के सीने पर कट्टा रखकर फायर कर दिया और राजेश आश्चर्यचकित अवस्था में ही मर गया।

'अज्ञात हत्यारे द्वारा एक मिल मजदूर की हत्या जैसा कुछ छाप देना, बाकी भदौरिया दरोगा संभाल ही लेगा' कहते हुए अग्रवाल ने एक पांच हजार का चेक उसकी ओर बढ़ा दिया।

काफी को पीने की कोशिश करते हुए उसने चेक जेब में रख लिया और खाली कप रखकर कमरे से बाहर आ गया।

वह घटनास्थल की ओर चल दिया। राजेश की हत्या की पूरे मिल में गहमागहमी थी।

'लोगों का खून कितना सफेद हो गया है, जिसने उसकी बहन को बचाया उसी को अपनी नेतागिरी के लिए मार दिया', कोई कह रहा था।

घटनास्थल पर काफी भीड़ थी। पुलिस अपनी कार्रवाई कर रही थी। वह जानता है राजेश की फाइल कल भी बंद हो जाएगी जबकि पूरी कहानी सभी को मालूम है कि मिल मैनेजमेंट राजेश के पीछे पड़ी थी। पहले उसे नौकरी से हटाया और दरोगा का वरदहस्त मिलते ही राधे द्वारा उसे रास्ते से ही हटा दिया।

 

राजेश चित पड़ा हुआ था, उसकी आंखें खुली हुई थीं, सीने से निकला खून आसपास फैलकर जमने लगा था। उसने राजेश को देखा और नजरें हटा लीं, उसे लगा वह राजेश की आंखों का सामना नहीं कर सकेगा। अंतर में मृतप्राय पड़ा प्रदीप उसे लगातार धिक्कार रहा था। उसे लगा जैसे राजेश उसे देखकर मुस्कराया हो। आज वह इतना गिर गया है कि मृत राजेश से भी आंखें नहीं मिल पा रहा है। अनायास उसका हाथ जेब में चला गया और जब बाहर आया तो उसमें चेक था, उसने एक क्षण चेक को देखा और फाड़कर उसके टुकड़े हवा में उड़ा दिये। अब वह स्वयं को हल्का महसूस कर रहा था। उसने निश्चय कर लिया कि वह पूरी कहानी छापेगा, परिणाम कुछ भी हो। उसने राजेश को देखा और स्कूटर स्टार्ट कर उस पर बैठ गया। उसे इस बात पर गर्व की अनुभूति हो रही थी कि वह पत्रकार  है और सत्य को उद्घाटित करना उसका धर्म है। स्कूटर एक झटके से आगे बढ़ गया। वह कुछ और तनकर बैठ गया था।