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Friday 24 Nov 2017

राजवती और हरा नाग

ईसा पूर्व 6 वीं शताब्दी की घटना है। तब मगध का सम्राट बिंबिसार था। अगम कुआं और गंगा नदी के बीच ही राजमहल था। राजप्रसाद के करीब ही माधो नाम का एक मल्लाह अपनी पत्नी और एकलौती बेटी के साथ एक झोपड़ी में रहता था। बेटी का नाम रूपवती था। वह जितनी ही सुन्दर थी उतनी ही गुणवती भी थी। चूंकि माधो को कोई पुत्र नहीं था, वह जब नाव लेकर नदी में मछली पकडऩे को निकलता था तो राजवती भी साथ में रहती थी।

जैसे-जैसे राजवती किशोर-वय को प्राप्त करती जा रही थी, वैसे-वैसे ही वह नाव खेने और मछली पकडऩे की कला में निपुण होती जा रही थी। अब वह जाल फेंक लेती थी, मछली की जगह की पहचान करने लगी थी, पानी की गहराई का अंदाजा लगा लेती थी, वहां मछली की सघनता को भाप लेती थी और हवा के रुख के अनुसार पाल को भी लहरा देती थी। यानि थोड़े ही दिनों में वह एक सफल मछुआरे के सारे गुणों से सम्पन्न हो गई थी जिसके कारण पिता को नदी में मछली पकडऩे में उससे काफी मदद मिलती थी।

कभी-कभी तो वह अपने पिता को किनारे छोड़कर नाव के साथ नदी में दूर निकल जाती थी और जाल फेंककर मछली भी पकडऩे लगती थी। इसी क्रम में नदी के दह में रहने वाले हरे रंग के एक सांप से उसकी दोस्ती हो गई थी।

बात ऐसी थी कि एक दिन उसके जाल में हरे रंग का एक सांप फंस गया था। जब उसने जाल से उसे बाहर निकाला तो देखा वह सांप बुरी तरह से घायल था। भागना तो दूर, वह ठीक से ससर भी नहीं सकता था। भूख के मारे तो उसकी हालत चिंतनीय थी। उसने उसकी मरहम-पट्टी की, खाने के लिए कुछ मछलियां दी, उसे ले जाकर एक सुरक्षित दह में छोड़ दिया। उसने वहां भी कुछ मछलियां छोड़ दीं।

दूसरे दिन जब वह उसे देखने गई तो वह हरा सांप भला-चंगा हो रहा था। उसने उस दिन भी उसके लिए मछलियां, मेंढक आदि जलीय जीव जो उसे अच्छे लगते थे, वहां छोड़ आई। फिर तो वह रोज ही उसके पास जाने और लिए भोजन पहुंचाने लगी। थोड़े ही दिनों में वह हरा सांप काफी भला-चंगा और हृष्ट-पुष्ट हो गया। फिर तो दोनों में बहुत गहरी दोस्ती हो गई। भोजन के बाद हरा सांप जब फण फैलाकर नाचता था, तो राजवती बहुत खुश होती थी। नदी के जल में तैरते-तैरते दोनों काफी दूर निकल जाते थे। अस्तगामी सूर्य की रक्तिम किरणें नदी के जल को जब सेंदूरी-रंग में रंग देती थीं और पक्षीगण संध्या-स्नान के लिए नदी के तट पर एकत्रित होने लगते थे तब उसके पिता आवाज देते थे। वह हरे सांप से विदा लेकर खुशी-खुशी वापस होती थी।

जैसे-जैसे वक्त गुजरता जा रहा था, दोनों की मित्रता प्रगाढ़ से प्रगाढ़तर होती गई थी। इस बीच राजवती किशोरावस्था लांघकर यौवनावस्था की दहलीज पर पांव रखने को थी। इसलिए उसके माता-पिता को उसकी शादी की चिंता सताने लगी थी। इसका सबसे बड़ा कारण यह था कि उसके पिता बहुत गरीब थे। गरीबी के कारण शादी के पैसे जुटा पाने में वह असमर्थ थे। रोज मछली पकडऩे और बेचने से जो पैसे आते थे, उनसे घर-खर्च ही पूरा नहीं होता था। फिर तो बचत की बात सोचना ही बेमानी थी। बहुत प्रयास करने पर भी हाथ पर पैसे ठहर नहीं पाते थे और मुट्ठी खाली ही रह जाती थी। इन सारी बातों को राजवती भी समझने लगी थी। इसलिए वह भी उदास और चिंतित रहने लगी थी। कभी-कभी तो वह नाव पर जाती भी नहीं थी। तब बेचारा हरा सांप भी चिंतित और उदास हो जाता था। वह देर तक राजवती का इंतजार करता रहता था और जब वह नहीं आती थी तब बिना कुछ खाए-पिए ही सो जाता था। पर दूसरे दिन फिर नये सिरे से राजवती का इंतजार करने लगता था। इस तरह कई दिनों तक राजवती को न आना था और न वह आई ही।

दूर तक अकेले नाव खेने और अधिक मेहनत करने के कारण उसके पिता की तबियत अचानक खराब हो गई। घर की माली हालत ऐसी नहीं थी कि बिना कमाए चूल्हा भी जल पाता। उस दिन मजबूरन राजवती को नाव लेकर अकेली घर से निकलना पड़ गया। उसने जब कुछ मछलियां पकड़ ली, तब अचानक उसे हरे सांप की याद आई। उसे लगने लगा, उसका भाई हरा सांप कई दिनों से भूखा है और वह भोजन के लिए बड़ी बेताबी से उसकी बाट जोह रहा है। भावावेश में वह भूल ही गई थी कि घर में अनाज का एक दाना भी नहीं और उसके पिता अस्वस्थ हैं। यदि वह मछली पकड़कर और उसे बेचकर राशन-पानी नहीं ले गई तो घर पर चूल्हा भी नहीं जलेगा। जितनी मछलियां उसने पकड़ी थीं, सबको लेकर वह सीधे हरे सांप के पास जा पहुंची। उसे यह देखकर घोर आश्चर्य हुआ कि हरा सांप अभी भी भूखे-प्यासे उसी की राह देख रहा था। पहले तो दोनों खूब रोये, फिर हरा सांप सारी की सारी मछलियां खा गया। राजवती देखती और मुस्कराती रही। भूखी तो वह भी थी। बल्कि उसके तो माता-पिता भी भूखे थे। परन्तु सांप की भूख के समक्ष वह अपनी भूख भूल गई थी। अपितु वह अपना दुख भी भूल गई थी। शायद हरे सांप की तृप्ति से वह भी संतुष्ट हो गई थी। यह सारा कुछ तो मित्रता की शुचिता और उसकी विश्वसनीयता पर निर्भर करता है। तभी हरे नाग ने अपना फण फैलाया, जोरों की फुफकार छोड़ी, फिर उसने एक दिव्य मणि को उसके सामने उगल दिया- नीला रंग और उसके चारों तरफ गुलाबी वर्ण का आवरण जिससे निकल रही इन्द्रधनुषी दिव्य आभा! राजवती की आंखें चौंधिया रही थीं। वह कुछ भी नहीं समझ पा रही थी। किंकर्तव्यविमूढ़-सी कभी वह हरे नाग तो कभी अलौकिक मणि को ओर देख रही थी। तभी हरे नाग ने कहा, ''बहन! तुम घबराओ नहीं और न ही किसी तरह की चिंता ही करो। यह नागमणि है। एक दिव्य अलौकिक रत्न!! यह मणि तुम्हारी सारी इच्छाएं पूरी करेगी!!! श्रद्धा-भक्ति से इसकी पूजा-अर्चना करना। कभी इसका अपमान मत करना!!!! इसे अपनी नाव में ही छिपा रखना और घर में भी इसे छिपाकर ही रखना..!"

इतना कहकर वह हरा नाग दह के जल में अंतरध्यान हो गया। राजवती मणि के साथ अपनी नाव में लौट आई। जब वह मणि को अपनी नाव पर बालू में छिपाने लगी तो उसके सुखद आश्चर्य की सीमा नहीं रही। नाव में ढेर सारी मछलियां छलमल-छलमल कर रही थीं। वह खुशी-खुशी घर को लौट गई।

घर आकर उसने पूरी कथा अपने माता-पिता को कह सुनाई। फिर उसने दोनों हाथ जोड़कर उस मणि से कहा, ''हे दिव्य नागमणि! हमारी अवस्था तो आपसे छिपी नहीं है। यद्यपि हमें कोई लालच नहीं है, फिर भी आप कुछ ऐसा करें जिससे आप पर मेरे माता-पिता का विश्वास पुख्ता हो सके...।"

राजवती के मुख से इतना निकलना था कि उसके घर की रंगत ही बदल गयी। चारों तरफ साफ-सफाई और स्वच्छता। घर के सारे सामान अपनी-अपनी जगह पर और करीने से सजे हुए। थोड़ा-थोड़ा राशन-पानी भी-उतना ही जितना कि इस परिवार को सुबह-शाम चाहिए और कोई अतिथि भी आ जाए तो उसे भी जमाया जा सके- बस। यह ईश्वरीय विधान था। सबके सब बेहद खुश हुए।

उस रात सबने खुशी-खुशी भोजन किया। फिर सब सोने चले गये। पर राजवती की आंखों में नींद कहां थी। वह देर रात तक करवटें बदलती रही, फिर उठकर माता-पिता के पास आ गई और कहा- ''पिताजी! क्या आपको नहीं लगता कि यह दिव्य मणि राजकीय सम्पत्ति है और इसे राजकोष में होना चाहिए...!"

कुछ क्षण के लिए वहां सन्नाटा छा गया। सब एक-दूसरे को निहार-भर रहे थे। तब राजवती ने ही सन्नाटा भंग करते हुए आगे कहा, ''वह नदी, दह और हरा नाग भी तो राजकीय परिसम्पत्तियां ही हैं! तो फिर इस दिव्य मणि को अपने पास रखने का हमें क्या अधिकार है?"

''हां बेटी!"उसके पिता ने कहा, ''मेरे मस्तिष्क में भी तब से कुछ ऐसा ही विचार चल रहा है! हमें अपनी मेहनत की कमाई पर भरोसा करना चाहिए, बेटी। क्या पता यह दैवी शक्ति हमारी परीक्षा ले रही हो।" मां की बातें राजवती को भी अच्छी लगीं। उसने आगे कहा, ''क्यों न कल हम इसे राजा के पास पहुंचा दें? हमारे राजा प्रजावत्सल हैं। वे अपनी समझदारी से प्रजा के हित में इस दिव्य मणि का सदुपयोग करेंगे।"

वे लोग गरीब जरूर थे पर उनमें राज-भक्ति कूट-कूटकर भरी थी। उन्होंने एकमत से निर्णय लिया कि कल ही इस दिव्य मणि को सम्राट के पास पहुंचा दिया जाए। सचमुच ऐसा निर्णय लेकर सबके सब बहुत राहत महसूस कर रहे थे। उस रात राजवती भी चैन की नींद सोयी।

समय से दोनों बाप-बेटी राजमहल पहुंच गये थे। राजवती ने पूरी कथा द्वारपाल से कह सुनाई, फिर उसने कहा कि वह महाराज से मिलकर यह 'नागमणि' उन्हें सौंपना चाहती, तो उनके कान खड़े हो गए। 'नागमणि' के नाम पर वे सब हंसे और उन्हें वहां से टरकाने का प्रयास किया। किन्तु दोनों बाप-बेटी ने जब उन्हें यकीन दिलाया, तब उन्होंने अंदर जाकर महाराज को इसकी सूचना दी।

सूचना पाकर महाराज बिंबिसार की आश्चर्यजनक खुशी की सीमा नहीं रही। ''आश्चर्य! घोर आश्चर्य! भला वह कौन कन्या है जो हमें 'नागमणि' भेंट करने आई हैं! कहीं यह देवलोक-वासिनी अप्सरा तो नहीं!! मैं अभी ही उससे भरे दरबार में मिलता हूं।" उन्होंने द्वारपाल से उसे अतिथि-गृह में सम्मान के साथ ठहराने को कहा तथा मंत्री जी से शीघ्र ही दरबार लगवाने का आदेश दिया।

महाराज बिंबिसार बहुत ही न्यायप्रिय और प्रजावत्सल सम्राट थे। वे प्रजा में बहुत लोकप्रिय थे। उनकी धर्मप्रियता जगजागिर थी। उनके भव्य-विराट व उज्ज्वल व्यक्तित्व को लेकर राज्य में कई-कई तरह की लोककथाएं प्रचलित थीं।

राजदरबार सजा था। राजवती अपने पिता के साथ पहले से ही वहां उपस्थित थी। वे दोनों राजदरबार की शोभा देखते नहीं अघाते थे। अद्भुत..! अलौकिक.! अभूतपूर्व..!! उनकी आंखें जिधर जाती उधर ही अटक जातीं। पर वह कितना देखती! कैसे देखती! उसका ध्यान तो बार-बार माथे की टोकरी में रेत से ढंकी 'नागमणि' की ओर दौड़ पड़ता था। दूसरे, वह हर पल राजसभा में महाराज के आने की प्रतीक्षा कर रही थी। तभी सभा को महाराज के आने की सूचना दी गई। दरबार का ध्यान राज सिंहासन की ओर केन्द्रित हो गया। तभी सबने महाराज का अभिवादन किया। उन्होंने राज सिंहासन पर आसीन होते ही आदेश दिया, ''राजवती और माधो मल्लाह को दरबार में पेश किया जाए।" आदेश पाते ही सिपाही ने दोनों को दरबार के मध्य में लाकर खड़ा कर दिया। दोनों ने सिर झुकाकर महाराज का अभिवादन किया। तभी महाराज ने पूछा- ''युवती तुम कौन हो और क्यों मुझसे मिलना चाहती थी?"

''महाराज, राजवती ने माथे पर टोकरी संभाले ही दोनों हाथ जोड़कर महाराज को प्रणाम किया, फिर कहना शुरू किया, ''मैं माधोपुर गांव की रहने वाली आपकी ही प्रजा हूं। ये मेरे पिताश्री माधो मल्लाह हैं। मैं नियमित अपने पिता के साथ नाव लेकर गंगा नदी में मछली पकडऩे जाया करती हूं।... कल नदी के दह में हरे नाग से मुझे एक मणि मिली है। यह एक दुर्लभ रत्न है और मनोवांछित फल देने में समर्थ है। इसलिए मैं चाहती हूं कि यह दिव्य, दुर्लभ मणि राजकोष में रहे ताकि आप इससे मनोवांछित धन-दौलत प्राप्त कर अपनी प्रजा का कल्याण कर सकें!" महाराज ने बड़े ध्यान से राजवती की बातें सुनीं, फिर कहा, ''क्या हम अपने राजदरबारियों के साथ इस दिव्य मणि के दर्शन कर सकते हैं?"

''नहीं महाराज! यह एक अलौकिक रत्न है। केवल आप इसके दर्शन कर सकते हैं।" और राजवती ने टोकरी को महाराज के पास लेकर उन्हें 'नागमणि' के दर्शन करा दिए। तभी राजा ने पूछा, ''लेकिन यह कैसे मान लिया जाए कि यह मणि मनोवांछित फल देती है?"

''दैवी शक्तियां कभी झूठ नहीं होतीं, महाराज और न ही आज तक मैंने झूठ बोला है। आप चाहे तो अभी इसकी परीक्षा कर सकते हैं।"

''तुम ही कुछ ऐसा करो जिससे हम सबका विश्वास पुख्ता हो सके। पूरे राज्य में सूखा पड़ा था जिससे अकाल की स्थिति बन रही थी। राजवती ने श्रद्धा और भक्ति के साथ नागमणि से प्रार्थना की कि वह जनकल्याण हेतु राज में बरसा करा दे...!"

फिर क्या था? हवा चलने लगी। बादल उमडऩे-घुमडऩे लगे। फिर देखते ही देखते बारिश भी शुरू हो गई। उमस से लोगों को राहत मिली। मनुष्य ही नहीं, पशु-पक्षी, जीव-जन्तु, पेड़-पौधे सबके सब हर्षातिरेक में झूम उठे, गा उठे... नाच उठे। महाराज की खुशी की सीमा नहीं थी। उन्होंने राजवती को अपने पास बुलाया। प्यार से उसकी पीठ थपथपाई, फिर उसके सिर पर हाथ फेरते हुए कहा, ''मैं तुमसे बहुत प्रसन्न हूं, बेटी। तुम अपने राज्य और राजा के बारे में इतना सोच सकती हो- यह मेरे लिए गर्व की बात है। तुमने अपने राज के लिए वह काम किया है जो आज तक किसी ने नहीं किया। आज से यह 'नागमणि' और 'तुम' दोनों राज की परिसम्पत्ति हुई। तुम अपने माता-पिता के साथ राजमहल में ही रहोगी। यह दिव्य 'नागमणि' भी तुम्हारे ही पास रहेगी। राजहित में, तुम जैसा उचित समझना, उससे मनोवांछित फल प्राप्त कर राज का सम्मान बढ़़ाना। मैं इस राज के प्रतिनिधि के रूप में इस राजमहल में तुम्हारा और अलौकिक नागमणि का हृदय से स्वागत करता हूं।" महाराज के निर्णय का राजदरबारियों ने भी स्वागत किया। पूरी राजसभा करतल-ध्वनियों से गूंज उठी। उस रात पूरे राज्य में दीपावली मनाई गई, मिठाईयां भी बांटी गई और जमकर खुशियां मनाई गईं। राजवती को रथ पर बैठाकर पूरे राज में सम्मान के साथ घुमाया गया। लोग उसके रथ के आगे-पीछे नाचते-गाते रहे। कई दिनों तक राज में जश्न का माहौल बना रहा।

 

नोट- कहते हैं, युवराज अजातशत्रु उस 'नागमणि' को हथियाना चाहता था किन्तु महाराज बिंबिसार के सामने उसकी एक नहीं चल पाती थी। इसलिए अपनी माता छलना के बहकावे में आकर उसने महाराज को बंदी बनाकर कारागाह में डाल दिया। पर इससे पहले कि वह 'नागमणिÓ को अपने कब्जे में कर पाता, वह दिव्य रत्न अंतरध्यान हो गया और राजवती ने उसी समय आत्महत्या कर ली थी।