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Monday 20 Nov 2017

याकूब राही की ग़ज़लें

                  (एक)

कोई बादल तपिशे-गम से पिघलता ही नहीं,

और दिल है कि किसी तरहा बदलता ही नहीं।

सब यहाँ बैठे हैं ठिठुरे हुए, घबराए हुए,

धूप की खोज में अब कोई निकलता ही नहीं।

सिर्फ एक मैं हूँ जो हर रोज़ नया लगता हूँ,

वर्ना इस शहर में तो कोई बदलता ही नहीं।

                 (दो)

सुर्ख लावे की तरह तपके निखरना सीखो,

सूखी धरती की दरारों से उभरना सीखो।

सीनए-दश्त में रह रह के उतरते जाओ,

या फिर आँधी की तरह खुल के गुज़रना सीखो।

कोहसारों  पे चढ़ो अबे्र रवाँ की सूरत,

आबशारों की तरह गिर के बिखरना सीखो।

मक्तले-शहर में जब हर्फे-वफा खो जाए,

तुम किसी ची$ख की मानिंद उभरना सीखो।

           (तीन)

रास्ता-रास्ता सफर माँगे,

कौन मुझसे मेरा हुनर माँगे?

कोर-चश्मों से, खुद-पसंदों से,

कोई क्या बुस्अते-नज़र माँगे?

इश्क, हर बार लग्जिशों का शिकार,

हुस्न, मद्दाहे-मोतबर माँगे।

जीने वाला जिए तो कैसे जिए?

कोई दिल और कोई सर माँगे।

            (चार)

सुबह, बेनाम-सा सफर सबका,

शाम, फिर हसरतों का घर सबका।

कौन इकबाले-जुर्म करता है?

जुर्म-पोशी जहाँ हुनर सबका!

सर्कशी की मजाल किसमें है?

बेबसी में यहाँ गुज़र सबका।

           (पाँच)

हर बार सब्रो-ज़ब्त को बख्शूँ ज़बान क्यों?

हर बार लाज़मी है मेरा इम्तिहान क्यों?

मेरे सिवा हैं और भी कितने ही सर बुलन्द,

मेरे ही सर पे बोझ तेरा आसमान क्यों?

जलकर तो राख हो चुके, ए चश्मे-नम, मगर,

याद आ रहे हैं आज वो सारे मकान क्यों?

ये लाज़मी नहीं कि सभी तीर हों खता,

फेंकी है अपने हाथ से तूने कमान क्यों?

हर शाम अब भी पलकों पे जलते तो हैं चराग,

फिर सुब्हे-एतबार से दिल बदगुमान क्यों?

                 (छह)

सर्गोशी-सर्गोशी को फिर आवाज़ों से जोड़ा जाय,

बस्ती-बस्ती, जंगल-जंगल, खामोशी को तोड़ा जाय।

तुम भी चुप और मैं भी गुमसुम, आगे रस्ता सीधा- सा,

सीधे-सादे इस रस्ते को, दाएँ-बाएँ मोड़ा जाय।

तुम भी उस पर उखड़े-उखड़े, मैं भी बरहम-बरहम-सा,

दुश्मन अपनी हद से गुज़रे, फिर क्यों उसको छोड़ा जाय!

                 (सात)

ख्वाब ऐसी खलिश पिरोएगी,

किसकी आँखों में रात सोएगी?

कोई सैलाब ही ज़रूरी है,

कैसे रिमझिम गुबार धोएगी?

एक मानूस-मोतबर आवाज़,

कौन जाने कहाँ डुबोएगी?

               (आठ)

सारी दुनिया खुली नुमाइश है,

सब्रे-बेबस की आज़माइश है।

राख का ढेर है कि टूटे दिल,

कोई धड़कन न कोई $ख्वाहिश है।

आए तो इन्क़िलाब क्यों आए?

कोई संघर्ष है न कोशिश है।

               (नौ)

सोई आँखों में जागता है कौन?

तुम नहीं हो तो दूसरा है कौन।

एक पल ही सही, दिखाई दे,

बादलों में छुपा हुआ है कौन?

ऐसी बेहिस ज़मीन पर आखिर,

आसमाँ से उतर रहा है कौन?

मिश्अले-जि़न्दगी किसे सौंपूँ?

इस अंधेरे में जी रहा है कौन?

             (दस)

ज़ोरे-बाज़ू आज़माएंगे हमारे आदमी,

कुछ भी हो, फिर सर उठाएंगे हमारे आदमी।

जब्र की इस खामुशी को कौन समझे जाविदाँ?

एक आँधी बन के आएंगे हमारे आदमी।

हल्का-हल्का, घेर लेंगे दुश्मनाने-सुब्ह को,

रफ्ता-रफ्ता, फतह पाएंगे हमारे आदमी।

              (ग्यारह)

खून की एक नदी और बहेगी शायद,

जंग जारी है तो जारी ही रहेगी शायद।

हाकिमे-व$क्त से बेज़ार, ये जागी मखलूक,

जब्रो-बेदाद को अब के न सहेगी शायद।

बढ़ के इस धुँध से टकराती हुई तेज़ हवा,

तेरे मिलने की कोई बात कहेगी शायद।

            (बारह)

गर्दिशे-नातमाम है दुनिया,

फिर वही सुब्हो-शाम है दुनिया।

साल-हा-साल से डरी-सहमी,

जाने किस की गुलाम है दुनिया।

अब तो कोई पटख ही दे इसको,

इक शिकस्ता-सा जाम है दुनिया।

शब्दार्थ: 1. कोहसार=पर्वत 2. आबशार=झरना 3. खुद-पसंद=आत्म-मुग्ध 4. वुस्अते नज़र=उदार दृष्टि 5.मद्दाहे मोतबर=विश्वस्त सगी 6. सर्कशी=विद्रोह 7. मिश्अले-जि़न्दगी=जि़न्दगी की मशाल 8. जाविदाँ=सनातन, अमर 9.जब्रो-बेदाद=अत्याचार