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Friday 17 Nov 2017

इज्तिरार-ए-मोहब्बत

इज्तिरार-ए-मोहब्बत

मुकम्मल होने की कोशिश करता रहा ताउम्र,
तुम आये तो पता चला तन्हाई ही इज्तिरार की वजह थी

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उम्र गुजर गयी उनसे वाबस्ता होने की परस्तिश में
बिना दस्तक, दबे पांवों कब वो दिल में दाखिल हो गये,
पता ही नहीं चला

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उसके इश्क की नवाजिश में मरासिम ढूंढने लगा था
भूल गया था, फकत इश्क का वादा था वफा का नहीं

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एक बार तो रंजिशें भुला कर देख मेरी तरफ,
सिफर हो गया हूँ तेरी जुस्तजू में
क्या शिकवा करूं अपनी तन्हा जिन्दगी का
मंजिल के सामने खड़ा राहें तलाशता रहा

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पेशानी पे छपा हुआ था नाम उसका

और हम जमाने से छुपाते रहे

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तुम और मैं वफा की हद से आगे निकल आये हैं
कभी इश्क में रूमानी थे, अब रूहानी हो गए हैं

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दिल की गहराइयों में दफन थीं उसकी यादें
एक जलजले ने फिर उनसे रूबरू करा दिया

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अल्फाजे मोहब्बत तो बेइंतेहा थे
कमबख्त स्याही ही सूख गयी
कहानी लिखते लिखते

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दोजख और जन्नत में क्या फर्क है उसने पूछा
मैंने कहा
तेरा मिलना जन्नत, तेरी फुरकत दोजख़

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ख़ुलूस ओ उनसियत चाहा था उस से
उसने मुंह फेर लिया, सारा जहां हमदर्द हो गया

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इश्क में डूबी कलम से जो ख़त तुम्हें लिखे थे
क्या पता था खंजर बन के मेरे ही सीने में उतर जायेंगे