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Tuesday 21 Nov 2017

गूंजती है आवाज़

 

गूंजती है आवाज़ 
 
टीवी स्क्रीन पर चमकते हैं शब्द
गूंजती है आवाज़ 
बोलने वाला छिपा रहता है 
क्योंकि उसके पास सिर्फ आवाज होती है
कोई चेहरा नहीं होता 
 
यह आवाज़ उसने तैयार की है 
ख़ास ऐसे ही काम के लिए
ऐसे ही वक़्त-जरूरत के लिए
वक़्त जो होता है किसी का, कैसा भी 
ज़रूरत जो होती है किसी की, कैसी भी
 
शब्द भी उसके नहीं होते
उसके लिए नहीं होते
उनका अर्थ जो होता है वह भी 
औरों-औरों के लिए होता है
जो उपभोक्ता होते हैं
 
उपभोक्ता होते हैं विभिन्न उत्पादों के 
सभी एक से एक मनोहर
और सुखकर
मोहते-से
पांव की बिवाइयों से लेकर
चेहरों की झुर्रियों तक के मरहम-मसाज
ख़ास दिनों के लिए सुरक्षित और भरोसेमंद  नैपकिनों से लेकर 
सतरंगी किरणें छिटकाती
अंगूठियों तक 
और क्या-क्या 
और क्या-क्या
सब जानते हैं आप
 
उसे फ़र्क़ नहीं पड़ता
सामने जो चेहरे हैं, किस के हैं
किस के हैं शब्द या
सुनते-देखते जो, कौन हैं
या किस पर असर पड़ता है कितना
या कोई असर नहीं पड़ता
 
नहीं पड़ता, तब भी 
बनाना पड़ता है असर
हवा में अपने लालचों की आग को चमकाने के लिए
उस आग पर अपने लाभों को 
दूसरों की जरूरतों की रिफाइंड में पकाने के लिए
बाजार को स्पर्धा और मूल्य से जमाने के लिए
गूंजती है आवाज लगातार...
 
कि हमारा स्वप्न
उस की सारी-सारी पूंजी होता है
और हमारा दुख उस का कारोबार!

 

(403, लावण्या अपार्टमेंट, टैगोर हिल रोड मोरहाबादी, रांची-834008, 
मो. 943011663)