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Tuesday 19 Feb 2019

समूचा शहर

समूचा शहर

समूचा शहर
एक हो गया है,
एक हो गया है दिन,
एक सी हो गई है रात,

सब मानो,
एक डाल पर बैठे होंं
एक सी आवाजें बोलते।

व्यापक मिसाल प्रस्तुत-
की है सबने एक होने की,
शहर में आयी इस आफत पर।।

सबेरा
सूरज का नभ में उग आना,
पक्षियों का कलरव करना,
बंद दरवाजों का खुलना,
सड़कों पर आवागमन,
खेतों में हलों की हलचल,
तालाबों में कुमुदनी,
यह सब संकेत देते हैं
सबेरा हो चुका है,
पर, लंबी रातें अभी भी,
मानव को अपने,
आगोश में जकड़े हैं
उसे मुक्त होने नहीं देती।

राह
इक राह बनानी है
राह बनाना आसान नहीं,
राह बनाने सब हैं आतुर,
देखो जंगल कट रहे हैं,
पत्थरों को फोड़ा जा रहा है,
घरों को भी गिराकर,
जमीनों को कब्जे में ले,
मुआवजा देकर,
हर तरह से राह बनाने,
सब आतुर हैं,
फिर राह बनती क्यों नहीं,
जीवन को उस तक ले जाने,
जहां यह जीवन मुस्काये।

(संतोष श्रीवास्तव
कोदाभाट, कांकेर (छ.ग.))