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Tuesday 21 Nov 2017

क्या साहित्य समाचार समाचार नहीं होते?

वर्तमान साहित्य में जब पाठकों का ही रोना रोया जा रहा हो तब वैसी स्थिति में साहित्य समाचारों के प्रति अभिरुचि की बात बेमानी लगती है। लेकिन इस बात से भी इंकार नहीं किया जा सकता है कि पूरे देश में साहित्यिक अभिरुचि वाले व्यक्तियों, लेखकों, साहित्यकारों, साहित्यिक पत्रिकाओं तथा उनके पाठकों की कम से कम इतनी संख्या तो है ही कि कोई समाचार पत्र देश-विदेश की साहित्यिक गतिविधियों, साहित्यिक आयोजनों, उपलब्धियों, प्रकाशनों, विवादों, चर्चाओं, प्रतियोगिताओं, पुरस्कारों, सम्मानों, प्रतिष्ठित साहित्यिक पत्रिकाओं में से खास, प्रतिष्ठित साहित्यकारों की जयंतियां एवं पुण्यतिथियां आदि के समाचारों को संकलित कर प्रकाशित कर सकता है। यदि यह भी संभव नहीं है तो हर प्रतिष्ठित समाचार पत्र में क्या साहित्य समाचार शीर्षक से इन सब साहित्यिक गतिविधियों के लिए एक कॉलम की जगह भी प्रतिदिन सुरक्षित नहीं की जा सकती? संभवत: ऐसा करने से उन राष्ट्रीय स्तर के प्रतिष्ठित समाचार पत्रों के मालिकों की आर्थिक स्थिति डांवाडोल न होगी न ही उनके पाठक हड़ताल करके सााहित्य समाचारों के प्रकाशन को बंद करने की मांग ही करेंगे।
प्रिंट मीडिया में तो थोड़ा बहुत स्थान साहित्यिक गतिविधियों एवं साहित्यिक रचनाओं के लिए सुरक्षित है भले ही वह सिर्फ रविवारीय में हो पर इलेक्ट्रानिक मीडिया का तो इस संबंध में नितांत उपेक्षाजनक रवैया है। न्यूज चैनल्स भूत-प्रेत, बाबा, अवधूतों, मजनंू की पिटाई, बिना ड्राइवर की चलती कार जैसे बकवास बेहूदे मुद्दों पर दिन-दिन भर समाचार प्रसारित करते रहते हैं। उनके न्यूज बुलेटिन में देश-विदेश के छोटे-बड़े समाचारों के अतिरिक्त ज्योतिष, सेहत, प्रदूषण, मौसम जैसे कई विषयों के लिए स्थान सुरक्षित रहता है। लेकिन इन सबके बीच एक मिनट का समय भी वे साहित्य समाचारों को नहीं देते, जैसे कि साहित्य समाचार प्रसारित करते ही उनकी टीआरपी घटकर जीरो पर पहुंच जाएगी। आखिर साहित्य एवं साहित्य समाचारों की ऐसी उपेक्षा क्यों? क्या साहित्यिक गतिविधियों के समाचार समाचार नहीं होते। उस समय बड़ा दुख होता है जब अतीत के अधिकांश दिवंगत प्रतिष्ठित साहित्यकारों की जयंतियों एवं पुण्यतिथियों पर भी न तो प्रिंट मीडिया द्वारा दो लाइनें लिखी जाती है और न ही इलेक्ट्रानिक मीडिया द्वारा दो शब्द कहे जाते हैं। जबकि कई प्रतिष्ठित साहित्यिक पत्रिकाओं में बाकायदा इलेक्ट्रानिक मीडिया के लिए स्तंभ सुरक्षित हैं। अफसोस तो यह भी है कि वे प्रतिष्ठित साहित्यिक पत्रिकाएं भी यह मांग नहीं करती कि इलेक्ट्रानिक मीडिया में साहित्य के लिए स्थान सुरक्षित किया जाए।
देश विदेश की साहित्यिक गतिविधियों के समाचार नियमित रूप से प्रकाशित एवं प्रसारित क्यों नहीं किये जाते? ऐसे समाचार प्रकाशित एवं प्रसारित किए जाने चाहिए या नहीं? ऐसे बिन्दुओं पर साहित्यिक अभिरुचि एवं साहित्य तथा पत्रकारिता से जुड़े लोगों के अभिमत जानने की अभिलाषा से मैंने एक निवेदन फेसबुक पर पोस्ट किया तथा उसे विभिन्न ग्रुप्स एवं वाट्सअप पर भी साझा किया। साहित्य एवं पत्रकारिता से जुड़े लगभग 50 लोगों के टाइमलाइन पर भी उसे पोस्ट किया। प्रतिक्रिया उत्साहजनक रही। साहित्य एवं पत्रकारिता से जुड़े कुछ विद्वानों ने इस विषय पर सहमति, असहमति एवं क्रियान्वयन में होने वाली कठिनाइयों पर ध्यानाकर्षण करते हुए अपनी टिप्पणियां दी जो कि निम्नानुसार हैं-
ललित सुरजन (प्रधान संपादक देशबन्धु एवं अक्षर पर्व रायपुर (छ.ग.)- कोई भी समाचार पत्र पूर्णत: साहित्य केन्द्रित नहीं हो सकता। बाकी की मैं बात नहीं जानता लेकिन देशबन्धु में साहित्य समाचारों को पर्याप्त महत्व दिया जाता है।
डॉ. लक्ष्मीकांत पाण्डेय (प्रधान संपादक 'नवनिकषÓ कानपुर उ.प्र.)- नवनिकष में शुरू में पहल की थी। लोग अपने सम्मान का चित्र और अपनी तारीफ भेज देते। शहर में गोष्ठियां होती, केवल दैनिक समाचार पत्रों को बुलाते। यह समाचार नहीं है। मैंने बंद कर दिया। आयोजकों को साहित्यिक पत्रिका को वही महत्व दिया जाना चाहिए जो स्थानीय दैनिकों को।
डॉ. श्यामसखा श्याम (भू.पू. सचिव हरियाणा साहित्य अकादमी, संपादक 'हरिगंधाÓ एवं 'मसि कागदÓ पंचकूला हरियाणा)- साहित्य समाचार है ही कहां? कवि सम्मेलन, चुटकुले। घर की गोष्ठी को राष्ट्रीय संगोष्ठी। अगर कोई एनआरआई मित्र आ जाए तो अंतरराष्ट्रीय गोष्ठी। गोष्ठी में मैं तेरी तू मेरी पीठ थपथपा बस ये समाचार हुए क्या?
राजेन्द्र दानी (कहानीकार, जबलपुर)- यह जरूर होना चाहिए इससे कोई इंकार भी कैसे कर सकता है, पर सवाल दर सवाल उठ खड़े होंगे किसी भी संगठित प्रयास के पहले। एक तरह से यह अच्छा भी है पर जिनकी आवाज सुनी जाती है वे सत्ता से गठजोड़ में लगे हैं। हम लोगों की कोई हैसियत नहीं है तो सवाल उद्देश्य के प्रति ईमानदारी का है। चलिये मैं सहमत हूं आगे बढिय़े। देखते हैं कौन हमारे साथ है।
डॉ. मुकेश कुमार (पत्रकार, टी.वी. एंकर एवं लेखक)- आपसे सहमत हूं। मीडिया अब बाजार के हाथों का खिलौना बन चुका है। वह केवल वही दिखाना चाहता है जिसमें किसी तरह का फायदा हो। वह किसी की नहीं सुनता। साहित्यकारों की तो बिलकुल ही नहीं। वह उन्हें और साहित्यकारों को अपना शत्रु मानता है। मुख्यधारा के मीडिया से अपेक्षा करना बेकार है। वह नहीं सुनेगा। कोशिश हुई है पहले भी मगर नाकाम रही।
प्रतिभू बनर्जी 'कहानीकारÓ (मुख्य प्रबंधक यूनियन बैंक, स्टाफ प्रशिक्षण भुवनेश्वर)- आपसे पूरी तरह से सहमत हूं। आपने एक ज्वलंत सामयिक किन्तु सर्वथा उपेक्षित मुद्दे को उठाया है। निश्चित रूप से साहित्यिक रुचि के संवद्र्धन से साहित्य को परिपुष्टि व समृद्ध होने में सहायता मिलेगी। जब इलेक्ट्रानिक मीडिया केवल अपनी रेटिंग बढ़ाने के हथकंडों में लिप्त है तब प्रिंट मीडिया की भूमिका इस मामले में अत्यंत महत्वपूर्ण हो उठती है। मेरा सुझाव है कि हर स्तर पर साहित्यकार एवं साहित्यप्रेमी मिलकर अपने-अपने क्षेत्र के प्रमुख अखबारों को सामूहिक अपील भेजें ताकि कहीं पर तो कोई सुगबुगाहट हो जो आगे चलकर महानाद का रूप ले ले।
गीता डोगरा (पत्रकार, लेखक एवं संस्थापक त्रिवेणी साहित्य अकादमी)- आपकी बात सही है। त्रिवेणी साहित्य अकादमी यह प्रयास करेगी। विश्वास कीजिए।
कृष्णा अग्निहोत्री (कहानीकार)- पहल जरूरी है और होगा भी।
रामनाथ शिवेन्द्र (संपादक असुविधा)- आपने सही सवाल किया है। पर समाचार तो वही निकालेगा जिसके पास रुपया होगा। फिर तथानामधारी कब चाहेंगे कि साहित्य भी समाचार बने।
अनवर सुहैल (कवि, कहानीकार एवं उपन्यासकार)- आपका आह्वान सही है। लेकिन प्रिंट मीडिया फिर भी सस्ता है। डाटा का रेट महंगा है ऐसे में ई समाचार चालू करना और निभाना कठिन प्रक्रिया है।
शीतेन्द्रनाथ चौधरी (कहानीकार)- आपका आइडिया स्वागतेय है। मित्रवर तेजिंदर सिंह गगन इस दिशा में पहल करेंगे।
श्रीमती शुक्ला चौधरी (कवयित्री)- सरकार को साहित्य से डर जो लगता है।
सरला सिंह (कवयित्री)- यदि स्थान मिला भी तो राजनीति पनप जाएगी। एक बार हम लोगों ने सन् 1972 में मांग रखी थी तो सप्ताह में आधे पेज का एक दिन मिला जिसे वह अपने मन का निकालते थे। हां अब तो एक कॉलम भी नहीं कौन मेहनत करेगा रोज के कलेक्शन हेतु। यदि यह हो जाए तो उचित रहेगा।
जनकृति पत्रिका- अभी इस दिशा में कार्य हुआ है कुछ न्यूज चैनल पोर्टल में साहित्य को स्थान दिया गया है। 'आज तकÓ संवाद 24 में।
कमल साबू (लेखक)- आपने बहुत ही महत्वपूर्ण प्रश्न उठाया है। ऐसे ग्रुप एवं समाचार पत्र साहित्य के लिए होने चाहिए जिससे देश एवं समाज को भी सही दिशा मिले। आपने इस ओर ध्यान दिया सराहनीय है। मैं आपके साथ हूं।
जनार्दन तिवारी (भू.पू. असिस्टेंट जनरल मैनेजर स्टेट बैंक ऑफ इंडिया भोपाल)- जहां तक साहित्यिक गतिविधियों की जानकारी का सवाल है। सभी साहित्यिक पत्रिकाओं में थोड़ी बहुत जानकारी रहती है और पढऩे वाले उसी से काम चला लेते हैं। अक्सर यह जानकारी सीमित रहती है और उबाऊ भी।
मोनिका गौड़ (बीकानेर)- आपका प्रश्न वाजिब है। साहित्य समाचार न छापने या न प्रसारित करने के पीछे सबसे बड़ी बात यही लगती है कि उसमें कोई मसाला, ग्लैमर, उत्तेजना पैदा करने वाली मार्केट वैल्यू नहीं होती।
अनुराग असफल (सदस्य नवनिकष वाट्सअप ग्रुप)- इस संकुल में साहित्यकार व साहित्यिक अभिरुचि के लोग जुड़े हैं। संभवत: हम लोग परस्पर सूचनाओं, समाचारों का आदान-प्रदान कर लें (कर भी रहे हैं) साथ ही साहित्यिक टिप्पणियां भी बड़ी मेहनत से तैयार करके दी जाती हैं। व्यापारियों से इस अर्थ युग में साहित्य सेवा की अपेक्षा न करें तो ही ठीक है। वस्तुत: विचार और शब्द अर्थवान है साधना हमें ही करनी होगी, रास्ते भी हमें ही बनाने होंगे। हम कितना कर पाते हैं या कितना कर पाएंगे- यह मायने नहीं रखता। करना ही हमारा (रचनाकारों एवं रचनात्मकता के प्रति समर्पित लोगों का) ध्येय है।
प्रमिला अवस्थी (संयुक्त संपादक नवनिकष कानपुर)- यह चिंता पूर्ण रूप से वाजिब है और सच भी है कि साहित्य समाचार का न तो कोई टी.वी. चैनल है और न ही कोई ऐसा समाचार पत्र जो देश-विदेश में सम्पन्न हो रही साहित्यिक गतिविधियों एवं अकादमिक कार्यक्रमों में साहित्यिक अभिरुचि रखने वालों को दिन प्रतिदिन परिचित करा सके। साहित्य को अपनी बपौती मानने वाले महीयसों को कम से कम इस हेतु समस्त पंथों से ऊपर उठकर सदिच्छा से प्रयास करना चाहिए और बुलंदी से अपनी आवाज उठाकर मांग भी करनी चाहिए। अन्यथा नक्कारखाने में तूती की आवाज कौन सुनता है।
अक्षर पर्व एवं दैनिक देशबन्धु के प्रधान संपादक ललित सुरजन का यह कथन कि कोई समाचार पत्र पूरी तरह से साहित्य केन्द्रित नहीं हो सकता, पूरी तरह से सही है लेकिन उनका यह कथन दैनिक या साप्ताहिक समाचार पत्र के संदर्भ में सही है, पाक्षिक या मासिक साहित्य समाचार पत्र, पत्रिका प्रकाशित की जा सकती है। यह भी संभव नहीं हो तो कम से कम प्रतिदिन राष्ट्रीय स्तर के समाचार पत्र एक दो कॉलम की जगह तो साहित्य समाचार के लिए सुरक्षित कर ही सकते हैं। साहित्यिक पत्रिका नवनिकष के प्रधान संपादक डॉ. लक्ष्मीकांत पांडेय का कथन प्राप्त स्थानीय साहित्य समाचारों के संबंध में है जबकि मेरा आशय देश-विदेश की साहित्यिक गतिविधियों के समाचारों को संकलित कर साहित्य समाचार के रूप में प्रस्तुत करने वाले साहित्य समाचार पत्र के प्रकाशन से है। साहित्यिक अभिरुचि के पाठकों की रुचि भी देश-विदेश के स्तरीय साहित्यिक गतिविधियों की जानकारियों वाले समाचारों को पढऩे और जानने में होगी न कि स्थानीय साहित्यिक गतिविधियों को। हां उनके साथ स्थानीय साहित्यिक गतिविधियों के समाचार भी प्रस्तुत किये जा सकते हैं। जिस दिन राष्ट्रीय स्तर का साहित्य समाचार पत्र प्रकाशित होगा उस दिन उसके संपादक तो बड़ी बात है, उसके संवाददाता को भी स्थानीय साहित्यिक आयोजनकर्ता ससम्मान अपने आयोजनों में आमंत्रित करेंगे।
डॉ. श्याम सखा श्याम साहित्यकार होने के साथ ही हरियाणा साहित्य अकादमी के सचिव तथा हरिगंधा एवं मसिकागद के संपादक रह चुके हैं। उनका कथन उनके अनुभव से उपजा है। पर उनके कथन के संबंध में मेरा निवेदन है कि आप प्राप्त साहित्य समाचारों को साहित्य समाचार क्यों मानते हैं। यह कार्य ऐसा व्यक्ति ही कर सकता है जो देश-विदेश की स्तरीय साहित्यिक गतिविधियों का प्रतिदिन अध्ययन और विश्लेषण कर समाचार पत्र में प्रस्तुत कर सके। इसमें देश-विदेश में आयोजित साहित्यिक आयोजन, नूतन प्रकाशन, स्तरीय साहित्यिक पत्रिकाओं में प्रकाशित विशेष, साहित्यिक विवाद, चर्चाओं, प्रतिष्ठित साहित्यकारों की जयंतियां, पुण्यतिथियों आदि से संबंधित समाचार संकलित कर प्रकाशित किए जा सकते हैं। ऐसे समाचार पत्र देश-विदेश में अवैतनिक संवाददाताओं से भी साहित्यिक गतिविधियों की जानकारी हासिल कर सकते हंै और नगर, कस्बे, गांवों से भी। कहानीकार राजेन्द्र दानी साहित्य समाचार के प्रकाशन एवं प्रसारण से सहमत तो हैं पर उसके क्रियान्वयन में होने वाली कठिनाइयों, विवादों तथा साहित्य के गुटवाद में सत्ता से गठजोड़ करने वाले गुट (?) के प्रति प्रश्नचिन्ह लगाते हुए अपना समर्थन देते हैं। जबकि अनुराग असफल का कथन साहित्यिक गतिविधियों की जानकारियों को एक सीमित दायरे में समेटता है। जबकि मैं साहित्य एवं साहित्यिक गतिविधियों को आम आदमी से साझा करना चाहता हूं। जब साहित्य आम आदमी के लिए लिखा जा रहा है तो आम आदमी को भी पता हो कि उसके लिए क्या लिखा जा रहा है।
कहानीकार, कवि एवं उपन्यासकार अनवर सुहैल ई. साहित्य समाचार प्रसारित करने की समस्याओं की तरफ ध्यानाकर्षण करते हैं तथा ई-समाचार की अपेक्षा प्रिंट मीडिया को सस्ता बतलाते हैं। जबकि प्रिंट मीडिया के तहत अखबार निकालना ग्राहक संख्या बढ़ाना, खर्चे के लिए विज्ञापन हासिल करना आदि ई-साहित्य समाचार की अपेक्षा कई गुना खर्चीला तथा पूरा समय लेने वाला व्यवसाय है, उसकी अपेक्षा ई-साहित्य समाचार प्रसारित करना अधिक सुगम एवं कम खर्चीला है। शीतेन्द्रनाथ चौधरी ने इस दिशा में तेजिंदर सिंह गगन के पहल करने की बात कही है लेकिन गगन जी की इस संबंध में कोई पोस्ट उपलब्ध नहीं हुई। शुक्ला चौधरी का कथन व्यंजनापूर्ण है। प्रजातंत्र में हरेक को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता है और मैं नहीं समझता कि सरकार को कोई साहित्य की परवाह है। उसे राजनीतिक उठापटक के महत्वपूर्ण मसलों को निपटाने से इतनी फुरसत ही कहां कि वह साहित्य की ओर ध्यान दे। असुविधा पत्रिका के संपादक रामनाथ शिवेन्द्र ने साहित्य समाचार पत्र प्रकाशन के सिलसिले में आर्थिक पहलू की तरफ इशारा किया है जो कि महत्वपूर्ण है लेकिन मेरा ध्यानाकर्षण उन प्रतिष्ठित राष्ट्रीय स्तर के समाचार पत्रों में भी साहित्य समाचारों के लिए स्थान सुरक्षित करने से है जो समृद्ध हैं, जिनके पाठकों की संख्या लाखों में है तथा उन न्यूज चैनल्स में साहित्य समाचार के लिए स्थान सुरक्षित करने से है जो करोड़ों रुपए कमा रहे हैं। अत: उनके लिए साहित्य समाचार प्रकाशन, प्रसारण में आर्थिक मुद्दा कहीं से भी आड़े नहीं आता। जनार्दन तिवारी अपनी बात का जवाब खुद ही दे देते हैं। एक ओर वे कहते हैं कि साहित्यिक पत्रिकाओं में साहित्य समाचार प्रकाशित होते हैं पाठक उनसे ही काम चला लेते हैं। दूसरी ओर वे यह भी कहते हैं कि वे समाचार सीमित एवं उबाऊ होते हैं। उनके इसी कथन का समाधान साहित्य समाचार पत्र का प्रकाशन है जिसमें विस्तृत एवं रोचक ढंग से देश-विदेश के साहित्य समाचार प्रकाशित किए जा सकते हैं। इसके अलावा मुख्य बात यह है कि साहित्य समाचार आम आदमी की नजर के सामने आ सके जिसके लिए उनका उन्हीं में प्रकाशन एवं प्रसारण जरूरी है जिससे आम आदमी जुड़े हैं, वे समाचार पत्र एवं न्यूज चैनल्स हो सकते हैं, साहित्यिक पत्रिका नहीं उसे तो साहित्यिक अभिरुचि के पाठक ही नहीं मिल पा रहे हैं। मोनिका गौड़ का जो कथन है संभवत: साहित्य समाचार प्रसारित न करने के पीछे यही तर्क इलेक्ट्रानिक मीडिया का भी है। यद्यपि साहित्यिक एवं साहित्यिक गतिवधियों में गांभीर्य होता है लेकिन इससे भी इंकार नहीं किया जा सकता कि साहित्यिक विवादों, उठापटक से अच्छी खासी मसालेदार साहित्यिक खबरें बनाई जा सकती हैं। बनारसी दास चतुर्वेदी एवं उग्र के बीच हुआ विवाद लंबे समय तक साहित्यिक जगत में रोचक ढंग से चर्चित रहा। यदि साहित्य समाचार में एक स्तंभ व्यंग्य के तेवर सहित प्रस्तुत होगा तो साहित्य समाचार रोचक और मसालेदार बन सकते हैं।
प्रतिष्ठित मीडियाकर्मी एवं लेखक डॉ. मुकेश कुमार का कथन इलेक्ट्रानिक मीडिया के नितांत व्यवसायिक रूप को उभारकर सामने रखता है जो कि बाजारवाद से प्रभावित है। वह साहित्यकारों की नहीं सुनता क्योंकि उसे लगता है कि साहित्य का कोई बाजार नहीं, साहित्य एवं साहित्यिक गतिविधियों के बारे में न कोई जानना चाहता है और न देखना ऐसे में वह साहित्य एवं साहित्यिक गतिविधियों से जुड़े समाचार क्यों प्रसारित करे। चलिए यदि इलेक्ट्रानिक मीडिया विशुद्ध बनिया है और साहित्य एवं साहित्यिक गतिविधियों से जुड़े समाचार का प्रसारण उसे घाटे का सौदा प्रतीत होता है तो क्या हम साहित्य वाले संवाद कर उसे नहीं समझा सकते कि साहित्य में रुचि रखने वाले भी देश में हैं। साहित्य का भी बाजार बन सकता है फिर भी यदि वह साहित्य समाचार प्रसारण से व्यवसाय में घाटा उठाने से भयभीत है तो साहित्य के साथ संस्कृति और जोड़ लें तथा 'साहित्य एवं सांस्कृतिक गतिविधियों के समाचारÓ के लिए प्रतिदिन 1 मिनट या उससे भी कम समय देकर तो देखें। साहित्य एवं संस्कृति से लोगों को इतनी एलर्जी या घृणा भी नहीं है कि उसके एक मिनट के प्रसारण को भी कोई नहीं देखेगा। जबकि कहानीकार प्रतिभू बनर्जी, इलेक्ट्रानिक मीडिया से नितांत निराश लेकिन प्रिंट मीडिया से कुछ आशावान हंै जिसकी वजह से वे प्रिंट मीडिया में साहित्य समाचार प्रकाशन हेतु लेखकों से अपील भेजने का सुझाव दे रहे हैं। मेरे ख्याल से अपील नहीं ये हक की लड़ाई है। मीडिया को उसके कर्तव्य का बोध कराने की लड़ाई है। मीडिया भी व्यवसाय हो गया है लेकिन बनिया की दुकान तो नहीं है कि जो सामान अधिक बिकेगा वह ही अपनी दुकान में रखेगा। पूरे मुखपृष्ठ पर विज्ञापन छापने वाले प्रिंट मीडिया और सेक्स, ग्लैमर तथा बाजारवाद से प्रभावित समाचार प्रसारित करने वाले इलेक्ट्रानिक मीडिया को याद दिलाना चाहूंगा कि उसे प्रजातंत्र का चौथा खंभा भी कहा जाता है क्या वह अपने कर्तव्य का ईमानदारी से निर्वाह कर रहा है? क्या उसका यह दायित्व नहीं कि वह समाज के हर वर्ग, हर क्षेत्र, हर इकाई की स्थितियों का प्रतिबिंबन अपने फलक पर प्रस्तुत कर आम आदमी को उनकी स्थितियों से परिचित कराए? यदि किसी क्षेत्र के प्रतिबिंबन करने में मीडिया उपेक्षा करता है तो उस क्षेत्र से निवेदन नहीं पूरे हक के साथ तीव्र विरोध के स्वर उभरेंगे अपील, निवेदन, याचना की रिरियाहट नहीं।
नवनिकष की संयुक्त संपादक प्रमिला अवस्थी ने इस विषय पर गंभीरता से विचार करते हुए अपना अभिमत दिया है जो कि स्वागतेय है। मैं उनकी इस बात से पूर्णतया सहमत हूं कि साहित्य के समस्त पंथों से ऊपर उठकर साहित्य से जुड़े हर व्यक्ति, इकाई को मिलजुलकर संयुक्त रूप से आवाज बुलंद करना चाहिए जिससे कि साहित्य, साहित्य समाचार के रूप में आम लोगों के करीब पहुंच सके। साहित्य के मठाधीश, प्रतिष्ठित साहित्यिक पत्रिकाएं, समितियां, अकादमियां कितनी ही आत्ममुग्ध क्यों न हो लेकिन वे इस बात से इंकार नहीं कर सकतीं कि भले ही वर्तमान में आम आदमी पर साहित्य लिखा जा रहा है पर वह आम आदमी से जुड़ नहीं पाया है, क्यों? इस प्रश्न का जवाब है कि उसे आम आदमी से जोडऩे का प्रयास वर्तमान के दिग्गज साहित्यकारों ने नहीं किया। साहित्य को विशिष्टता के दायरे में कैद कर उसका जुड़ाव आम आदमी से नहीं होने दिया गया है और न ही आत्ममुग्ध साहित्यकारों ने इस दिशा में कोई प्रयास ही करना उचित समझा। साहित्यिक समाचारों के लिए राष्ट्रीय स्तर के समाचार पत्रों एवं टी.वी. के न्यूज चैनल्स में स्थान सुरक्षित होने से क्या आम आदमी का साहित्य से जुड़ाव नहीं होगा? क्या वह साहित्यिक गतिविधियों से परिचित नहीं होगा? और इन सबसे उसके मन में क्या साहित्यिक अभिरुचि जागृत नहीं होगी? यदि इन सब प्रश्नों का सकारात्मक उत्तर है तो इस दिशा में साहित्य से जुड़े हर व्यक्ति, संस्था एवं साहित्यिक पत्रिका को पहल करना नितांत जरूरी है।