Monthly Magzine
Tuesday 27 Jun 2017

कंधे पर पानी की कांवड़ का भार उठाए कवि

मुक्तिबोध की कविता पर बातचीत की शुरूआत 'कई बार’ शीर्षक कविता से करना चाहता हूँ जो कि विष्णुचंद्र शर्मा द्वारा संपादित-प्रकाशित 'कवि’ पत्रिका के जून 1957 अंक में पहली बार प्रकाशित हुई और कालांतर में 'भूरी-भूरी खाक-धूल’ संकलन में संकलित की गई। पूरी कविता इस प्रकार है -

कई बार/ किरणों की अप्सरा/आई और चली गयी,

निर्विकार किन्तु मैं/घिरा रहा अँधेरे से सूने में ताकता।

सत्यों का फेरा/शुरू हुआ, खत्म हुआ कई बार,

निराकार सूने का घेरा/ किन्तु अखण्ड स्थिर रहा

वह मेरा श्याम शून्य/ अनिमेष निहारता खड़ा रहा सत्यों को एकटक।

उदित हुआ सूर्य लाल, डूब गया।

चन्द्र व नक्षत्र आये, चले गये

किन्तु उन सबके पार परे रह/ अँधेरे की परम्परा

अम्बर में खड़ी रही

व्यथाएँ उभरी खूब, डूब गयीं

निराकार आदर्श-दिशाएँ किन्तु/ खड़ी रहीं मुँहबाये!

मेरा मन/ निराकार सँवलाया तमोलीन/ परदा बना रहा

उभरे सौ रश्मि-चित्र/ जीवन के मर्म के/ उभरे विलुप्त हुए।

बन्द हुआ थिएटर/भावुक दार्शनिक/बहु स्वभाव दर्शक चले गये!

बुझ गयी बिजलियाँ/ खाली पड़ी कुर्सियों की पाँतें वे।

दरवाजे बन्द हुए/ सूने उस तमोलीन/ अन्तराल भीतर

सुदूर वह परदा किन्तु/ गत रश्मि-चित्रों के

विलुप्त-संवेदना-प्रकाश पाश्र्व भूमि में

स्वयं की असंग/ अप्रमाणित/ असम्पर्कित तटस्थ अँधकारिता को

देख चकित है, विस्मित है!

सत्य आये व चले गये/ रश्मि उभरी व लीन हुई

अन्धकार किन्तु जो तब भी था, अब भी है।

मेरा मन/ अँधकार प्रतिरूप!

प्रदान वह करता है/ आकाश-अवकाश-प्रभास व रेखाएँ

रश्मियों को, रश्मि चरित्र को, सत्य को!

सार्थकता उसकी अपार है!

मुक्तिबोध की कोई भी कविता पढ़ें, वह न तो अपने आप में पूर्ण होती है न ही उसके भाव एकार्थ में व्यंजित होते हैं। प्रत्येक कविता और उसके हरेक पदबंध जैसे अपने भीतर कई अर्थ छवियाँ और कई संदर्भ-प्रसंग समेटे होते हैं, जो काल की गति में चिर नवीन भाव संवेदना भी पाठक के भीतर उत्पन्न करती हैं। यहाँ संबंधित कविता का जितनी बार पाठ करें, उतनी ही बार नए-नए संदर्भ-प्रसंग और अर्थ छवियाँ उभरती-खुलती हैं।

'अँधेरा’,'सूनापन’,'निराकार आदर्श’, 'व्यथाएँ’, 'भूख’, 'लाल-सूर्य’, 'बुझी बिजलियाँ’, 'खाली कुर्सियाँ’, 'विलुप्त संवेदना’, जैसे बिंब व प्रतीक मुक्तिबोध की विभिन्न कविताओं (और कहानियों में भी) हमें मिलेंगे- जो सही अर्थ में उनके काव्य सरोकारों, स्वप्नों व यथार्थ से मुठभेड़ करने के तरीके, उनके रचनाकार की सतत प्रश्नाकुलता, बेचैनी और गहन सृजनात्मक संघर्ष को ही उद्घाटित व व्यंजित करते हैं।

       मुक्तिबोध की रचना प्रक्रिया तथा रचनाशीलता आदि को समझना चाहें तो वहाँ जितना हासिल आता है उससे कहीं ज्यादा छूटा रह जाता है, जिसे फिर-फिर पकडऩा पड़ता है- बड़े धैर्यपूर्वक, चुनौतियाँ स्वीकार करते हुए। यहाँ संबंधित कविता के अंतिम पदबंध में जो कहा गया है कि ''सत्य आये व चले गये/रश्मि उभरी व लीन हुई/अन्धकार किन्तु जो तब भी था, अब भी है “ उसमें स्पष्ट संकेत है कि परतंत्र भारत में जिन आकांक्षाओं और मूल्यों की खातिर लड़ाई लड़ी गई, संघर्ष किया गया था, वह स्वतंत्रता के सालों बाद भी न तो पूर्ण हुईं न ही उन मूल्यों की रक्षा की जा सकी जिनकी खातिर गाँव-जनपद और शहर के असंख्य जन आंदोलन का हिस्सा बन प्राण दिए, दुख सहे। 'व्यथाओं का उभरकर डूब जाना’ आजाद भारत की तत्कालीन व्यवस्था की घोर असफलता को दर्शाता है। यों वर्तमान की भी यही व्यथा-कथा है। बल्कि आज 'अँधेरा’ तो 'उजाले के छद्म भेस’ में आता है- जो ज्यादा खतरनाक है। ऐसी खतरनाक स्थिति में मुक्तिबोध की कविताएँ हमें रास्ता दिखाती हैं। दोगले चरित्रों को पहचानते हुए उनके खिलाफ संघर्ष तेज करने का आह्वान करती है, साथ ही आह्वान होता है 'स्व के प्रति सजगता और समूह के प्रति प्रतिबद्धता’ बनाए व बचाए रखने का।

       मुक्तिबोध का स्पष्ट मत था कि संघर्ष और आंदोलन का कोई विकल्प नहीं होता। वह लगातार स्वयं संघर्षपथ पर चलते हुए साम्राज्यवादी, सामंतवादी व पूंजीवादी ताकतों की मुठ्ठी में कैद जन साधारण के स्वप्न को उबारने और उसे यथार्थ जीवन में परिघटित करने की लड़ाई लड़ते रहे। इस लड़ाई में कोई भी व्यक्ति अकेला कुछ नहीं कर सकता था और लड़ाई बहुत लंबी लडऩी होगी, इसकी उन्हें स्पष्ट समझ थी, अत: उन्होंने सामूहिक संघर्ष पर बल दिया और साथ ही लड़ाई की निरंतरता बनाए रखने स्वयं के साथ अपने परिजनों, वर्गीय जनों को भी मैदान पर उतरने को प्रेरित करते हुए खुलकर के यह कहा कि -

''जड़ी-भूत ढाँचों से लड़ेंगे हम/चाहे प्रतिनिधि तुम

चाहे प्रतिनिधि मैं/वैचारिक डीजल के इंजन को तोड़ेंगे।

उड़न्त घोड़ों-से जरूर हम अड़ेंगे

चाहे प्रतिनिधि तुम/ चाहे प्रतिनिधि मैं।

द्वंद्व में हार जाऊँ यदि मैं/ तुम मेरे घर आना/ बच्चे पुचकारना

तुम्हारी भाभी को/ आखिरी मेरी बात कहना-

स्वयं के पैरों पर खड़ी होकर जीना।

स्पष्ट है कि मुक्तिबोध के लिए कविता, कहानी, लेख आदि अभिजात्य वर्ग से आए लेखक-कवि की तरह कभी भी बौद्धिक जुगाली नहीं, बल्कि परिवर्तनकारी चेतना के संवाहक रचनाकार वर्ग की जरूरी जीवनचर्या रहे हैं। वे अक्सर किसान-मजदूर-मछुआरे, गाड़ीवान व ठेले-गुमटी वाले के बीच बैठते-उठते, उनसे संवाद करते थे। उनके दु:ख-दरद को बाँचते हुए संघर्ष की प्रेरणा देते और स्वयं भी उनसे प्रेरित होते थे। इसलिए वह लिख सके कि -

'' रहूँगा तुम से मैं ईमानदार प्रतिपल, प्रतिक्षण

मेरी साँसों के साथ-साथ जितनी धड़कन

दिल के गहरे खड्डे में लाल रक्त जितना

उतनी ताकत से हिम्मत से

कलपुर्जे अपने तन-मन के

हर मिनिट जोर से खूब घुमाता हुआ तुम्हारी तरफ

(रहूँगा तुमसे मैं ईमानदार)

मुक्तिबोध जी जान लगाकर जीवन संग्राम में जिस तरह जूझते-लड़ते रहे, उसी तरह साहित्यिक क्षेत्र में रहे। उनकी कविताएँ उनके गहन आत्म संघर्ष, तीव्र वैचारिक उद्वेलन और संवेगात्मक उठान की सहज परिणति होती थी। उनकी एक-एक कविता में कई-कई कविताओं के सूत्र विन्यस्त होते थे। उनकी सर्जनात्मक क्षमता अद्भुत व अप्रतिम थी। वे सामाजिक विषमताओं, रूढिय़ों और शोषण व दमनकारी तात्कालीन व्यवस्था, अंतर्विरोधी चरित्रों को सतर्क और सचेत रूप से ताउम्र उजागर करते रहे हैं। सत्य के पथ पर चलना और अन्याय न सहना मुक्तिबोध के कवि व मनुष्य जीवन का मूलाधार था। इसीलिए वे जीवन भर कष्ट में रहे। चाहते तो अपनी बेहतरी के लिए सुविधाभोगी लेखक-कवियों की तरह सत्ता व शासन तंत्र से साँठ-गाँठ कर सुख के साजो-सामान व जीवन-तंत्र विकसित कर सकते थे, परंतु उन्होंने कुत्सित सुख के बजाय कठोर यातना पथ पर चलते हुए विजडि़त जीवन को कहीं श्रेयस्कर समझा और लिखा-

'सत्य के गरबीले/अन्याय न सह मित्र

संघर्ष करता हुआ तू जीवन का खींच चित्र

मिथ्या की हत्या कर बुद्धि के आत्मा के विष भरे तीरों से

खींच चित्र मानव का प्राणों के रूधिर लकीरों से!

(सत्य के गरबीले अन्याय न सह)

रचनाकारों का एक वर्ग विशेष सुनियोजित रूप से मुक्तिबोध की रचनाओं का मजाक उड़ाता था इससे उन्हें स्वाभाविक रूप से पीड़ा होती थी, लेकिन वे निराशा, विषाद या कुण्ठा से नहीं घिरे। उन्होंने दृढ़तापूर्वक कहा कि-''हो सकता है मेरी कविताएँ रद्दी की टोकरी में डाल दी जाएँ, मेरी मृत्यु के बाद वे जला दी जाएँ, फिर भी मैं उन्हें लिखता अवश्य हूँ। मेरा वातावरण, मेरा परिवेश, मुझे साहित्यिक कार्यों के लिए कोई प्रोत्साहन नहीं देता, इसके विपरीत वह मुझे परावृत्त करता है, फिर भी मैं उन्हें लिखता हूँ। दीर्घ कविताएँ लिखता हूँ। एक-एक कविता छ:-छ: महीने तक चलती हैं। सब कार्य उसके अधीन कर देता हूँ।“

मुक्तिबोध का संघर्ष आंतरिक और बाह्य दोनों स्तर पर गहन व जटिल था। यों इन्हीं सब के बीच वे उस समानधर्मा की निरंतर तलाश भी करते रहे जिनके साथ संघर्ष किया जा सके। वह समानधर्मा किसी देश विशेष या राज्यों की सीमा से बंधे न होकर समूची मानव जाति व वैश्विक फलक पर हस्तक्षेप करने वाले अभावग्रस्त किंतु कर्मठ और प्रतिबद्ध जन थे। अपनी जन्मभूमि मालवा के संघर्षशील किसान-मजदूर की विपन्नता व अकालजनित तमाम दु:सह स्थितियों को मुक्तिबोध ने देखा-भोगा था और साथ ही यह भी जाना था कि कैसे विपरीत समय में भी ईमानदारी और कर्मठता जैसे उदात्त मूल्यों को वहाँ के लोगों ने त्यागा नहीं। पेट की खातिर भले वे अपनी धरती से पलायन करते रहे लेकिन जीवन से कभी पलायन नहीं किया, 'मालव निर्झर की झर-झर कंचन रेखा’ कविता में उन्होंने लिखा -

''हम खण्डहर के वासी हैं

कोमल खुली-खुली आकाश-नीलिमा को पीकर

तारों की गतिविधियाँ जीकर

गहरा दिक्-बोध हमें होते रहना स्वाभाविक है

करते रहते हैं तीखा-तीखा विश्लेषण!

रखते हैं ध्वस्त भीत के आले में दीपक

उसकी आलोक-महक में बालक हँसकर भी

गम्भीर गहन एकाग्र पीत-मुख दिखते हैं,

माना कि जिंदगी बदरंग विकृताकृति सी है...

दिल में मीठी-ताकत सी एक दमकती है।

व्यक्तित्व महकते रहते हैं।“

'ध्वस्त भीत के आले में दीपक रखने’, 'गहरे दिकबोध होने’ व 'दिल में मीठी ताकत दमकने’; जैसी उदात्त चेतना के संवाहक कवि मुक्तिबोध का व्यक्तिगत व पारिवारिक जीवन भले ही अभाव, विपन्नता व खानाबदोशी में बीता हो उनके विचार और साहित्य में पलायन नहीं है। उनके भीतर सदैव 'आत्म निर्भर’ दृढ़ संकल्पी समाज और स्वाभिमानी राष्ट्र के साथ वैश्विक मानव-संस्कृति वाले महादेश का स्वप्न’ पलता रहा- जो दुर्भाग्य से आजादी के 70 साल बाद भी जैसे रोज थोड़ा-थोड़ा स्खलित होता गया है। मुक्तिबोध अपने समय के समग्र सामाजिक, राजनीतिक व सांस्कृतिक घटनाक्रमों, समकालीन विसंगतियों, अंतर्विरोधों और पतनशीलता पर खुली चोट करते थे। उनका संबंध किसान-मजदूर व शोषित उत्पीडि़त वर्ग से 'संवादी-संगी’ का था। वह कभी मध्यवर्गीय ढुलमुलपन का शिकार नहीं हुए और बड़े साफ शब्दों में अपनी पक्षधरता जाहिर करते हुए कहा कि -

'' नहीं चाहिए मुझे हवेली/ नहीं चाहिए मुझे इमारत

नहीं चाहिए मुझको मेरी/अपनी सेवाओं की कीमत

नहीं चाहिए वह आईना/बिगाड़ दे जो सूरत मेरी

बड़ों-बड़ों के इस समाज में/शिरा-शिरा कंपित होती है

अहंकार है मुझको भी तो/ मेरे गौरव की भेरी

यदि न बजे इन राजपथों पर/तो क्या होगा।

मैं न मरूंगा/कंधे पर पानी की काँवड़ का

यह भार अपार सहूँगा।।

(नहीं चाहिए मुझे हवेली)

'कंधे पर पानी की काँवड़ लेकर चलने’ और उसका पूरा भार सहने वाले हिंदी के स्वाभिमानी व धुर संघर्षी कवि मुक्तिबोध समूची मानव जाति की मुक्ति और उनके विकास के पक्षधर थे। उनके सरोकारों व स्वप्न का ऐक्य उनकी सहज अभिलाषा थी। सही अर्थों में मुक्तिबोध विश्वचेता कवि थे।  उनकी चेतना, संवेदना और सृजन के आयाम समय के साथ निरंतर व्यापक से व्यापकतर होते गए थे। उन्होंने यों ही नहीं लिखा कि -

चाहे जिस देश प्रांत पुर का हो/ जन-जन का चेहरा एक

एशिया की, यूरोप की, अमेरिका की/ गलियों की धूप एक!

कष्ट-दुख-संताप की/चेहरों पर पड़ी हुई झुर्रियों का रूप एक

जलता हुआ लाल कि भयानक सितारा एक/उद्दीपन उसका विकराल सा इशारा एक।

(जन-जन का चेहरा एक)

युद्ध और राजनीति जन-मन को कैसे बाँटते व नितांत अकेला कर देते हैं, मुक्तिबोध यह गहरे जानते थे। उन्होंने द्वितीय विश्वयुद्ध की विभीषिका को न सिर्फ  महसूस किया था, बल्कि बड़े व्यथित रहे युद्ध की उस परिणति से जिसने मनुष्य जाति से ज्यादा मनुष्यता को मार डाला था। परमाणु बम के शिकार लोगों की पीड़ा से भरे उन्होंने 'क्लॉड ईथरली’ कहानी लिखी और कविताओं में भी उतारी अपनी भावना को। उन्होंने मानवता के पक्ष में बातें करते हुए सुझाया कि -

उन्हें युद्ध की ही करने दो बात/चाँद की बात हम करें

सूत्र निकालें गणित जमायें/अज्ञातों को ज्ञात हम करें

फिर उन ज्ञातों से अगले सब अज्ञातों तक

ऊँची नि:श्रायणी लगायें/भव्य सातवें मंजिल के सपनों तक ले जायें...

फिर से जाँचे गणित/ कि ज्ञात हो और भी अधिक ज्ञात...।

स्पष्ट है कि मुक्तिबोध की कविताओं का फलक व्यापक है और वहाँ अद्योपांत 'जीवन’, 'संघर्ष’ व 'सृजन’ के भाव ही गहरे हैं। अणु से लेकर परमाणु तक, तृण से जंगल व धरती से लेकर आकाश तक, अँधेरे से उजाले, जीव से ब्रम्हाण्ड तक, बुद्ध से गांधी और हिटलर से क्लॉड इथरली तक संवाद व सृजनात्मक उत्स का विस्तार है। मुक्तिबोध को कभी 'दुरूह’ तो कभी 'ठस गद्यात्मकता’ का कवि और कभी 'केंचुआ व रबर छंद’ का कवि बताते हुए खूब मजाक उड़ाया गया। सांगठनिक हमले भी हुए, लेकिन षडय़ंत्र व हमले के बीच मुक्तिबोध और भी जीवट, प्रासंगिक व अर्थोन्मुखी कवि होते गए। संघर्ष व प्रतिरोध का उनका स्वर तीखा एवं लक्ष्य भेदी होता गया। उन्होंने अपनी 'भूमिका’ का निर्वहन करते हुए खुल करके लिखा, कि -'अगर मेरी कविताएँ पसंद नहीं/ उन्हें जला दो

अगर उसकी आग बुरी लगती है/ दबा डालो

इस तरह बला टालो/ लेकिन याद रखो

वह लोहा खेतों में तीखी तलवारों का जंगल बन सकेगा

मेरे नाम से नहीं, किसी और नाम से सही

और वह आग बार-बार चूल्हे में सपनों सी जागेगी

सिगड़ी में खयालों सी भड़केगी, दिल में दमकेगी

मेरे नाम से नहीं किसी और नाम से सही।

लेकिन मैं वहाँ रहूँगा/ तुम्हारे सपनों में आऊँगा

सताऊँगा/खिलखिलाऊँगा/खड़ा रहूँगा

तुम्हारी छाती पर अड़ा रहूँगा।

मुक्तिबोध के लोहे का 'खेतों में तलवार का जंगल बनना’ और 'छाती पर अड़ा रहना’ लिखत भर का नहीं, बल्कि काल की आँतों में उतर और छाती पर चढ़कर चुनौती देना था - ठीक उसी तरह जिस तरह से अपने समय में हिंदी के योद्धा कवि 'निराला और बांग्ला के काजी नजरूल इस्लाम ने दी थी- कबीर का धज धारण करते। समर में अनवरत लड़ते।