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Tuesday 27 Jun 2017

अंधेरे से उजाले की ओर

क्यामुक्तिबोध दोहराव के कवि है - यह प्रश्न उठता है और मुक्तिबोध रचनावली के सम्पादक नेमीचंद जैन ने मुक्तिबोध को दोहराव का कवि मानने वालों को जवाब भी दिया है- ''यह भी कहा जा सकता है कि मुक्तिबोध में विषय की विविधता की बड़ी कमी है और वह एक ही अनुभव को दोहराते हुए जान पड़ते हैं। मगर मुक्तिबोध के लिए यह अनुभव किसी एक कविता में समा सकने वाला छोटा-मोटा आवेग या विचार नहीं, बल्कि पूरी जिंदगी का फलक है, जिससे बाहर कुछ नहीं है। मेरा अनुमान है कि यही उनके रचना-जगत की मौलिकता और अपने अलग निजी स्वर तथा उससे पैदा होने वाले अलग काव्यरूप का स्रोत है।“ (पृष्ठ 28 मुक्तिबोध रचनावली खंड-1) मुझे लगता है कि हिन्दी में जितनी भी रचनावलियों का सम्पादन किया है, प्रकाशित हुई हैं उनमें सबसे अच्छा सम्पादन ''मुक्तिबोध रचनावली” का हुआ है। गजब की मेहनत की गई है इन छ: खंडों के सम्पादन में और एक बात यह भी कि मुक्तिबोध पर सबसे अच्छा काम कवि चन्द्रकांत देवताले का है, इसमें उनकी कवि दृष्टि झलकती है।

अब मुक्तिबोध पर अपनी बात कहूं। मुझे लगता है कि मुक्तिबोध को केवल उनकी कविताओं से ही नहीं समझा जा सकता, उनके सरोकार को समझने के लिए उनके समग्र साहित्य को सामने रखना होगा अन्यथा हासिल आया शून्य होगा। दरअसल मुक्तिबोध पर एक ही विषय के दोहराव का आरोप उनके सामाजिक सरोकार, रुझान को बदल डालने की उनकी तीव्र प्रतिबद्धता व इच्छा को न समझ पाने का परिणाम है। मुक्तिबोध इस पूंजीवादी, गैर बराबरी वाले समाज और अद्र्धसामंती लोकतंत्र के क्रियाकलाप तथा इसकी जकडऩ को खत्म कर एक मनुष्य हितैषी समाज के लिए तड़पन लिए हुए थे- सब बदल देना चाहते थे। इसलिए इस घोर शोषणकारी व्यवस्था पर चहुंओर से आक्रमण करते रहे। ठीक उसी तरह जैसे शत्रु को परास्त करने चारों ओर से आक्रमण किया जाए। यह शोषण की व्यवस्था मुक्तिबोध के लिए बड़ा शत्रु थी और मुक्तिबोध साहित्य की हर विधा से उस पर आक्रमण कर रहे होते हैं। कुछ कविताएं भी आक्रमण करती हैं अत: इस अर्थ में उनका साहित्य शस्त्र की तरह प्रयोग में लाई गई हैं। मुक्तिबोध को केवल कविताओं से ही नहीं समझा जा सकता। उनका सरोकार एक लेकिन शब्दबाण कई। रचनावली के सम्पादक ने सही कहा है- ''पर इतना अवश्य कहा सकता है कि अपने सरोकारों की इस अद्वितीयता और विराटता के कारण ही मुक्तिबोध हिन्दी में इस दौर के सबसे बड़े अप्रतिम कवि हैं।“

मुक्तिबोध का यह जन्म शताब्दी वर्ष चल रहा है। जगह-जगह आयोजन हो रहे हैं। लेकिन आयोजनों की रिपोर्टिंग पढ़कर लगता है सारा कुछ एक-सा हो रहा है। मेरा मानना है कि मुक्तिबोध के सरोकारों को जन-जन तक पहुंचाना आज ज्यादा जरूरी हो गया है और इसके लिए हमें भी मतलब जो मुक्तिबोध को व्यवस्था के खिलाफ डटे रहने व लगातार आक्रमण करने वाला मानते हैं, आज उपलब्ध तमाम मीडिया का उपयोग करना चाहिए। गोष्ठियां हों, होनी चाहिए। लेकिन अखबारों में लेख आएं, सम्पादक के नाम पत्र लिखे जाएं, उनकी सूक्तियां अखबारों में दी जाएं। सोशल मीडिया का भरपूर उपयोग किया जाए। हम पूरे मीडिया को अपने ढंग से अपना तरीका, अपनी रणनीति अपनाते हुए, मुक्तिबोधमय कर दें। यह हम पर है।

दिक्कत यह भी है कि कुछ लोगों ने मुक्तिबोध की लम्बी कविताएं पढ़ लीं और कुछ छोटी कविताएं और मुक्तिबोध पर प्रवचन देने लगे- लोग समझने लगे कि मुक्तिबोध यहीं खत्म हो गए। दरअसल मुक्तिबोध के केन्द्रीय सरोकार को रेखांकित करने की जरूरत है। मुक्तिबोध होरी और धनिया को इस तरह याद करते हैं अपनी कविता में-

धूप की राहों की

धूलिमय सफेदी में

एक जगह श्यामलता

पेड़ तले छाया में बैठे हैं

होरी औ’ धनिया

धनिया है नीलांचल

सम-सिक्त श्याम लता...

आगे और 13 पंक्तियां हैं। मतलब मुक्तिबोध श्रम, श्रमिक (मजदूर, किसान) के आदिम संघर्ष की निरंतरता को पेश कर रहे हैं और पेश ही नहीं कर रहे, समय के साथ उसके सघन होते जाने को रेखांकित कर रहे हैं- (कविता ''शब्दों का अर्थ जब”- पृष्ठ 43-44) मुक्तिबोध को समझने के लिए उनके 'समय’ को भी ध्यान में लाना होगा। वह नेहरू युग था, लेकिन आमजन के परेशानी का काल भी था। देश आजाद हुआ ही हुआ था- अनाज की भारी कमी थी, जमाखोरी, कालाबाजारी जोरों पर थी। कम्युनिस्ट पार्टी, समाजवादी पार्टी अनाज दुकानों के सामने पिकेटिंग करते, लाठी खाते, पकड़े जाते, बड़ा ही कठिन समय था। नागपुर में मुक्तिबोध यह सब देख रहे थे। मुक्तिबोध को समझने के लिए, उनकी प्रतिबद्धता को समझने के लिए कम्युनिस्ट पार्टी के चेयरमैन डांगे को लिखा गया पत्र भी पढऩा होगा। साहित्य की भूमिका जानने के लिए उनके ''आलोचना-लेख” के साथ ही सुभद्राकुमारी चौहान पर लिखा गया उनका निबंध भी पढऩा होगा। मुक्तिबोध की समाज में व्याप्त घोर शोषण को लेकर पीड़ा को समझने के लिए उनकी कविता ''शब्दों का अर्थ जब” के अंदर धंसना होगा। वर्गभेद से ग्रस्त जीवन को समझने के लिए उनकी रचना के हर वाक्य के अंदर घुसना होगा। चीरफाड़ करनी होगी। एक और बात यह कि मुक्तिबोध को समझने के लिए हमें पूंजीवाद व उससे उत्पन्न सोच जो रुढिग़्रस्त हो गई उसे समझना होगा। एक और बात, मुक्तिबोध को अकादमिक व्याख्या के अंदर ला देने पर मुक्तिबोध दुरुह हो जाएंगे और  दुरुह ही नहीं होंगे, वे समाज के दूर कर दिए जाएंगे उस समाज से जिसमें धंसकर उन्होंने उनके लिए लिखा है। मुक्तिबोध की आशावादी आवाज भी ध्यान में रखनी चाहिए-

तब मनुष्य ऊबकर उकताकर

ऐसे सब अर्थों की छाती पर पैर जमा

तोड़ेगा काराएं कल्याण की,

तोड़ेगा दुर्ग सब...