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Friday 18 Aug 2017

मुक्तिबोध जितना समझदार और ईमानदार लेखक सदियों में कोई कोई ही होता है

वरिष्ठ आलोचक डॉ. जीवन सिंह से लंबी बातचीत के अंश

प्र. मुक्तिबोध की कविताओं पर दुर्बोधता का आरोप लगाया जाता है। जीवन की जटिलता को सहज शब्दों में व्यक्त न कर पाना क्यों न एक कवि की सीमा मानी जाय?
उ. मुक्तिबोध की कविता दो तरह की है। उनकी अनेक कविताएं हैं जो सीधे-सीधे समझ में आती हैं। ऐसी कविताएं उस दौर की हैं, जब वे प्रगतिवादी काव्यांदोलन के प्रभाव में लिख रहे थे। उस समय उनकी कविताएं समाजकेन्द्रित समस्याओं या सामाजिक रूढ़ मान्यताओं पर होती थी। 'भूरी भूरी खाक धूल' नामक काव्य संग्रह में इन कविताओं को पढ़ा जा सकता है। सच बात तो यह है कि उनकी कविताओं का संकलन उलटे विकास क्रम में हुआ, जो संग्रह पहले आना चाहिए था वह बाद में आया और बाद में आने वाला पहले आया। उनके जीते जी तो एक भी संग्रह नहीं आ पाया था। उस समय वैसे ही दीर्घाकार कविताओं का चलन ज्यादा नहीं था, जबकि वे लघु आकार में जब भी लिखते तो उसे अधूरी कविता मानते थे। उन्होंने स्वयं स्वीकार किया है कि ''मैं छोटी कविताएं नहीं लिख पाता हूँ। यदि लिखता भी हूँ तो वह अधूरी होती है। “इसका सीधा सा मतलब यह है कि जो छोटी कविताएं होती हैं उनमें जीवन यथार्थ अपने समग्र रूप में नहीं आ पाता है। कोई एक बिन्दु होता है जिसे कवि उठाता है और वहीं छोड़ देता है। उस समस्या के कारण, प्रभाव व परिणाम पर बहुत कम, शायद नहीं के बराबर विचार हो पाता है। मुक्तिबोध अकेले कवि हैं, जिनके यहाँ ऐसा नहीं है। वे किसी विषयवस्तु की समग्रता में उतरकर कविता रचते हैं। इस वजह से भी उनकी प्रदीर्घ कविताओं को समझने के लिए पाठक को भी अपने कविता को समझने की विधि को बदलने की जरूरत होती है। पाठक के लिए भी दीर्घाकार कविताएं एक चुनौती की तरह होती हैं, क्योंकि वह इतनी लम्बी कविताओं को पढऩे का अभ्यस्त नहीं होता। इसलिए उनकी कविताएं सामान्य कविता को समझने की अभ्यस्त बुद्धि के लिए दिक्कत वाली होती हैं। मुक्तिबोध मानते थे कि ज्ञान और बोध के आधार पर भावना की इमारत खड़ी होती है। ज्ञान के बिना जो भावना होगी, उसका कोई आधार नहीं होगा। इस आधार पर वे संवेदना को ज्ञान से जोड़ते हैं और ज्ञान को संवेदना से। कविता में आधुनिक बोध के लिए सिर्फ संवेदना से काम नहीं चल सकता। उनकी कविता देशकाल के जितने आयामों से होकर गुजरती है, उतने आयाम शायद ही अन्य किसी कवि के यहाँ मिलें। अपने समय के जटिल भावबोध को जिस शैली में वे व्यक्त करते हैं वह भी सामान्य पाठक के संस्कारों से मेल नहीं खाती। उन्होंने काव्यास्वादन के पूर्व संस्कारों से अलग ढंग की कविता लिखी है। एक बात और कि वे पाठक को बाहर की प्रत्यक्ष जिन्दगी के समानांतर व्यक्ति के मनोजगत में चलने वाले अन्तद्र्वन्द्व की यात्रा भी कविता के माध्यम से कराते हैं। वे दरअसल, कविता की बजाय एक अलग तरह की महाकविता रचने वाले रचनाकार हैं। इसलिये उनकी कविता को समझने के लिए एक अलग तरह के अनुशासन और धैर्य की आवश्यकता होती है।
प्र. 'अँधेरे' कविता में मुक्तिबोध की एक पंक्ति है-कविता में कहने की आदत नहीं, पर कह दूं।' यह कहीं उनका अपनी दुर्बोधता का अहसास तो नहीं?
उ. सामान्यत: मुक्तिबोध अपनी कविताओं में सपाट तरीके से कोई बात नहीं कहते थे। यथार्थ को व्यक्त करने का आन्तरिक दबाव उनके मन पर इतना अधिक रहता था कि उसकी बेहद उलझी हुई पर्तों को सुलझाने में एक प्रक्रियागत जटिलता आए बिना नहीं रहती थी। सपाट तरीके से बात कहने पर जो वे व्यक्त करना चाहते थे वह आने से रह जाता था, क्योंकि वे यह मानते थे कि जो कुछ बाहर आन्दोलनकारी शक्तियाँ करती हैं, वही एक सच्चे रचनाकार के भीतर भी चलता है। उसका मन उन स्थितियों के अनुरूप बदल जाता है। उसके भीतर के संशय दूर हो जाते हैं। तब वह अपनी बात को सपाट तरीके से दृढ़तापूर्वक इस तरह से कहता है कि...कविता में बात को कहने की मेरी यह शैली नहीं रही है फिर भी मैं साफ-साफ शब्दों में कह देना चाहता हूँ कि जो यह मानकर चल रहे हैं कि पूँजी से जुड़े लोगों का हृदय परिवर्तन हो जाएगा और जो व्यक्ति-स्वातंत्र्य को ज्यादा तरजीह देते हैं तथा समाज की समस्याओं को व्यक्तिवादी तरीके से हल करना चाहते हैं, वे सही नहीं हैं। वे मुक्ति के मन को इस तरह से धोखे में रखकर छल नहीं सकते। उनके यहाँ बाहर के साथ-साथ व्यक्ति के भीतर की जो छिपी हुई दुनिया है उसका इतना जबर्दस्त आवेग रहता है कि वे बात को बाहरी तरीके से पूरी तरह व्यक्त नहीं कर पाते। वे व्यक्ति के भीतर की दुनिया को भी उतना ही महत्वपूर्ण मानते हैं,जितना बाहर की दुनिया को। उनकी कविता इन दोनों की द्वन्द्वात्मकता के प्रवाह में विकसित होती है इस वजह से वे बीच बीच में इस तरह के कथन भी कहते चलते हैं।
प्र. भाषाई जटिलता को लेकर नामवर सिंह भी कहते हैं, ''विचारों की अभिव्यक्तिमें मुक्तिबोध अपेक्षाकृत जटिल भाषा का प्रयोग करते  हैं और जहाँ स्वप्न-लोक का निर्माण करते हैं और अधिक जटिल-जटिल वाक्य-विन्यास मिलेंगे वहां ज्यादा धुंधलके वाली भाषा-कोहरे वाली गूढ़ भाषा का वे प्रयोग करते है।"
उ. मेरे हिसाब से उनके यहाँ भाषा की जटिलता तो है ही लेकिन उसकी वजह उनके विचारों की जटिलता है। जिस विचार और भावभूमि का वे निर्माण करते हैं और जिन्दगी के जिन सवालों को वे उठाते हैं, कोई दूसरा कवि है ही नहीं जो उनको उठा पाया है। वे नयी कविता युग के कवि हैं जब कविता को एक नया वातावरण मिला था। पहले तो स्वाधीनता के लिए संघर्ष चला। उपनिवेशवाद और सामंतवादी परिस्थितियों में बुनियादी तो नहीं लेकिन संरचनात्मक बदलाव हुआ। इस नए बदलाव में ताकतवर व्यक्ति को ज्यादा स्वाधीनता मिली। वह उसका उपभोग कर सकता था किन्तु गरीब, लाचार, असहाय और शोषित पीडि़त के लिए अभी लड़ाई बाकी थी। फिर भी परिस्थिति में नवीनता थी, इसी वजह से नयी कविता जैसी संज्ञा को तुरंत स्वीकृति मिल गयी। मुक्तिबोध के लिए नयेपन का मतलब वही नहीं था, जो उस समय अज्ञेय और उनके मंडल के कवियों के लिए था। यही वजह है कि मुक्तिबोध इस तरह की व्यक्तिवादी नवीनता से अलग रहे। इतना ही नहीं, उन्होंने प्रगतिशील काव्यधारा से माक्र्सवादी दृष्टि लेकर भी उसकी रेजीमेंटशन वाली प्रवृति से खुद को बचाया। उनकी आरम्भिक कविता प्रगतिवाद से प्रभावित भी हैं ,जो दुरूह और दुर्बोध भी नहीं हैं। उत्तराद्र्ध की कविताओं की भाषा ही नहीं विचार भी दुर्बोध हैं। यहाँ उनकी शैली में भी जटिलता है। इसका एक कारण उस समय की बदली हुई परिस्थितियाँ और उनको न समझ पाने की उलझन भी है। ऐसा नहीं है कि मुक्तिबोध पर लगाए गये इन आरोपों के प्रति वे सजग नहीं थे। उन्होंने अपनी कई कविताओं और लेखों में इसे दर्ज किया है। अपनी एक कविता में उन्होंने कहा है- कहते हैं लोगबाग बेकार है मेहनत, तुम्हारी सब कविताएं रद्दी हैं। भाषा है लचर उसमें लोच तो है ही नहीं, बेडौल हैं उपमाएं ,विचित्र हैं कल्पना की तस्वीरें, उपयोग मुहावरों का, शब्दों का अजीब है, सुरों की लकीरों की रफ्तार टूटती ही रहती है। माधुर्य का नाम नहीं, लय भाव सुरों का तो काम नहीं, कौन तुम्हारी कविताएं पढ़ेगा। इस बात में संदेह नहीं कि मुक्तिबोध की परवर्ती कविताओं की भाषा उस समय के मनोवैज्ञानिक यथार्थ को व्यक्त करने के उद्देश्य से उन्होंने अपने लिए रची थी। वह बोलचाल वाली आदर्श भाषा नहीं है लेकिन सोचने की बात यह है कि जो विषय वस्तु वे लेकर चले हैं उसको उसी भाषा में व्यक्त कर पाना संभव था। मुक्तिबोध ने एक ही तरह की भाषा का प्रयोग नहीं किया है। वे छायावादी काव्य भाषा के प्रयोग से लेकर प्रगतिवादी काव्यभाषा का प्रयोग करते हैं। नयी कविता तक आकर वे अपने विषय के अनुरूप अपनी भाषा को बनाते हैं। उनकी काव्य भाषा का एक उदाहरण यह भी है जिसकी अनदेखी की जाती है- झुलसी हुई झाडिय़ों के कटे हुए ठूंठों के जंगल की वीरानी में एक ओर मरी हुई गाय की झांकती हुई अधखुली ठठरी पर छाई है सफेद धूप, वीरानी की मुस्कान लिए है आसमान जिसके बिल्कुल बीचोंबीच मरी हुई गाय की ठठरी को देखती हुई मंडराती चीलें हैं। असंख्य गिद्ध उड़ आकर कहीं से हैं घेरे हुए बैठे मरी हुई गाय को......। यह भी उनकी भाषा का एक रूप है। क्या इसमें कहीं दुरूहता है ? देखने की बात यह भी है कि मुक्तिबोध की अपनी भाषा और डिक्शन का निर्माण किस परिवेश और परिस्थिति में हुआ। उनके परिवार की भाषा में हिन्दी और मराठी जैसी दो जातीयताओं का अद्भुत मिश्रण था। अँग्रेजी का अर्जन शिक्षा के माध्यम से किया। हिन्दी क्षेत्र में रहते हुए भी हिन्दी मुक्तिबोध की स्वाभाविक भाषा नहीं है। यह उनकी सीखी हुई अर्जित भाषा है। नेमिचंद जैन को 26.10.1945 को बनारस से लिखे पत्र में उन्होंने स्वयं स्वीकार किया है,''हिन्दी सुधारने की कोशिश शुरू हो गई है। छोटी सी फ्रेज, कोई चुश्त जबान बंदी झट नोट कर लिया करता हूं, बिल्कुल शा के लेडी आफ द डार्क के शेक्सपीयर की भाँति। इसके पहले, मैं हिन्दी के साहित्यिक प्रयासों के सिवाय, कभी भी लिखा नहीं करता था। मेरे अत्यंत आत्मीय विचार मराठी या अंग्रेजी में निकलते थे, जिसका तर्जुमा, यदि अवसर हो तो हिन्दी में हो जाता था। इसीलिये जानबूझकर यह पत्र हिन्दी में लिख रहा हूं। मेरा खयाल है कि मेरी भाषा सुन्दर न भी हो सके वह सशक्त होकर रहेगी, क्योंकि उसके पीछे अंदर का जोर रहेगा।" यह अंदर का जोर ही है जो उनकी भाषा को सशक्त और दुरूह दोनों एक साथ बनाता है।
प्र. विजेंद्र जी मुक्तिबोध की दुरुहता का कारण उनकी आत्मग्रस्तता और जीवन संघर्ष से बचने को मानते हैं। वह कहते हैं कि एक कवि को इतना आत्मग्रस्त नहीं होना चाहिए कि वह जीवन संघर्ष से बचने को फंतासी का रहस्य लोक बुनने लग जाये।
उ. यही तो विडम्बना है कि जिस व्यक्ति ने सबसे बड़ा और ईमानदारी से सर्वहारा के स्तर तक जाकर संघर्ष किया, उसी के ऊपर आरोप कि उन्होंने जीवन संघर्ष नहीं किया। मुझे तो लगता है कि आधुनिक कविता के लिए निराला के बाद यदि किसी ने बेहद ईमानदारी से जीवन तप किया है तो वे मुक्तिबोध ही हैं। जिस व्यक्ति को अपना अस्तित्व बचाने के लिए कितना बड़ा समझौताविहीन जीवन संघर्ष करना पड़ा, उसको आत्मग्रस्त कहना किसी भी दृष्टि से तर्कसंगत नहीं कहा जा सकता।
प्र.यह भी आरोप है कि वे माक्र्सवाद से ऊब कर उससे अपना पिंड छुड़ाना चाहते हैं।
उ. यह दूसरा आरोप भी पहले आरोप का ही विस्तार है,जो जीवन संघर्षों से बचेगा वही तो माक्र्सवाद से ऊबेगा। और वही फंतासी के रहस्य लोक की शरण लेगा। जैसा कि मैंने पहले कहा कि मुक्तिबोध जितना समझदार और ईमानदार लेखक सदियों में कोई कोई ही होता है। माक्र्सवादी विचारधारा को जितनी बारीकी और गहराई में उन्होंने समझा है और उसे अपने आचरण में उतारा है, उतना शायद ही किसी अन्य रचनाकार ने उतारा हो। उनके आत्मसंघर्ष और सामाजिक संघर्ष अलग-अलग विभाजित नहीं हैं। उन्होंने अपनी डायरी में कलाकार की व्यक्तिगत ईमानदारी पर चार जगहों पर बहुत सुचिन्तित तरीके से संवाद शैली में बहुत स्पष्ट लिखा है, जहाँ अपने एक माक्र्सवादी दोस्त यशराज से संवाद करते हैं। यशराज कहता है कि हम अपूर्व शब्दावली में बात करते हैं, लेकिन जीवन के जिस क्षेत्र की हम बात करें उसकी शब्दावली आनी चाहिए। क्या लेखक के लिए परम आवश्यक नहीं है कि वह विश्व जनता के अभ्युत्थान को देखे, और समाज का उत्पीडऩ करने वाली शक्तियों से सचेत हो और उसके प्रति विद्रोह करने वाली ताकतों से सक्रिय सहानुभूति रखे। ज्ञानात्मक आधार के विकास में तो ये बातें भी सम्मिलित हैं। नहीं हैं क्या? मैंने सिर्फ इतना ही कहा, ''तुम तो मेरे बारे में जानते हो, मेरा तो यह दृष्टिकोण बहुत पहले से रहा है और उसके लिए कुछ तकलीफ. भी उठाई है।"जिस तरह के आरोप मुक्तिबोध पर लगाए जाते रहे हैं,वह आज की बात नहीं है। अपने जीवन काल में ही उन्होंने स्वयं इस तरह के आरोपों के उत्तर में 'समीक्षा की समस्याएं' शीर्षक से एक लम्बा लेख लिखते हुए तत्कालीन व्यक्तिवादी, कलावादियों और माक्र्सवादियों का उत्तर देते हुए अपने पक्ष को भी रख दिया था। मुक्तिबोध मानते हैं कि इस तरह के आरोप वे लोग लगाते हैं जो न लेखक के जीवन को बाहर से जानते हैं न भीतर से। वे कहते हैं कि लेखक के अन्तकरण में संचित संवेदनात्मक ज्ञान और ज्ञानात्मक संवेदन समीक्षक को प्राप्त करना कठिन भी है। यह सचमुच संभव नहीं है कि समीक्षक लेखकों का आत्मवृत्त जाने। किन्तु यह तो हो ही सकता है कि समीक्षक अपने स्वयं के उद्योग से लेखक के अन्तर्बाह्य जीवन में ज्यादा दिलचस्पी ले। वे यह भी कहते हैं कि इसी प्रक्रिया से समीक्षा गहरी और यथार्थोन्मुख होती है। समीक्षक को चाहिए कि लिखने से पहले वह न केवल लेखक की रचनाओं को समझे बल्कि उनके जीवन को भी नजदीक से या किसी अन्य स्रोत से जानने का प्रयास करे कि लेखक ने किस तरह का जीवन जिया। जीवन से लिया कितना है और लौटाया कैसे और कितना है। मुक्तिबोध की माक्र्सवाद की धारणा औरों से वैसे ही भिन्न है, जैसे बहुत से रूसी समीक्षकों और चिन्तकों की आपस में भिन्न दिखाई देती है। मुक्तिबोध ने यह स्वयं बतलाया है कि उनके यहाँ जो आत्मग्रस्तता दिखाई देती है उसकी वजह भी वह यथार्थ ही है जो हमारे सामने होते हुए भी, संभव है कुछ लोगों को नजर ही न आए। उन्होंने अपनी डायरी .....एक लम्बी कविता का अंत में लिखा है,''ऐसी स्थिति में, जबकि बाह्य समाज में संजीवनकारी उत्प्रेरक आन्दोलन या ऐसी संगठित शक्ति नहीं है, एक संवेदनशील मन, जिसमें अब तक अवसरवादी कौशल और लाभ लोभ की समझदारी विकसित नहीं हुई है, केवल अपने को निस्सहाय अनुभव करता है। यदि वह कवि हुआ तो सहज मानवीय आकांक्षाओं की पूर्ति के सामाजिक वातावरण के अभाव में, उसके काव्यात्मक रंग अधिक श्यामल, अधिक बोझिल और अधिक आत्मग्रस्त हो जाते हैं।" इस से स्पष्ट हो जाता है कि मुक्तिबोध के यहाँ दिखलाई पडऩे वाली आत्मग्रस्तता किसी व्यक्तिवादी की आत्मग्रस्तता नहीं है। वह यथार्थ से पैदा हुई आत्मग्रस्तता है।
प्र. क्या कुछ ऐसे उदाहरण दे पायेंगे, जिससे पता चलता हो कि मुक्तिबोध माक्र्सवाद की गहरी समझ रखते हैं ?
उ. मुक्तिबोध एक समय तक कम्युनिस्ट पार्टी के सामान्य सदस्य भी रहे और उसके लिए काम भी किया।1940 में मुक्तिबोध शारदा शिक्षा सदन, शुजालपुर में अध्यापक होकर गये थे। वहाँ माक्र्सवादी विचारधारा को मानने वाले और कम्युनिस्ट पार्टी की गतिविधियों से गुप्त रूप से जुड़े रहने वाले नेमिचंद्र जैन इस स्कूल में 1941 में आए। जैन भी कविता करते थे, खूब पढ़ते और दुनिया के बारे में सोचते विचारते भी थे, मुक्तिबोध भी इस मामले में उनसे कम नहीं थे। दोनों का साथ हुआ और घनिष्ठता में बदल गया। इस समय तक मुक्तिबोध एडलर,जुंग आदि विचारकों को पढ़ चुके थे। वाल्जाक,फ्लावेयर,गोर्की का लेखन उनको प्रिय था। भौतिकवाद की ओर रुझान तो था किन्तु अभी माक्र्सवादी नहीं हुए थे। नेमिचंद जैन के साथ और सत्संग ने उनको माक्र्सवादी बना दिया था। इस तरह से उनकी एक वैचारिक भूमि और विश्व दृष्टि शुजालपुर में ही बन गयीं थी, जिसका विकास उन्होंने अपनी रचना और आचरण दोनों से किया। शुजालपुर स्कूल बंद हो जाने की वजह से उनको उज्जैन जाना पड़ा। जहाँ उनको समाज सुधाकर के सम्पादन के लिए बुलाया गया था। यहाँ उन्होंने मध्यभारत प्रगतिशील लेखक संघ की शुरुआत कराई। इन्दौर में 1944 में उन्होंने फासिस्ट विरोधी लेखक कांफ्रेंस का आयोजन कराया, जिसकी अध्यक्षता राहुल सांकृत्यायन ने की थी। इससे पहले1943 में तारसप्तक निकल चुका था। यहाँ से वे बनारस गये। शमशेर जी ने उनकी जीवन कथा में लिखा है कि ''उनका काशी प्रवास बहुत सुखद नहीं रहा। "यहीं से वे 1946-47 में जबलपुर आए। जहाँ हितकारिणी हाईस्कूल में अध्यापकी की। जबलपुर आने पर वे कम्युनिस्ट पार्टी का काम करने लगे थे। उनके निकट साथी बतलाते हैं कि बनारस से जबलपुर आने के पीछे उनका गुप्त रूप से कम्युनिस्ट पार्टी के काम करना था। संभावना यह भी है कम्युनिस्ट पार्टी ने उनको काम करने के लिए यहाँ भेजा हो। यहाँ वे जयहिंद नामक एक दैनिक में लिखा करते थे और समता नाम की पत्रिका के सम्पादन में सहयोग करते थे। यहाँ पर उनके पास कम्युनिस्ट पार्टी के पत्र 'न्यू एज' के वितरण करने का काम था। लेकिन जबलपुर निवास उनके लिए हर दृष्टि से कष्टकारी रहा। गुप्त गतिविधियों में भाग लेने की वजह से गुप्तचर विभाग भी उनके पीछे लगा रहा। जबलपुर से वे जब 1948 में नागपुर गये तो यहाँ उनको अस्तित्व बचाने की मुश्किलें तो खूब हुई लेकिन मित्रों का संग बेहद उर्वर रहा। यहाँ उनकी वैचारिक जमीन बहुत पुख्ता हुई। लेकिन यहाँ वे कम्युनिस्ट पार्टी से अलग हो गये और ज्यादा समय साहित्यिक कार्यों को देने लगे। उनका उत्कर्षकालीन सृजन यही से शुरू हुआ। यहाँ उनको सबसे ज्यादा गरीबी से सामना करना पड़ा। रेडियो की नौकरी छोड़कर साप्ताहिक 'नया खून' में कालम लिखने लगे। यहाँ एम्प्रेस मिल के मजदूरों पर जब गोली चलाकर उनका दमन किया गया तब उसकी आंखों देखी रिपोर्टिंग मुक्तिबोध ने की। उनकी कविता के बारे में शमशेर जी की कही इस बात पर हमको बहुत ध्यान से गौर करने से मालूम हो जायगा कि वे किस तरह के माक्र्सवादी थे। शमशेर जी के शब्दों में ''मुक्तिबोध ने छायावाद की सीमाएं लांघकर, प्रगतिवाद से माक्र्सी दर्शन ले, प्रयोगवाद के अधिकांश हथियार संभाल और उसकी स्वतंत्रता महसूस कर स्वतंत्र कवि रूप से, सब वादों और पार्टियों से ऊपर उठकर, निराला की सुथरी और खुली मानवतावादी परम्परा को बहुत आगे बढ़ाया।" 
प्र. लेकिन मुक्तिबोध जनांदोलन से सदा दूर ही रहे।
उ. मुक्तिबोध के बारे में व्यक्त इस धारणा से मैं सहमत नहीं हूं कि वे जनांदोलनों से कटे हुए थे। सच तो यह है कि बेहद ईमानदारी से जीवन निर्वाह करने का उनका संकल्प ही इतना बड़ा है जो उनको अपने समय के जन से कभी अलग ही नहीं होने देता। वे दूसरे लेखकों की तरह सत्ता के गलियारों में जाकर समझौता करते हुए सुविधा सम्पन्न जीवन जी सकते थे किन्तु उनके भीतर के एक ईमानदार और जनसम्पृक्त आंदोलनकारी मन ने उनको ऐसा नहीं करने दिया। 1935 में उन्होंने 18 वर्ष की आयु में एक कालेज की मैगजीन में पहली कविता प्रकाशित कराई थी।1936 में उनकी एक कविता वेदना और कल्पना शीर्षक से उज्जैन की वाणी पत्रिका में छपी। इसकी टेक पंक्ति है..........''वेदना का कवि बनूं मैं, कल्पना का मृदु चितेरा।"यह उनका प्रारम्भिक संकल्प है जो बाद में जनवेदना में बदल जाता है। देश को आजादी मिलने के आसपास मुक्तिबोध ने एक बेहद सम्प्रेषित होने वाली एक कविता लिखी, जिसमें लिखा- चाहे जिस देश प्रान्त पुर का हो जन जन का चेहरा एक। एशिया की यूरोप की,अमरीका की गलियों की धूप एक। कष्ट, दुख संताप की, चेहरों पर पड़ी हुई झुर्रियों का रूप एक। जोश में यों ताकत से बंधी हुई मुट्ठियों का एक लक्ष्य। पृथ्वी के गोल चारों ओर के धरातलों पर है जनता का दल एक, एक पक्ष। यह बीच के आकार की कविता है। मेरा सवाल है कि क्या जनांदोलनों से कटकर क्या कोई इस तरह की कविता लिख सकता है? किसानों की जिन्दगी के काव्य रूपक उनकी कविताओं में आरम्भ से ही मिलते हैं। उनका एक निबंध है -''मेरी मां ने मुझे प्रेमचंद का भक्त बनाया।" मेरी समझ में जो किसान को और उनके संघर्ष को नहीं जानता, वह प्रेमचंद का भक्त नहीं हो सकता।1941 में उनकी एक कविता 'क्षिप्रा धारा' शीर्षक से कलकत्ता से निकलने वाली पत्रिका विचार में प्रकाशित हुई- इस कविता में एक पुराना घाट आता है, जो गांव का कोई घाट है किन्तु यहाँ की लहरें साफ और गहरी हैं। यहाँ के बारे में कवि अपना अनुभव बतलाता है- मुझे यहाँ तक आ जाने पर नवीन आकुल अनुभव होता, सौन्दर्याकुल मन होकर भी यहाँ अधिक मैं मानव होता। वे इसी में आगे कहते हैं कि पहले यह सामंतों के महलों के मैदानों में बहा करती थी। अब इसने अपना मार्ग बदल लिया है और अब यह अधिक सबल होकर गरीबों के प्यासे खेतों से होकर बह रही है। इस शब्दावली में कविता कहने वाला संघर्षशील किसानों को अपनी कविता में न लाए, मेरी समझ के बाहर है। फिर उनकी कविता का सारतत्त्व दुनिया के मेहनतकशों के पक्ष में है जिससे किसान बाहर नहीं हैं। उनके प्रारम्भिक गीतों में ही वे ज्वार के खेतों और श्वेत रंग के बैलों वाली गाड़ी का वर्णन करते हुए कहते हैं- पीले ज्वार खेत के बाजू गाड़ी श्वेत बैलवाली है। मुक्तिबोध की खासियत रही है कि वे अपने संघर्षों का इकहरा और सपाट चित्र न बनाकर द्वन्द्वात्मक चित्र बनाते हैं वे मानते हैं कि जीवन के द्वन्द्व जितने बाहर हैं उतने ही भीतर भी हैं।
प्र. मुक्तिबोध के बारे में तो यह भी कहा जाता है कि वह बाद में माक्र्सवाद की अपेक्षा अस्तित्ववाद की ओर झुक गये और अंत में अस्तित्ववाद ही उन पर हावी हो गया।
उ. कौन कहता और मानता है कि मुक्तिबोध बाद में अस्तित्ववाद की तरफ झुक गये। रामविलास जी ने एक बार ऐसा क्या कह दिया कि उनकी हर बात में हाँ में हाँ मिलाने वाले अक्सर इस तरह के फतवे देते रहते हैं जबकि सच यह है कि साहित्य में मुक्तिबोध जितना समझदार और ईमानदार माक्र्सवादी कोई ढूँढे ही मिले। न तो उन्होंने कभी खुद को कोसा न कभी परिवार को। अपनी विपत्तियों, दिक्कतों, परेशानियों और कमजोरियों को नजदीकी दोस्तों को बताना न तो आत्मग्रस्तता है न ही अस्तित्ववाद। उनके लगभग अंतिम वर्षों के दिनों में अपने दोस्तों को लिखे पत्रों, कविताओं, कहानियों और उनके सम्बंध में लिखे गये संस्मरणों को पढ़ लीजिए, न कहीं हताशा है न उत्साह में कोई कमी है। एक ही ललक है कि कहीं कालेज में हिंदी की लेक्चररशिप मिल जाये कि निश्चिंत होकर कुछ और गंभीर लेखन कर्म किया जा सके। अपनी मृत्यु से सात महीने पहले 20 फरवरी 1964 को श्रीकांत वर्मा को लिखे आखिरी पत्र में उन्होंने बड़े उत्साह और आशा के साथ लिखा है, ''प्रिय श्रीकांत भाई, हम अपने समय से निपटने के लिए समर्थ हैं। यह स्फूर्तिमय आशावाद, मेरे लिए विश्व रूप में हृदयस्पर्शी है जबकि मेरी संघर्ष करने की शक्ति बराबर घटती जा रही है। केवल आप लोगों की मानसिक छवियाँ देखकर प्रेरणा इकठ्ठा करने का प्रयत्न करता हूं, और चाहता हूं कि अपने जीवन के शेष काल को अधिकाधिक सार्थक बना सकूँ।" नामवर सिंह जी ने भले ही सिद्ध लेखक की बात की हो, उनसे बड़े आलोचक आचार्य रामचंद्र शुक्ल ने सिद्धावस्था के लेखन की तुलना में साधनावस्था के लेखन को बड़ा और बड़े काम का माना है। इसी कसौटी पर वे साधनावस्था के कवि तुलसी को सिद्धावस्था के कवि सूर से बड़ा मानते हैं। कहना न होगा कि साधनावस्था की रचनात्मकता को केन्द्र में रखकर चलने वाले मुक्तिबोध इसी वजह से कवियों को रास्ता दिखाने वाले रचनाकार हैं। क्या कोई अस्तित्ववादी आत्मग्रस्त कवि अपनी किसी कविता में यह कह सकता है- आत्मविस्तार यह बेकार नहीं जायगा जमीन में गड़े हुए देहों की खाक से शरीर को मिट्टी से, धूल से खिलेंगे गुलाबी फूल, सही है कि हम पहचाने नहीं जायेंगे, दुनिया में नाम कमाने के लिए कोई फूल नहीं खिलता है, हृदयानुभव राग अरुण, गुलाबी फूल, प्रकृति के गंधकोश, काश! हम बन सकें।
प्र. मुक्तिबोध ने कविता के साथ-साथ आलोचना में भी बहुत काम किया। 'नयी कविता का आत्म संघर्ष' और 'नए साहित्य का सौंदर्यशास्त्र' जैसी महत्वपूर्ण किताबें इसका प्रमाण हैं। इसके बावजूद हिंदी आलोचना में उनका नाम आलोचक के रूप में उस तरह नहीं लिया जाता है जैसे अन्य आलोचकों का।
उ. इसकी एक वजह तो केंद्र में उनके कवि रूप का होना है। सामान्यत:, व्यक्ति के बहुआयामी रूपों में उसका जो केन्द्रीय रूप होता है, उसी की चर्चा अधिक होती है। इस सब के बावजूद मुक्तिबोध के आलोचक एवं अन्य साहित्यकार -रूपों की चर्चा भी हुई है। इसकी दूसरी वजह मुक्तिबोध की नयी आलोचना-दृष्टि भी रही है। वे जिस तरह से अपने समय की वास्तविक कविता लिख रहे थे, उसी तरह अपने समय की यथार्थवादी आलोचना भी। उनकी कविता की तरह उनकी नयी आलोचना के नवीन सौन्दर्य-सूत्र भी आसानी से समझ में नहीं आते, इस वजह से भी उनकी उपेक्षा हुई, जबकि उन्होंने जितनी ईमानदार आलोचना लिखी है उतनी उनके समय के आलोचकों ने नहीं लिखा। उनकी आलोचना में अपने समय पर सबसे पैनी नजर है। जिस व्यक्ति की कविता की ही उपेक्षा हुई, उसकी आलोचना पर कौन है जो चर्चा करेगा। दूसरे उनकी आलोचना रचनाकार के आचरण का सवाल उठाती है। अवसरवाद से लडऩे के लिए कहती है। अनेक तरह के असुविधाजनक सवाल पेश करती है। ऐसे माहौल में पद और सत्ता वाले लोग ही चर्चाओं के केन्द्र में रहते हैं। मुक्तिबोध के पास न कोई पद था ,न सत्ता का सहारा था। उनके पास थी ज्ञानसम्पन्न गरबीली गरीबी, जिसकी चर्चा करने वाले लोग अपवाद स्वरूप ही हुआ करते हैं।
प्र. मुक्तिबोध की आलोचना आपकी नजर में किस रूप में सबसे अधिक महत्वपूर्ण है ?
उ. अपने समय के सम्बंधों के स्वरूप को सही रूप में मानवता की दिशा में समझने की जीवन-दृष्टि और सौंदर्य की यथार्थवादी कला-दृष्टि, जिसमें व्यक्ति और समाज दोनों का द्वन्द्वामक महत्व रहता है। काव्य की रचना-प्रक्रिया का जितना वैज्ञानिक और मनोवैज्ञानिक विवेचन उनकी आलोचना में किया गया है, वह रचना को सही दिशा में ले जाने वाला है।
प्र. एक इतिहासकार के रूप में मुक्तिबोध को आप कहाँ पाते हैं?
उ. अपने अस्तित्वगत अभावों के चलते कुछ पैसों के लिए वे ऐसा लेखन करते थे। स्कूल शिक्षक तो थे ही और सामान्य परम्परावादी एक लीक पर चलने वाले शिक्षक भी नहीं थे। वे पहले से बनी बनायी धारणाओं की नयी व्याख्या और विश्लेषण करने वाले शिक्षक थे ताकि युवा विद्यार्थी का दृष्टिकोण बदल सके। वह दुनिया और अपने देश के इतिहास और संस्कृति को आधुनिक नजरिए के आलोक में समझ सके। माक्र्सवादी विचारधारा से यह दृष्टिकोण उन्होंने अर्जित किया था। इसी के आधार पर उन्होंने भारत : इतिहास और संस्कृति पुस्तक लिखी थी किन्तु प्रकाशकों की प्रतिस्पर्धा और दकियानूसी राजनीतिकों की मूढ़ता और जड़ता का इसे शिकार होना पड़ा। उस समय के सभी दक्षिणपंथी-मध्यपंथी सब एक हो गये या चुप लगा गये। मुक्तिबोध को तभी महसूस हुआ कि यह फासीवाद की आहट है। इससे उनकी चेतना और विवेक का नया कपाट खुला। इस घटना से उनका अवचेतन ही नहीं चेतन भी गहरे में प्रभावित हुआ। इतिहास-दृष्टि जिसके पास है वह इतिहासविद तो होता ही है। मुक्तिबोध की इतिहास-दृष्टि उनको इतिहासकारों की श्रेणी में रख सकती है। यद्यपि, इतिहास के काम को उन्होंने आगे नहीं बढ़ाया। उसका पूरा उपयोग साहित्य-सृजन में किया। इस पुस्तक को लिखकर उन्होंने अभिव्यक्ति का खतरा उठाया था और पुराने मठों और गढ़ों पर प्रहार किया था यानी सच्चाई को व्यक्त करने का हल्का-सा प्रयास किया था, किन्तु दकियानूसी लोगों के जमावड़े ने उसको विफल कर दिया। तब मुक्तिबोध ने दुखी होकर लिखा था, ''यह आंदोलन इतनी तेजी से बढ़ा, इतनी तेजी से फैला कि लगता है कि उसकी एक मशीनरी पहले से तैयार थी,जनसंघी,दक्षिणपंथी कांग्रेसी,उखड़े हुए नेता, नाराज प्रकाशक--इन सबकी तेज रफ्तार के चक्कर में खींचकर काम करने वाली यह मशीनरी अजीब है।