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Wednesday 23 Aug 2017

मुक्तिबोध की इतिहास दृष्टि

कहा जाता है कि मुक्तिबोध कवि से अधिक भविष्यद्रष्टा और भविष्यवक्ता थे और जिसका आधार था उनका विलक्षण इतिहास बोध । यही वजह है कि उनकी मशहूर कविता अँधेरे में के कुछ प्रसंग कोई दस साल बाद के भारतीय राजनीतिक परिदृश्य के वर्णन की तरह पढ़े गये और कुछ तो आज भी मौजूदा हालात के ब्योरे मालूम पड़ते हैं। उनमें बेचैनी और छटपटाहट तो साफ दिखती थी। उनमें कुछ कहने की बेचैनी जैसे लावा की तरह उबलती थी। पर किससे कहा जाय और क्या कहा जाय इसकी खोज उनके अंदर साथ-साथ चलती थी जिसकी उपज थी उनकी बेचैनी और छटपटाहट। हमारे समय के एक बड़े आलोचक रामविलास शर्मा ने मुक्तिबोध को अस्तित्ववादी कहा और उन्हें रुग्ण मन: स्थिति का कवि तक घोषित कर दिया जिसका तमाम आलोचकों ने प्रतिकार भी किया। किसी व्यक्ति की प्रशंसा में उन्हें भविष्यवक्ता अथवा भविष्यद्रष्टा कहना एक बात है पर कवि मुक्तिबोध का सचमुच अपनी रचनाप्रक्रिया और सम्पूर्ण रचनाधर्मिता में भविष्यवक्ता के रूप में परलक्षित होना दूसरी बात है जो ज्यादा मह्त्वपूर्ण है। विडम्बना देखिए कि मुक्तिबोध ने खुद को माक्र्सवादी कहा और माक्र्सवाद ही उनको समझने में सहायक होने से अधिक बाधक बन गया। उनकी रचनाएँ माक्र्सवादी कसौटी पर कितनी खरी उतरती हैं और उनकी माक्र्सवादी समझ कितनी दुरुस्त है इस पर देश के बौध्दिक खेमे में खासी बहस भी हुई है। मुक्तिबोध उस माक्र्सवाद से संतुष्ट नहीं थे जो उन्हें सोवियत स्रोतों से भारतीय संस्करणों में अवतरित होकर प्राप्त हुआ। यह संयोग ही था कि उनकी मुलाकात अग्नेष्का सोनी से हुई जो उस समय पोलैंड की एक शोधार्थी थी और भारत अपने शोध के सिलसिले में आयीं थी। उसके माध्यम से उन्हें साम्यवादी दुनिया में साहित्य और कला को लेकर चल रही बहस का अंदाजा मिला जो सिर्फ  सोवियत संघ तक सीमित नहीं थी। मुक्तिबोध अपने समकालीन लेखकों में शायद अकेले कवि थे जो सत्तारूढ़ माक्र्सवाद या साम्यवाद के साथ कला के द्वंद्व को समझने का प्रयास कर रहे थे। मुक्तिबोध की अप्रकाशित सामग्री में कुछ महत्वपूर्ण नोट्स मिले हैं जो उन पुस्तकों के अध्ययन पर आधारित हैं जो सोवियत साहित्य की आलोचना हैं। इन विस्तृत नोट्स से पता चलता है कि मुक्तिबोध माक्र्सवाद के सोवियत संस्करण से न सिर्फ  असहमत थे बल्कि उसके विरुध्द आलोचनात्मक तर्क भी तैयार कर रहे थे।

    मुक्तिबोध इस बात से भी भयभीत रहते थे कि सत्तासीन माक्र्सवादियों की आलोचना से कहीं साम्यवाद विरोधी पूंजीवादी ताकतों को बल न मिले। उनका सीधा सवाल था कि स्वतंत्र विचार व्यवहार और माक्र्सवाद या साम्यवाद में द्वंद्व क्यों है? स्वतंत्रता और सर्वहारा की तानाशाही के बीच विरोध था उसे कैसे पाटा जाय? इन सवालों के जवाब मुक्तिबोध खोज रहे थे। सामाजिक न्याय, समता और प्रत्येक को मानवोचित गरिमा का आदर्श वस्तुत:एक लक्ष्य है तो फिर पूंजीवादी व्यवस्था से मुक्ति की लड़ाई में किसी संशय का प्रश्न खड़ा नहीं होता। पर साम्यवादी वैश्विक समाज का रुख मानवोचित गरिमा के प्रति क्या है यह साफ  होना चाहिए। साम्यवाद और स्वतंत्रता के बीच जो द्वंद्व है वह कैसे दूर हो यह मुक्तिबोध की मुख्य चिंता थी। स्वतंत्रता और मानवोचित गरिमा मुक्तिबोध के लिए बहुत महत्व रखती थी। अग्नेष्का ने मुक्तिबोध को शिल्पकला पर एक पुस्तक भेंट की जिसकी भूमिका पढ़ कर मुक्तिबोध सुखद आश्चर्य में पड़ गये। मुक्तिबोध लिखते हैं कि मुझे यह जान कर आश्चर्य हुआ कि पोलिश लेखक और कलाकार केवल आर्ट की शब्दावली में सोचते हैं जबकि अमेरिका में ऐसा नहीं होता है और हिंदी वाले भी ऐसा नहीं करते और न ही रूस में ऐसा होता है। कला पर बात करने के लिए कला की अपनी भाषा हो मुक्तिबोध को इसमें कोई दुविधा नहीं थी। उनकी कविता अँधेरे में, का यह अंश उद्धृत करने योग्य है- स्वातंत्र्य व्यक्ति का वादी, छल नहीं सकता मुक्ति के मन को जन को। कहा जाता है कि मुक्तिबोध व्यक्ति की जगह वर्ग को तरजीह दे रहे थे, पर मुक्तिबोध के लिए वर्ग चेतना और व्यक्ति स्वातंत्र्य में कोई विरोध नहीं था। मुक्तिबोध माक्र्सवाद की तलाश कर रहे थे या नया माक्र्सवाद रच रहे थे यह बात उनकी अनूठी रचना, एक साहित्यिक की डायरी को खंगालने से पता चलता है जिसमें वे ग्राम्शी और माक्र्स की 1844 की पांडुलिपियों के निकट खड़े दिखाई देते हैं जबकि मुक्तिबोध न तो ग्राम्शी के लेखन से परिचित थे और न ही माक्र्स की पांडुलिपियों का अनुवाद उन तक पहुंचा था।

यह एक अजूबी बात है कि जैसे-जैसे समय बीतता जाता है मुक्तिबोध और समकालीन होते नजर आते हैं और उनकी कविताओं के पुनर्पाठ की जरुरत पड़ती है। उनका यह गुण मुक्तिबोध को और कवियों से अलग करता है। उनकी कविताओं का यही गुण उन्हें भविष्यदर्शी भी बनाता है और भविष्यदृष्टि इतिहास दृष्टि की कोख से जन्म लेती है। भविष्य वही देख सकता है जिसे इतिहास की गहरी पहचान हो और इतिहास की गहरी चाल समझता हो। इतिहास के साथ जीवित संवाद करने वाली कविताएँ सदैव सजीव बनी रहती हैं और यह खासियत मुक्तिबोध की कविताओं में बखूबी मौजूद है। उनकी उस दिन, कविता कुछ कम चर्चित कविता है, पर मुक्तिबोध की इतिहास दृष्टि समझने के लिहाज से यह कविता बेजोड़ है। इस कविता का सन्दर्भ 330 ईसा पूर्व घटित उस ऐतिहासिक घटना से है जब पर्सिपोलिस की लाइब्रेरी को सिकन्दर द्वारा जलाया जाता है। कहा जाता है कि पर्सिपोलिस की लाइब्रेरी जलाए जाने के पीछे एक सदी पहले एथेंस के एक्रोपोलिस (सर्वोच्च धार्मिक केंद्र) द्वारा विनाश का बदला लेने की भावना थी। कविता का एक अंश- कहाँ थे तुम कि जब दस मंजिलों वाली, दस गुम्बदों वाली सुलगती जा रही थी लाइब्रेरी पर्सिपोलिस की, हमारे गहन जीवन ज्ञान, मानव मूल्य के उस एक्रोपोलिस की। लेकिन तब के पर्सिपोलिस और आज के भारत में बड़ा अंतर यह है कि वहाँ विनाश मचाने के लिए विदेशी ताकतें थीं जबकि यहाँ अपने ही लोग हैं। यह कविता 1963 में लिखी गयी थी यानि भारत-चीन युध्द की समाप्ति के दो-तीन महीने बाद। उनकी इसी कविता के अगले अंश से 2014-15 का पाठक कितनी आसानी से जुड़ा महसूस कर सकता है। क्षितिज पर पोत डामर जब, गुलाबों, सूर्यमुखियों, पारिजातों पर छिड़क कर स्याह, गाढ़ा, कोलतारी द्रव, हमीं में से विदेशी सा, हमारे बीच का ही एक, नव-साम्राज्यवादी, लोभ के आवेश में आकर उजाड़े जा रहा है जिन्दगी की बस्तियां, तुम्हें क्या चाहिए पिस्तौल या वायलिन। मुक्तिबोध की तमाम कविताएँ गवाह है कि वे बदलाव के  एक ऐसे अस्त्र की तलाश में थे जिसमें वायलिन के स्वर निकलते हों। हथियारों की आलोचना का मुकाबला आलोचना के हथियारों से नहीं किया जा सकता और न ही इसे समझने के लिए माक्र्सवादी होने की जरुरत है। ध्यान से सुने तो मुक्तिबोध की कविता में ऐसे ही वायलिन के स्वर हैं जिसमें एक ओर बदलाव के लिए कठिन वैचारिक संघर्ष का माद्दा है तो दूसरी और संवेदना के गहनतम धरातलों तक पहुँचने की जिद। एक ओर ज्ञानात्मक संवेदनशीलता तो दूसरी ओर संवेदनात्मक ज्ञान। एक ओर आक्रोश और संकल्प तो दूसरी ओर जीवन-ज्ञान और मानव मूल्य। एक ओर सभ्यता-समीक्षा तो दूसरी ओर आत्म-आलोचना। एक ओर समाज और समय तो दूसरी ओर व्यक्ति और परिवार। एक ओर इतिहास तो दूसरी ओर भविष्य। एक ओर यथार्थ तो दूसरी ओर फैंटेसी। एक ओर जीवन तो दूसरी ओर कला। मुक्तिबोध के ये दोनों छोर अलग-अलग नहीं हैं बल्कि दोनों एक दूसरे से जुड़े हुए एक दूसरे पर निर्भर हैं। उनके बीच की द्वंद्वात्मक एकता ही मुक्तिबोध की कविता का माक्र्सवाद है। वह उनकी कविता का मूल स्वभाव है और यही उसकी अंत: प्रकृति भी है। माक्र्सवादी इतिहास दृष्टि और माक्र्सवादी भविष्य दृष्टि के बगैर न उनकी कविता संभव है और न ही उनकी कविता का अनुसंधान सम्भव है। ग्राम्शी की तरह मुक्तिबोध भी यह महसूस करते थे कि सांस्कृतिक वर्चस्व सामाजिक-राजनीतिक वर्चस्व बनाये रखने का उपकरण है। सांस्कृतिक वर्चस्व के जरिये ही उत्पीडि़त जनता से यथास्थिति के पक्ष में सहमति हासिल की जा सकती है और यही सहमति ही आर्थिक-सामाजिक-राजनीतिक वर्चस्व का मुख्य आधार होती है। सांस्कृतिक वर्चस्व के कारण उत्पीडि़त जन प्रभु वर्गों के विचारों से प्रभावित होते हैं। मुक्ति अभियान के लिए इन्हीं विचारों को संशोधित-सम्पादित कर अपने अनुकूल बनाना पड़ता है। प्रभु वर्ग पहले तो इन संशोधनों को नकारने और निरस्त करने की कोशिश करता है, इसके बावजूद अगर वे संशोधन लोकप्रियता हासिल कर लेते हैं तो उसके कुछ तत्वों को सिध्दांत के स्तर पर मान्यता देते हुए उन्हें एक नया रूप दे दिया जाता है। उसमें नये तत्व जोड़ दिये जाते हैं ताकि उसकी विद्रोही अंतर्वस्तु नष्ट हो जाय। सामाजिक-आर्थिक-राजनीतिक परिवर्तन के लिए सांस्कृतिक-बौद्धिक और वैचारिक संघर्ष प्राथमिक महत्व का विषय हैं। इसके बिना राजनीतिक संघर्ष का विफल होना अपरिहार्य है। ग्राम्शी की तरह मुक्तिबोध भी सामाजिक-राजनीतिक बदलाव में बुद्धिजीवियों की भूमिका का निर्णायक महत्व महसूस करते थे। उनकी कविताओं की थीम में बुद्धिजीवियों की भूमिका का जिक्र बार-बार इसीलिए आया है। पर आधुनिक छायावादी बौद्धिकता जिसने एक समय उत्तर भारत में वर्चस्व कायम किया था, सामन्ती संस्कारों की विरासत के खिलाफ  परिवर्तनकारी संघर्ष नहीं कर पायी। इसने स्वाधीनता, व्यैक्तिता और विश्वमानवतावाद के सिद्धांतों का गुणगान तो किया पर समता और संघर्ष को प्राथमिक मूल्यबोध के रूप स्थापित नहीं किया। इन प्रवृत्तियों ने आगे चल कर लोकतंत्र के भीतर लोकतांत्रिक मूल्यबोध को नष्ट करने की भूमिका निभायी और फासीवादी ताकतों के लिए रास्ते खोल दिये। मुक्तिबोध अकेले कवि हैं जिन्होंने इस सच्चाई से साक्षात्कार करने, इसे समझने और अनेक स्तरों पर इनसे जूझने और इसके पार जाने का उद्यम अपनी कविता में किया। मुक्तिबोध की कविता वे सवाल पूछती हैं जिनसे सब छलनाएँ उजागर हो जायें। वे अपनी कविताओं में मनुष्यता के, इतिहास के और उसकी नियति के प्रश्न के चित्र खींचते हैं। इन चित्रों में गति और आवेग होता है। इसमें इतिहास की टेढ़ी मेढ़ी चालें होती हैं और बारीक से बारीक अवलोकन होते हैं। जटिलताओं के गहन मकडज़ाल होते हैं और इन सबके बीच सबसे बुनियादी सवाल पैदा होते हैं। मुक्तिबोध इस अर्थ में आधुनिक गैर रोमानी कवि हैं कि वे कोई प्रश्नोत्तरी नहीं बनाते। कृत्रिम उत्तरों के लिए कृत्रिम प्रश्न नहीं उठाते बल्कि ऐसी सभी प्रश्नोत्तरियों को कविता के हथौड़े से तोड़ देते हैं। लोकतंत्र की त्रासदी के लिए मुक्तिबोध मुख्यत: बौद्धिक वर्ग को जिम्मेदार मनाते हैं। मुक्तिबोध आजादी के बाद की हिंदी कविता के प्रस्थान बिन्दु हैं। उनके बारे में यह भी कहा जाता है कि मुक्तिबोध ऐसे कवि हैं कि जिनका न कोई पूर्वज है और न वंशज।