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Monday 23 Oct 2017

मुक्तिबोध को पढ़ते हुए स्फुट विचार

(एक)

बहुत सारे सरल कहे जाने वाले कवियों को कितनी जनता पढ़ती है।  या वे कवि जनआन्दोलनों को कितनी ताब - ताकत दे पाते हैं। और बहुत से कठिन कहे जाने वाले कवियों में कितनी जनता नदारद है। या जनता की आकांक्षाओं या संघर्ष की तस्वीर धुंधली है। सवाल विषय और समय की जवाबदेही का बनना  चाहिये । और कवि के मानसिक-वैचारिक गठन के साथ उसकी अटूट निष्ठा किस जन की ओर है यह मूल्यांकित करने की जरुरत है। जबकि हम सरलता बनाम जटिलता का बौद्धिक विमर्श खड़ा करते हैं जो ऊपर से देखने में  जनमानस की ओर से अपना बयान पढ़ते प्रवक्ता का लगता है। और लगे क्यों न! क्योंकि आप ऐसी कविता की मांग करने लगते हैं जिससे समस्याओं /चुनौतियों का समाधान  निचुड़ कर बाहर आ जायेगा। भूल जाते हैं कविता जीवन अनुभूतियों -संवेदनाओं की  कलात्मक अभिव्यक्ति मात्र है। यह हमारे मनस्तन्तुओं के रेशे-रेशे को सहलाती ही नहीं झनझनाती भी है । कहीं ऐसा तो नहीं कि  कवि से (मुक्तिबोध )  महज सरलता की मांग जनता की जरुरतों से नहीं आपकी सपाट समझदारी से जन्मी है? मित्र! जब जीवन की जद्दोजहद इतनी उलझी हुई है तब उसकी अभिव्यक्ति महज रास्ता  बताने  वाली ही हो यह जरूरी नहीं ! हर कवि की सृजन प्रक्रिया  की जमीन  की विभिन्नता को  बाईपास कर बात करना रचना और रचनाकार को सरलीकृत करके  देखना  तो नहीं ? यह द्वन्द्वहीन पक्षधरता की परम्परागत  टेक तो नहीं  है; जिससे  नीचे आप उतरना ही नहीं चाहते। सैद्धांतिक ताकत के चलते नहीं बल्कि बदली हुई परिस्थिति का नये सिरे से मूल्यांकन न कर पाने के बौद्धिक आलस्य  या प्रमाद  के चलते  तो नहीं ! क्या इस पहलू से भी मुक्तिबोध की कविता पर विचार करने की जरुरत नहीं है ?

हमारा सवाल यह होना चाहिए कि वह  कवि-कलाकार जन आकांक्षाओं  से एकाकार होने की ओर उन्मुख है या नहीं? जब मुक्तिबोध कहते हैं कि हर मनुष्य के पास इतने अनुभव हैं कि उसे साहित्य में समेट पाना सम्भव नहीं है। विषयों की कमी नहीं है। और हम हैं कि कुछ नारों और कुछ सधी सधाई लकीरों के सहारे मानव जगत में सतत चलने वाले संघर्ष  को महज ऊपर- ऊपर से  शब्द भर दे पाते हैं और इसी को किसान -मजदूर से एकता बताते हुए गज-गजभर लम्बे अल्फाजों में प्रचारित करने में नध जाते हैं, और संतुष्ट हो जाते हैं। यहाँ मानवीय अनुभूतियों और उसके अन्तर्मन में चल रहे द्वन्द्वों के कितने  निकटस्थ हैं? यहाँ यह कवि जिसकी आत्मा मानवीय पीड़ा देखकर अधीर है। वो मनुष्य तह के अन्दर की तहें  देखने  के  लिए  गहराई  में हाथ डालना  चाहता  है।

मुझे कदम-कदम पर

चौराहे मिलते हैं

बाँहे फैलाये !!

एक पैर रखता हूं

कि सौ राहें फूटतीं

व मैं  उन सब पर से गुजरना  चाहता हूं ;

बहुत अच्छे लगते हैं

उनके तजुर्बे  और सपने

सब सच्चे लगते हैं

अजीब -सी अकुलाहट दिल में उभरती  है

मैं कुछ गहरे में उतरना  चाहता हूं

जाने क्या मिल जाये !! ""

(दो)

मुक्तिबोध के रचनात्मक जगत को हम अक्सर असहज/ दुर्बोध जटिल आदि विशेषणों से विभूषित करके आगे बढ़ जाते हैं। उन्हें जनपक्ष का महान कवि बताते बताते या तो कुछ तमगे जड़ देते हैं या किन्हीं जनकवि की तुलना में कमतर साबित कर अपनी सहृदयता प्रकट करते मिलते हैं। क्या हम कभी भी मुक्तिबोध के गद्य-पद्य में बिखरे तमाम उन सूतों को सुलझाने की कोशिश भी करते हैं जहाँ वे बारम्बार परिवर्तन का  परिणाम देखने के आदी स्वभाव की आलोचना करते हैं और परिवर्तन की प्रक्रिया को देखने समझने की बात करते हैं। जब जीवन सतत गतिशील है तब उसकी जीवंत कलात्मक अभिव्यक्ति की धड़कन कैसी होगी। एक साहित्यिक की डायरी  में  जब वे कहते  हैं कि - भारतीय जीवन की भीतरी गति का आपके साहित्य में प्रतिबिंब  हो या न हो, उसकी तलाश में हो या न हो, वह गति आपसे कन्नी काटकर निकल  जायेगी। यानि साहित्य में मौजूद जीवन से पहले वास्तव यथार्थ और उनमें चल रहे सामाजिक-राजनीतिक परिवर्तन की प्रक्रिया पर जब हम गौर फरमायेंगे   तभी उन अन्त:सूत्रों की गतिकी समझ पायेंगे, लेकिन हम हैं कि अपने बने -बनाये फर्मा में, परिवर्तन के परिणामों, को सेट कर देखना चाहते हैं। जबकि जीवन है कि वह इसी बीच दो कदम आगे बढ़ चुका होता है और हम फिर नये फर्मा में उसे सेट करने की चाहत समोये उसमें कुछ बीनते बटोरते मिलते हैं। हम मुक्तिबोध की कविता में पसरे मनस्तन्तुओं को उनसे नि:सृत सपनों को दबोच लेने की असफल कोशिश करते हैं जब हम उस मनोभाव या सृजनात्मक क्षण को परिणामवादी दृष्टि से हल करने की कोशिश करते हैं तब  उनकी कविता से हमें  अकसर मनचाहा कुछ मिल नहीं पाता फलत: तमाम नेकनीयती के बावजूद हम उनकी कविता को तोहमतों से लैस करते मिलते हैं। साथी समस्या वहाँ नहीं आपके देखने के तरीके में है।

(तीन)

विभिन्न व्यक्तियों के लिए सृजन-प्रक्रियाएं भिन्न-भिन्न हैं, विभिन्न युगों में सृजन-प्रक्रियाएं अलग-अलग होती है। विभिन्न साहित्य-प्रकारों के लिए भी सृजन-प्रक्रियाएं भिन्न-भिन्न होती हंै। (मुक्तिबोध)। हम अक्सर किसी कवि का मूल्यांकन उसकी  सृजन प्रक्रिया की  विविधता और विशिष्टता के बजाय सामान्यीकरण से करते हैं। रचनात्मक अनुगूंज में उसकी अपनी जमीन क्या है! उस कवि की कविता में आये बिम्ब -प्रतीक की प्रकृति क्या है उसकी गूँज उस कविता में तैर रही है या नहीं । आदि आदि। अमूमन एक राग एक ढंग में अनफिट कलाकार की कलाकृति अनफिट करार दी जाती है। जबकि उसकी विशिष्टता क्या है इसकी पहचान नदारद मिलती है। इस पद्धति दोष ने यांत्रिक आलोचना को ही बढ़ावा दिया है। शायद ! जबकि सामान्य से विशिष्ट और विशिष्ट से सामान्य की आवाजाही की प्रकृति क्या है? इसकी भी जाँच-पड़ताल  करें तो रोचक बातें देखने को मिल सकती हैं। जैसे निराला और मुक्तिबोध के लेखन की आन्तरिक प्रकृति। गद्य और कविता के बीच अपने विषय को लेकर बराबर की आवाजाही और पात्र चयन में स्वयं की सक्रिय हिस्सेदारी।

(चार)

मुक्तिबोध सतत अपने आप की वास्तविक भूमिका की तलाश करने  की  कोशिश करते मिलते हैं। कविता में भी  जीवन में भी। यही जद्दोजहद उन्हें अपने आप से बहसतलब सी करती मिलती  है  यही चीज उनकी आकांक्षा को सबसे घनीभूत रुप में उनकी कविता प्रकट करती है। जब जीवन और कर्म में अलग-अलग खांचा बनाकर रचनारत कवि/लेखक उन्हें आत्मग्रस्त या आत्मग्लानि का कवि बताते हैं तब आश्चर्य नहीं क्योंकि वे मुक्तिबोध के पास आकर नहीं समझते बल्कि बाहर से अपने तयशुदा वैचारिक हथियारों के निकष पर कसने की कोशिश करते हैं ।क्या नहीं ?"""

नहीं चाहिये मुझे हवेली

नहीं चाहिए मुझे इमारत ;

     नहीं चाहिये मुझको मेरी

      अपनी सेवाओं की कीमत

नहीं चाहिए मुझे दुश्मनी

करने कहने की बातों की

         नहीं चाहिए वह आइना

           बिगाड़ दे जो सूरत मेरी

बड़े-बड़ों के इस समाज में

शिरा-शिरा कम्पित होती है

       अहंकार है मुझको  भी  तो

              मेरे भी गौरव की भेरी

यदि न बजे इन राजपथों पर

तो क्या  होगा !! मैं  न मरुंगा

कन्धे पर  पानी  की काँवड़

का यह भार अपार  सहूँगा !!  ""

(पाँच)

निराला युग के बाद के तमाम बड़े- बड़े कवियों में से कितने कवि हैं, जो व्यवस्था को प्रश्नांकित करने के साथ ही खुद को और खुद के वर्गीय विच्युतियों  को प्रश्नांकित करते मिलते हों। गर कोई एक कवि दिखता है तो सिर्फ मुक्तिबोध।

(छह)

घनीभूत अभिव्यक्ति के पीछे मौजूद  जिन्दा विचार को उसी क्षण में प्रकट कर देने की अकुलाहट है मुक्तिबोध की कविता। मुक्तिबोध जब कविता में कर्ता की तलाश करते हुए उसके, कर्म और क्रिया  के  बीच अन्तर्सम्बन्धों को देखने की बात करते हैं वहाँ महज सतह पर के यथार्थ पर टिक जाने को नहीं बल्कि उस जीवन की तह में जाने और उसकी गतिशीलता में नये नये सवालों और अनुत्तरित प्रश्नों से सामना करने की बात भी करते हैं। क्या इस निगाह से भी उनकी कविता को देखने-परखने की कोशिश की जा

सकती है ?

(सात)

मुक्तिबोध गहन विचारबोध के कवि हैं। उनकी कविता की संशिलष्टता  और जटिलता हमारे पूंजीवादी उत्पादन सम्बन्धों के  जमाने की अभिव्यक्ति  है। इतने रेशों में विभक्त जीवन की अभिव्यक्ति कई बार हमें और गहरे उतरकर सोचने की ओर उन्मुख करती है। और तो और निराला तक कविता में सरलता की मांग करने वाले पाठकों के लिए अलग से शिक्षण-प्रशिक्षण की बात करते थे मसलन आज कविता समझने  के लिए महज मोटा मोटी दो दुना चार कहके काम नहीं चला सकते। अपनी वर्गीय सीमाबद्धताओं से जितना मुक्तिबोध ने संघर्ष किया उतना शायद ही किसी अन्य कवि ने किया। वे  उन पर महज  व्यंग्य करके चुपा नहीं गये बल्कि उन्हें मरणशील समाज की प्रवृति बताकर लगातार प्रश्नांकित भी  करते  रहे। या यूं कहें मुक्तिबोध आधुनिक निम्न मध्यवर्ग के लेखक थे अपने अन्तर्द्वन्दों के साथ। अब कोई यह कहे कि उनमें किसान जीवन नहीं है, आदिवासी जीवन नहीं है आदि आदि। तब हमें यह भी  देखना होगा कि उनमें निम्नमध्यवर्गीय जीवन और मेहनतकश अवाम के सवाल की प्रकृति  कैसी  और उसकी टोन  की दिशा  क्या है ! असल में यह पूंजीवादी तंत्र को कटघरे में खड़ा करते हुए जितनी स्पष्टता और तेवर से मौजूद है, वह दूसरे तमाम कवियों में कमतर ही है।  आज पचास साल बाद भी मुक्तिबोध की कविता अपने समय को बहुत गहराई से बयान करती मिलती है यह उस कवि की अपने उभर रहे नये वर्ग को नजदीकी से पहचान की वजह भी है प्रमाण भी। अगर महज सरलता के अभाव में नकार दिया जाना होता तो मुक्तिबोध की कविता कब की भुला दी गयी होती। कितने आक्रमण और कितने आरोपों के बावजूद वे संघर्षशील अवाम के ही कवि माने जाते हैं ।

और अन्त में -

पैरों के नखों से या डण्डे की नोक से

धरती  की धूल में भी  रेखाएँ खींचकर

तसवीर बनती हैं

बशर्ते  कि जिंदगी के चित्र सौ

बनाने  का चाव हो ,

श्रद्धा हो,  भाव हो  ।""

 (चाँद का मुँह टेढ़ा है, से )

  यह वर्ष   हमारे प्रिय  साहित्यकार गजानन माधव मुक्तिबोध का  जन्मशताब्दी वर्ष है। पिछले पचास साल से जिस कवि की कविता और आलोचना  से सीखते जूझते अपने मानक तय करने में लगा हमारा हिंदी जगत आज भी मुक्तिबोध के सीधे सवाल- पार्टनर आपकी पालिटिक्स क्या है?  के सामने खड़ा मिलता है। यह सवाल एक यक्ष प्रश्न की तरह बारबार हमसे मुखातिब है। जीवन और कर्म को अलग-अलग खांचों में फिट करते साहित्यिक जन इन सवालों से कन्नी काटते मिलते हैं इसके बरक्स साहित्यकार  के अलग-अलग चरित्रों का बखान-गान करते मिलते हैं।  और करें क्यों न ! क्योंकि यह सवाल महज एक पंक्ति में लिखा वाक्य भर नहीं है जिसे भरीपूरी आवाज में पढ़कर हम मुक्त जायें। ये सवाल हमसे पूछता है कि हे !लेखक जन !हे कला कोविद ! आप क्यों लिखते हैं वह कौन सी चाहत है जो तुमसे लिखाती है और किसके लिये लिखते हो? यानि आपकी सामाजिक भूमिका क्या है? क्योंकि लिखना या रचना वैयक्तिक कर्म होने के बावजूद सामूहिक गतिविधि है। उसका निहितार्थ समाज की कीमत पर और सामाजिक भूमिका में ही फलित होना होता है। और समाज के किस तानेबाने को बदलना चाहते हो ? इसीलिये आज मुक्तिबोध के नामलेवा तो तमाम हैं लेकिन उस सजल उर शिष्य की पीड़ा को समझने वाले कम हैं। जो साहित्यिक  जन कल तक डोमा जी उस्ताद की पुस्तक का विमोचन  करते गदगद हैं वहीं किसी प्रगतिशील मंच पर जन की मुक्ति का पाठ पढ़ाती कविता पर सारगर्भित व्याख्यान देते मिल रहे हैं। ऐसे अन्तर्विरोधों व्यक्तित्वों के लिये मुक्तिबोध का पूरा लेखन एक चुनौती की तरह पीछा करता है। अपने अन्दर चलने वाले द्वन्द्वों और अपने सामाजिक व्यक्तिगत आकांक्षाओं को इस कवि ने कभी  छुपाया नहीं  न ही दार्शनिक वैचारिक वाग्जाल से उस पर परदा डालने की कोशिश की । यही सजीवता और सतत सचेतनता उनकी रचनात्मकता  का प्राण  है जब वे कहते हैं कि -

तुम्हारे पास

हमारे पास सिर्फ एक चीज है

बुद्धि का बल्लम है , हृदय की तगारी है

बनाने के लिए भवन आत्मा के  मनुष्य के नये नये

ऐसे कवि को महज याद करके काम नहीं चलेगा बल्कि उन सवालों पर  नये सिरे सोचते हुए व्यवहार में उतरने  की जरुरत है। तभी मुक्तिबोध के स्मरण का वास्तविक महत्व है। मुझे लगता है मुक्तिबोध को आइकान बनाकर  या ढाल बनाकर पिछले पचास एक साल में पक्ष-विपक्ष में तमाम बातें हुईं, अब जरुरत है उन बातों के बरक्स एक बार मुक्तिबोध के साथ बैठा जाय। मुक्तिबोध के गद्य और कविता में फैले  विचारों और सामाजिक तनावों के पीछे की दुनिया से सचमुच का नाता जोड़ा जाय  यह आसान नहीं है। जिस प्रकार एक कवि होना- मुक्तिबोध सा। यानि अपने आप को खराद पर चढ़ाता  हुआ कवि होना सहज नहीं है। लेकिन और कोई शार्टकट राह मुक्तिबोध तक पहुंच पाने की है भी नहीं। यह यात्रा हमें अपने बूते खुद ही करनी पड़ेगी। रचनात्मक यात्रा और रचनात्मक यातना  खुद  ही सहनी पड़ती है। यह रस्सी के पुल पर चलकर  पार करनी  है

पार  करो  पर्वत  -संधि -गह्वर,

रस्सी  के पुल  पर  चलकर

दूर उस शिखर-कगार पर स्वयं ही पहुंचो ठ्ठ